यह लेख अनुच्छेद 19 का यथारूप संकलन है। आप इसका हिन्दी और इंग्लिश दोनों अनुवाद पढ़ सकते हैं। आप इसे अच्छी तरह से समझ सके इसीलिए इसकी व्याख्या भी नीचे दी गई है आप उसे जरूर पढ़ें। इसकी व्याख्या इंग्लिश में भी उपलब्ध है, इसके लिए आप नीचे दिए गए लिंक का प्रयोग करें;

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अनुच्छेद 19
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📜 अनुच्छेद 19 (Article 19) Right to Freedom

19. वाक्‌-स्वातंत्र्य आदि विषयक कुछ अधिकारों का संरक्षण – (1) सभी नागरिकों को –
(क) वाक्‌-स्वातंत्रय और अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य का,
(ख) शांतिपूर्वक और निरायुध सम्मेलन का,
(ग) संगम या संघ 1[या सहकारी सोसाइटी] बनाने का,
(घ) भारत के राज्यक्षेत्र में सर्वत्र अबाध संचरण का,
(ङ) भारत के राज्यक्षेत्र के किसी भाग में निवास करने और बस जाने का,

2[और]
3() * * * * *
(छ) कोई वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारबार करने का,
अधिकार होगा।

4[(2) खंड (1) के उपखंड (क) की कोई बात उक्त उपखंड द्वारा दिए गए अधिकार के प्रयोग पर 5[भारत की प्रभुता और अखंडता,] राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार के हितों में अथवा न्‍यायालय-अवमान, मानहानि या अपराध-उद्दीपन के संबंध में युक्तियुक्त निर्बंधन जहां तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित
करती है वहां तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बंधन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करेगी।]

(3) उक्त खंड के उपखंड (ख) की कोई बात उक्त उपखंड द्वारा दिए गए अधिकार के प्रयोग पर 6[भारत की प्रभुता और अखंडता या] लोक व्यवस्था के हितों में युक्तियुक्त निर्बन्धन जहां तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहां तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बन्धन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करेगी।

(4) उक्त खंड के उपखंड (ग) की कोई बात उक्त उपखंड द्वारा दिए गए अधिकार के प्रयोग पर 7[भारत की प्रभुता और अखंडता या] लोक व्यवस्था या रुदाचार के हितों में युक्तियुक्त निर्बन्धन जहां तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहां तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बन्धन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं
करेगी ।

(5) उक्त खंड के 8[उपखंड (घ) और उपखंड (ङ)] की कोई बात उक्त उपखंडों द्वारा दिए गए अधिकारों के प्रयोग पर साधारण जनता के हितों में या किसी अनुसूचित जनजाति के हितों के संरक्षण के लिए युक्तियुक्त निर्बन्धन जहां तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहां तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बन्धन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करेगी ।

(6) उक्त खंड के उपखंड (छ) की कोई बात उक्त उपखंड द्वारा दिए गए अधिकार के प्रयोग पर साधारण जनता के हितों में युक्तियुक्त निर्बन्धन जहां तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहां तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बंधनअधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करेगी और विशिष्टतया 9[उक्त उपखंड की कोई बात –
(i) कोई वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारबार करने के लिए आवश्यक वृत्तिक या तकनीकी अर्हताओं से, या
(ii) राज्य द्वारा या राज्य के स्वामित्व या नियंत्रण में किसी निगम द्वारा कोई व्यापार, कारबार, उद्योग या सेवा, नागरिकों का पूर्णतः या भागतः अपवर्जन करके या अन्यथा, चलाए जाने से,

जहां तक कोई विद्यमान विधि संबंध रखती है वहां तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या इस प्रकार संबंध रखने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करेगी।]
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1. संविधान (सत्तानवेवां संशोधन) अधिनियम, 2011 की धारा 2 द्वारा (8-2-2012 से) अंतःस्थापित।
2. संविधान (चवालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1978 का धारा 2 द्वारा (20-6-1979 से) अंतःस्थापित।
3. संविधान (चवालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1978 का धारा 2 द्वारा (20-6-1979 से) उपखंड (च) का लोप किया गया।
4. संविधान (पहला संशोधन) अधिनियम, 1951 की धारा 3 द्वारा (भूतलक्षी प्रभाव से) खंड (2) के स्थान पर प्रतिस्थापित।
5. संविधान (सोलहवां संशोधन) अधिनियम, 1963 की धारा 2 द्वारा (5-10-1963 से) अंतःस्थापित।
6. संविधान (सोलहवां संशोधन) अधिनियम, 1963 की धारा 2 द्वारा (5-10-1963 से) अंतःस्थापित।
7. संविधान (सोलहवां संशोधन) अधिनियम, 1963 की धारा 2 द्वारा (5-10-1963 से) अंतःस्थापित।
8. संविधान (चवालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1978 की धारा 2 द्वारा (20-6-1979 से) “उपखंड (घ), उपखंड (ङ) और उपखंड (च)” के स्थान पर प्रतिस्थापित।
9. संविधान (पहला संशोधन) अधिनियम, 1951 की धारा 3 द्वारा कतिपय शब्दों के स्थान पर (18-6-1951 से) प्रतिस्थापित।
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19. Protection of certain rights regarding freedom of speech, ete.— (1) All citizens shall have the right—
(a) to freedom of speech and expression;
(b) to assemble peaceably and without arms;
(c) to form associations or unions 1[or co-operative societies];
(d) to move freely throughout the territory of India;
(e) to reside and settle in any part of the territory of India;

2[and]

3[(f)* * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * *]
(g) to practise any profession, or to carry on any occupation, trade or business.

4[(2) Nothing in sub-clause (a) of clause (1) shall affect the operation of any existing law, or prevent the State from making any law, in so far as such law imposes reasonable restrictions on the exercise of the right conferred by the said sub-clause in the interests of 5[the sovereignty and integrity of India], the security of the State, friendly relations with foreign States, public order, decency or morality, or in relation to contempt of court, defamation or incitement to an offence.]

(3) Nothing in sub-clause (b) of the said clause shall affect the operation of any existing law in so far as it imposes, or prevent the State from making any law imposing, in the interests of 6[the sovereignty and integrity of India or] public order, reasonable restrictions on the exercise of the right conferred by the said sub-clause.

(4) Nothing in sub-clause (c) of the said clause shall affect the operation of any existing law in so far as it imposes, or prevent the State from making any law imposing, in the interests of 7[the sovereignty and integrity of India or] public order or morality, reasonable restrictions on the exercise of the right conferred by the said sub-clause.

(5) Nothing in 8[sub-clauses (d) and (e)] of the said clause shall affect the operation of any existing law in so far as it imposes, or prevent the State from making any law imposing, reasonable restrictions on the exercise of any of the rights conferred by the said sub-clauses either in the interests of the general public or for the protection of the interests of any Scheduled Tribe.

(6) Nothing in sub-clause (g) of the said clause shall affect the operation of any existing law in so far as it imposes, or prevent the State from making any law imposing, in the interests of the general public, reasonable restrictions on the exercise of the right conferred by the said sub clause, and, in particular, 9[nothing in the said sub-clause shall affect the operation of any existing law in so far as it relates to, or prevent the State from making any law relating to –

(i) the professional or technical qualifications necessary for practising any profession or carrying on any occupation, trade or business, or

(ii) the carrying on by the State, or by a corporation owned or controlled by the State, of any trade, business, industry or service, whether to the exclusion, complete or partial, of citizens or otherwise.]

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1. Inserted by the Constitution (Ninety-seventh Amendment) Act, 2011, s. 2 (w.e.f. 8-2-2012).
2. Ins. by the Constitution (Forty-fourth Amendment) Act, 1978, s. 2 (w.e.f. 20-6-1979).
3. Sub-clause (f) omitted by the Constitution (Forty-fourth Amendment) Act, 1978, s. 2 (w.e.f. 20-6-1979).
4. Substituted (with retrospective effect) for clause (2) by the Constitution (First Amendment) Act, 1951, section 3.
5. Ins. by the Constitution (Sixteenth Amendment) Act, 1963, s. 2 (w.e.f. 5-10-1963).
6. Ins. by the Constitution (Sixteenth Amendment) Act, 1963, s. 2 (w.e.f. 5-10-1963).
7. Inserted by the Constitution (Sixteenth Amendment) Act, 1963, s. 2 (w.e.f. 5-10-1963).
8. Substituted by the Constitution (Forty-fourth Amendment) Act, 1978, s. 2, for “sub-section (d), sub-section (e) and sub-section (f)” (w.e.f. 20-6-1979).
9. Subs. by the Constitution (First Amendment) Act, 1951, s. 3, for certain words (w.e.f. 18-6-1951).
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🔍 व्याख्या (Explanation)

स्वतंत्रता यानी कि किसी व्यक्ति पर बाहरी प्रतिबंधों का अभाव। दूसरे शब्दों में कहें तो अपने जीवन और नियति का नियंत्रण स्वयं करना तथा अपनी इच्छाओं और गतिविधियों को आजादी से व्यक्त करने का अवसर बने रहना, स्वतंत्रता है।

भारत की बात करें तो स्वतंत्रता यहाँ एक मौलिक अधिकार है। दरअसल भारतीय संविधान का भाग 3 मौलिक अधिकारों के बारे में है। इसी के अनुच्छेद 19 से लेकर अनुच्छेद 22 तक “स्वतंत्रता का अधिकार” की चर्चा की गई है। (जैसा कि आप चार्ट में देख सकते हैं) हम यहाँ अनुच्छेद 19 को समझने वाले हैं;

स्वतंत्रता का अधिकार
अनुच्छेद 19 – छह अधिकारों की सुरक्षा; (1) अभिव्यक्ति (2) सम्मेलन (3) संघ (4) संचरण (5) निवास (6) व्यापार
⚫ अनुच्छेद 20 – अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण
⚫ अनुच्छेद 21 – प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता
⚫ अनुच्छेद 21क – प्रारम्भिक शिक्षा का अधिकार
⚫ अनुच्छेद 22 – गिरफ़्तारी एवं निरोध से संरक्षण

| अनुच्छेद 19 – अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आदि विषयक कुछ अधिकारों का संरक्षण

हम देख सकते हैं कि अनुच्छेद 19 के अंतर्गत कुल 6 खंड है जिसमें से इसके पहले खंड के अंतर्गत 6 प्रकार की आजादी दी गई है और बाकी के खंडों में (खंड 2 से 6 तक) युक्तियुक्त निर्बंधन (reasonable restriction) की बात की गई है।

Q. युक्तियुक्त निर्बंधन (reasonable restriction) का अर्थ ये है कि किसी व्यक्ति के अधिकारों पर उतना ही प्रतिबंध लगाया गया है जो कि सभी के हित में आवश्यक हो।

कहने का अर्थ ये है कि अनुच्छेद 19(1) मूल अधिकारों को लागू तो करता है लेकिन यह पूर्ण (absolute) नहीं है। राज्य, कुछ चीजों को ध्यान में रखकर इन अधिकारों पर प्रतिबंध लगा सकती है। क्या है वो चीज़ इसपर हम आगे चर्चा करेंगे पहले ये समझ लेते हैं कि अनुच्छेद 19(1) किन छह अधिकारों की बात करता है;

अनुच्छेद 19 (1) के तहत सभी नागरिकों को,

(a) अभिव्यक्ति की आजादी का, 
(b) शांतिपूर्वक और बिना हथियार के सम्मेलन का,
(c) संघ या गुट बनाने का, 
(d) भारत में निर्बाध कहीं भी घूमने का,
(e) भारत में कहीं भी बस जाने का, और
(f) ***
(g) भारत में कहीं भी व्यापार करने का, अधिकार होगा।

*** मूल संविधान के तहत अनुच्छेद 19 में 7 अधिकारों की चर्चा थी, लेकिन (f) जो कि संपत्ति खरीदने या बेचने के अधिकार से संबन्धित था; उसे 1978 में 44वें संविधान संशोधन के माध्यम से हटा दिया गया।

और अनुच्छेद 300क के तहत इसे रख दिया गया। जहां यह स्पष्ट लिख दिया गया है कि किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से बिना विधि के प्राधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है।

इसके हटाने के पीछे का मुख्य कारण भूमि-सुधार को लागू करने से था। या यूं कहें कि उस समय के भारतीय परिस्थितियों में इसका अन्य मूल अधिकारों से असंगत होना था।

बात कुछ इस तरह से था कि पहले बड़े-बड़े जमींदार हुआ करता था और जमीन का मालिकाना हक़ उसी के पास होता था। तथा अनुच्छेद 19 उसकी संपत्ति की रक्षा भी करता था।
ऐसी स्थिति में गरीबों का और गरीब रह जाना एवं उसका हमेशा जमींदार के पास बंधुआ मजदूर की तरह काम करते रहने जैसा समस्या एक नए प्रकार की गुलामी को जन्म दे सकता था।
इसीलिए इसे मूल अधिकार से हटाकर संवैधानिक अधिकार बना दिया गया ताकि जमींदारी प्रथा खत्म हो जाये, गरीबों को भी अपनी जमीन मिल सकें और जनहित में किसी काम के लिए सरकार को जमीन की उपलब्धता बनी रहें।
इसी से संबन्धित एक और अधिकार था अनुच्छेद 31 में, उसे भी 44वां संविधान संशोधन द्वारा ही हटा दिया गया था। इस पूरे प्रकरण को केशवानन्द भारती↗️ मामले से समझा जा सकता है।

आइए अब एक-एक करके इन छह अधिकारों को समझते हैं ;

(a) अभिव्यक्ति की आजादी

प्रत्येक व्यक्ति को अपने विचार और मत पूर्णतया अभिव्यक्त्त करने का अधिकार है। वह चाहे बोलकर, लिखकर, मुद्रण से, चित्र द्वारा या किसी अन्य रीति से करे।

अभिव्यक्ति की आजादी में सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित बातों को सम्मिलित किया है;

(1) अपने या किसी अन्य के विचारों को प्रचारित-प्रसारित करने का अधिकार।
(2) प्रेस एवं विज्ञापन की स्वतंत्रता।
(3) सरकारी गतिविधियों की जानकारी का अधिकार।
(4) शांति का अधिकार
(5) प्रदर्शन एवं विरोध का अधिकार, लेकिन हड़ताल का अधिकार नहीं। आदि।

याद रखिए कि ये सारी चीज़ें संविधान में इस तरह से लिखी नहीं गई है ये माना गया है कि ये सारे अधिकार अभिव्यक्ति की आजादी के तहत ही आएंगी।

राज्य, अगर चाहे तो भारत की एकता एवं संप्रभुता, राज्य की सुरक्षा, नैतिकता की स्थापना, विदेशी राज्यों से मित्रवत संबंध, न्यायालय की अवमानना, लोक व्यवस्था, मानहानि एवं अपराध उद्दीपन (guilt provocation) आदि को ध्यान में रखकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अनुच्छेद 19(2) के तहत युक्तियुक्त प्रतिबंध (Reasonable restriction) भी लगा सकता है।

| अभिव्यक्ति की आजादी को विस्तार से समझें – अभिव्यक्ति की आजादी : अर्थ, क्लॉज़, उद्देश्य व प्रतिबंध

(b) शांतिपूर्वक और बिना हथियार के सम्मेलन का अधिकार

अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत नागरिकों को एक दूसरे से मिलने की स्वतंत्रता दी गई है। लेकिन यह बिना हथियार के और शांतिपूर्वक होना चाहिए।

दूसरे शब्दों में, इसके तहत बिना हथियार के संगठित होने, सार्वजनिक बैठकों में भाग लेने एवं प्रदर्शन करने का अधिकार सम्मिलित है।

शांतिपूर्ण शोभा यात्रा या जुलूस निकालने का अधिकार इसी के तहत माना जाता है। लेकिन यह यातायात क़ानूनों (traffic laws) के अधीन होता है।

यह व्यवस्था हिंसा, अव्यवस्था एवं सार्वजनिक शांति भंग करने के लिए नहीं है। और राज्य चाहे तो इस पर अनुच्छेद 19(3) के तहत युक्तियुक्त प्रतिबंध लगा सकता है।

यहाँ यह याद रखिए कि सम्मेलन के अधिकार का प्रयोग करते समय किसी भी व्यक्ति को अनुच्छेद 51क में दिए गए मूल कर्तव्यों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, जैसे कि सार्वजनिक सम्पत्तियों का विनाश नहीं करना चाहिए।

(c) संघ या गुट बनाने का अधिकार

इसके तहत – राजनीतिक दल बनाने का अधिकार, कंपनी, साझा फर्म, समितियां, क्लब, संगठन या अन्य किसी प्रकार के संघ बनाने का अधिकार सम्मिलित है। साथ ही इसे संचालित करने का भी अधिकार इसके तहत सम्मिलित है।

और सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि किसी संघ या गुट का हिस्सा बनने से इंकार करने का अधिकार भी इसमें शामिल है।

यहाँ यह भी याद रखिए कि अनुच्छेद 19 नागरिकों को अधिकार प्रदान करता है, संघ या गुट को नहीं। यानी कि एक संघ नागरिकों के समूह के रूप में अधिकार का दावा कर सकता है, संघ या गुट के रूप में नहीं।

दूसरी बात ये कि अनुच्छेद 19(1)(ग) संघ बनाने का अधिकार देता है, सम्मेलन करने का अधिकार 19(1)(ख) से मिलता है और एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने का अधिकार 19(1)(घ) से मिलता है।

राज्य इस पर भी अनुच्छेद 19(4) के तहत भारत की प्रभुता और अखंडता या लोक व्यवस्था या सदाचार को आधार बनाकर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगा सकता है।

क्योंकि इसके तहत किसी को आतंकवादी संगठन बनाने की आजादी तो नहीं ही दी जा सकती है। या किसी को हड़ताल करने की आजादी नहीं दी सकती।

(d) भारत में निर्बाध कहीं भी घूमने का अधिकार

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है ये भारत में निर्बाध घूमने के अधिकार को सुनिश्चित करता है न कि भारत के बाहर।

कहने का अर्थ ये है कि यह, भारत के राज्यक्षेत्र में एक स्थान से दूसरे स्थान आने-जाने को, या एक ही राज्य के विभिन्न भागों में बिना किसी विभेदकारी बंधन के संचरण का अधिकार देता है।

हालांकि यह भी युक्तियुक्त प्रतिबंधों से मुक्त नहीं है। जैसे कि भारत के अंदर कई ऐसे जगह हो सकते हैं जहां निर्बाध घूमने को रोका जा सकता है या फिर परमिट लेकर जाने दिया जा सकता है। ऐसा आमतौर पर जनजातिय क्षेत्रों में उसकी संस्कृति को बचाने के उद्देश्य से किया जाता है।

इसके अलावा अपराध में संलिप्त व्यक्ति को कहीं जाने से रोका जा सकता है। या फिर विदेश से आने वाले व्यक्तियों को कुछ खास स्थानों पर जाने से रोका जा सकता है।

इसके अलावा अगर किसी को ऐसी बीमारी है जो दूसरों में फैल सकती है तो उसे भी अबाध संचरण से रोका जा सकता है। राज्य को इस मामले में युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाने का अधिकार अनुच्छेद 19(5) के तहत मिलता है।

(e) भारत में कहीं भी बस जाने का अधिकार

यहाँ भी नाम से स्पष्ट है कि ये भारत में कहीं भी बस जाने के अधिकार से संबन्धित है न कि भारत के बाहर। भारत के अंदर भी ये अस्थायी एवं स्थायी दोनों तरह से बस जाने का अधिकार देता है।

चूंकि ये भारतीय नागरिकों को प्राप्त है इसीलिए कोई विदेशी व्यक्ति इस अधिकार पर दावा नहीं कर सकता है।

लेकिन यहाँ भी राज्य चाहे तो अनुच्छेद 19(5) के तहत युक्तियुक्त प्रतिबंध लगा सकता है। ये भी आमतौर पर जनजातीय क्षेत्रों या किसी अन्य ऐसे संवेदनशील क्षेत्रों से संबन्धित होता है जहां पर बसना उचित नहीं होता है।

अनुच्छेद 19(1) (च) – संपत्ति की स्वतंत्रता – 44वें संविधान संशोधन द्वारा हटा दिया गया है।

कहने का अर्थ ये है कि चूंकि अब संपत्ति के अधिकार को मूल अधिकार से हटा दिया गया है इसीलिए कोई नागरिक संपत्ति के अर्जन, धारण और व्ययन (disposal) करने के अधिकार को मौलिक अधिकार के तहत दावा नहीं कर सकता है।

इसका दूसरा मतलब ये भी है अब अगर किसी व्यक्ति से उसकी संपत्ति किसी विधि के आधार पर छीनी जाती है तो वह मौलिक अधिकार के तहत इसे कोर्ट में नहीं ले जा सकता है।

(g) भारत में कहीं भी व्यापार करने का अधिकार

इसके तहत भारत में किसी भी व्यवसाय को करने, अपनाने का छूट दिया गया है। कहने का अर्थ ये है कि नागरिक के पास यह चुनने का अधिकार है कि वह कौन सा व्यापार करना चाहता है, कौन सा नौकरी करना चाहता है या कुछ भी नहीं करना चाहता है।

अगर कोई व्यक्ति कुछ नहीं करना चाहता है तो उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई कारोबार करने को बाध्य नहीं किया जा सकता है।

ये कुछ मायनों में खास है, जैसे कि अगर कोई व्यक्ति सवारी को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने का कारोबार करना चाहता है तो राज्य उसे रोड पर गाड़ी चलाने से रोक नहीं सकता है। लेकिन वहीं अगर कोई व्यक्ति दूसरे के पेड़ से फल तोड़कर व्यापार करना चाहता है तो ये स्वीकार्य नहीं होगा।

कहने का अर्थ ये है कि राज्य यहाँ भी अनुच्छेद 19(6) के तहत युक्तियुक्त प्रतिबंध लगा सकता है एवं (1) किसी पेशे या व्यवसाय के लिए किसी खास योग्यता को जरूरी ठहरा सकता है। (2) किसी व्यवसाय या उद्योग को स्वयं संचालित करने के लिए आरक्षित रख सकता है।

अनुच्छेद 19 से संबन्धित कुछ तथ्य

  1. अनुच्छेद 19 सिविल अधिकारों तक ही सीमित है। यानी कि इसका विस्तार राजनैतिक अधिकारों तक नहीं है। [राजनैतिक अधिकारों का मतलब है मतदान का अधिकार या राजनैतिक पद धारण करने का अधिकार।
  2. अनुच्छेद 19 मूल रूप से नैसर्गिक या कॉमन लॉ है। यानी कि ये उन अधिकारों से भिन्न है जिसे कि किसी कानून द्वारा बनाया जाता है। कहने का अर्थ ये है कि कोई कानून बने या ना बने लोग तो खुद को अभिव्यक्त करेंगे ही, इसे तो कोई नहीं रोक सकता।
  3. यदि कोई ऐसा अधिकार है जो जिसका कि वर्णन अनुच्छेद 19 में नहीं किया गया है इसका ये मतलब नहीं होता है कि वो मूल अधिकार है ही नहीं। जैसे कि प्रेस की स्वतंत्रता का अधिकार अनुच्छेद 19 में नहीं लिखा हुआ है लेकिन फिर भी वो उसी के तहत आता है।
  4. अनुच्छेद 19 केवल नागरिकों पर लागू होता है ऐसे व्यक्तियों पर नहीं जो भारत का नागरिक नहीं है।

तो कुल मिलाकर यही है अनुच्छेद 19, उम्मीद है आपको समझ में आया होगा। दूसरे अनुच्छेदों को समझने के लिए नीचे दिए गए लिंक का इस्तेमाल कर सकते हैं।

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Constitution
Basics of Parliament
Fundamental Rights
Judiciary in India
Executive in India
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Executive in India
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अस्वीकरण - यहाँ प्रस्तुत अनुच्छेद और उसकी व्याख्या, मूल संविधान (नवीनतम संस्करण), संविधान पर डी डी बसु की व्याख्या (मुख्य रूप से) और संविधान के विभिन्न ज्ञाताओं (जिनके लेख समाचार पत्रों, पत्रिकाओं एवं इंटरनेट पर ऑडियो-विजुअल्स के रूप में उपलब्ध है) पर आधारित है। हमने बस इसे रोचक और आसानी से समझने योग्य बनाने का प्रयास किया है।