शिक्षा क्या है?: क्या आप खुद को शिक्षित मानते है?

इस लेख में हम शिक्षा के व्यावहारिक पहलूओं को समझेंगे और ये भी जानेंगे कि सही शिक्षा क्या है? तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें।

शिक्षा

शिक्षा की समझ

इन्सानों में हमेशा से जानने की प्रवृति रही है न केवल बाह्य भौतिक परिवेश को बल्कि आंतरिक परिवेश को भी। और संभवतः इन्सानों की यही जानने की प्रवृति ने शिक्षा व्यवस्था को जन्म दिया होगा ताकि इंसान एक अनुशासनात्मक तरीके से चीजों को जान सकें, खुद को समझ सकें ।

खुद को समझना शिक्षा का एक मूलभूत तत्व है क्योंकि अज्ञानी व्यक्ति वह नहीं है जो विद्वान नहीं बल्कि अज्ञानी तो वह है जो स्वयं खुद को नहीं जानता। ऐसा विद्वान होने से भी क्या फ़ायदा जो अपनी समझ अथवा बोध के लिए हमेशा जानकारियों एवं प्रामाण्य पर निर्भर रहता हो। वो समझ अथवा बोध भला जानकारियों से कहाँ आ पाती है, वो तो हमेशा आत्मज्ञान से ही आता है और आत्मज्ञान तभी आ सकता है जब हम स्वयं के होने के प्रति सजग हो,

अपनी पूरी मानसिक प्रक्रिया के प्रति सजग हो और जब ऐसा होगा तभी हमारे व्यवहार में एक सकारात्मक बदलाव आ पाएगा, तभी हमारी चेतना संकीर्णता के बंधनों से मुक्त हो पाएगी, और यही तो शिक्षा की मौलिकता है। 

शिक्षा करता क्या है?

शिक्षा का कार्य सिर्फ जानकारी इकट्ठा करना, तथ्यों को बटोर कर उन्हे आपस में मिलाना तथा अनुपयुक्त तथ्यों की मदद से या फिर कुतर्क की मदद से चीजों को सत्यापित करना नहीं है। बल्कि शिक्षा का कार्य तो ऐसे मनुष्य तैयार करना है जो स्वयं में पूर्ण एवं प्रज्ञाशील हो। हमारे वर्तमान समाज में प्रज्ञाशील हुए बिना भी हम डिग्री प्राप्त कर सकते हैं, यांत्रिक रूप से सक्षम हो सकते है, खुद को बाज़ार के मांग के अनुरूप प्रशिक्षित कर सकते है पर हम इस बात को कैसे झुठला सकते है कि प्रशिक्षण सिर्फ कार्यकुशलता लाता है, पूर्णता नहीं। 

जो है, उसे पूर्ण रूप से देख पाने की क्षमता जब तक विकसित नहीं होगी तब तक प्रज्ञाशीलता नहीं आएगी और प्रज्ञाशीलता के बिना शिक्षा अधूरा है। आज हम जिस समाज का हिस्सा है, उसमें लोग अपने बच्चों को केवल जीविकोपार्जन की तकनीक सीखने के लिए स्कूल भेजते है, सभी अपने बच्चे को एक विशेषज्ञ बनाना चाहते है।

इस आशा से की एक दिन वो खूब पैसे कमाएगा, आर्थिक दृष्टि से वो सुरक्षित हो जाएगा । इस सब में होता यही है कि शिक्षा का मूलभूत उद्देश्य तो कहीं पीछे छूट जाता है उसकी जगह बाज़ारवाद और पूंजीवाद का एक विकृत स्वरूप ले लेता है। 

बेशक पढ़ने-लिखने का ज्ञान होना, इंजीनियरिंग का ज्ञान होना और अत्यधिक पैसा कमाने के उद्देश्य से अन्य प्रकार के कौशलों को विकसित करना, स्पष्ट रूप से आवश्यक है, आज के समय की मांग भी तो यही है,

पर क्या हम इस बात को नजरअंदाज कर सकते है कि तकनीक के क्षेत्र में इतना विकसित होने के बाद भी आज तक इंसान कोई ऐसा तकनीक ईजाद नहीं कर पाया है जो खुद को जानने में मदद कर सकें।

आज भी खुद को जानने का एक मात्र स्रोत है – शिक्षा। और जब हम इस स्तर पर जाकर सोचते है तब हमें शिक्षा के महत्व का एहसास होता है। 

क्या हम शिक्षा को समझते हैं?

 हमें इस पर विचार करना ही होगा कि, जीवन का महत्व आखिर क्या है?, हम क्यों जीवित है?, हम क्यों अपने अस्तित्व को लेकर इतना संघर्ष कर रहें है?

यदि हम मात्र कोई विशेष योग्यता पाने के लिए, अच्छी नौकरी पाने के लिए, अधिक कार्यकुशल होने के लिए, दूसरों पर अधिकाधिक आधिपत्य जमाने के लिए ही शिक्षा प्राप्त कर रहें है, तो ये गलत दिशा में विकसित हो रही हमारी संकीर्ण सोच को ही दर्शाता है।

अगर हम शिक्षित होकर भी विश्व में विनाश और दु:ख का ही सृजन कर रहें है तो हमें इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है कि आखिर क्यों आज हमारी शिक्षा व्यवस्था अब तक की सबसे बड़ी विकृति से गुजर रही है।

आखिर क्यों आज हमारी शिक्षा व्यवस्था इस बात की गारंटी नहीं दे पाती है कि एक शिक्षित व्यक्ति हमेशा एक अच्छा इंसान होगा?

हम_शिक्षा क्यूँ ग्रहण करना चाहते हैं?

आज हम सुख-सुविधा के उद्देश्य से शिक्षा ग्रहण करते है और सुख-सुविधा मिलने के बाद जीवन का कोई एकांत कोना खोज लेते है जहां पर किसी प्रकार का कोई प्रतिरोध न हो और फिर उस सुविधा – क्षेत्र में जीने के हम इतने आदि हो जाते है कि – हमें उस एकांत कोने से बाहर निकलने में भी डर लगता है,

हम स्थूल हो जाते है और व्यवस्था को दोष देने लगते है, उसे कोसने लगते है, यहाँ तक कि हम उस व्यवस्था को बदलने के लिए परिकल्पनाओं में डूब जाते है और ये हम भूल जाते है कि कोई भी व्यवस्था रहस्यमयी ढंग से नहीं बदली जाती है। उसमें परिवर्तन तभी होता है जब हमारे अंदर कोई मौलिक परिवर्तन होता है और बिना सही शिक्षा के हम उस मौलिकता को समझ पाने से कोसों दूर रह जाते हैं। 

वर्तमान में शिक्षा का संबंध बाहरी कार्यकुशलता से हो गया है, इस प्रकार की शिक्षा मनुष्य की आंतरिक प्रकृति की या तो पूर्णतया: उपेक्षित कर देती है या फिर उसे विकृत कर देती है।

वर्तमान शिक्षा हमारे आंतरिक प्रकृति के एक अंश का तो विकास करता है पर शेष को बोझ के रूप में ढोने के लिए छोड़ देता है।

इस बात को बिल्कुल भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि जानकारी तथा तकनीकी प्रशिक्षण बहुत जरूरी है पर जानकारी तथा तकनीकी प्रशिक्षण देने के साथ ही सबसे अधिक जरूरी है कि शिक्षा, जीवन के प्रति एक समन्वित दृष्टिकोण को प्रोत्साहित करें ।

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