Unemployment (बेरोजगारी क्या है?)

इस लेख में हम बेरोजगारी (Unemployment) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे, तो लेख को अंत तक जरूर पढ़ें। बेरोजगारी से संबन्धित अन्य सभी लेखों का लिंक आपको नीचे मिल जाएगा, उसे भी जरूर विजिट करें।

Unemployment in Hindi

Unemployment

बेरोजगार को समझे

बेरोजगारी (Unemployment) आधुनिक युग की सर्वाधिक गंभीर सामाजिक समस्याओं में से एक है। यह सामाजिक विघटन की सहगामी है, इसीलिए वर्तमान युग की कठिन समस्या बेरोजगारी है। जिसने सन 1919 से 1937 तक विकराल रूप धारण कर रखा था। जिससे चारों और त्राहि-त्राहि मच गयी ।

उस समय व्यवसाय और व्यापार का अवसाद, मृत्यु, भूख, अपराध आदि चारों तरफ अपने विकराल रूप में छाये हुए थे । द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद तो इसका रूप और विकराल हो गया

आधुनिक युग में भारत में इसका वृहत विभाजित रूप है। इससे न केवल व्यैक्तिक विघटन ही बढ़ता है, अपितु सामाजिक एवं पारिवारिक विभाजन भी बल प्राप्त करता है। यह नैतिक पतन एवं अपराध-वृति को तो प्रोत्साहन देती है, साथ ही समाज में बर्बादी को भी जन्म देती है।  

अतः यह न केवल देश विशेष के लिए खतरनाक है, बल्कि संपूर्ण मानव समाज के लिए भी भयंकर है ।

बेरोजगारी (Unemployment) का गंभीर पक्ष

बेरोजगारी (Unemployment) की सबसे गंभीर पहलू व्यैक्तिक पहलू होता है।  जिस व्यक्ति के पास कोई धंधा नहीं है उसको अनेक व्यक्तिगत विपत्तियाँ झेलनी पड़ती है और उसकी आय बंद हो जाती है।

उसकी सहायता करने के लिए चाहे कुछ भी किया जाए वित्तीय असुरक्षा के कारण जीवन के प्रति उसका समस्त दृष्टिकोण बदल जाता है । इससे नित्य प्रति के सभी कामों पर इसका असर पड़ता है ।

आगे चलकर यह विश्वास होने पर की समाज को उसकी जरूरत नहीं है तथा यह निकम्मा है, उसमें आत्म-सम्मान भी लुप्त हो सकता है।

अंत में वह एकदम निराश हो सकता है, तथा अन्य बातों में भी लापरवाह हो सकता है और धंधे की तलास करना छोड़ सकता है ।

मानसिक एवं भावात्मक अस्थिरता के कुछ मामलों में बेरोजगारी पूर्णतः एक व्यक्तिगत समस्या होती है जिसका व्यक्तिगत इलाज करना पड़ता है लेकिन सामान्य रूप में यह एक आर्थिक और सामाजिक समस्या है।

बेरोजगारी(Unemployment) की विशेषताएँ

 बेरोजगारी (Unemployment) की कुछ प्रमुख विशेषताओं के आधार पर इसकी अवधारणा को और अधिक स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है ये विशेषताएं निम्न है ।  

1.कार्य करने की योग्यता व समर्थता :

किसी व्यक्ति को उसी रूप में बेरोजगार कहाँ जा सकता है, जब उसमें कार्य करने की योग्यता व समर्थता हो, कार्य करने की शारीरिक व मानसिक क्षमता हो ।

यदि कोई अस्वस्थ एवं विक्षिप्त व्यक्ति अपनी शारीरिक एवं मानसिक दोष के कारण कोई कार्य नहीं करता, तो उसे बेरोजगारी की श्रेणी में नहीं रखा जायेगा ।  

2.काम करने की इच्छा :

यदि कोई व्यक्ति कोई लाभकारी काम करना ही नहीं चाहता है और फिर वह अकर्मण्य या आलसी जीवन व्यतीत करता है तो उसे बेरोजगार नहीं कहाँ जा सकता ।

किसी व्यक्ति को उसी स्थति में बेरोजगार कहाँ जाएगा, जब वह कार्य की इच्छा अवश्य रखता हो किन्तु उसे फिर भी कोई कार्य नहीं मिल पाता ।  

इस दृष्टि से साधुओं, सन्यासियों, तपस्वियों आदि को बेरोजगार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता,

क्योंकि वे शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ होते हुए भी कार्य करने की इच्छा नहीं रखते । कार्य करने की इच्छा उसमें होती ही नहीं ।  

3.कार्य खोजने के सन्दर्भ में सतत प्रयत्नशील :

इच्छा और योग्यता रहते हुए भी यदि कोई व्यक्ति किसी लाभकारी कार्य को करने के लिए सतत प्रयत्नशील नहीं है तो बेरोजगारी की दशा उत्त्पन्न नहीं कर सकता ।

उदाहरणस्वरुप, एक प्रथम श्रेणी में सफलता प्राप्त करने वाला नौकरी की इच्छा एवं योग्यता रखते हुए भी यदि कहीं प्रार्थना –पत्र आदि नहीं भेजता हो वह बेरोजगार नहीं कहला सकता ।

4.अर्थार्जन करने का उद्देश्य :

यदि कोई व्यक्ति अर्थार्जन करने के उद्देश्य से कोई लाभकारी कार्य प्राप्त नहीं करता तो वह बेरोजगार नहीं कहलायेगा ।

उदाहरणस्वरुप, यदि कोई अध्यापक विद्यार्थियों से बिना कुछ लिए निशुल्क शिक्षा प्रदान करता है तो उसे हम रोजगार में लगा हुआ व्यक्ति नहीं कह सकते ।

वह रोजगार में लगा हुआ व्यक्ति तभी कहलायेगा जब वह अपनी पढ़ाई  के कार्य की फीस वसूल करें ।

इसी प्रकार एक गृह-स्वामिनी के गृह-प्रबंध के कार्य को रोजगारपरक कार्य नहीं माना जा सकता क्योंकि उसका यह कार्य मूल्यवान होते हुए भी आर्थिक उत्पादक नहीं है, धनार्जनकारी नहीं है ।

परन्तु यदि वह अपने गृह-व्यवस्था के कार्य के साथ-साथ प्रचलित मजदूरी की दर पर कोई और कार्य करती है तो उसका यह कार्य रोजगारपरक कहलाएगा ।  

5.योग्यता अनुसार पूर्ण रोजगार का अभाव :

एक व्यक्ति को पूर्ण रोजगार की स्थिति में तभी कहाँ जा सकता है जब उसे उसकी योग्यता एवं उसकी क्षमता के अनुरूप वैतनिक कार्य में संलग्न हो

परन्तु यदि उसे उसकी योग्यता एवं क्षमता के अनुरूप वैतनिक काम नहीं मिल पाता बल्कि उससे कम वेतन पर काम करना पड़ता है तो ऐसी स्थिति को आंशिक बेरोजगार (part time job) कहा जाता है ।  

इस प्रकार इन समस्त विशेषताओं के आलोक में बेरोजगारी को स्पष्ट करते हुए हम कह सकते है कि यह वह दशा है

जिसमें शारीरिक एवं मानसिक रूप से योग्य इच्छुक एवं प्रयत्नशील व्यक्ति अर्थार्जन करने के उद्देश्य से अपनी योग्यता एवं क्षमता के अनुसार प्रचलित मजदूरी की दर पर कोई लाभकारी कार्य प्राप्त नहीं कर पाता है ।

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