इस लेख में हम रिट (Writ) तथा रिट के प्रकार पर सरल एवं सहज चर्चा करेंगे, एवं इसके विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं को समझने का प्रयास करेंगे, तो अच्छी तरह से समझने के लिए इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें साथ ही संबंधित अन्य लेखों को भी पढ़ें।

ये लेख ‘संवैधानिक उपचारों के अधिकार (Right to constitutional remedies)‘ यानी कि अनुच्छेद 32 वाले लेख का कंटिन्यूएशन है। इसलिए इस लेख को समझने से पहले उसे जरूर पढ़ें।

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रिट क्या है? (What is a Writ ?)

रिट, उच्चतम और उच्च न्यायालय को प्राप्त एक प्रकार का विशेषाधिकार है जो कि उच्चतम एवं उच्च न्यायालय को मौलिक अधिकारों के हनन को रोकने एवं उसका प्रवर्तन (Enforcement) कराने की शक्ति देता है।

दूसरे शब्दों में कहें तो रिट एक लिखित औपचारिक ऑर्डर है जिसे किसी प्राधिकृत संस्था द्वारा जारी किया जाता है। भारत में ये संस्था है उच्च और उच्चतम न्यायालय।

◾मूल अधिकार तब तक किसी काम का नहीं है जब तक उसे संरक्षण न मिले और उसे लागू कराने के लिए कोई प्रभावी मशीनरी न हो।

उच्च न्यायालय तथा उच्चतम न्यायालय एक मशीनरी की तरह कार्य करता है और रिट उसका एक टूल है जिसकी मदद से वे मूल अधिकारों का सही क्रियान्वयन सुनिश्चित करता है।

◾यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि चूंकि अनुच्छेद 32 स्वयं में एक मूल अधिकार है इसलिए उच्चतम न्यायालय इसे नकार नहीं सकता है।

मतलब ये कि कोई भी अगर मूल अधिकारों के हनन से संबन्धित याचिका उच्चतम न्यायालय में दायर करता है तो उच्चतम न्यायालय सुनवाई से इंकार नहीं कर सकता है।

वहीं अगर उच्च न्यायालय की बात करें तो वे अपने रिट संबंधी न्याय क्षेत्र के क्रियान्वयन को नकार भी सकता है क्योंकि उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के तहत मूल अधिकारों के हनन के मामले में सुनवाई करता है जो कि एक मूल अधिकार नहीं है।

रिट के प्रकार (Types of Writ )

उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय पाँच प्रकार के रिट जारी कर सकते हैं – बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas corpus), परमादेश (mandamus), प्रतिषेध (prohibition), उत्प्रेषण (certiorari) एवं अधिकार पृच्छा (quo warranto)। आइये इसे एक-एक करके समझते हैं;

1.बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus)

इसे लैटिन भाषा से लिया गया है इसका मतलब होता है ‘प्रस्तुत किया जाए या सामने लाया जाए (Be presented or brought forth),

अगर किसी व्यक्ति को राज्य द्वारा या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा जबरन हिरासत में रखा गया है और उस व्यक्ति ने मूल अधिकारों के हनन के बेसिस पर याचिका दायर की है तो न्यायालय इस स्थिति में बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट जारी कर सकता है।

अगर न्यायालय हिरासत को कानून सम्मत (Lawful) नहीं पाता है तो फिर उस व्यक्ति को तुरंत ही रिहा कर दिया जाता है लेकिन अगर हिरासत कानून सम्मत है तो ये रिट जारी नहीं किया जा सकता।

◾ बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट किसी सार्वजनिक प्राधिकरण (Public authority) या किसी व्यक्ति दोनों के विरुद्ध जारी किया जा सकता है।

लेकिन ये कुछ मामलों में जारी नहीं किए जाते हैं जैसे,

  • (1) अगर हिरासत विधि सम्मत हो तो ये जारी नहीं किया जा सकता
  • (2) अगर कार्यवाही किसी विधानमंडल या न्यायालय की अवमानना के लिए हुई हो,
  • (3) अगर हिरासत न्यायालय के न्यायक्षेत्र के बाहर हुई हो।

1976 में एक बहुचर्चित मामला सुप्रीम कोर्ट आया था जिसे हीबियस कॉर्पस मामला या फिर ADM जबलपुर vs शिवकान्त शुक्ला मामला कहा जाता है।

ये एक जबरन हिरासत का मामला था पर सुप्रीम कोर्ट ने जो निर्णय उस समय दिया, उसे सुप्रीम कोर्ट के सबसे खराब निर्णयों में गिना जाता है। क्या था पूरा मामला इसके लिए आप दिये गए लेख पढ़ सकते हैं।

2. परमादेश (Mandamus)

इसका मतलब है ‘हम आदेश देते है (We order/command)’। यह एक ऐसा आदेश है जो सार्वजनिक इकाईयों (Public units), अधीनस्थ न्यायालयों (Subordinate courts), निगमों (Corporations), प्राधिकरणों (Authorities) और सरकार (Government) को जारी किया जाता है।

ये क्यों जारी किया जाता है?

जब न्यायालय को ये लगता है कि ऊपर लिखित संस्था या संस्थान ठीक से अपना काम नहीं कर रही है या फिर, जब कोई व्यक्ति कोई काम लेकर इन संस्था या संस्थानों के संबन्धित अधिकारी पास जाते है और वे उसे करने से मना कर देते है।

ऐसी स्थिति में परमादेश जारी किया जाता है ताकि उनसे उसके कार्यों और उसे नकारने के संबंध में पूछा जा सकें और ऐसी गलतियों को सुधारा जा सकें।

परमादेश की रिट कौन दायर कर सकता है?

कोई भी व्यक्ति चाहे वह एक व्यक्ति हो या एक निजी निकाय परमादेश के रिट के तहत अदालती याचिका दायर कर सकता है, जब तक कि संबंधित मामले में उनके पास ऐसा करने का कानूनी अधिकार है।

◾ वैसे यहाँ एक बात याद रखना जरूरी है कि परमादेश कुछ क्षेत्रों में जारी नहीं किया जा सकता, जैसे –

(1) यह आमतौर पर एक निजी संस्था के खिलाफ प्रयोग करने योग्य नहीं होता है जब तक कि इसे सार्वजनिक कर्तव्य नहीं सौंपा जाता है। यानि कि एक व्यक्ति या एक निजी निकाय के विरुद्ध परमादेश जारी किया जा सकता है अगर इसे एक सार्वजनिक कर्तव्य सौंपा गया है।

(2) ऐसे विभाग जो गैर-संवैधानिक है, या जिसमें वैधानिक बल नहीं है

(3) भारत के राज्यों के राज्यपाल और राष्ट्रपति के विरुद्ध,

(4) उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध,

(5) ऐसे कार्य जिसका किया जाना विवेक पर निर्भर करता हो,

(6) एक संविदात्मक दायित्व लागू (Contractual liability) करने के लिए इसे लागू नहीं किया जा सकता।

सोहनलाल बनाम भारत संघ (1957) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि परमादेश का रिट केवल एक निजी व्यक्ति या संगठन के खिलाफ लागू होगा यदि यह साबित हो जाता है कि वह एक सार्वजनिक प्राधिकरण के साथ एकीकृत है।

3. प्रतिषेध (Prohibition)

प्रतिषेध का शाब्दिक अर्थ होता है रोकना

इसे किसी उच्च न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालयों को या अधिकरणों को अपने न्यायक्षेत्र से बाहर के न्यायिक कार्यों को करने से रोकने के लिए जारी किया जाता है।

जैसे कि – अगर कोई अनुमंडलीय न्यायालय किसी दोषी को फांसी की सज़ा सुना दे तो उच्च न्यायालय उसे रोक सकता है। क्योंकि फांसी की सजा उसके न्याय क्षेत्र से बाहर की चीज़ है।

◾ यहाँ ये बात याद रखने योग्य है कि ये सिर्फ न्यायिक और अर्ध-न्यायिक प्राधिकरणों के विरुद्ध ही जारी किए जा सकते है। किसी अन्य प्राधिकरणों या इकाईयों के विरुद्ध इसे जारी नहीं किया जा सकता।

4. उत्प्रेषण (Certiorari)

इसका शाब्दिक अर्थ है ‘प्रमाणित होना (To be certified)’ या ‘सूचना देना (To inform)’ है।

ये भी कुछ-कुछ प्रतिषेध की तरह ही है पर इसमें जो मुख्य अंतर है वो ये है कि जहां प्रतिषेध किसी अधीनस्थ न्यायालय द्वारा अपने न्यायिक क्षेत्र का अतिक्रमण रोकने के लिए जारी किया जाता है, वहीं उत्प्रेषण एक उच्च न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालयों को या अधिकरणों को लंबित मामलों के स्थानांतरण के लिए जारी किया जाता है।

मतलब ये कि जब भी किसी उच्च न्यायालय को लगता है कि किसी खास मामले की सुनवाई और उसका पुनरावलोकन (Review) उसे खुद करनी चाहिए जबकि वो मामला किसी निचली अदालत में होता है तो ऐसी स्थिति में कोई भी उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय उत्प्रेषण जारी कर वो मामला अपने पास मँगवा लेता है।

◾ यहाँ पर एक बात ध्यान रखने योग्य है कि ये न्यायिक प्राधिकरणों के अलावा, व्यक्तियों के अधिकार को प्रभावित करने वाले प्रशासनिक प्राधिकरणों के खिलाफ भी जारी किया जा सकता है। हालांकि ये निजी व्यक्तियों या इकाइयों पर लागू नहीं होता है।

5. अधिकार पृच्छा (Quo warranto)

इसका शाब्दिक अर्थ है, ‘प्राधिकृत या वारंट के द्वारा (Authorized or by warrant)’। वैसे इसे Right of inquiry भी कहा जाता है।

जिसके तहत न्यायालय ये जांच कर सकता है कि कोई व्यक्ति जिस किसी भी सार्वजनिक पद पर है वो उस पद पर रहने के अधिकारी है या नहीं।

या फिर दूसरे शब्दों में कहें तो उस पद पर रहते हुए जो निर्णय लिए है, वो लेने के अधिकारी है कि नहीं।

इसमें न्यायालय उस व्यक्ति से पूछ सकता है कि आप किस अधिकार के तहत या फिर किस शक्ति का प्रयोग करके किसी अमुक कार्य को किया है या फिर निर्णय लिया है।

◾ इसे किसी मंत्री के कार्यालय या निजी कार्यालय के लिए जारी नहीं किया जा सकता। दूसरी बात ये कि इसे कोई भी इच्छुक व्यक्ति जारी करने के लिए कह सकता है।

उच्चतम एवं उच्च न्यायालय के रिट संबंधी कार्य क्षेत्र में भिन्नता

जैसे कि हमने ऊपर भी बात की है कि उच्चतम न्यायालय की तरह उच्च न्यायालय को भी रिट जारी करने का अधिकार है लेकिन दोनों के रिट जारी करने के कार्यक्षेत्र में कुछ अंतर है, जो कि निम्नलिखित है –

1. उच्चतम न्यायालय को रिट जारी करने का अधिकार अनुच्छेद 32 के तहत मिला है (जो कि खुद एक मौलिक अधिकार है) और उच्चतम न्यायालय सिर्फ मूल अधिकारों के लिए ही रिट जारी कर सकता है।

जबकि उच्च न्यायालय की बात करें जिसे कि रिट जारी करने का अधिकार अनुच्छेद 226 के तहत मिलता है, वो मूल अधिकारों के अलावे किसी अन्य सामान्य कानूनी अधिकारों के लिए भी रिट जारी कर सकता है।

2. उच्चतम न्यायालय किसी व्यक्ति या फिर सरकार के विरुद्ध रिट जारी कर सकता है जबकि उच्च न्यायालय अपने राज्य के व्यक्ति या सरकारों के अलावे दूसरे राज्य के विरुद्ध भी जारी कर सकता है।

3. चूंकि अनुच्छेद 32 स्वयं में एक मूल अधिकार है इसलिए उच्चतम न्यायालय इसे नकार नहीं सकता है। मतलब ये कि कोई भी अगर मूल अधिकारों के हनन से संबन्धित याचिका उच्चतम न्यायालय में दायर करता है तो उच्चतम न्यायालय सुनवाई से इंकार नहीं कर सकता है।

वहीं अगर उच्च न्यायालय की बात करें तो वे अपने रिट संबंधी न्याय क्षेत्र के क्रियान्वयन को नकार भी सकता है क्योंकि उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के तहत मूल अधिकारों के हनन के मामले में सुनवाई करता है जो कि एक मूल अधिकार नहीं है।

तो कुल मिलाकर यही है रिट (Writ), उम्मीद है समझ में आया होगा। अन्य कई महत्वपूर्ण लेखों का लिंक नीचे दिया गया है उसे भी विजिट करें, और क्विज जरूर दें।

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Chapter Wise Polity Quiz

रिट के प्रकार और उसके कार्य क्षेत्र अभ्यास प्रश्न

  1. Number of Questions - 8
  2. Passing Marks - 75 %
  3. Time - 6 Minutes
  4. एक से अधिक विकल्प सही हो सकते हैं।

Can the Supreme Court issue writs only for the enforcement of fundamental rights?

1 / 8

क्या उच्चतम न्यायालय केवल मूल अधिकारों के क्रियान्वयन को लेकर ही रिट जारी कर सकता है?

Consider the following statements regarding Writ and choose the correct statements.

  1. The President can suspend Article 32 under Article 359 during national emergency.
  2. The High Court has the power to issue writs under Article 226.
  3. If the State Legislature wants, it can also extend the right to issue writs.
  4. At present there are 5 writs in existence.

2 / 8

रिट के संबंध में निम्न कथनों पर विचार करें और सही कथनों का चुनाव करें।

  1. राष्ट्रपति, राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 359 के तहत अनुच्छेद 32 को स्थगित कर सकता है।
  2. उच्च न्यायालय को अनुच्छेद 226 के तहत रिट जारी करने का अधिकार प्राप्त है।
  3. राज्य विधानमंडल चाहे तो रिट जारी करने के अधिकार का विस्तार भी कर सकती है।
  4. अभी फ़िलहाल 5 रिट अस्तित्व में है।

3 / 8

इनमें से कौन सा एक रिट नहीं है?

Which of the following is correct regarding Mandamus?

  1. It means we give orders.
  2. It can be issued only to the government.
  3. If any institution is not doing its work properly then it can be issued.
  4. It cannot be issued against a private company.

4 / 8

परमादेश के संबंध में इनमें से क्या सही है?

  1. इसका मतलब है हम आदेश देते हैं।
  2. इसे केवल सरकार को जारी किया जा सकता है।
  3. कोई संस्था ठीक से अपना कार्य नहीं कर रहा है तो इसे जारी किया जा सकता है।
  4. इसे निजी कंपनी के विरुद्ध जारी नहीं किया जा सकता।

Which of the following statements is correct with respect to entitlement?

  1. Under this, the court can investigate whether any person holding any public post is entitled to hold that post or not.
  2. It is issued for the office of a minister or for a private office.
  3. Any interested person can ask to issue it.
  4. The court can issue it only with the consent of the Parliament.

5 / 8

अधिकार पृच्छा के संबंध में निम्न में से कौन सा कथन सही है?

  1. इसके तहत न्यायालय ये जांच कर सकता है कि कोई व्यक्ति जिस किसी भी सार्वजनिक पद पर है वो उस पद पर रहने के अधिकारी है या नहीं।
  2. इसे किसी मंत्री के कार्यालय या निजी कार्यालय के लिए जारी किया जाता है।
  3. इसे कोई भी इच्छुक व्यक्ति जारी करने के लिए कह सकता है।
  4. न्यायालय इसे सिर्फ संसद की सहमति से ही जारी कर सकता है।

Which of the following is correct regarding Habeas Corpus?

  1. It means to be presented.
  2. It pertains to forcible detention.
  3. It can be issued only against public authority.
  4. If the detention is not lawful, the person can be released.

6 / 8

बंदी प्रत्यक्षीकरण के संबंध में इनमें से क्या सही है?

  1. इसका मतलब होता है प्रस्तुत किया जाए।
  2. ये जबरन हिरासत में रखें जाने से संबंधित है।
  3. इसे केवल सार्वजनिक प्राधिकरण के विरुद्ध जारी किया जा सकता है।
  4. अगर हिरासत विधि सम्मत न हो तो व्यक्ति को छोड़ा जा सकता है।

Which of the following is correct regarding prohibition?

  1. It means maintaining the status quo.
  2. It is issued by a High Court to prevent subordinate courts from performing judicial functions outside their jurisdiction.
  3. It can be issued only against judicial and non-judicial authorities.
  4. The Supreme Court is required to issue a reasonable amount of prohibition every year.

7 / 8

प्रतिषेध के संबंध में निम्न में से क्या सही है?

  1. इसका अर्थ होता है यथास्थिति बनाए रखना।
  2. इसे किसी उच्च न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालयों को अपने न्यायक्षेत्र से बाहर के न्यायिक कार्यों को करने से रोकने के लिए जारी किया जाता है।
  3. इसे सिर्फ न्यायिक और गैर-न्यायिक प्राधिकरणों के विरुद्ध ही जारी किए जा सकते है।
  4. उच्चतम न्यायालय द्वारा हर साल उचित मात्रा में प्रतिषेध जारी करना जरूरी होता है।

Which of the following statements is correct regarding motivation?

  1. It literally means to certify or to inform.
  2. It is issued by the High Court for transfer of pending cases to subordinate courts or tribunals.
  3. It is issued against judicial authorities and administrative authorities affecting the rights of individuals.
  4. This writ needs approval from the Parliament every 10 years.

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उत्प्रेषन के संबंध में निम्न में से कौन सा कथन सही है?

  1. इसका शाब्दिक अर्थ है प्रमाणित होना या सूचना देना।
  2. इसे उच्च न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालयों को या अधिकरणों को लंबित मामलों के स्थानांतरण के लिए जारी किया जाता है।
  3. इसे न्यायिक प्राधिकरणों एवं व्यक्तियों के अधिकार को प्रभावित करने वाले प्रशासनिक प्राधिकरणों के खिलाफ जारी किया जाता है।
  4. इस रिट को हर 10 साल में संसद से अप्रूवल की जरूरत पड़ती है।

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Writ Explained

Important links,
मूल संविधान भाग 3↗️
https://en.wikipedia.org/wiki/Writ↗️