Need of GST in hindi ॥ जीएसटी की जरूरत॥

Basics of GST Part 2

इस लेख में जीएसटी की जरूरत (Need of GST) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे। ये लेख Basics of GST का Second Part है।

अगर आपने इसका फ़र्स्ट पार्ट नहीं पढ़ा है तो शायद आप इस लेख का पूरी तरह से फायदा नहीं उठा पाएंगे। इसका पार्ट 1 पढ़ने के लिए ↗️यहाँ क्लिक करें।

Need of GST

Need of GST
(जीएसटी की जरूरत)

VAT System के बावजूद भी, कुछ बहुत ही व्यावहारिक कारणे (Practical reasons) थी जो जीएसटी लाने के लिए पर्याप्त था। आइये उन कारणों को देखते हैं।

🔷 1. पहले तो सिर्फ वस्तु (Goods) पर टैक्स लगता था। पर 88वां संविधान संशोधन 2003 द्वारा सेवा कर (सर्विस टैक्स) नामक एक व्यवस्था लाया गया।

लेकिन इसके लाने के बाद ही समस्याएँ आनी शुरू हो गयी। हुआ ये कि चूंकि वस्तु पर टैक्स की दर अलग थी वही सेवा पर टैक्स की दर अलग थी।

और सबसे बड़ी बात ये थी क्या वस्तु है और क्या सेवा ये पूरी तरह से स्पष्ट नहीं था। इसका फायदा कुछ लोग जमकर उठाते थे। जिसका टैक्स रेट कम होता था वे उसी में घुस जाते थे।

इसे इस तरह से समझिये कि अभी आप ये लेख पढ़ रहें हैं। तो ये तो एक सेवा है जो मेरे द्वारा दिया जा रहा है।

पर अगर मैं कहूँ कि ये एक वस्तु है तो आपके पास क्या सबूत है कि आप सिद्ध कर देंगे कि ये एक वस्तु नहीं है। यही समस्या आता था सरकार के पास।

और सरकार को बार-बार अपनी लिस्ट को अपडेट करना पड़ता था कि क्या सेवा है और क्या वस्तु।

फिर दोनों टैक्स (वस्तु और सेवा) अलग-अलग लगायी जाती थी। इसीलिए इसे एक साथ मैनेज करने में काफी दिक्कते थी। इसका कोई स्थायी हल तो खोजना ही था।

🔷 2. VAT आ जाने से भी पूरी तरह से कैस्केडिंग इफैक्ट खत्म नहीं हुआ। वो कैसे? वो ऐसे कि केंद्र और राज्य के बीच में जो टैक्स व्यवस्था था उसमें कैस्केडिंग था।

इसे ऐसे समझिये कि किसी ने कहीं से रॉ मटिरियल इम्पोर्ट किया तो उसपे केंद्र सरकार ने आयात कर (इम्पोर्ट ड्यूटि) लगाया।

वो सामान किसी फैक्ट्री में गया वहाँ से जब बन कर निकला तो केंद्र सरकार ने उस पर उत्पाद कर (एक्साइज़ ड्यूटि) लगाया।

तो अभी जो दो स्तर पर केंद्र सरकार द्वारा टैक्स लगाया गया है। उसमें तो VAT अच्छे से काम करता था। इसमें कोई कैस्केडिंग नहीं था।

क्योंकि घूम फिर कर पैसा केंद्र के पास ही रहता था। और इनपुट क्रेडिट आसानी से मैनेज कर लिया जाता था।

यहीं बात राज्य पर भी लागू होता था। बहुत सी चीज़ें जो राज्य सरकार के अंदर आती थी उस पर राज्य सरकार भी अपना कर लगाती थी। इसमें भी कैस्केडिंग नहीं था।

पर समस्या तब आता था जब केंद्र सरकार ने किसी वस्तु पर एक्साइज़ ड्यूटि लगाया और वहीं सामान राज्य में गया तो राज्य ने उस पर VAT लगाया।

ऐसी स्थिति में कैस्केडिंग इफैक्ट होता था। क्योंकि इनपुट टैक्स क्रेडिट को मैनेज करना मुश्किल हो जाता था। ऐसा क्यों?

🔷 3. क्योंकि अलग-अलग राज्यों की VAT की दरें अलग-अलग होती थी। इससे फर्क ये पड़ता था कि एक ही वस्तु का दाम अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग होता था।

और चूंकि ये राज्यों के हाथ में था इसीलिए केंद्र के लिए यहाँ ज्यादा कुछ करने की गुंजाइश नहीं थी।

🔷 4. इसके अलावा एक और बहुत बड़ी समस्या समान लदे ट्रकों के आवाजाही को लेकर थी। राज्य सरकार अलग-अलग प्रकार की बहुत ज्यादा टैक्स लगाती थी।

जैसे कि अगर कोई ट्रक किसी राज्य के सीमा में प्रवेश कर रही है तो उसे सीमा शुल्क (Entry Tax) देना पड़ता था।

वहीं, अगर वो ट्रक उस राज्य के किसी नगरपालिका के क्षेत्र से गुजर रही है तो चुंगी (Octroi) देना पड़ता था।

अब सोचिए कि किसी ट्रक को समान लेकर दिल्ली से मिज़ोरम जाना है तो उसका क्या हश्र होता होगा।

तभी तो कई-कई दिन तक ट्रक किसी राज्य के सीमा पर खड़े रहते थे और समान सही समय पर नहीं पहुँच पाता था। ये एक बहुत बड़ी समस्या थी।

🔷 अब देश तो एक था पर उसमें टैक्स अलग-अलग था। और ये सारी समस्याएँ बहुत ज्यादा बड़ी थी। इसीलिए इतने सालों के जद्दोजहद के बाद आखिरकार 2017 में ये लागू हो गया।

जीएसटी लागू होने से हुआ क्या?
(What happened with the implementation of GST?)

जैसे कि नाम से ही स्पष्ट है कि ये वस्तु एवं सेवा कर (goods and services Tax) है। यानी कि ये एक साथ वस्तु और सेवा दोनों पर लगता है।

🔷 आपको याद होगा अभी हमने ऊपर चर्चा किया था। कि सेवा और वस्तु में कितना झंझट होता था. इससे वो समस्या सुलझ गया।

अब वो वस्तु रहें या सेवा चूंकि दोनों का टैक्स दर एक ही है इसीलिए अब इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कौन क्या है?

दूसरी बात कि इसके आने से बहुत सारे टैक्स खत्म हो गये। और उसकी जगह पर सिर्फ एक टैक्स आ गया GST।

याद रहें कि चूंकि प्रत्यक्ष कर (डायरेक्ट टैक्स) से इसका कोई लेना देना नहीं है। इसीलिए ये पूरी तरह से अप्रत्यक्ष कर (इनडायरेक्ट टैक्स) पर ही लागू होता है।

इससे कौन-कौन सा टैक्स खत्म हुआ आइये जान लेते हैं।

❎ केंद्र सरकार का टैक्स; जो खत्म हुआ।

🔷 केन्द्रीय उत्पाद कर (सेंट्रल एक्साइज़ ड्यूटि) – याद रखिए कि ये पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है। हाँ जहां पर जीएसटी लागू है वहाँ पर ये पूरी तरह से खत्म हो चुका है।

और जिसपे जीएसटी नहीं लागू है उस पर अभी भी सेंट्रल एक्साइज़ काम करता है। जैसे कि – पेट्रोल, डीज़ल आदि।

सेंट्रल एक्साइज़ ड्यूटि को CENVAT भी कहा जाता है, इसीलिए कन्फ्युज मत होइएगा। क्यों कहा जाता है? इसे आगे समझते हैं।

  • अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (Additional Excise Duties) खत्म हो गया।

🔷 सर्विस टैक्स जो कि केंद्र सरकार लगाता था वो पूरी तरह से खत्म हो गया। और अब ये जीएसटी में ही मर्ज हो गया। है।

🔷 प्रतितुलन शुल्क (Countervailing duty) या फिर (Additional Custom Duty) ये भी केंद्र सरकार द्वारा आयातित वस्तुओं पर लगाया जाता था। ये भी खत्म हो गया।

  • विशेष अतिरिक्त सीमा शुल्क (Special Additional Custom Duty) खत्म हो गया।

🔷 केन्द्रीय बिक्री कर (सेंट्रल सेल्स टैक्स) खत्म हो गया। इसी के जगह पर IGST आया।

यानी कि देखें तो कुल मिलाकर 5 प्रकार के मुख्य सेंट्रल टैक्स इससे खत्म हो गया और उसके जगह पर आ गया जीएसटी।

❎ राज्य सरकार का टैक्स; जो खत्म हुआ

राज्यों की बात करें तो – 🔷 राज्य से VAT खत्म हो गया। लेकिन याद रखिए कि VAT सिर्फ वहीं खत्म हुआ है जहां पर जीएसटी लागू है।

जहां पर जीएसटी लागू नहीं है वहाँ पर VAT खत्म नहीं हुआ है। जैसे कि शराब, अफीम इत्यादि।

🔷 सीमा शुल्क (Entry Tax) एंट्री टैक्स पूरी तरह से खत्म हो गया। अब किसी भी ट्रक को किसी राज्य की सीमा पर रुकना नहीं पड़ता है। वे बेरोकटोक अपने गंतव्य तक जा सकते हैं।

🔷 चुंगी (Octroi) पूरी तरह से खत्म हो गया है। अब कोई नगरपालिका बांस से रास्ते घेरकर चुंगी नहीं ले सकता।

🔷 विज्ञापन टैक्स खत्म हो गया। 🔷 लक्ज़री टैक्स (Luxury Tax) खत्म हो गया।

🔷 एंटरटैनमेंट टैक्स (Entertainment and Amusement Tax) , लॉटरी टैक्स, गंबलिंग टैक्स खत्म हो गया है।

इतनी मात्रा में अप्रत्यक्ष टैक्स खत्म हो गया और पूरे देश के लिए एक टैक्स व्यवस्था लागू हो गया इसीलिए इसे व्यापक अप्रत्यक्ष कर प्रणाली (Comprehensive indirect tax system) कहते हैं।

केन्द्रीय बिक्री कर (सेंट्रल सेल्स टैक्स) खत्म हो गया है। सेंट्रल सेल्स टैक्स को समझ लीजिये। ये जरूरी है क्योंकि इसी की जगह IGST आया है।

केन्द्रीय बिक्री कर (Central sales tax)

जब केंद्र और राज्य व्यापार करते थे तो उसमें कोई समस्या नहीं आती थी पर जब एक राज्य के व्यापारी दूसरे राज्य के व्यापारी से व्यापार करते थे तो समस्या आती थी।

और 2005 से पहले इस तरह के व्यापार में बिक्री कर (sales tax) लगाया जाता था और ये राज्यों द्वारा लगाया जाता था।

पर जब 2005 में केंद्र सरकार के कहने पर सभी राज्यों ने अपने-अपने बिक्री कर (सेल्स टैक्स) को खत्म करके VAT लागू कर दिया तो फिर एक समस्या आ गयी।

समस्या ये था कि इस व्यवस्था के अनुसार एक राज्य, दूसरे राज्य से टैक्स कलेक्शन करने के लिए उसके राज्य नहीं जा सकता था। क्योंकि वे उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता था।

जबकि पहले जब सेल्स टैक्स (Sales tax) लगाया जाता था तो राज्यों के द्वारा पहले ही टैक्स वसूल लिया जाता था। पर VAT आने के बाद इसमें इस प्रकार की समस्याएँ आ गयी।

🔷 इसी को ध्यान में रखकर केन्द्रीय बिक्री कर (सेंट्रल सेल्स टैक्स) लाया गया। इसका मकसद ये था कि जिस राज्य से जिस राज्य को समान बेचा जाएगा उस पर जितना VAT लगेगा,

केंद्र, जिस राज्य में वो समान बिका वहाँ से वो कर इकट्ठा कर के उस राज्य को दे देगी जिस राज्य का हिस्सा वो था। यहीं था सेंट्रल सेल्स टैक्स जो कि अनुच्छेद 269 में लिखा था।

लेकिन जीएसटी लागू होने से सेंट्रल सेल्स टैक्स खत्म हो गया। इसीलिए इसके जगह पर IGST लाया गया। इससे जो भी वसूली की जाती है उसे केंद्र और राज्य के मध्य बाँट दिया जाता है।

बांटने में मदद करता है- वित्त आयोग (Finance Commission)। इसकी चर्चा केंद्र और राज्य के मध्य वित्तीय संबंध वाले लेख में किया गया है।

▶▶▶facts

▶ 2005 से पहले राज्यों में बिक्री कर यानी कि सेल्स टैक्स ही चलता था। 2005 में उसी सेल्स टैक्स को हटाकर VAT लाया गया है।

▶ इसी प्रकार केंद्र सरकार पहले सेंट्रल एक्साइज़ ड्यूटि लगाती थी। पर 1996 में VAT प्रिंसिपल पर इसे चलाने के कारण, इसका नाम CENVAT यानी कि Central VAT कर दिया गया।

💠Multistage Tax

जीएसटी का सबसे बड़ा फायदा तो ये है कि इससे कैस्केडिंग इफैक्ट पूरी तरह से खत्म हो गया।

और दूसरी बात ये कि जहां पहले रॉ मटिरियल पर VAT लगता था, प्रॉडक्शन पर सेंट्रल एक्साइज़ और सर्विस टैक्स जिसे कि सम्मिलित रूप से CENVAT कहा जाता था,

होलसेलर पर VAT लगता था,
रिटेलर पर VAT लगता था,
उपभोक्ता पर VAT लगता था

इस सब के गजह पर सिर्फ एक ही टैक्स आ गया जिसका नाम है जीएसटी। इसीलिए इसे Multistage टैक्स भी कहते हैं।

💠Destination based tax

अब हर एक पॉइंट पर लगने वाला टैक्स जब खत्म हो गया तो सवाल ये था कि जीएसटी कहाँ लगाया जाये प्रॉडक्शन पर लगाया जाये, सप्लाइ लगाया जाये या फिर उपभोक्ता पर।

अंततः ये डिसाइड किया गया कि किसी भी प्रॉडक्ट का चेन (Chain) जहां पर खत्म होगा। वहीं पर टैक्स लगाया जाएगा।

यानी कि कोई समान भले ही किसी और राज्य में बनी हो पर जिस राज्य में वो समान उपभोक्ता के पास पहुंचेगा उसी राज्य में टैक्स लगाया जाएगा।

और इसका इनपुट क्रेडिट उस राज्य को लौटा दिया जाएगा जिस राज्य से बनकर वो समान आया है। इसीलिए इसे डेस्टिनेशन बेस्ड टैक्स (Destination based tax) भी कहते हैं।

Need of GST ends here

ये लेख बहुत ज्याद लंबा न हो जाये इसीलिए अगले लेख में बात करेंगे कि जीएसटी कितने प्रकार के होते है और ये काम कैसे करता है?

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2 thoughts on “Need of GST in hindi ॥ जीएसटी की जरूरत॥

  1. Wooow … I read your all blogs .. Jo chije books ko 10 times padh k ni aati Aapke blogs me ek hi bar me a jati … Thanks

    1. आपका बहुत-बहुत शुक्रिया मुझसे जुड़े रहने के लिए, मुझे उम्मीद है आगे भी आपको एक से एक बेहतरीन लेख पढ़ने को मिलेंगे।

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