स्वास्तिक क्या है? इसका धार्मिक महत्व क्यों हैं?

इस लेख में हम स्वास्तिक पर सरल एवं सहज चर्चा करेंगे एवं जानेंगे कि इसका धार्मिक महत्व क्यों हैं, ये इतना पवित्र क्यों है? आदि।

तो इस तथ्य को अच्छी तरह से समझने के लिए लेख को अंत तक जरूर पढ़ें साथ ही साइट पर उपलब्ध अन्य दिलचस्प तथ्यों को भी जानें।

स्वास्तिक

स्वास्तिक को पुण्य का प्रतीक क्यूँ माना जाता है? 

बहुत समय पहले मैंने एक मूवी में हिटलर के नाजी सेना के झंडे और बाहों पर स्वास्तिक चिन्ह को देखा। मैं हैरान था कि ये तो हिंदुओं का प्रतीक चिन्ह है पर उसे मूवी में इस तरह से क्यों दिखाया जा रहा है? हालांकि बाद में जब मैंने इस पर थोड़ी सी रिसर्च की तो कुछ और ही पता चला।

बौद्ध धर्म में भी स्वस्तिक के चिन्ह को अपनाया गया है। बौद्ध धर्म में, स्वस्तिक को बुद्ध के पैरों के निशान का प्रतिनिधित्व करने के लिए माना जाता है। 

जैन धर्म में भी स्वास्तिक चिन्ह को अपनाया गया है। जैन संप्रदाय में लाल,पीले एवं श्वेत रंग से अंकित स्वस्तिक का प्रयोग होता रहा है ।

मेसोपोटामिया सभ्यता में इसका इस्तेमाल सिक्कों पर किया जाता था। यह अफ्रीका और एशिया में प्राचीन मिट्टी के बर्तनों पर पाया गया है।

इसे जर्मनिक और वाइकिंग संस्कृतियों में भी अपनाया गया। 19 वीं और 20 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, स्वस्तिक पश्चिमी संस्कृति में अच्छी तरह से प्रतीक के रूप में स्थापित हो गया।

और तब पता चला कि क्यों हिटलर ने इस प्रतीक का इस्तेमाल किया। हालांकि हिटलर ने स्वस्तिक का उपयोग नफरत फैलाने के लिए किया पर हिन्दू धर्म के लिए ये एक पुण्य प्रतीक है।

स्वास्तिक का मतलब

स्वस्तिक शब्द सु+अस्ति+क से बना है। यानी शुभ करने वाला । मूल संस्कृत में इसका इसका अर्थ है “कल्याण के लिए अनुकूल।”

इसमें चारों दिशाओं में जाती रेखाएँ होती है, जो दाई ओर मुड़ जाती हैं। धन चिन्ह(प्लस) बना कर उसकी चारों भुजाओं के कोने से समकोण बननेवाली एक रेखा दाहिनी ओर खींचने से स्वास्तिक बन जाता है।

इसका धार्मिक महत्व

भारतीय संस्कृति में लाल रंग का महत्व है इसीलिए हिंदुओं के व्रतों, पर्वों, त्योहारों, पुजा एवं हर मांगलिक अवसर पर इसे सिंदूर, रोली या कुमकुम से स्वस्तिक अंकित किया जाता है।

इसका सामान्य अर्थ शुभ, मंगल एवं कल्याण करनेवाला है। सिंधु घाटी की सभ्यता में ऐसे स्वास्तिक चिन्ह मिले हैं। हिन्दू धर्म में स्वास्तिक श्री गणेश का प्रतीक भी है। इसीलिए सभी मंगल-कार्यों मे इसे सबसे पहले बनाया जाता है।

इसे रसोईघर, तिजोरी, स्टोर, प्रवेशद्वार, मकान, दुकान, पूजास्थल एवं कार्यालय हर जगह बनाया जाता है।

ऐसा कहा जाता है कि रेखा खींचने का कार्य ऊपरी भुजा से प्रारम्भ करना चाहिए।

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