शंका और संदेह में मुख्य अंतर क्या है?

शंका और संदेह मानव का सामान्य स्वभाव है, इसीलिए हम सब इसके आदि होते हैं। यहाँ तक कि ऐसे दार्शनिक हुए है जो ये कहते हैं कि हर एक चीज़ पर संदेह करो और तब तक करो जब तक की उसमें संदेश की गुंजाइश है।

इस लेख में हम शंका और संदेह पर सरल एवं सहज चर्चा करेंगे एवं इसके मध्य कुछ महत्वपूर्ण अंतर को जानेंगे, तो लेख को अंत तक जरूर पढ़िये;

शंका और संदेह

| शंका क्या है?

कुछ बुरा या फिर अनिष्ट होने के अनुमान पर मन में उत्पन्न होनेवाला भय, शंका है। ये पूर्वाग्रह से ग्रसित मन की वह स्थिति है, जिसमें किसी बात के सामने आने पर उसके संबंध में कई प्रश्न या जिज्ञासा मन में उत्पन्न होता है, पर किसी को मानने का मन नहीं करता !

बस इस स्थिति में हम बस वहीं मानते है जो उस से संबन्धित हमारे मन में पूर्वाग्रह होता है।

इस स्थिति में हम तर्क का कम और कुतर्क का ज्यादा इस्तेमाल करते है जिससे कि उससे संबन्धित नकारात्मक बातें मन में घूमती रहती है और विश्वास जैसी चीज़ें गौण होने लगती है।

इसीलिए तो कहा जाता है कि शंका एक ऐसी बीमारी है जिसका कोई इलाज़ नहीं है। जिसके मन में शंका हुई हो, वह शंकित और जो शंका से आकुल या विचलित हो, वह शंकाकुल कहलाता है। 

| संदेह क्या है?

संदेह संस्कृत के संदिह से बना है जिसका अर्थ ठीक तरह से कुछ निश्चय न कर पाना है। संदेह प्राय: पर्याप्त प्रमाण नहीं रहने के कारण उत्पन्न होता है।

इसमें सामने आई बात का स्वरूप स्पष्ट नहीं रहने के कारण उस पर विश्वास करना कठिन हो जाता है और मन में यह भाव उत्पन्न होता है कि वस्तुस्थिति इससे कुछ भिन्न तो नहीं है।

कहीं कुछ मुझसे छुपाया तो नहीं जा रहा है आदि । इसमें तर्क-वितर्क की काफी गुंजाईश रहती है इसीलिए हम जल्दी से जल्दी सही चीज़ें पता करने के लिए उत्सुक रहते हैं।

और जैसे ही हम वस्तु स्थिति का सही-सही आकलन कर लेते हैं । हमारा संदेह खत्म हो जाता है।  संदेह तब उत्पन्न होता है, जब ऊपर से दिखाई देने वाले तथ्य या रूप पर विश्वास नहीं होता। 

| शंका और संदेह में कुल मिलाकर फर्क

कुल मिलाकर इन दोनों में फर्क यह है कि  शंका में एक तो प्रस्तुत वस्तु आपत्तिजनक जान पड़ती है, और दूसरी ओर उसके सही रूप जानने की मन में उत्सुकता भी होती है पर अगर कोई सही बात बताए तो मानने का मन भी नहीं करता ।

जबकि संदेह वहाँ उत्पन्न होता है, जब हमें कोई बात पूरी तरह ठीक नहीं जँचती और मन में यह भाव उत्पन्न होता है कि कहीं इससे अलग कोई और बात तो नहीं है।

शंका प्रायः नकारात्मकता की ओर ले जाती है,जबकि संदेह की बात करें तो सही और गलत के बीच में झूलते रहने के कारण इसमें नकारात्मकता और सकारात्मकता के बीच की स्थिति होती है।

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