इस लेख में हम भाषा और बोली में अंतर (difference between language and dialect) पर सरल एवं सहज चर्चा करेंगे एवं इसके विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं को समझने का प्रयास करेंगे।

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| भाषा और बोली

भाषा (Language) संप्रेषण (Communication) का एक माध्यम है। दूसरे शब्दों में कहें तो अपने विचारों, मनोभावों या कल्पनाओं आदि को अभिव्यक्त करने का माध्यम, भाषा है।

विकिपीडिया के अनुसार, भाषा, संप्रेषण का एक संरचित प्रणाली (structured system) है जो कि बोलने, लिखने, हाव-भाव या संकेतों पर आधारित होता है।

भाषा विद्वान हेनरी स्वीट के अनुसार, “भाषा शब्दों में संयुक्त भाषण-ध्वनियों के माध्यम से विचारों की अभिव्यक्ति है। भाषा कमाल की चीज़ है आप इस लेख को पढ़ रहे हैं यानी कि भाषा अपनी भूमिका निभा रही है।

डॉ. बाबू राम सक्सेना के अनुसार, जिन ध्वनि समूहों द्वारा मनुष्य परस्पर विचार-विनिमय करता है उनको समष्टि रूप से भाषा कहते हैं।

भाषा की दुनिया में ऐसा माना जाता है कि प्राचीन काल में एक मानव-समूह भावों-विचारों के आदान-प्रदान के लिए किसी भाषा को अपना रहा होगा। वहाँ व्यक्तियों की संख्या बढ़ जाने से भरण-पोषण के साधनों की कमी पाकर या प्राकृतिक कारणों के चलते कुछ लोग इधर-उधर चले गये होंगे।

भौगोलिक परिवर्तनों एवं ऐतिहासिक कारणों से उनकी भाषा में अंतर आ गया होगा। जब उस समूह के विशाल हो जाने पर कुछ लोग छूट कर अलग चले गये होंगे तो बार-बार के परिवर्तनों से उनकी भाषा अपनी मूल भाषा से थोड़ी भिन्न हो गई होगी। इस तरह से कालांतर में अलग-अलग भाषाओं का जन्म हुआ होगा।

बोलियों के बनने का कारण

बोलियों के विकसित होने का प्रमुख कारण भौगोलिक परिस्थिति या प्राकृतिक संकट को माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि एक ही भाषा बोलने वाले लोगों के समूह से जब कुछ लोग प्राकृतिक घटनाओं या फिर किसी अन्य कारणों से विलग (separate) हो जाता होगा तो उसके मूल भाषा से उसका संबंध टूट जाता होगा और उसके भाषा का विकास अवरुद्ध हो जाता होगा या फिर एक अलग दिशा को अपना लेता होगा। और इस तरह से यह बोली का रूप धारण कर लेता होगा।

कई बार ऐसा भी होता होगा कि लोग राजनीतिक या आर्थिक कारणों से कुछ लोग अपना क्षेत्र छोड़कर दूर चले जाते होंगे और इस तरह से वहाँ नई बोली विकसित हो जाती होगी।

उपबोली या स्थानीय बोली – जब किसी स्थान विशेष पर रहने वाले कुछ लोग व्यक्ति बोली को परस्पर व्यवहार में लाते हैं तो वहाँ एक स्थानीय भाषा का विकास को जाता है, जिसका क्षेत्र बहुत ही छोटा होता है इसीलिए इसे उपबोली कहा जाता है।

जब बहुत सी उपबोलियाँ मिल कर एक भाषा क्षेत्र का निर्माण करती है तो उस भाषा क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा को बोली (Dialect) कहा जाता है।

कहने का अर्थ ये है कि एक भाषा क्षेत्र में कई बोलियाँ होती है, जैसे कि हिन्दी भाषा क्षेत्र के अंतर्गत खड़ी बोली, ब्रज या अवधि बोलियाँ आती है। इसी तरह से एक बोली में कई उपबोलियाँ आती है जैसे कि बुन्देली बोली के अंतर्गत लोधन्ती, राठौरी, पंवारी आदि उपबोलियाँ आती है।

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बोली क्या है?

एक भाषा के अंतर्गत जब कई अलग-अलग रूप विकसित हो जाते हैं तो उसे बोली कहते हैं। यहाँ यह याद रखने वाली बात है कि कोई बोली तभी तक बोली रहती है जब तक कि उसे साहित्य, धर्म, व्यापार या राजनीति के कारण विशेष महत्व प्राप्त नहीं हो जाता। होता ये है कि उपरोक्त कारणों से किसी बोली की विशेषताएँ इतनी विकसित हो जाती है कि अन्य बोली बोलने वाले लोग भी उसे समझने लग जाते हैं। इस तरह से कोई बोली भाषा का रूप ले लेती है।

इसका सबसे अच्छा उदाहरण ब्रज या अवधि को माना जाता है, क्योंकि तुलसी और जायसी जैसे कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से इसे दूर-सुदूर तक पहुंचा दिया, जिससे कि इस बोली को जानने वाले लोगों की संख्या में उतरोत्तर वृद्धि होती गई और यह एक भाषा का रूप लेने लग गया।

| भाषा और बोली में अंतर

भाषा का क्षेत्र अपेक्षाकृत बड़ा होता है जबकि बोली का क्षेत्र सीमित।
एक भाषा में कई बोलियाँ समाहित हो सकती है जबकि एक बोली में एक से अधिक भाषा नहीं हो सकता है।
बोली किसी न किसी भाषा से उत्पन्न होता है इसीलिए बोली और भाषा में बेटी और माँ का रिश्ता माना जाता है।
भाषा मानक रूप में उपलब्ध होता है जबकि बोली आमतौर पर बस बोल-चाल की भाषा में ही अभिव्यक्त होता है।
बोली में विविधता का अभाव होता है जबकि भाषा में विविधता उसकी जान है।
ऐसा भी हो सकता है कि बोली कुछ समय पश्चात समाप्त हो जाए पर भाषा इतनी जल्दी समाप्त नहीं होता है।
बोली में शिष्टता का अभाव होता है इसीलिए इसे असाधु भाष भी कहा जाता है जबकि भाषा चूंकि व्याकरणीय नियमों से बंधा होता है इसीलिए इसे शिष्ट भाष या साधू भाष कहा जाता है।

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| समापन टिप्पणी

हमने ऊपर भाषा और बोली को विभिन्न उदाहरणों से समझा कि क्यों बोली से अलग होती है। पर इसके साथ ही हमने यह भी याद रखनी चाहिए कि कुछ बोली अपने आस-पास के बोलियों को दबा कर इतना प्रभावशाली हो जाती है वह धीरे-धीरे भाषा में परिणत हो जाती है। हमने ऊपर समझा भी कि किस तरह जब कोई साहित्यकार या कवि, किसी बोली में कोई श्रेष्ठ रचना करता है तो वह भाषा का रूप धारण कर लेती है। तो कुल मिलाकर हम यह कह सकते हैं कि अनेक बोलियों के सामूहिक रूप को ही भाषा कहते हैं।

उम्मीद है भाषा और बोली में अंतर आपको समझ में आया होगा, भाषा विज्ञान को विस्तार से और ज़ीरो लेवल से समझने के लिए भाषा से संबन्धित लेख अवश्य पढ़ें। साथ ही हमारे फ़ेसबुक पेज को लाइक कर लें और हमारे यूट्यूब चैनल को भी अवश्य विजिट करें। लिंक नीचे दिया हुआ है;

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FAQs

Q. मूल भाषा किसे कहते हैं?

मूल भाषा वो प्रारम्भिक भाषा है जिसे कि प्रारम्भिक लोगों द्वारा अपने भावों एवं विचारों के आदान-प्रदान के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा होगा। फिर कबीले में लोगों की संख्या बढ़ती गई होगी और कुछ लोग दूर चले गए होंगे जहां पर उसके भाषा में कुछ परिवर्तन आ गया होगा और ये क्रम सैंकड़ों सालों तक चला होगा। आज जो हम भाषा देखते हैं वो उसका नवीनतम रूप है, चूंकि भाषा लगातार परिवर्तनशील है इसीलिए आगे भी इसमें बदलाव आते रहेंगे।

Q. राजभाषा और राष्ट्र भाषा में क्या अंतर है?

किसी विशेष देश, क्षेत्र या प्रदेश में रहने वाले सामान्य वंश, इतिहास, संस्कृति या भाषा से एकजुट लोगों के एक बड़े समूह को राष्ट्र कहा जाता है। इस तरह से राष्ट्र भाषा (national language) का मतलब है, ऐसी भाषा जो कि राष्ट्र की भावनाओं और विचारों को अभिव्यक्त करने का माध्यम हो। एक राष्ट्र के निवासी अपने पर्वों-उत्सवों व सार्वजनिक कार्यों में इस तरह के भाषा का प्रयोग करता है। किसी देश के बहुत सारे भाषाओं एवं बोलियों में राष्ट्र भाषा सबसे महत्वपूर्ण होता है।
वहीं राजभाषा (official language) की बात करें तो राज-काज के कार्यों में प्रयोग में आनेवाली भाषा राजभाषा कही जाती है। इसी भाषा में राजकीय कार्यों एवं राजाज्ञा आदि का प्रसारण किया जाता है। इसके अलावा सभी कार्यालयों में इसी भाषा का प्रयोग किया जाता है।

Q. भारत का राष्ट्र भाषा क्या है?

आधिकारिक या संवैधानिक रूप से भारत का कोई राष्ट्र भाषा नहीं है। अँग्रेजी और हिन्दी राजभाषा है जिसे कि पहले तो संविधान के अनुच्छेद 343 के तहत 15 साल के लिए राजभाषा का दर्जा दिया गया और बाद में एक संवैधानिक संशोधन, राजभाषा अधिनियम, 1963, के तहत हिन्दी के साथ अंग्रेजी को अनिश्चित काल तक जारी रखने का फैसला लिया जब तक कि कानून द्वारा इसे बदल नहीं दिया जाता।

Q. भारत में संवैधानिक दर्जा प्राप्त भाषाएँ कौन-कौन से हैं?

भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को सूचीबद्ध किया गया है, जिन्हें अनुसूचित भाषाओं के रूप में संदर्भित किया गया है और उन्हें मान्यता, दर्जा और आधिकारिक प्रोत्साहन दिया गया है। ये भाषाएँ कुछ इस प्रकार है; असमिया, बंगाली, बोडो, डोगरी, गुजराती, हिन्दी, कन्नड, कश्मीरी, कोंकणी, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, मैथिली, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगू एवं उर्दू। [यहाँ यह याद रखिए कि 8वीं अनुसूची में इंग्लिश भाषा शामिल नहीं है।

Q. शास्त्रीय भाषा किसे कहते हैं?

निम्नलिखित मानदंडों के आधार पर किसी भाषा को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया जाता है;

  1. 1500-2000 वर्षों की अवधि में इसके प्रारंभिक ग्रंथों एवं दर्ज इतिहास की उच्च पुरातनता हो;
  2. प्राचीन साहित्य एवं ग्रंथों का एक समूह, जिसे वक्ताओं की पीढ़ियों द्वारा एक मूल्यवान विरासत माना जाता हो;
  3. साहित्यिक परंपरा मूल हो और किसी अन्य भाषण समुदाय से उधार न ली गई हो;

कुल मिलाकर कहने का अर्थ ये है कि समृद्ध विरासत और स्वतंत्र प्रकृति वाली भाषाओं को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया जाता है। भारत सरकार ने कन्नड़, मलयालम, ओडिया, संस्कृत, तमिल और तेलुगु को शास्त्रीय भाषा का गौरव प्रदान किया है।

Q. साहित्यिक भाषा किसे कहते हैं?

साहित्य रचना के लिए अपनाई जाने वाली भाषा को साहित्यिक भाषा कहते हैं। यह आम बोलचाल की भाषा से इस मायने में अलग होता है कि इसमें व्याकरणिक शुद्धता पर बल दिया जाता है और परिनिष्ठित शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है। जबकि आम बोलचाल की भाषा में आमतौर पर सरलता पर बल दिया जाता है और इसके लिए व्याकरणिक नियमों को तोड़ा भी जाता है।