Cognizable and Non- Cognizable Offences in Hindi

इस लेख में हम संज्ञेय एवं गैर-संज्ञेय अपराध (Cognizable and non-cognizable offences) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे एवं इसके विभिन्न पहलुओं को समझने की कोशिश करेंगे, तो लेख को अंत तक जरूर पढ़ें।
Cognizable and Non- Cognizable Offences

अपराध (Crime)

ऐसा कोई भी कृत्य जिसके लिए किसी कानून में दंड का प्रावधान है अपराध (crime) कहलाता है। संसद या विधानमंडल द्वारा बनाए गए कानून तो है ही साथ ही न्यायालय के आदेश, कोई निजी संस्थागत कानून, रीति-रिवाज या परंपरा आधारित कानून आदि ऐसे ढेरों कानून हो सकते है जिसमें किसी कृत्य के लिए दंड का प्रावधान हो।

ऐसे में कितना भी बचने की कोशिश करें अपराध हो ही जाता है। इसीलिए अपराध के बारे में कुछ मूलभूत बातें तो हमें पता होनी ही चाहिए। तो अपराध क्या होता है ये तो हम समझ ही गए है अब आइये आगे की बात करते हैं।

कौन सा कृत्य अपराध होगा और उसकी सजा क्या होगी ये भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) यानी कि IPC 1860 में लिखा हुआ है। और अपराध को सत्यापित करने की प्रक्रिया क्या होगी, सजा देने की प्रक्रिया क्या होगी, उसको क्रियान्वित करने की प्रक्रिया क्या होगी इस सब की चर्चा आपराधिक प्रक्रिया संहिता (Criminal Procedure Code) यानी कि CrPC 1973 में की गई है।

अपराध का वर्गीकरण (Classification of crime)

अपराध की प्रकृति और उसकी गंभीरता के आधार पर इसे मुख्य रूप से तीन भागों में वर्गीकृत किया जाता है –

1. ↗️समाधेय एवं गैर-समाधेय अपराध (Compoundable and Non-Compoundable Offenses)
2. संज्ञेय अपराध एवं गैर-संज्ञेय अपराध (Cognizable crime and non-cognizable offenses)
3. ↗️ज़मानती एवं गैर-ज़मानती अपराध (Bailable and non-bailable offences)।

इसमें से दो पर पहले से ही लेख उपलब्ध है इस लेख में हम संज्ञेय एवं गैर-संज्ञेय अपराध (Cognizable and non-cognizable offences) को समझेंगे।

संज्ञेय अपराध (Cognizable offence)

सीआरपीसी के सेक्शन 2 (सी) के अनुसार संज्ञेय अपराध ऐसे अपराध है जिसमें पुलिस किसी मुजरिम को बिना किसी वारंट के गिरफ्तार कर सकती है और बिना कोर्ट के अनुमति के प्रारम्भिक जांच आरंभ कर सकती है।

अब सवाल ये आता है कि कौन से अपराध के लिए पुलिस ऐसा कर सकती है तो सीआरपीसी (CrPC) के अनुसूची 1 में जितने भी अपराध दर्ज है और किसी कानून के तहत घोषित जितने भी अपराध है वे सब संज्ञेय अपराध है। पुलिस को जब भी लगेगा कि अपराध सीआरपीसी (CrPC) के अनुसूची 1 या किसी कानून के तहत हुआ है तो वे आरोपी व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकता है और जांच शुरू कर सकता है।

संज्ञेय अपराध बड़े ही गंभीर किस्म के और समाज पर बुरा असर डालने वाले प्रकृति के होते हैं। जैसे कि – अपहरण, बलात्कार, मर्डर, चोरी, डकैती, दहेज मृत्यु इत्यादि।

अनुसूची 1 में कौन-कौन से अपराध आते है इसे आप इस ↗️लिंक के माध्यम से देख सकते हैं।

◾सीआरपीसी के सेक्शन 154 के तहत इस प्रकार के मामले में पुलिस को FIR दर्ज करना होता है। हालांकि वो चाहे तो FIR दर्ज करने से पहले कुछ प्रारम्भिक जांच कर सकता है। उसके बाद उसे निर्धारित समय में मैजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत किया जाता है। अगर प्रारम्भिक जांच से ये पता चल जाये कि आरोपी व्यक्ति सही में गुनहगार है तो दंडाधिकारी उसे गिरफ्तार करके जेल में डलवा सकता है।

◾यहाँ पर एक बात याद रखिए कि संज्ञेय अपराध ज़मानती भी हो सकते है और गैर-ज़मानती भी। जैसे कि IPC सेक्शन 509 के तहत अगर कोई व्यक्ति किसी लड़की या औरत को गलत इशारे या उस पे अश्लील कमेंट करता है तो इसे एक संज्ञेय अपराध माना गया है। लेकिन प्रकृति में ये ज़मानती होते हैं।

◾वैसे आमतौर पर संज्ञेय अपराध गैर-ज़मानती प्रवृति के ही होते हैं। इसके लिए एक सामान्य व्यवस्था ये है कि अगर किसी आरोपी ने ऐसा अपराध किया है जिस अपराध के लिए आरोपी को 7 साल या उससे अधिक की सजा या मृत्युदंड मिल सकता है तो ऐसे अपराध प्रकृति में गैर-ज़मानती और संज्ञेय होते हैं।

◾इसी प्रकार 3 साल से ऊपर और 7 साल से नीचे सजा वाले अपराध भी संज्ञेय होते है और गैर-ज़मानती होते हैं। लेकिन अगर आप अनुसूची 1 देखेंगे तो आप पाएंगे कई ऐसे मामले है जिसमें ये गैर-संज्ञेय और ज़मानती होते है। उदाहरण के लिए आप आईपीसी धारा 506 (2) देख सकते हैं।

लेकिन अगर किसी अपराध के लिए सजा 3 साल या उससे कम होने का प्रावधान है तो वे संज्ञेय भी हो सकते है या गैर-संज्ञेय भी। लेकिन प्रकृति में ज़मानती होते हैं। जैसे कि अभी ऊपर आईपीसी धारा 509 का एक उदाहरण देखा जो कि एक संज्ञेय अपराध है लेकिन चूंकि उसमें मिलने वाली सजा 3 साल की है इसीलिए उसे ज़मानती की श्रेणी में रखा गया है।

आमतौर पर 3 साल से कम सजा वाले अपराध गैर-संज्ञेय और ज़मानती होते हैं।

गैर-संज्ञेय अपराध (Non cognizable offences)

क्रीमिनल प्रोसिजर कोड (CrPC 1973) की धारा 2 (एल) के अनुसार गैर-संज्ञेय अपराध वे अपराध है जिसमें किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस के पास वारंट जरूरी होती है। यानी कि ऐसे अपराध जिसमें पुलिस आरोपी को बिना वारंट के गिरफ्तार नहीं कर सकती है उसे गैर-संज्ञेय अपराध कहते हैं।

इस प्रकार के अपराध में किसी को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस को पहले शिकायत दर्ज करनी पड़ती है फिर FIR दर्ज होता है, उसके बाद जांच, फिर चार्ज शीट, चार्ज शीट को कोर्ट में पेश करना, ट्राइल चलना और उसके बाद कहीं जाकर गिरफ्तार करने का वारंट जारी होता है।

गैर-संज्ञेय अपराध आमतौर पर ज़मानती प्रकृति के होते हैं। जैसे कि आईपीसी की धारा 465 को लें जो कि जालसाजी के बारे में है। ये अपराध गैर-संज्ञेय और ज़मानती अपराध है। क्योंकि इसके तहत मिलने वाली सजा 2 साल की है।

लेकिन ऐसा बिलकुल भी नहीं है कि सभी गैर-संज्ञेय अपराध ज़मानती होते है। उदाहरण के लिए आईपीसी की धारा 274 को लें। ये दवा में इस तरह से मिलावट जिससे कि उसकी कार्यक्षमता कम हो जाये या फिर वो विषाक्त हो जाये; के बारे में है ये एक गैर-संज्ञेय अपराध है लेकिन ये गैर-ज़मानती है जबकि इसमें सजा का प्रावधान भी सिर्फ 6 महीने है।

Difference between Cognizable and Non- Cognizable Offences

Cognizable (संज्ञेय)Non-Cognizable (गैर-संज्ञेय)
ये एक ऐसा अपराध है जिसमें पुलिस बिना किसी वारंट के किसी को गिरफ्तार कर सकती है।ये एक ऐसा अपराध है जिसमें पुलिस बिना किसी वारंट के किसी को गिरफ्तार नहीं कर सकती है।
इसे CrPC section 2 (c) में परिभाषित किया गया है। इसे CrPC section 2 (L) में परिभाषित किया गया है।
पुलिस बिना कोर्ट के आदेश के या बिना FIR दर्ज किए किसी के विरुद्ध प्राथमिक जांच आरंभ कर सकता है। पुलिस बिना कोर्ट के आदेश के या बिना FIR दर्ज किए किसी के विरुद्ध प्राथमिक जांच आरंभ नहीं कर सकता है।
इस प्रकार के अपराध बड़े ही जघन्य (Heinous) किस्म के होते हैं। जैसे कि मर्डर (murder), बलात्कार (rape), दहेज मृत्यु (dowry death) इत्यादि। इस प्रकार के अपराध उतने गंभीर किस्म के नहीं होते हैं जैसे कि धोखाधड़ी, मानहानि इत्यादि।
पीड़ित व्यक्ति FIR दर्ज कर सकता है या फिर दंडाधिकारी (Magistrate) के पास शिकायद या परिवाद दायर कर सकता है।पीड़ित व्यक्ति केवल दंडाधिकारी (Magistrate) के पास शिकायत या परिवाद दायर कर सकता है।
ऐसे मामलों में पुलिस बिना दंडाधिकारी के आदेश के FIR दर्ज करने को बाध्य होता है।ऐसे मामलों में पुलिस चाहे तो FIR दर्ज नहीं भी कर सकती है या फिर सिर्फ दंडाधिकारी के आदेश पर ही FIR दर्ज कर सकती है।
आमतौर पर ये गैर-जमानती होते हैं। ये जमानती अपराध होते हैं।

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