यह लेख अनुच्छेद 17 का यथारूप संकलन है। आप इसका हिन्दी और इंग्लिश दोनों अनुवाद पढ़ सकते हैं। आप इसे अच्छी तरह से समझ सके इसीलिए इसकी व्याख्या भी नीचे दी गई है आप उसे जरूर पढ़ें। इसकी व्याख्या इंग्लिश में भी उपलब्ध है, इसके लिए आप नीचे दिए गए लिंक का प्रयोग करें;

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अनुच्छेद 17
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📜 अनुच्छेद 17 (Article 17)

17. अस्पृश्यता का अंत – “अस्पृश्यता” का अंत किया जाता है और उसका किसी भी रूप में आचरण निषिद्ध किया जाता है। “अस्पृश्यता” से उपजी किसी निर्योग्यता को लागू करना अपराध होगा जो विधि के अनुसार दंडनीय होगा।
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17. Abolition of Untouchability – “Untouchability” is abolished and its practice in any form is forbidden. The enforcement of any disability arising out of “Untouchability” shall be an offence punishable in accordance with law.
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🔍 व्याख्या (Explanation)

संविधान के भाग 3 के अनुच्छेद 14 से लेकर 18 तक समता का अधिकार (Right to Equality) वर्णित किया गया है। जिसे कि आम नीचे चार्ट में देख सकते हैं। इसी का चौथा अनुच्छेद है अनुच्छेद 17, जो कि “अस्पृश्यता का अंत” की बात करता है।

समता का अधिकार
अनुच्छेद 14 – विधि के समक्ष समता एवं विधियों का समान संरक्षण
अनुच्छेद 15 – धर्म, मूलवंश, लिंग एवं जन्मस्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध
अनुच्छेद 16 – लोक नियोजन में अवसर की समता
अनुच्छेद 17 – अस्पृश्यता का अंत
अनुच्छेद 18 – उपाधियों का अंत
अनुच्छेद 17

समता का आशय समानता से होता है, एक लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना के लिए समानता एक मूलभूत तत्व है क्योंकि ये हमें सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक वंचितता (deprivation) से रोकता है।

हमने अनुच्छेद 14 , अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 16 के तहत क्रमशः समझा कि किस तरह से “विधि के समक्ष समता और विधियों का समान संरक्षण” सिद्धांत की मदद से, “धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध करके” और नियुक्तियों और नियोजनों में अवसर की समता की मदद से समानता स्थापित करने की कोशिश की गई है।

उसी की अगली कड़ी है अनुच्छेद 17, जो कि अस्पृश्यता का अंत की बात करती है। आइये इसे समझते हैं;

| अनुच्छेद 17 – अस्पृश्यता का अंत

अस्पृश्यता का अंत का मतलब है कि छुआछूत का पूरी तरह से अंत। इसका एक ही मकसद था कि लोगों में इंसानियत की भावना को मजबूत करना ताकि एक ही समाज में सभी वर्गों के लोग मिल जुल का रह सकें। इसीलिए अस्पृश्यता (untouchability) से उपजी किसी भी निर्योग्यता (disability) को लागू करने पर रोक लगा दिया गया।

पर ये इतना आसान नहीं था। कमोबेश आज भी छुआछूत है ही, भले ही ये एक मौलिक अधिकार है। इसीलिए अनुच्छेद 17 को सपोर्ट देने के लिए या इसे कानूनी रूप से लागू करने के लिए समय के साथ कुछ महत्वपूर्ण अधिनियम बनाए गए। और अस्पृश्यता को उचित तरीके से परिभाषित भी किया गया।

इसी के तहत चार सबसे महत्वपूर्ण अधिनियमों की संक्षिप्त में हम यहाँ चर्चा कर रहें है। विस्तार से समझने के लिए आप pdf डाउनलोड कर सकते हैं;

जन अधिकारों का सुरक्षा अधिनियम 1955 (THE PROTECTION OF CIVIL RIGHTS ACT, 1955)

इस अधिनियम का नाम पहले अस्पृश्यता अधिनियम 1955 (Untouchability Act 1955) था जो कि जून 1955 से प्रभावी हुआ था।

अप्रैल 1965 में गठित इलैया पेरुमल समिति के सिफ़ारिशों के आधार पर 1976 में इसमें संशोधन किया गया और इसका नाम बदलकर नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955 कर दिया गया।

ऐसा इसीलिए किया गया ताकि इसका उद्देश्य स्पष्ट हो सके कि दोषियों को दंडित करने के साथ ही इसका काम नागरिकों के अधिकारों को संरक्षण देना भी है।

इस अधिनियम में 17 धाराएं हैं। और अस्पृश्यता पर बहुत ही विस्तार से बात की गई है। और अस्पृश्यता को परिभाषित भी किया गया है। विस्तार से समझने के लिए पूरे डॉक्युमेंट को पढ़ सकते हैं;

⚫ इसकी धारा 3 से लेकर 7A अस्पृश्यता को अपराध मानती और सजा का प्रावधान करती है।

⚫ धारा 3, अस्पृश्यता के आधार पर, सार्वजनिक पूजा स्थलों, जल स्रोतों, तक पहुँच से रोकने से संबन्धित है। इसके तहत 1 महीने से 6 महीने तक जेल या 100 से 500 रुपए तक जुर्माना लगाया जा सकता है।

⚫ धारा 4, अस्पृश्यता के आधार पर, दुकान , सार्वजनिक भोजनालय, होटल, धर्मशाला, सार्वजनिक मनोरंजन स्थान, शमसान भूमि तक पहुँच से रोकने से संबन्धित है। इसके तहत भी उपरोक्त सजा का प्रावधान है।

⚫ धारा 5, अस्पृश्यता के आधार पर, अस्पताल, औषधालय, शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश से इंकार करने करने से संबन्धित है। इसके तहत भी उपरोक्त सजा का प्रावधान है।

⚫ धारा 6, अस्पृश्यता के आधार पर माल बेचने और सेवा देने से इंकार करने से संबन्धित है। इसके तहत भी उपरोक्त सजा का प्रावधान है।

⚫ धारा 7, अस्पृश्यता के आधार पर चोट पहुंचाने या नुकसान पहुंचाने से संबन्धित है। इसके तहत भी उपरोक्त सजा का प्रावधान है।

⚫ धारा 7A, अस्पृश्यता के आधार पर झाड़ू लगाने, शव को हटाने या इसी तरह के अन्य काम करने को मजबूर करने से संबन्धित है। इसे 1976 में संशोधन से द्वारा जोड़ा गया था। इसके तहत 3 महीने से लेकर 6 महीने तक सजा हो सकती है।

⚫ धारा 8 दोषी व्यक्ति के लाइसेंस रद्द करने से संबन्धित है। धारा 9 दोषी संस्था को सरकार से मिलने वाले अनुदान को रद्द करने से संबन्धित है।

⚫ धारा 10 इस तरह के अपराध को उकसाने वाले के संबंध में है और धारा 11 आदतन दोषी व्यक्ति को सजा बढ़ाने से संबन्धित है।

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अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 (Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act 1989)

इस अधिनियम को मुख्य रूप से एससी एव एसटी वर्ग के लिए बनाया गया है। इसके तहत अपराधों की सुनवाई के लिए विशेष न्यायालय के गठन का और अत्याचार पीड़ितों के पुनर्वास का प्रावधान किया गया है।

यह अधिनियम पूरे भारत में लागू है और इसे अच्छी तरह से क्रियान्वित करने की जिम्मेवारी राज्य सरकार को दी गई है।

जनवरी 1990 में यह अधिनियम लागू किया गया। इस अधिनियम में 4 अध्याय है। आइए इसे संक्षिप्त में समझते हैं;

⚫ अध्याय 1 शीर्षक, सीमा और परिभाषाओं की बात करता है। इसके तहत धारा 1 और दो आती है।

⚫ अध्याय 2, अत्याचार और सजा की बात करता है; इसके तहत धारा 3 से 9 तक आती है, जो कि कुछ इस तरह से है;

  1. अपराध अत्याचार के लिए दंड।
  2. कर्तव्यों की उपेक्षा के लिए दंड।
  3. सजा के बाद बढ़ी हुई सजा।
  4. भारतीय दंड संहिता के कुछ प्रावधानों का लागू होना।
  5. कतिपय व्यक्तियों की संपत्ति का समपहरण।
  6. अपराधों के बारे में उपधारणा।
  7. शक्तियों का प्रदान करना।

⚫ अध्याय 3, निर्वासन (EXTERNMENT) की बात करता है, इसके तहत धारा 10 से 13 तक आता है, जो कि कुछ इस तरह है;

  1. अपराध करने की संभावना वाले व्यक्ति को हटाना।
  2. किसी व्यक्ति द्वारा स्वयं को क्षेत्र से हटाने और हटाए जाने के बाद उसमें प्रवेश करने में विफल रहने पर प्रक्रिया।
  3. जिन व्यक्तियों के विरुद्ध धारा 10 के अधीन आदेश है, उनकी माप लेना और फोटो आदि लेना।
  4. धारा 10 के तहत आदेश का पालन न करने पर जुर्माना।

⚫ अध्याय 4, विशेष न्यायालय (Special Courts) के संबंध में है। इसके तहत धारा 14 से 15 तक आता है, जो कि कुछ इस तरह से है;

  1. विशेष न्यायालय और अनन्य विशेष न्यायालय।
    14ए. अपील।
  2. विशेष लोक अभियोजक और अनन्य लोक अभियोजक।

⚫ अध्याय 4A, पीड़ितों और गवाहों के अधिकार के संबंध में है। इसके तहत धारा 15A से 23 तक आती है, जो कि कुछ इस तरह से है’

  1. A – पीड़ितों और गवाहों के अधिकार।
  2. सामूहिक जुर्माना लगाने की राज्य सरकार की शक्ति।
  3. कानून और व्यवस्था तंत्र द्वारा की जाने वाली निवारक कार्रवाई।
  4. संहिता की धारा 438 अधिनियम के तहत अपराध करने वाले व्यक्तियों पर लागू नहीं होगी।
    • 18ए. किसी पूछताछ या अनुमोदन की आवश्यकता नहीं है।
  5. संहिता की धारा 360 या अपराधी परिवीक्षा अधिनियम के प्रावधानों का अधिनियम के तहत अपराध के दोषी व्यक्तियों पर लागू नहीं होना।
  6. अन्य कानूनों को ओवरराइड करने के लिए अधिनियम।
  7. अधिनियम के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए सरकार का कर्तव्य।
  8. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई का संरक्षण।
  9. नियम बनाने की शक्ति।

⚫ जनवरी 2016 में इसमें संशोधन किया गया था पर सुप्रीम कोर्ट ने इस अधिनियम के दुरुपयोग पर चिंता जतायी और कहा कि शिकायत मिलने के बाद तुरंत मामला दर्ज नहीं होगा, डीएसपी पहले शिकायत की प्रारम्भिक जांचकरके पता लगाएगा कि मामला कहीं दुर्भावना से तो प्रेरित नहीं है।

⚫ इसके बाद 2018 में सरकार ने इस कानून में फिर से संशोधन किया और अगस्त 2018 में इसे पास कर दिया गया।

इसके तहत ये व्यवस्था किया गया कि अब complain दर्ज कराने से पहले प्रारम्भिक जांच कराने की जरूरत नहीं होगी और किसी आरोपी को गिरफ्तार करने से पहले किसी अधिकारी से मंजूरी लेने की आवश्यकता नहीं होगी। संशोधन के द्वारा धारा 18A के तहत इसको जोड़ा गया।

इस अधिनियम को भी सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने फिर से इस पर सुनवाई की और सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रखा है। [जब आएगा इसे अपडेट कर दिया जाएगा।]

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दिव्याङ्गजन अधिकार अधिनियम 2016 (Rights of Persons with Disabilities Act 2016)

यह अधिनियम विकलांग व्यक्तियों (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 की जगह लेता है। यह विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्रीय सम्मेलन (यूएनसीआरपीडी) के दायित्वों को पूरा करता है, जिसका भारत एक हस्ताक्षरकर्ता है।

विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 को केवल RPWD अधिनियम कहा जाता है। शैक्षिक, सामाजिक, कानूनी, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक क्षेत्रों में विकलांग लोगों के अधिकारों और सम्मान को बढ़ावा देता है और उनकी रक्षा करता है।

अधिनियम की मुख्य विशेषताएं – यह अधिनियम उपयुक्त सरकारों को उपाय करने और यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी देता है ताकि पीडब्ल्यूडी समान अधिकारों का आनंद लें।

इस अधिनियम के तहत विकलांगों के प्रकार 7 से बढ़ाकर 21 कर दिए गए हैं। और केंद्र सरकार के पास और अधिक प्रकार की विकलांगता जोड़ने की शक्ति दी गई है। 21 प्रकार के विकलांगता कुछ इस प्रकार है –

  1. शारीरिक विकलांगता
    • लोकोमोटर विकलांगता
      • कुष्ठ रोग से मुक्त व्यक्ति
      • मस्तिष्क पक्षाघात
      • बौनापन
      • मांसपेशीय दुर्विकास
      • एसिड अटैक पीड़िता
    • दृश्य हानि
      • अंधापन
      • कम दृष्टि
    • सुनने में परेशानी
      • बहरा
      • सुनने में दिक्कत
    • भाषण और भाषा विकलांगता
  2. बौद्धिक अक्षमता
    • विशिष्ट सीखने की अक्षमता
    • ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिस्ऑर्डर
  3. मानसिक व्यवहार (मानसिक बीमारी)
  4. विकलांगता के कारण-
    • क्रोनिक न्यूरोलॉजिकल स्थितियां जैसे
      • मल्टीपल स्क्लेरोसिस
      • पार्किंसंस रोग
    • रक्त विकार
      • हीमोफीलिया
      • थैलेसीमिया
      • सिकल सेल रोग
  5. एकाधिक विकलांगता
  • “बेंचमार्क विकलांग” वाले व्यक्तियों को उन लोगों के रूप में परिभाषित किया गया है जो ऊपर निर्दिष्ट विकलांगों के कम से कम 40 प्रतिशत होने के लिए प्रमाणित हैं।

अधिकार एवं पात्रता

  • यह सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी उपाय करने के लिए उपयुक्त सरकारों पर जिम्मेदारी डाली गई है कि विकलांग व्यक्ति दूसरों के साथ समान रूप से अपने अधिकारों का आनंद लें।
  • बेंचमार्क विकलांग व्यक्तियों के लिए अतिरिक्त लाभ जैसे उच्च शिक्षा में आरक्षण (5% से कम नहीं), सरकारी नौकरियों (4% से कम नहीं), भूमि के आवंटन में आरक्षण, गरीबी उन्मूलन योजनाओं (5% आवंटन) आदि प्रदान किए गए हैं। और जिन्हें उच्च समर्थन की आवश्यकता है।
  • 6 से 18 वर्ष की आयु के बीच बेंचमार्क विकलांगता वाले प्रत्येक बच्चे को मुफ्त शिक्षा का अधिकार होगा।
  • सरकार द्वारा वित्तपोषित शैक्षणिक संस्थानों के साथ-साथ सरकारी मान्यता प्राप्त संस्थानों को विकलांग बच्चों को समावेशी शिक्षा प्रदान करनी होगी।
  • प्रधानमंत्री को मजबूत करने के लिएसुलभ भारत अभियान में सार्वजनिक भवनों (सरकारी एवं निजी दोनों) में निर्धारित समय-सीमा में सुगमता सुनिश्चित करने पर बल दिया गया है।

संरक्षण

  • अधिनियम जिला न्यायालय द्वारा संरक्षकता प्रदान करने का प्रावधान करता है जिसके तहत अभिभावक और विकलांग व्यक्तियों के बीच संयुक्त निर्णय-निर्माण होगा।

प्राधिकरणों की स्थापना

  • केंद्र और राज्य स्तर पर शीर्ष नीति बनाने वाले निकायों के रूप में काम करने के लिए विकलांगता पर व्यापक आधार वाले केंद्रीय और राज्य सलाहकार बोर्डों की स्थापना की जानी है।
  • विकलांग व्यक्तियों के मुख्य आयुक्त के कार्यालय को मजबूत किया गया है, जिसे अब 2 आयुक्तों और एक सलाहकार समिति द्वारा सहायता प्रदान की जाएगी, जिसमें विभिन्न विकलांगों के विशेषज्ञों से 11 से अधिक सदस्य नहीं होंगे।
  • इसी तरह, विकलांग राज्य आयुक्तों के कार्यालय को मजबूत किया गया है, जिन्हें एक सलाहकार समिति द्वारा सहायता प्रदान की जाएगी, जिसमें विभिन्न विकलांगों के विशेषज्ञों में से 5 से अधिक सदस्य नहीं होंगे।

अपराधों के लिए दंड

  • अधिनियम विकलांग व्यक्तियों के खिलाफ किए गए अपराधों और नए कानून के प्रावधानों के उल्लंघन के लिए दंड का प्रावधान करता है।
  • कोई भी व्यक्ति जो अधिनियम के प्रावधानों, या इसके तहत बनाए गए किसी नियम या विनियम का उल्लंघन करता है, को छह महीने तक के कारावास और/या 10,000 रुपये के जुर्माने, या दोनों के साथ दंडित किया जाएगा। किसी भी बाद के उल्लंघन के लिए, दो साल तक की कैद और/या 50,000 रुपये से पांच लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।

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मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम 2017 (The Mental Health Act 2017)

भारत में, मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017, अप्रैल 2017 को पारित किया गया था और 29 मई 2018 से लागू हुआ था।

अधिनियम का उद्देश्य सरकार से भेदभाव के बिना स्वास्थ्य देखभाल और उपचार तक पहुंच के साथ-साथ मानसिक बीमारी वाले लोगों के अधिकारों की रक्षा करना है। 

इसके अतिरिक्त, बीमाकर्ता अब मानसिक बीमारी के इलाज के लिए चिकित्सा बीमा के लिए उसी आधार पर प्रावधान करने के लिए बाध्य हैं, जो शारीरिक बीमारियों के इलाज के लिए उपलब्ध है।

⚫ इस अधिनियम ने प्रभावी रूप से आत्महत्या के प्रयास को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया जो भारतीय दंड संहिता की धारा 309 के तहत दंडनीय था। यानी कि अब मुकदमा चलाने या दंडित करने के बजाय सरकार से पुनर्वास के अवसर प्रदान किए जा सकते हैं।

⚫ यह कानून, मानसिक बीमारी वाले व्यक्तियों के लिए मानसिक स्वास्थ्य देखभाल और सेवाएं प्रदान करने और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल और सेवाओं के वितरण के दौरान ऐसे व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा, प्रचार और पूर्ति करने से जुड़ा हुआ है।

⚫ यह अधिनियम पहले से मौजूद मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987 का स्थान लेता है जो 22 मई 1987 को पारित किया गया था।

⚫ इसमें कहा गया है कि मानसिक बीमारी “राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत चिकित्सा मानकों के अनुसार केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित की जा सकती है।”

इसके अतिरिक्त, अधिनियम में कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति या प्राधिकरण किसी व्यक्ति को मानसिक बीमारी वाले व्यक्ति के रूप में तब तक वर्गीकृत नहीं करेगा जब तक कि इसका संबंध सीधे तौर पर बीमारी के उपचार से न हो।

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तो कुल मिलाकर यही है अनुच्छेद 17, उम्मीद है आपको इसका कॉन्सेप्ट समझ में आया होगा। समता के अधिकार के तहत आने वाले अन्य लेखों को पढ़ना न भूलें।

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Constitution
Basics of Parliament
Fundamental Rights
Judiciary in India
Executive in India
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अस्वीकरण - यहाँ प्रस्तुत अनुच्छेद और उसकी व्याख्या, मूल संविधान (नवीनतम संस्करण), संविधान पर डी डी बसु की व्याख्या (मुख्य रूप से) और संविधान के विभिन्न ज्ञाताओं (जिनके लेख समाचार पत्रों, पत्रिकाओं एवं इंटरनेट पर ऑडियो-विजुअल्स के रूप में उपलब्ध है) पर आधारित है। हमने बस इसे रोचक और आसानी से समझने योग्य बनाने का प्रयास किया है।