उपग्रह के प्रकार, अर्थ, उपयोग इत्यादि आसान भाषा में

अंतरिक्ष के बारे में जानने की जिज्ञासा ने इंसान को उस मुकाम पर पहुंचा दिया है जहां से वे दूसरे ग्रह पर जाने की बात सोच सकते हैं। और इस सब में उपग्रह की भूमिका अतुलनीय रही है।

पहले भारत इस दिशा में भले ही धीमा रहा हो लेकिन अब उसने अभी अपनी रफ्तार पकड़ ली है। इसरो (ISRO) आज विश्व के टॉप अंतरिक्ष एजेंसियों में से एक है।

इस लेख में हम मुख्य रूप से उपग्रह के प्रकार इसके उपयोग और भारत द्वारा छोड़े गए उपग्रहों पर सरल एवं सहज चर्चा करेंगे, तो लेख को अंत तक जरूर पढ़ें।

उपग्रह

| उपग्रह किसे कहते हैं?

उपग्रह कोई खगोलीय पिंड या फिर मशीन हो सकती है जो किसी ग्रह या तारे की परिक्रमा करता है। उदाहरण के लिए, पृथ्वी को एक उपग्रह कह सकते है क्योंकि यह सूर्य की परिक्रमा करती है। इसी तरह से, चंद्रमा एक उपग्रह है क्योंकि यह पृथ्वी की परिक्रमा करता है। इसके अलावा इंसानों द्वारा निर्मित बहुत सारी मशीनें जो कि किसी विशेष कार्य के लिए अंतरिक्ष में भेजे जाते हैं, वो भी उपग्रह है।

पृथ्वी और चंद्रमा प्राकृतिक उपग्रहों के उदाहरण हैं। वहीं जो मशीनें इंसानों द्वारा अंतरिक्ष में भेजे जाते हैं उसे कृत्रिम या मानव निर्मित उपग्रह कहा जाता है। मानव निर्मित उपग्रह अलग-अलग आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु बनाए जाते हैं, जैसे कि कुछ को तस्वीरें लेने के लिए बनाया जाता है तो कुछ को मौसम की भविष्यवाणी एवं नेविगेशन आदि के लिए।

| भारत में उपग्रहों का इतिहास

अंतरिक्ष के प्रति लोगों में जिज्ञासा प्राचीन काल से ही रही है और पीढ़ी दर पीढ़ी ये जिज्ञासा बढ़ती ही गयी। ये बढ़ती जिज्ञासा कब जरूरत बन गयी पता ही नहीं चला और अब तो ये ज़िंदगी का एक हिस्सा है। कुछ देशों ने तो अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्रों में वाकई झंडे गाड़ दिये है। खैर भारत भी देर-सवेर इस क्षेत्र में आ ही गया और अब भारत भी इस क्षेत्र में झंडे गाड़ रहा है।

भारत में अन्तरिक्ष कार्यक्रम का आरंभ 1962 में प्रसिद्ध अन्तरिक्ष वैज्ञानिक डॉ. विक्रम साराभाई की अध्यक्षता में गठित भारतीय राष्ट्रीय अन्तरिक्ष अनुसंधान समिति के गठन के साथ हुआ। 1963 में केरल के थुंबा में साउंडींग रॉकेट लौंचिंग फैसिलिटी सेंटर की स्थापना भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। 21 नवम्बर, 1963 को भारत ने अपना पहला रॉकेट ‘नाइक एपाश’ प्रक्षेपित किया।

15 अगस्त, 1969 को इसी भारतीय राष्ट्रीय अन्तरिक्ष अनुसंधान समिति को पुनर्गठित कर भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान संगठन (Indian Space Research Organization), जिसे हम आज इसरो (ISRO) कहते हैं; की स्थापना की गयी।

अन्तरिक्ष अनुसंधान को स्वतंत्र अस्तित्व प्रदान करने के लिए 1972 में अन्तरिक्ष आयोग तथा अन्तरिक्ष विभाग का गठन किया गया। 19 अप्रैल 1975 को प्रयोग के तौर पर आर्यभट्ट नामक उपग्रह को अंतरिक्ष में भेजा गया और इसके बाद इसरो ने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और आज इसरो दुनिया के टॉप अंतरिक्ष एजेंसियों में से एक है।

आज इस लेख में जानेंगे की उपग्रह कितने प्रकार के होते हैं लेकिन जैसा कि हम जानते हैं कि सैटेलाइट पृथ्वी की कक्षा (orbit) में घूमते हैं, इसीलिए यहाँ पृथ्वी की कक्षाओं के बारे में जान लेना जरूरी है।

| पृथ्वी की कक्षाएँ (earth orbits)

पृथ्वी की कक्षाएँ मुख्य रूप से तीन प्रकार की होती हैं: उच्च पृथ्वी की कक्षा (high earth orbit), मध्यम पृथ्वी की कक्षा (medium earth orbit) और निम्न पृथ्वी की कक्षा (low earth orbit)

पृथ्वी की सतह से 160 से 2000 किलोमीटर तक की ऊंचाई क्षेत्र को निम्न पृथ्वी की कक्षा (low earth orbit) कहा जाता है। 2000 किलोमीटर से लेकर लगभग 36000 किलोमीटर तक कि ऊंचाई क्षेत्र को मध्यम पृथ्वी की कक्षा (medium earth orbit) कहा जाता है। 36,000 किलोमीटर और उससे ऊपर के कक्षीय क्षेत्र को उच्च पृथ्वी की कक्षा (high earth orbit) कहा जाता है।

कुल मिलाकर यहाँ कहने का अर्थ ये है कि जब भी कोई सैटेलाइट छोड़ा जाएगा तो इन्ही कक्षाओं में से किसी में भेजा जाएगा। पृथ्वी की उच्च कक्षा में भेजा गया सैटेलाइट स्थिर होता है यानी कि जब भी धरती से उसे हम देखेंगे तो वो हमें हमेशा एक ही स्थान पर स्थित दिखायी देगा।

दरअसल उच्च कक्षा में स्थित उपग्रह 24 घंटे में पृथ्वी का एक चक्कर पूरा करता है, और इतने ही समय में पृथ्वी भी अपने धुरी पर एक चक्कर लगा लेता है; यही कारण है कि इस कक्षा में स्थित उपग्रह पृथ्वी से स्थिर दिखायी देता है।

उपग्रह की भू-स्थिर कक्षा

निम्न कक्षा और मध्यम कक्षा में भेजा गया सैटेलाइट इतनी तेजी से पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं, कि वे आकाश में लगातार एक निश्चित बिंदु पर दिखाई नहीं देते हैं। निम्न कक्षा का उपग्रह लगभग 90 मिनट में ही पृथ्वी की एक परिक्रमा कर लेता है। वहीं मध्यम कक्षा का उपग्रह पृथ्वी का एक चक्कर लगाने में 2 से 8 घंटे का समय लेता है। निम्न भू-कक्षा का उपग्रह कुछ इस तरह से चक्कर लगाता है;

उपग्रह की निचली कक्षा

| उपग्रह के प्रकार 

उपग्रहों की स्थिति के आधार पर देखें तो इसे निम्नलिखित भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है;

| सूर्य-तुल्यकालिक उपग्रह (Sun-synchronous satellite)

सूर्य-तुल्यकालिक उपग्रह निम्न भू-कक्षा (Lower Earth Orbit) का एक उपग्रह है, जो पृथ्वी से 1000 किमी की उससे नीचे की ऊँचाई पर स्थित होती है। इस प्रकार का सैटेलाइट हमेशा एक ही स्थानीय समय पर एक ही स्थान पर आ जाता है – उदाहरण के लिए, अगर कोई सूर्य तुल्यकालिक उपग्रह दिन के 10 बजे दिल्ली के ऊपर से गुजरता हुआ दिखायी देता है तो फिर से अगले दिन वो 10 बजे ही दिल्ली के ऊपर दिखायी देगा। आमतौर पर ये एक विशेष प्रकार की ध्रुवीय कक्षा (polar orbit) में उत्तर से दक्षिण दिशा में घूमता है, इसीलिए इसे ध्रुवीय उपग्रह (polar satellite) भी कहा जाता है;

उपग्रह की ध्रुवीय कक्षा

| भू-स्थिर उपग्रह (geo-stationary satellite)

पृथ्वी की उच्च कक्षा में चक्कर लगाने वाली ये उपग्रह भूमध्य रेखा के लगभग 36,000 किलोमीटर ऊपर पृथ्वी की गति की दिशा में (पश्चिम से पूर्व) लगभग 24 घंटे में अपना एक चक्कर पूरा करती है।

एक एकल भू-स्थिर उपग्रह पृथ्वी की सतह के लगभग 40 प्रतिशत भाग  पर नजर रख सकता है। ऐसे तीन उपग्रह, जिनमें से प्रत्येक को 120 डिग्री देशांतर से अलग किया जाय तो यह पूरे ग्रह का कवरेज प्रदान कर सकता है।

भू-स्थिर

| भू-समकालिक उपग्रह (geo-synchronous satellite)

ये भू-स्थिर उपग्रहों (geo-stationary satellites) के समान ही कार्य करता है बस इसमें कुछ झुकाव (inclination) होता है। जैसा कि आप नीचे के तस्वीर में देख भी सकते हैं।  

भू-समकालिक
  • कार्य के आधार पर उपग्रहों को निम्नलिखित प्रकारों में बांटा जा सकता है;

| संचार उपग्रह (Communication satellite)

संचार उपग्रह मानव निर्मित बहुत ही महत्वपूर्ण उपग्रह है, ये एक ट्रांसपोंडर (transponder) के माध्यम से रेडियो दूरसंचार सिग्नल को प्रसारित और प्रवर्धित (amplified) करता है। दरअसल ट्रांसपोंडर उपग्रह में लगा एक ऐसा डिवाइस होता है जो सिग्नल को रिसीव भी करता है और उसे संचारित (transmit) भी करता है।

उदाहरण के लिए मान लीजिये एक टीवी चैनल द्वारा एक प्रोग्राम ब्रोडकास्ट किया जाता है तो सबसे पहले उसका सिग्नल उपग्रह में लगे ट्रांसपोंडर द्वारा रिसीव किया जाएगा और फिर उसे धरती पर संचारित कर दिया जाएगा। धरती पर लगे डिश एंटीना द्वारा उसे रिसीव कर लिया जाएगा।

संचार उपग्रहों को भूस्थिर कक्षा (geostationary orbit) में स्थापित किया जाता है ताकि हमेशा वो पृथ्वी के किसी एक भाग को लक्षित करके सिग्नल भेजता रहे। इसका फायदा ये होता है कि डिश एंटीना को बार-बार घुमाना नहीं पड़ता है बल्कि उसे किसी एक खास दिशा में फिक्स करके छोड़ दिया जाता है और वो काम करते रहता है। संचार उपग्रहों का उपयोग टेलीविजन के अलावा टेलीफोन, रेडियो, इंटरनेट और सैन्य अनुप्रयोगों के लिए किया जाता है।

⏫भारत द्वारा अब तक 40 से अधिक संचार उपग्रहों को छोड़ा गया है, अगर आप सभी उपग्रहों के बारे में जानना चाहते हैं तो यहाँ क्लिक करके इसरो के साइट पर देख सकते हैं।

| वैज्ञानिक उपग्रह (Scientific Satellite)

वैज्ञानिक उपग्रहों को खोजों और शोध कार्यों में इस्तेमाल में लाया जाता है। इसकी मदद से चुम्बकीय क्षेत्र, अंतरिक्ष विकिरण, पृथ्वी और उसके वायुमंडल, सूर्य या अन्य सितारों, ग्रहों और उनके चंद्रमाओं, एवं अन्य खगोलीय पिंडों से संबन्धित घटनाओं पर डेटा प्राप्त किया जाता है और जरूरी शोध-कार्यों में इसका इस्तेमाल किया जाता है। जैसे कि नासा का पार्कर सोलर प्रोब और इसरो का आदित्य एल 1 जो कि सूर्य के अध्ययन से संबंधित है। 

| मौसमी उपग्रह (Weather Satellite)

मौसम संबंधी सूचनाओं के लिए वायुमंडलीय परिस्थितियों का अध्ययन करने वाले पार्थिव उपग्रहों को मौसमी उपग्रह कहते हैं। इस प्रकार के उपग्रह ध्रुवीय परिक्रमा (polar orbit) वाले भी हो सकते हैं और भूस्थैतिक (geostationary) भी।

इन मौसमी उपग्रहों में लगे यंत्र बादलों के आर-पार भी मौसम संबंधी जानकारी प्राप्त करने की क्षमता रखते हैं। इसके अलावा ये अन्य घटनाओं जैसे शहर की रोशनी, आग, प्रदूषण के प्रभाव, रेत और धूल के तूफान, बर्फ के आवरण एवं महासागरीय धाराओं आदि से संबंधित जानकारी भी उपलब्ध कराता है। इंडिया का Insat 3D इसी प्रकार का एक उपग्रह है।

| दूरसंवेदी उपग्रह (Remote Sensing Satellite)

रिमोट सेंसिंग का मतलब बिना किसी भौतिक संपर्क के या फिर बिना उस साइट पर जाये वहाँ से संबंधित किसी वस्तु या घटना के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त करना है। रिमोट सेंसिंग तकनीक का इस्तेमाल कई क्षेत्रों में किया जाता है, जैसे कि भूमि सर्वेक्षण में, सैन्य एवं खुफिया जानकारी जुटाने में, वाणिज्यिक एवं आर्थिक क्षेत्रों में एवं अन्य मानवीय अनुप्रयोगों में। इसी तरह का काम जब किसी उपग्रह द्वारा किया जाता है तो उसे रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट कहा जाता है।

जब सैटेलाइट द्वारा धरती पर स्थित किसी वस्तु पर सिग्नल प्रचारित किया जाता है और इसके प्रतिबिंब को सेंसर द्वारा प्राप्त कर लिया जाता है तो इसे सक्रिय इसे रिमोट सेंसिंग कहा जाता है। लेकिन जब सेंसर द्वारा सूर्य के प्रकाश का प्रतिबिंब पता लगाया जाता है तो उसे निष्क्रिय रिमोट सेंसिंग कहा जाता है। भारत का Cartosat-1 इसी तरह का एक सैटेलाइट है।

| मैरीसैट उपग्रह (Marine Satellite)

मैरीसैट उपग्रह समुद्री जलयानों के नाविकों को संकट की प्रत्येक घड़ी में रेडियो संकेतों द्वारा दिशा-ज्ञान और निर्देश देते है। इस प्रकार के उपग्रहो से वे दूसरे जलयानों के नाविकों एवं अपने मुख्यालय से भी संपर्क कर सकते है। 

| नौवहन उपग्रह (Navigation Satellite)

नौवहन उपग्रह (navigation satellite) वे सैटेलाइट है जो रोज जरूरत पड़ने वाली जानकारियां जैसे कि लाइव ट्रैफिक, डिस्टेन्स मेजर, लाइव लोकेशन आदि उपलब्ध करवा कर हमारे जीवन को आसान बनाती है। 

ये आमतौर पर बहुत सारे सैटेलाइटों का एक समूह होता है जो कि जो कि क्षेत्रीय या वैश्विक स्तर पर नौवहन संबंधित जानकारी मुहैया करवाता है। जैसे कि GPS की बात करें तो ये अमेरिका द्वारा संचालित एक वैश्विक नौवहन उपग्रह है।

हम जिस गूगल मैप का इस्तेमाल करते हैं वो GPS पर ही आधारित है। भारत के पास भी इस प्रकार की कुछ उपग्रहें है, जिसे कि आप नीचे देख सकते हैं?

| जी.पी.एस. समर्थित भू संवर्धित नौवहन (गगन) [GPS Aided Geo Augmented Navigation(GAGAN)]

इसका नाम थोड़ा लंबा है लेकिन ये गगन के नाम से जाना जाता है। गगन नागरिक उड्डयन के क्षेत्र में इस्तेमाल में लाया जाता है। ये आवश्‍यक परिशुद्धता एवं विश्‍वसनीयता के साथ उपग्रह आधारित नौवहन सेवाएं मुहैया कराता है। भारतीय वायु क्षेत्र में बेहतर वायु यातायात प्रबंधन मुहैया कराना, गगन के मुख्‍य उद्देश्‍य हैं। 

| भारतीय प्रादेशिक नौवहन उपग्रह प्रणाली (IRNSS) : नाविक (NaVic)

अमेरिका की GPS की तरह यह भारत का अपना लोकल GPS प्रणाली है। जैसा कि इसके नाम में ही प्रादेशिक लगा हुआ है; ये बस भारत को केन्द्रित करके बनाया गया है न कि पूरे विश्व को। इसका ऑपरेशनल नाम यानी कि उपयोग में लाया जाने वाला नाम NavIC – NAVigation with Indian Constellation है। 

इसे उच्चस्तरीय नौवहन सुविधाएं उपलब्ध कराने हेतु डिज़ाइन किया गया है और ये सटीक रियल टाइम स्थिति (Position) बताने में सक्षम है। ये अभी सफलता पूर्वक कार्य भी कर रहा है लेकिन पब्लिक के इस्तेमाल के लिए ये अभी पूरी तरह से उपलब्ध नहीं है। [विस्तार से IRNSS NaVic के बारे में जानें]

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