Voting behavior in India (मतदान व्यवहार: अर्थ, प्रभाविता इत्यादि)

इस लेख में हम मतदान व्यवहार (Voting behavior) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे और इसके विभिन्न पहलुओं को समझने की कोशिश करेंगे। तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें।
Voting behavior

मतदान व्यवहार का अर्थ

आखिर क्या सोचकर लोग वोट करता है?, कौन सी चीज़ किसी किसी व्यक्ति को किसी के पक्ष में वोट डालने को बाध्य करता है? आखिर कुछ तो कारण रहता ही होगा इस सब के पीछे।

जी हाँ! ऐसे ढ़ेरों कारण हो सकते हैं जैसे कि सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक इत्यादि जो कि मतदान करते समय लोग ध्यान में रखता है। तो कुल मिलाकर उस समय किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह का जो मनोभाव होता है जो कि उसके मतदान के माध्यम से प्रकट होता है उसे मतदान व्यवहार (Voting behavior) कहा जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो ऐसा कोई भी कारक जो किसी मतदाता के मतदान के समय के व्यवहार को तय करता हो।

सार्वजनिक चुनाव में लोग किस प्रकार वोट देते हैं, इससे संबंधित अध्ययन क्षेत्र ही मतदान व्यवहार है और इसमें वे कारण भी शामिल हैं कि लोग मतदान उसी प्रकार क्यों करते हैं।

प्लानो एण्ड रिग्स

मतदान व्यवहार को ऐसे व्यवहार के रुप में परिभाषित किया जा सकता है जो कि मतदाता की पसंद, प्राथमिकता, विकल्पों, विचारधाराओं, चिंताओं, समझौतों तथा कार्यक्रमों को साफ-साफ प्रतिबिम्बित करता है जो कि विभिन्न मुद्दों से जुड़े होते हैं और समाज तथा राष्ट्र से संबन्धित प्रश्नों से संबन्धित होते है।

ओइनम कुलाबिधु

चुनाव विश्लेषण (सेफोलॉजी) राजनीतिक विज्ञान की एक शाखा है जिसमें मतदान व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है। मतदान व्यवहार और उसका अध्ययन क्यों जरूरी है आइये इसे कुछ पॉइंटों से समझते हैं।

मतदान व्यवहार का महत्व (The importance of voting behavior)

यह राजनीतिक समाजीकरण की प्रक्रिया को समझने में सहायक होता है। मान लीजिये किसी निर्वाचन क्षेत्र में बीजेपी उम्मीदवार भारी बहुमत से जीतता है। सिर्फ इतनी सी बात से बहुत कुछ पता किया जा सकता है जैसे कि या तो वोट मोदी के नाम पर दिया, अगर ऐसा है तो आप समझ सकते है कि करिश्माई छवि वाला फैक्टर कितना काम करता है। या तो धर्म के आधार पर लोगों ने उसे वोट दिया होगा, या फिर जाति के नाम पर। ऐसे ढ़ेरों कारण हो सकते है जिससे ये पता किया जा सकता है कि चुनाव के समय किस प्रकार लोगों का राजनैतिक समाजीकरण हुआ है।

◾यह समाज के उच्च वर्गों के साथ-साथ आमजनों में भी लोकतंत्र के प्रति धारणा की जाँच करने में सहायक होता है। कई लोग अधिकार या दायित्व भाव के साथ वोट गिराने जाते हैं लेकिन वहीं कुछ वोट गिराते ही नहीं या फिर नोटा दबा देते हैं, इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे कि उम्मीदवार पसंद न आना, सरकार से नाराजगी, ये सोचना कि मेरे वोट डालने या न डालने से क्या हो जाएगा? इत्यादि।

◾यह इस बात पर भी प्रकाश डालता है कि चुनावी राजनीति किस हद तक अतीत से जुड़ी है या विच्छेदित (Dissected) है। हम हर बार नोटिस करते है कि एक केंद्रीय मुद्दा होता है जिस के इर्द-गिर्द ही चुनावी राजनीति घूमती रहती है। कभी गरीबी पर, तो कभी रोजगार पर और कभी विकास के नाम पर चुनाव लड़ा जाता है। कभी राजनीतिक दलों के पास्ट रिकॉर्ड पर, तो कभी वर्तमान के प्रदर्शन पर।

◾यह राजनीतिक विकास के संदर्भ में आधुनिकता अथवा प्राचीनता को मापने में सहायता करता है और निर्णय निर्माण की क्रिया को दर्शाता है।

मतदान व्यवहार प्रभावित और निर्धारित करने वाले कारक (Factors affecting and determining voting behavior)

भारतीय समाज अपने प्रकृति एवं रचना में अत्यंत विविध है। इसलिए भारत में मतदान व्यवहार (voting behavior) को प्रभावित करने वाले इतने कारक है की सब की चर्चा करना भी मुश्किल है। समझने की दृष्टि से आइये हम इसके मुख्य सामाजिक-आर्थिक कारक तथा राजनीतिक कारकों पर चर्चा करते हैं।

जाति (caste): जाति मतदाताओं के व्यवहार को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक है। समाज में आधुनिकता आने के बावजूद भी जाति वोट देने में एक महत्वपूर्ण फैक्टर के रूप में काम करता है। आज भी राजनीतिक दल अपनी चुनावी रणनीति बनाते समय जाति के कारक को हमेशा ध्यान में रखते हैं। वे किसी खास जाति बाहुल्य क्षेत्र में उसी जाति के उम्मीदवार को उतारते है।

कभी जाति राजनीति को प्रभावित करता है तो कभी राजनीति जाति को प्रभावित करता है। रजनी कोठारी के अनुसार – “भारतीय राजनीति जातिवादी है तथा जाति राजनीतिकृत है।

पॉल ब्रास ने इसकी व्याख्या अच्छे से की है। “स्थानीय स्तर पर देहात में मतदान व्यवहार का सबसे महत्वपूर्ण कारक जातीय एकता है। बड़ी और महत्वपूर्ण जातियाँ अपने चुनाव क्षेत्र में अपनी ही जाति के किसी नामी-गिरामी सदस्य को समर्थन देती है या ऐसे राजनीतिक दल को समर्थन देती है जिनसे उनकी जाति के सदस्य अपनी पहचान स्थापित करते हैं।”

धर्म (religion): भारत में धर्म एक अन्य महत्वपूर्ण कारक है जो मतदान व्यवहार (voting behavior) को प्रभावित करता है। जाति जहां किसी छोटे से भाग में अपना प्रभाव दिखा सकती है धर्म एक बड़े भाग में अपना प्रभाव दिखाता है। क्योंकि कई बार अंतरजातीय गठबंधनों के कारण जातीय पक्ष थोड़ा कमजोर हो जाता है लेकिन धार्मिक पक्ष अपना रंग दिखाना शुरू करता है।

राजनीतिक दल सांप्रदायिक प्रचार में शामिल होते हैं और मतदाताओं की धार्मिक भावनाओं का शोषण करते हैं। अनेक सांप्रदायिक पार्टियों के होने से धर्म का भी राजनीतिकरण हुआ है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होते हुए भी कोई दल चुनावी राजनीति में धर्म के प्रभाव की अवहेलना नहीं करता।

भाषा (language): भाषायी विचार लोगों के मतदान व्यवहार (voting behavior) को कितना प्रभावित कर सकता है। इसका उदाहरण आप इस रूप में देखिये कि जैसे ही दक्षिण भारत में हिन्दी को चलाने की बात होती है द्रविडियन भाषा वाले लोग एक हो जाते हैं। यहाँ तक कि पहला राज्य भी भाषा के आधार पर ही अलग हुआ था। चुनाव के दौरान राजनीतिक दल लोगों की भाषायी भावनाएं उभारकर उनके निर्णय को प्रभावित करते हैं।

धन (money): मतदान व्यवहार की व्याख्या करते हुए धन या पैसा की अनदेखी नहीं की जा सकती है। चुनावी खर्चो पर सीमा बांधने के बावजूद करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। मतदाता अपने मत के बदले पैसा या शराब या कोई और वस्तु चाहता है। लेकिन ये हर बार काम नहीं करता कई बार ये देखा जाता है कि मतदाता किसी और से पैसे लेकर किसी और को वोट दे देते हैं, या फिर कई बार ये भी होता है कि अचानक से रातों-रात जन भावनाएं बदल जाती है और लोग मतदान दिवस के दिन किसी और को वोट डाल कर आ जाते हैं।

क्षेत्र (region): क्षेत्रवाद तथा उप-क्षेत्रवाद की भी मतदान व्यवहार में महत्वपूर्ण भूमिका है। उप-राष्ट्रीयता की संकीर्ण भावनायें अनेक राज्यों में क्षेत्रीय दलों के उदय का कारण बनी है। इस प्रकार के क्षेत्रीय दल क्षेत्रीय अस्मिताओं तथा भावनाओं के आधार पर मतदाताओं से मत की अपील करते हैं। हालांकि ये बहुत ज्यादा सीटें तो नहीं जीत पाते हैं लेकिन किसी क्षेत्र विशेष में ये अपना प्रभुत्व स्थापित कर लेते है और कभी-कभी अलगाववाद को भी हवा देते हैं।

व्यक्तित्व (individuality): किसी दल के किसी नेता का करिश्माई व्यक्तित्व भी मतदान व्यवहार को प्रभावित करता है। जैसे कि – जवाहर लाल नेहरु, इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी, जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी तथा नरेन्द्र मोदी की ऊँची छवि ने मतदाताओं को उनके दलों अथवा उनके द्वारा समर्थित दलों के पक्ष में मत देने के लिए प्रभावित किया। उसी प्रकार राज्य स्तर पर भी क्षेत्रीय दल के नेता का करिश्माई व्यक्तित्व चुनावों में लोकप्रिय समर्थन का महत्वपूर्ण कारक रहा है।

पॉल ब्रास ने वेब इलेक्सन जिसे कि हमलोग लहर भी कहते है; को इस प्रकार परिभाषित किया है, “वेब इलेक्सन वह है जिसमें मतदाताओं के बीच एक ही दिशा में एक प्रवृत्ति बननी शुरू होती है जो कि किसी एक राष्ट्रीय दल अथवा उसके नेता के पक्ष में होती है। यह किसी एक मुद्दे पर अथवा अनेक मुद्दों पर आधारित होती है।” जैसे कि मोदी लहर आदि।

एंटी-इंकम्बेन्सी फैक्टर (Anti-incumbency factor): एंटी-इंकम्बेन्सी का सीधा-सीधा मतलब यही है कि सत्ताधारी दल के कार्य प्रदर्शन से असंतोष। ये असंतोष कई कारणों से उभरता है, जैसे कई टर्म तक सत्ता में रहना, घोषित वादों को पूरा न कर पाना, सत्ताधारी दल पर किसी प्रकार का अनैतिक दाग लग जाना आदि। उदाहरण के लिए 1977 में कांग्रेस पार्टी की हार, 2018 के छतीसगढ़ विधानसभा चुनाव में बीजेपी की हार, 2014 में बीजेपी की जीत आदि।

विचारधारा (ideology): किसी राजनीतिक दल द्वारा पोषित विचारधारा भी मतदाता के निर्णय को प्रभावित करती है। कुछ लोग समाज में कुछ विचारधाराओं, जैसे – साम्यवाद, पूँजीवाद, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, देशभक्ति तथा विकेन्द्रीकरण आदि के प्रति प्रतिबद्ध होते हैं। ऐसे लोग उन्हीं दलों के उम्मीदवारों को मत देते हैं जो उनकी विचारधारा से मेल खाते हैं।

अन्य कारक (other factors): ऊपर प्रस्तुत कुछ बड़े कारकों के अतिरिक्त कुछ अन्य छोटे एवं सूक्ष्म कारक भी होते हैं जो भारतीय मतदाता के मतदान व्यवहार को निर्धारित करते हैं। जैसे कि – चुनाव पूर्व घटी कुछ राजनीतिक घटनाएँ, उदाहरण के युद्ध, किसी नेता की हत्या, भ्रष्टाचार की अपकीर्ति आदि। आपको याद होगा कि 2019 में लोकसभा चुनाव से पूर्व हुए बालाकोट एयर स्ट्राइक से मतदाताओं के व्यवहार में कितना परिवर्तन आया था।

चुनाव के समय की आर्थिक दशाएँ, जैसे महंगाई, खाद्य की कमी, बेरोजगारी आदि भी एकाएक मतदाता के मूड को बदल देता है।

भावनात्मक जुड़ाव (Emotional connection) की भी मतदान व्यवहार निर्धारित करने में एक भूमिका है। जो लोग किसी दल के साथ अपनी पहचान जोड़्ते हैं, वे लाख कमियों एवं खूबियों के बावजूद उसी दल के लिए मतदान करेंगे।

इसके अलावा मीडिया की भूमिका, परिवार की भूमिका, व्यक्तिगत हित, आदि भी ऐसे ही कारक है। यहाँ मीडिया की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है, इसे समझते हैं।

चुनाव एवं मतदान व्यवहार में मीडिया की भूमिका (Role of Media in Election and Voting behavior)

सूचना प्रसार (information dissemination): चुनाव की घोषणा, नामांकन, जाँच, चुनाव अभियान, सुरक्षा व्यवस्था, चुनाव कब, कहाँ व कैसे की जानकारी, मतगणना तथा परिणाम की घोषणा, उम्मीदवारों की शैक्षणिक एवं आर्थिक स्थिति तथा उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि संबंधी सूचनाओं आदि सबको व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार की जरुरत होती है और मीडिया ये काम बड़ी ही सहजता से करती है।

यहाँ तक कि अंतिम समय में हुए परिवर्तनों, मतदान आयोजनों, आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन, चुनावी खर्च सीमा का उल्लंघन, किसी प्रकार की कोई दुर्घटना अथवा अशांति आदि की सूचना न केवल आम लोगों को, बल्कि चुनाव आयोग को भी मीडिया से ही मिलती है।

आदर्श आचार संहिता एवं अन्य क़ानूनों के क्रियान्वयन पर नजर रखना:

ये राजनैतिक दलों एवं उसके उम्मीदवारों पर नजर बनाए रखते हैं और किसी भी प्रकार के अनैतिक गतिविधियों एवं लागू नियम-कानूनों की अवहेलना पर तुरंत रिपोर्ट करते है। मीडिया के इन उल्लंघन संबंधी रिपोर्टों का चुनाव आयोग उसी प्रकार संज्ञान लेता है जैसे कि किसी औपचारिक शिकायतों का। आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct)↗️ को विस्तार से जाने…

हालांकि मीडिया को खुद कुछ जरूरी नियम-कानून को मानना पड़ता है और उसी के अनुसार अपना काम पड़ता है। जैसे कि जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951↗️ की धारा 126A के तहत मीडिया एक्ज़िट पोल तथा परिणामों को प्रथम चरण के चुनाव शुरू होने के पहले और अंतिम चुनाव के सम्पन्न होने के आधा घंटा के बाद तक प्रसारित नहीं कर सकता है।

सरकारी मीडिया की भूमिका

चुनाव आयोग का प्रसार भारती के साथ अच्छा तालमेल है जिसके अंतर्गत मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय एवं राज्यस्तरीय दलों को निःशुल्क प्रसारण समय प्रदान किया जाता है ताकि चुनाव प्रचार-प्रसार के मामले में बराबरी के आधार पर लड़ा जा सके। इसके अलावा मतदाता जागरुकता प्रसार में भी प्रसार भारती अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

मतदाता शिक्षण एवं सहभागिता को सुनिश्चित करना (Ensuring voter education and participation):

काफी मतदाताओं को चुनाव संबंधी ढेरों समस्याएँ होती है जैसे कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने, पहचान पत्र, मतदान केंद्र, EVM का उपयोग आदि। हालांकि चुनाव आयोग खुद बड़े पैमाने पर अलग-अलग माध्यमों से इन सब से संबन्धित जागरूकता अभियान चलाता है पर चूंकि मीडिया की पहुँच बहुत ही व्यापक होती है इसीलिए ये एक ही बार में बहुत ही बड़े वर्ग को जागरूक कर पाता है।

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