विकल्पों का मारा इंसान । एक मजेदार व्यंग्यात्मक लेख

क्या विकल्प वाकई हमारी मदद करता है – पढ़िये विकल्पों का मारा इंसान और समझिए।

विकल्पों

विकल्पों का मारा इंसान 

विकल्पों से बंधा हुआ एक ज़िद्दी परिंदा है इंसान
विकल्पों का मारा है, विकल्पों पे ही जिंदा है।

हाँ – हाँ! मुझे पूरी उम्मीद है कि आप ने ये शायरी जरूर सुनी होगी पर, मैंने इस शायरी के उम्मीदों का विकल्प ढूंढ ही लिया। क्या करें हमारी फ़ितरत जो है विकल्प ढूँढना । 

हमारी पूरी ज़िंदगी विकल्प तलाशते- तलाशते ही गुजर जाती है –
बुरी स्थिति में फंसे हो तो विकल्प चाहिए
अच्छी स्थिति में हो तो भी विकल्प चाहिए
हम हमेशा विकल्पों से ही तो घिरे होते हैं। कहाँ नहीं है विकल्प….! 

विकल्प हमारे दिल में है, विकल्प हमारे दिमाग में हैं।
विकल्प आज में है, विकल्प इतिहास में है।

विकल्प परिवार में है, विकल्प हमारे समाज में है।
विकल्प हमारे कैरियर में है, विकल्प हमारी ज़िंदगी में है। 

विकल्प पे विकल्प, विकल्प पे विकल्प, विकल्प पे विकल्प
हमें और कुछ भी नहीं चाहिए, चाहिए तो बस एक विकल्प ।।

                  और हमें मिलता भी तो है…….

अगर हमें बेटी हो जाये तो अगली बार बेटा होने का विकल्प मिलता है।
अगर कोई छोड़ दे तो दूसरा मिल जाने का विकल्प मिलता है।
हमें नेता चुनने का विकल्प मिलता है, हमें विषय चुनने का विकल्प मिलता है।

हमें अपना आशियाना चुनने का विकल्प मिलता है, हमें अपने अपना ठिकाना चुनने का विकल्प मिलता है।

हमें रास्ता चुनने का विकल्प मिलता है, हमें मंजिल चुनने का विकल्प मिलता है।
हमें जीवन के हर मोड़ पर विकल्प मिलता है और हमें चाहिए भी तो यहीं………..! 

पर ज़िंदगी के इस व्यस्तता में हम आम तौर पर इसपे ध्यान तक नहीं देते हैं और तब भी विकल्पों से घिरी हमारी ज़िंदगी, विकल्पों में घुटती और सिसकती; विकल्पों के नए-नए आयामों से गुजरती आगे बढ़ती जाती है,

पर सिनेमा, समाज का आईना होने के नाते हमें विकल्पों के अलग-अलग आयामों को समझने की समझ हमारे अंदर पैदा करती है। 

वो बहुचर्चित डायलॉग, जब बिरु कहता है – बसंती इन कुत्तों के सामने मत नाचना !!!;
पर बसंती के अंतरात्मा से बस एक ही आवाज निकलती है – नहीं, मैं नाचूँगी, मैं नाचूँगी

क्योंकि वह जान रही होती है कि उसके पास गब्बर ने कोई विकल्प नहीं छोड़ा है। और ये दृश्य वास्तविक जीवन में हमारी विकल्पहीनता की स्थिति को प्रतिबिंबित कर जाती है

जब हमारे पास भी सामने वाला कोई विकल्प नहीं छोड़ता और हम मजबूर हो जाते है वो करने को जो हम कभी करना नहीं चाहते हैं, मजबूर हो जाते है वो बनने को जो हम कभी नहीं बनना चाहते हैं पर ये सब यहीं खत्म नहीं होता है । 

हम उस दृश्य को भी देख पाते है जब गब्बर कहता है – ये हाथ मुझे दे दे ठाकुर, ये हाथ मुझे दे दे! और वो ले भी लेता है ।

हमें लगने लगता है कि अब ठाकुर के पास कोई विकल्प नहीं बचा पर चरमोत्कर्ष (Climax) तक पहुँचते – पहुँचते हमें एहसास हो जाता है कि ठाकुर के पास अब भी एक विकल्प बचा हुआ है और वो है-उसका पैर

और ये दृश्य इंसानी जीवटता और उसके आशावादी रवैये को प्रतिबिंबित कर जाता है, जब हम सब्र जैसे तथाकथित महान शब्द की आड़ लेकर तब तक शांत बैठे रहते हैं जब तक कि हम कोई दूसरा विकल्प नहीं ढूंढ लेते । 

पर ये इंसानी जीवटता और आशावादी रवैया भी तब उस वक़्त, रेत के महल की तरह ढहने लग जाती है; जब हम भविष्य में विकल्प न मिल पाने की चिंता से आसंकित रहने लगते है। बिल्कुल उस गीत की तरह, जिसमें नायिका कहती है –
लग जा गले कि फिर ये हसीं रात हो न हो  
शायद फिर इस जनम में मुलाक़ात हो न हो……

क्योंकि नायिका समझ रही है कि उसके पास बस आज एक विकल्प है जहां वह नायक के साथ प्रेमालाप में मग्न हो सकती है

उसके बाद उसे शायद न ही ये वक़्त मिले और न ये विकल्प। पर हमारी सारी समझदारी उस वक़्त ख़त्म हो जाती है जब हम किसी खास वक़्त में मिलें विकल्पों को समझ नहीं पाते हैं,

हम सही विकल्प को चुन तक नहीं पाते है बिल्कुल उस दुर्योधन की तरह जब श्रीकृष्ण ने उसे विकल्प देते हुए कहा कि – 

‘दो न्याय अगर तो आधा दो ,
पर इसमें भी यदि बाधा हो,
तो दे दो केवल पाँच ग्राम,
रखों अपनी धरती तमाम ।
हम वही खुशी से खाएँगे
परिजन पर असि न उठाएंगे!’ 

पर दुर्योधन वह भी नहीं दे पाता है उस समय उसकी सारी समझदारी ख़त्म हो जाती है,

वे उस विकल्प को समझ ही नहीं पाता है और पूरे भारतवर्ष को महाभारत जैसे युद्ध की आग में झोंक देता है। तब हमें समझ में आता है कि कभी-कभी विकल्पों के प्रति हमारी नासमझी किस कदर हमें विनाश की ओर ले जाता है। 

हममें इतनी चेतना होने के बावजूद भी हम विकल्पों में हमेशा उलझे रहते है, हर समय – हर जगह; चाहे वो परीक्षा हो या फिर ज़िंदगी !

और जब मैं ये सब महसूस करता हूँ तो मैं ये सोचने पर विवश हो जाता हूँ कि – विकल्प हमें कभी-कभी कितना कमजोर बना देता है, हमारे असली सामर्थ्य को बाहर ही नहीं आने देता और किसी एक चीज़ पर फोकस्ड होने ही नहीं देता है बिल्कुल प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहें विद्यार्थियों की तरह…………..! 

विकल्प हमें उससे दूर कर देता है जिसे हम कभी छोड़ना नहीं चाहते । वो आपको छोड़ देता है / देती है, क्योंकि उसके पास आपका विकल्प होता है।

और तब विकल्प असली इंसानी चेहरे को सामने लाता है और इंसानी प्रवृति और इंसानी प्रकृति का बोध करवाता है। 

मुझे याद है, जैसे ही ये बोध (Sense) मुझमें आया – मैंने भगवान से प्रार्थना की कि, हे भगवान! आपने लोगों को इतने विकल्प क्यूँ दिये………………………………………………….।

भगवान ने मेरी पूरी बात सुनी और मुझे दो विकल्प देते हुए कहा कि – की या तो अपना बकवास बंद करो और निष्काम कर्म पर ध्यान दो, और नहीं तो तुम्हारे पास दूसरे भगवान के पास जाने का विकल्प खुला हुआ है । 

मुझे बात समझ में आने लगी थी …………………………।

मैं आपको एक विकल्प दे रहा हूँ , इस लेख को जरूर पढ़िये –

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