इस लेख में हम रोस्टर व्यवस्था (Roster System) पर सरल एवं सहज चर्चा करेंगे एवं आरक्षण के पीछे के गणित को समझने का प्रयास करेंगे।

🔹 समझने की दृष्टि से इस पूरे लेख को चार मुख्य भागों में बाँट दिया गया है। यह इसका चौथा भाग है। इसे पढ़ने से पहले इसके पहले, दूसरे और तीसरे भाग को अवश्य पढ़ लें, वहाँ हमने क्रमश: भारत में आरक्षण के आधारभूत तत्व[1/4], आरक्षण का संवैधानिक आधार[2/4] और आरक्षण का विकास क्रम[3/4] को समझा था। बेहतर समझ के लिए संबन्धित सभी लेखों का अध्ययन करें।

यहाँ ये याद रखिए कि रोस्टर व्यवस्था बहुत ज्यादा स्पष्ट और सरल नहीं है, समय-समय पर इसमें काफी बदलाव आया है और केंद्र और राज्य या प्रांत के लिए रोस्टर सिस्टम अलग-अलग हो सकता है। साथ ही इससे संबंधित कई मामले कोर्ट में विचाराधीन है।

रोस्टर

रोस्टर क्या है ?

रोस्टर (Roster) शब्द का इस्तेमाल, किसी संगठन में व्यक्तियों या समूहों के लिए ड्यूटी, नियुक्ति या छुट्टी आदि को प्रबंधित करने या उसे दिखाने वाली सूची या योजना के संदर्भ में किया जाता है।

रोस्टर के Synonyms से हम इसे आसानी से समझ सकते हैं; listing, register, schedule, agenda, calendar, roll, directory Etc.

भारत में आरक्षण के संबंध में, रोस्टर, एससी, एसटी, ओबीसी एवं सामान्य वर्ग के व्यक्तियों का विभिन्न पदों पर वितरण की एक व्यवस्था है जिसके तहत ये सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाता है कि जिन वर्गों के लिए जितने प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गई है उसे उतना मिल जाए।

आसान शब्दों में कहें तो यह एक सूची है जिसके तहत नियुक्तियाँ की जाती है। हम जानते हैं कि एससी (15%), एसटी (7.5%) एवं ओबीसी (27%) को वर्टिकल एवं अन्य (जैसे कि महिलाओं, दिव्याङ्गजनों आदि) को हॉरिजॉन्टल आरक्षण मिलता है।

इंद्रा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले के अनुसार कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। यहाँ तक हम अच्छे से समझते हैं कि एससी को 15 प्रतिशत का आरक्षण प्राप्त है यानी कि अगर कुल 100 सीटें हैं तो एससी को 15 सीटें मिलेंगी, एसटी को 7.5 सीटें मिलेंगी और ओबीसी को 27 सीटें मिलेंगी।

लेकिन जब हम इसे व्यावहारिक तौर पर देखते हैं तो पता चलता है कि ये इतना आसान नहीं है, ऐसा इसीलिए क्योंकि अलग-अलग संस्थाएं है, उसमें अलग-अलग विभाग है और उसमें भी अलग-अलग स्तर पर अलग-अलग विशेषज्ञता या विशेषता वाले अधिकारी या स्टाफ़ काम कर रहे होते हैं।

ऐसा तो होता नहीं है कि अगर किसी विभाग में 100 अधिकारी या स्टाफ़ है तो सभी एक ही बार अपना पद त्याग कर देंगे। हरेक साल कुछ अधिकारी सेवानिवृत होते हैं, कुछ का प्रोमोशन होता है एवं कुछ अन्य कारणों से अपने पद का त्याग करते हैं। और इस तरह से कुछ सीटें खाली होती है जिस पर पुनः नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू होती है।

ये नियुक्तियाँ खुली प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से भरी जा सकती है या फिर बिना प्रतियोगी परीक्षा के। पर सवाल यही रहता है कि किस तरह से इन रिक्तियों को भरा जाए जिससे कि सभी वर्ग को मिलने वाले पूर्व निर्धारित आरक्षण को सुनिश्चित किया जा सके। इसी को करने के लिए हमने नियम अपनायी है उसे रोस्टर (roster) कहते हैं।

Vacancy Based Roster v/s Post Based Roster

जाहिर है ओबीसी नामक वर्ग 1993 से अस्तित्व में आया, यानी कि उससे पहले सिर्फ एससी एवं एसटी को आरक्षण मिलता था। 1993 से ओबीसी भी उसमें जुड़ गया और अब उसे भी आरक्षण मिलता है।

जुलाई 1997 से पहले रोस्टर को vacancy के आधार पर maintain किया जाता था। जिसे कि vacancy based रोस्टर कहा जाता है। पर 1995 के R.K. Sabharwal v. State of Punjab मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा, आरक्षण का निर्धारण कैडर में पदों की संख्या (Posts) के आधार पर किया जाना चाहिए न कि रिक्तियों (vacancy) के आधार पर। लेकिन ऐसा तब होगा जब एक बार सभी आरक्षित वर्ग उस निर्धारित प्रतिशत तक पहुँच जाए।

पद आधारित (post based) आरक्षण का मूल सिद्धांत यह है कि किसी संवर्ग (cadre) में किसी भी श्रेणी के लिए आरक्षण द्वारा भरे गए पदों (post) की संख्या उस श्रेणी के लिए निर्धारित कोटे के बराबर होनी चाहिए। यानी कि अगर किसी कैडर में 100 पोस्ट है तो 15 पोस्ट एससी के लिए, 7 या 8 पद एसटी के लिए और 27 पद ओबीसी के लिए किसी भी समय आरक्षित रहेगा। इससे ज्यादा नहीं हो सकता है कम भले ही हो जाए।

आइये विस्तार से इसे उदाहरणों से समझते हैं –

मान लीजिये किसी विभाग या काडर में 1000 पद निर्धारित किया गया है। तो शुरू में जब उसे भरा जाएगा तब 27 प्रतिशत आरक्षण के कारण 270 सीटें ओबीसी से भरी जाएंगी, 15 प्रतिशत आरक्षण के कारण 150 सीटें एससी से भरी जाएंगी और 7.5 प्रतिशत आरक्षण के कारण 75 सीटें एसटी से भरी जाएंगी। अब मान लीजिये अगले साल किसी कारणवश 400 सीटें फिर से खाली हो गई तो ऐसी स्थिति में 108 सीटें ओबीसी से भरी जाएंगी, 60 सीटें एससी से भरी जाएंगी और 30 सीटें एसटी से भरी जाएंगी। फिर से मान लीजिये कि अगले वर्ष 200 सीटें खाली हो जाती है और उस पर भर्तियाँ निकाली जाती है। तो फिर से यही प्रक्रिया चलेगी और पूरी वेकेंसी पर 27 प्रतिशत ओबीसी को, 7.5 प्रतिशत एसटी को और 15 प्रतिशत एससी को आरक्षण मिलेगी। इसे कहते हैं वेकेंसी बेस्ड रोस्टर (Vacancy Based Roster)

अब फिर से ऊपर वाला ही उदाहरण लेते हैं और मान लेते हैं कि प्रारंभिक 1000 सीटें आरक्षण के अनुसार बांटी जा चुकी है और फिर से अगले साल 200 पद खाली हो जाता है और उस पर वेकेंसी निकाला जाता है। इस 200 पद में मान लेते हैं कि 20 सीटें एससी का खाली हुआ है, 10 सीटें एसटी की और 34 सीटें ओबीसी की खाली हुई।

अब अगर पहले की तरह देखें तो उस हिसाब से 200 सीटों में से 54 सीटें ओबीसी को, 30 सीटें एससी को और 15 सीटें एसटी को मिलनी चाहिए। लेकिन पोस्ट बेस्ड रोस्टर में ऐसा नहीं होता है। यानी कि ये वेकेंसी की बात नहीं करती बल्कि उस पोस्ट की बात करती है जो कि खाली हुआ है। इस तरह से देखें तो 200 पोस्ट में से एससी को सिर्फ 20 सीटें मिलेंगी, एसटी को 10 सीटें मिलेंगे और ओबीसी को 34 सीटें मिलेंगी। बाद बाकी के 136 सीटें सामान्य वर्ग को चली जाएंगी। इसी को कहते हैं पोस्ट बेस्ड रोस्टर (Post based roster), जिस पर हम 1997 के बाद चल रहे हैं।

जाहिर है अभी जो आपने ऊपर उदाहरण देखा उसके हिसाब से एससी को 10 सीटों का नुकसान हुआ, एसटी को 5 सीटों का नुकसान हुआ और ओबीसी को 20 सीटों का नुकसान हुआ। पर आप ख़ुद सोचिए अगर ये सीटें एससी, एसटी एवं ओबीसी को दे दी जाती तो हरेक के मामले में उसका आरक्षण प्रतिशत बढ़ जाता और ओवरऑल पूरे कैडर में आरक्षित सीटों का प्रतिशत 50 के पार चला जाता।

यहाँ पर हमने EWS श्रेणी की बात नहीं की है क्योंकि ये भी विवादास्पद है। ऐसा इसीलिए क्योंकि इसके आने के बाद आरक्षण की सीमा तो 50 प्रतिशत के पार चली जाएगी। सुप्रीम कोर्ट में ये मामला विचाराधीन है। हालांकि 10 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है। पर जब तक चीज़ें पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हो जाती तब तक बहुत सारी चीज़ें उलझी रहेंगी।

रोस्टर के दो महत्वपूर्ण प्रकार

रोस्टर के दो महत्वपूर्ण प्रकार 13 पॉइंट रोस्टर और 200 पॉइंट रोस्टर हैं। और हम इसी पर चर्चा करने वाले हैं हालांकि यहाँ ये याद रखिए कि और भी प्रकार के रोस्टर हो सकते हैं जैसे कि लोकल भर्तियों के लिए 100 पॉइंट रोस्टर का इस्तेमाल किया जाता है।

200 पॉइंट रोस्टर

200-पॉइंट रोस्टर सिस्टम उस कैडर पर लागू होता है जिनमें 14 या उससे अधिक कर्मचारी होते हैं, जबकि 13-पॉइंट रोस्टर उन कैडर पर लागू होता है, जहां कैडर में 2-13 कर्मचारी होते हैं।

इस व्यवस्था को “200 पॉइंट” रोस्टर इसीलिए कहा जाता है क्योंकि 200वें पोस्ट पर एक पूरा लूप या चक्र पूरा करता है। और 201वें पोस्ट से शुरू होने वाला पूरा पैटर्न खुद को दोहराता है। कहने का अर्थ ये है कि अगर 400 भर्तियाँ निकलती है तो पहले 1 से 200 तक भर्तियाँ होगी फिर से 1 से 200 तक भर्तियाँ होगी, न कि सीधे 1 से लेकर 400 तक।

यहाँ पर 1 से लेकर 200 तक के प्रत्येक सीट को एक निश्चित श्रेणी के लिए निर्धारित की गई है और उन सीटों पर भर्ती केवल उसी श्रेणी के अनुसार की जा सकती है जिसके लिए उन्हें निर्धारित किया गया है।

निर्धारित कैसे किया गया है?

किसी भी आरक्षित समूह के लिए रोस्टर में एक स्थायी स्थिति को आरक्षण कोटा के प्रतिशत से 100 को विभाजित करके प्राप्त किया जाता है। उदाहरण के लिए, ओबीसी कोटा 27% है, इसलिए, उन्हें 100/27 = 3.7 मिलता है, यानी हर चौथा पद जिसके लिए एक रिक्ति उत्पन्न होगी वह ओबीसी के लिए होगा। [यहाँ ये याद रखिए कि हमेशा पूर्ण संख्या ली जाती है। क्योंकि व्यक्ति पूर्ण होता है न कि दशमलव में]

इसी तरह, एससी को 100/15 = 6.66 मिलता है, यानी हर 7वां पद मिलता है, और एसटी को 100/7.5 = 13.33, यानी हर 14वां पद मिलता है।

इसे दूसरे तरीके से भी निकाल सकते हैं, जैसे कि आरक्षण के प्रतिशत को 100 से विभाजित कर दीजिए और फिर गुणकों की गणना तब तक कीजिये जब तक कि एक पूर्ण संख्या नहीं आ जाता है।

उदाहरण के लिए, अगर एससी को लें जिसे कि 15 प्रतिशत आरक्षण मिलता है। तो उसमें 100 से भाग देने पर 0.15 आता है और इसे 7 से गुना करने पर एक पूर्ण संख्या आता है इसीलिए रोस्टर की 7वीं सीट एससी श्रेणी को जाता है।

🔹 यहाँ पर आप देखेंगे कि किसी श्रेणी को प्रदान किए गए आरक्षण का प्रतिशत जितना कम होगा, उस श्रेणी के उम्मीदवार को आरक्षित पद पर नियुक्त होने में उतना ही अधिक समय लगेगा।

🔹 इसमें एक समस्या ये भी आती है कि एक ही स्थान के लिए अलग-अलग आरक्षित वर्ग अर्हित हो जाते हैं ऐसे में सीटों को आगे पीछे कर दिया जाता है। उदाहरण के लिए, 14वें पोस्ट को ले तो कायदे से यह पोस्ट एससी को जानी चाहिए क्योंकि सातवाँ पोस्ट उसका है और 7 के गुणक में उसका पोस्ट होने के लिए 14वां पोस्ट उसका होना चाहिए लेकिन ऐसा होता नहीं है। 14वां पोस्ट एसटी वर्ग को दिया जाता है ऐसा इसीलिए क्योंकि आरक्षण प्रतिशत कम होने की वजह से उसको आरक्षण मिलने में देरी होती है।

🔹 इसी तरह से 20वें पोस्ट को लें तो ये ओबीसी को मिलना चाहिए क्योंकि 4 के गुणक में 8वां, 12वां, 16वां सीट उसे ही मिला था। फिर अगर EWS के नजरिए से देखें तो 20वां सीट उसे मिलना चाहिए क्योंकि 10 सीट उसे मिला था। पर ऐसा होता नहीं है, बैलेन्स करने के लिए 19वां सीट ओबीसी को दिया जाता है, 20 सीट एससी को दिया जाता है और 21वां सीट EWS को।

🔹 200 पॉइंट रोस्टर की खास बात ये है कि प्रत्येक 200 सीटों में से 30 एससी को, 15 एसटी को और 54 ओबीसी को मिल जाता है, जो कि उतना ही है जितना आरक्षण प्रतिशत उसे मिला है। अब यहाँ पर आप समझ सकते हैं कि 200 पॉइंट रोस्टर क्यों अपनाया जाता है 100 पॉइंट रोस्टर क्यों नहीं। क्योंकि 7.5 प्रतिशत एसटी को आरक्षण की स्थिति में दिक्कत आ जाएगी, क्योंकि जैसे कि ऊपर भी हमने चर्चा की है व्यक्ति दशमलव में नहीं होता है बल्कि पूर्ण होता है। 200 पॉइंट रोस्टर में 15 सीटें एसटी को मिल जाती है जो कि पूर्ण है। यहाँ पर आप ये भी देखेंगे कि 200 पॉइंट रोस्टर में कुल 99 सीटें आरक्षित वर्ग को जाता है (EWS को छोड़कर) जो कि 50 प्रतिशत से कम है और सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिये गए ऊपरी सीमा से संगत है।

नोट – 200 पॉइंट रोस्टर आमतौर पर केन्द्रीय प्रतिष्ठानों में लागू किया जाता है। वहीं लोकल भर्तियों में 100 पॉइंट रोस्टर इस्तेमाल किया जा सकता है। ऐसा इसीलिए क्योंकि विभिन्न राज्यों में अलग-अलग समुदायों का प्रतिशत अलग-अलग होता है। उदाहरण के लिए छतीसगढ़ में एसटी को 32 प्रतिशत आरक्षण मिलता है, ऐसे में आसानी से 100 पॉइंट रोस्टर वहाँ लागू किया जा सकता है।

200 सीटों में से, प्रत्येक श्रेणी को निम्नलिखित सीटें मिलती हैं: 30 (एससी), 15 (एसटी), 54 (ओबीसी) और 20 (ईडब्ल्यूएस)। इस तरह से उदाहरण के लिए देखें तो, सरकार के 21 कर्मचारियों की भर्ती निम्नलिखित पैटर्न में की जाएगी:

1. UR8. OBC15. SC
2. UR9. UR16. OBC
3. UR10. UR/EWS17. UR
4. OBC11. UR18. UR
5. UR12. OBC19. OBC
6. UR13. UR20. SC
7. SC14. ST 21. UR/EWS

यदि रोस्टर के क्रमांक 4, 7, 10 और 12 के कर्मचारी इस वर्ष सेवानिवृत्त हो जाते हैं, तो रिक्तियों को उन श्रेणियों (अर्थात, ओबीसी, एससी, ईडब्ल्यूएस, ओबीसी) द्वारा निर्धारित श्रेणियों से भरना होगा। .

13 पॉइंट रोस्टर या L-shaped roster

जैसा कि हमने ऊपर देखा 200 पॉइंट रोस्टर में सभी आरक्षित वर्गों को 14वें स्थान पर कम से कम एक सीट मिल जाती है। हालांकि एसटी को सिर्फ एक स्थान (14वां स्थान) मिलता है। यानी कि ऐसे सरकारी विभाग जहां पर 14 या उससे कम सीटें होती है वहाँ पर 13 पॉइंट रोस्टर को लागू किया जा सकता है। (इसे 14 पॉइंट रोस्टर भी कह सकते हैं।)

दूसरे शब्दों में, “13 पॉइंट रोस्टर” इस ​​तथ्य को दर्शाती है कि आरक्षण के एक चक्र को पूरा करने के लिए 14 रिक्तियों की आवश्यकता होती है।

इसके आधार पर 13 पॉइंट रोस्टर में हर चौथी, सातवीं, आठवीं, 12वीं और 14वीं रिक्तियां क्रमश: ओबीसी, एससी, ओबीसी, ओबीसी, एसटी के लिए आरक्षित हैं। इसका मतलब ये है कि पहले तीन पदों के लिए कोई आरक्षण नहीं है और,14 पदों के पूरे चक्र में भी, केवल पांच पद आरक्षित श्रेणियों में जाते हैं। यानी कि इसे प्रतिशत में निकालें तो ये 35.71% होता है जो कि संवैधानिक रूप से अनिवार्य से काफी कम है। क्योंकि संवैधानिक रूप से 49.5% (EWS को छोड़कर) दिया जाना चाहिए। [ओबीसी 27% + एससी 15% + एसटी 7.5%]। इसीलिए इस पॉइंट पर इसकी काफी आलोचना की जाती है।

अब सवाल ये आता है कि 13 पॉइंट रोस्टर क्यों अपनाया जाता है, इसके स्थान पर 200 पॉइंट रोस्टर भी तो अपनाया जा सकता है !

हाँ, इसके स्थान पर 200 पॉइंट रोस्टर का इस्तेमाल किया जा सकता है, पर इसमें एक ही विभाग में सारे आरक्षित या सारे अनारक्षित व्यक्तियों को जाने का खतरा रहता है। इसी बात को ध्यान में रखकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 13 पॉइंट रोस्टर अपनाने की व्यवस्था की थी।

13-बिंदु रोस्टर प्रणाली कैसे काम करती है?

13-पॉइंट रोस्टर में सभी कर्मचारियों को उसी पैटर्न में भर्ती किया जाता है जैसे 200-पॉइंट रोस्टर के पहले 14 पॉइंट्स पर भर्ती की जाती है यानी कि UR, UR, UR, OBC, UR, UR, SC, OBC, UR, EWS, UR, OBC, UR, ST, जिसके बाद पैटर्न खुद को दोहराता है। जबकि 200 पॉइंट रोस्टर 200 के बाद दोहराता है। चूंकि एकल पद के लिए कोई आरक्षण नहीं होता है, इसीलिए 13 पॉइंट रोस्टर प्रणाली में केवल 2-13 कर्मचारियों के बीच के संवर्ग (cadre) के लिए लागू होती है।

आइये उदाहरण से समझते हैं कि ये कैसे काम करता है;

मान लीजिए कि एक विभाग है जिसमें 5 कर्मचारी हैं। नीचे दी गई तालिका में 13 पॉइंट रोस्टर के छायांकित भाग के आधार पर पांचों कर्मचारियों की भर्ती की जाएगी।

रोस्टर

यहाँ ये याद रखिए कि प्रारम्भिक भर्तियाँ (initial recruitment) वर्टिकल पैटर्न में की जाती है जैसा कि आप चार्ट में देख सकते हैं और उसके बाद की नियुक्तियाँ हॉरिजॉन्टल पैटर्न पर की जाती है, इससे एक L आकार बन जा है इसीलिए इसे L-shaped रोस्टर भी कहते हैं।

यह पैटर्न हर 14 नियुक्तियों के बाद खुद को दोहराएगा। उदाहरण के लिए, 5वीं रिक्ति EWS श्रेणी से, 9वीं रिक्ति एसटी श्रेणी से, और 10वीं रिक्ति अनारक्षित (UR) श्रेणी से भर्ती की जाएगी।

[यहाँ पर ये याद रखिए कि 5वीं रिक्ति EWS से तभी भरी जाएंगी जब EWS लागू होगा, अगर ऐसा नहीं होगा तो उसके स्थान पर UR श्रेणी का व्यक्ति आ जाएगा।]

ऊपर दिए गए 5-कर्मचारी के उदाहरण में, दूसरी रिक्ति होने पर एक अनुसूचित जाति का उम्मीदवार आरक्षण का हकदार होगा, जबकि एक अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवार को 9वीं रिक्ति तक प्रतीक्षा करनी होगी। इसमें लंबा समय लग सकता है।

और दूसरी बात कि यहाँ केवल 5 कर्मचारी हैं, इसीलिए 50% नियम बनाए रखने के लिए, किसी भी समय 2 से अधिक कर्मचारी आरक्षित श्रेणियों से संबंधित नहीं हो सकता है। 200-पॉइंट रोस्टर के विपरीत, यहाँ पर आरक्षण रोटेशन द्वारा होता है और किसी भी श्रेणी के लिए पद निर्धारित (Earmarked) नहीं किए जाते हैं।

13 पॉइंट और 200 पॉइंट रोस्टर के बीच विवाद

इसके विवाद को समझने से पहले आइये समझते हैं की 13 पॉइंट रोस्टर की क्या खामियाँ है।

मान लीजिये कि किसी केंद्रीय university के हिन्दी विभाग में 5 प्रोफेसर है। अब अगर इस विभाग को एक यूनिट मानकर आरक्षण की व्यवस्था किया जाये तो जाहिर है कि यहाँ 13 पॉइंट रोस्टर काम करेगा। ऐसी स्थिति में किसी भी समय इन पाँच सीटों में से 2 से अधिक सीटें आरक्षित वर्ग को नहीं मिलेगा, क्योंकि इससे ज्यादा मिलने पर 50 % नियम का उल्लंघन होगा। इन पाँच सीटों का जब प्रारम्भिक भर्ती होगी तो उसमें भी सिर्फ एक आरक्षित वर्ग (ओबीसी) का सीट आएगा क्योंकि वह चार नंबर पर आता है। एससी को सीट मिलेगा नहीं क्योंकि वह 7 नंबर पर आता है। ऐसे में जब दूसरी भर्ती या 2nd replacement होगी तब एक एससी को सीट मिलेगा। यानी कि एससी वर्ग के व्यक्ति को कई सालों का इंतजार करना पड़ सकता है और एसटी वर्ग के व्यक्ति को तो इससे भी ज्यादा वर्षों का इंतजार करना पड़ सकता है।

अब फिर से मान लीजिये कि पूरे university में हिन्दी विभाग को मिलाकर अन्य विभाग 40 है। और सभी विभागों में 5-5 प्रोफेसर है। यानी कि पूरे university में 200 प्रोफेसर हैं अब अगर पूरे university को एक यूनिट मान लिया जाये और तब आरक्षण दिया जाये तो स्थिति अलग होगी। क्योंकि यहाँ 200 प्रोफेसर यानी कि 200 सीटें है इसीलिए यहाँ 200 पॉइंट रोस्टर काम करेगा और इस रोस्टर से हिसाब से सभी आरक्षित वर्ग के व्यक्ति को अपना सीट मिल जाएगा। ऐसा इसीलिए क्योंकि इस तरह से कुल 99 सीटें आरक्षित वर्गों को मिल जाएगा। उन 99 व्यक्तियों को अलग-अलग विभागों में बांटा जा सकता है। और फिर आगे जिस विभाग में जिस आरक्षित वर्ग का स्थान खाली हो उसे उसी आरक्षित वर्ग के व्यक्ति से भरा जा सकता है।

तो 200 पॉइंट रोस्टर का ये फायदा मिल जाता है कि चूंकि इसके तहत पूरे university को एक यूनिट माना जाता है तो इसमें रिक्तियों की संख्या बढ़ जाती है और आरक्षित वर्गों को सीटें मिलना अपेक्षाकृत आसान हो जाता है। हालांकि इसका कमजोर पॉइंट ये एक है कि इसमें एक ही विभाग में सारे आरक्षित या सारे अनारक्षित व्यक्तियों को भरे जाने का खतरा होता है।

🔹 अगर 13 पॉइंट रोस्टर को लें, और ऐसा हो कि हर विभाग में कम से कम 14 रिक्तियाँ निकले तो फिर सभी को स्थिति कुछ अलग होगी लेकिन आमतौर पर ऐसा होता नहीं है क्योंकि आमतौर पर विभागों में 3, 4 या 5 ही प्रोफेसर होते हैं। ऐसे में मान लें कि किसी विभाग में 3 ही शिक्षक है तो फिर 13 पॉइंट रोस्टर के हिसाब से आरक्षित वर्ग के व्यक्ति का नंबर आएगा ही नहीं और 100 प्रतिशत आरक्षण सामान्य वर्ग को चला जाएगा।

इन आधारों पर देखें तो 200 पॉइंट रोस्टर 13 पॉइंट रोस्टर से बेहतर लगता है। और यही चलता भी था पर अप्रैल 2017 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने Vivekanand Tiwari v. Union of India मामले में कहा कि विश्वविद्यालयों में शिक्षण पदों के आरक्षण के लिए विभाग को एक इकाई के रूप में लिया जाएगा, न कि विश्वविद्यालय को। और साथ ही निम्न बातें भी कही,

(1) न्यायालय ने R K Sabharwal case 1995 में सुनाये गए फैसले (खंड 8 A (v)) को रद्द कर दिया, जो कि कैडर में पदों की कुल संख्या पर लागू होने वाले रोस्टर की प्रयोज्यता को संदर्भित करता है।

(2) न्यायालय ने ये कहा कि विषय ‘ए’ का एक एसोसिएट प्रोफेसर विषय ‘बी’, ‘सी’ या ‘डी’ में एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में सीधी नियुक्ति के लिए आवेदक नहीं हो सकता है । वह केवल ‘ए’ विषय में पद के लिए आवेदन कर सकता है। 

(3) भले ही प्रत्येक विषय या विभाग के सहायक प्रोफेसर, रीडर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर को समान वेतनमान में रखा गया है, लेकिन उनकी सेवाएं न तो हस्तांतरणीय हैं और न ही वे एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा में हैं। यही कारण है कि विश्वविद्यालय को ‘इकाई’ मानकर समान स्तर के पदों को मिलाना पूरी तरह से अव्यवहारिक है। यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन होगा

ये मामला सुप्रीम कोर्ट गया और जून 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को बरकरार रखा। इसी फैसले को ध्यान में रखकर मार्च 2018 में UGC ने 13 पॉइंट रोस्टर के आधार पर एक नया गाइडलाइंस जारी कर दिया। और फिर जो विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ, उसने सरकार के सामने चुनौती खड़ी कर दी। और सरकार ने इस पर पुनः विचार करने के लिए स्पेशल लीव पिटिशन सुप्रीम कोर्ट में दायर किया लेकिन जनवरी 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने उसे रिजैक्ट कर दिया।

लोकसभा चुनाव सर पर था ऐसे में सरकार चाहती नहीं थी कि जनता इस विषय को लेकर नाराज हो जाए इसीलिए सरकार ने इस पर अध्यादेश जारी कर दिया और पुनः 200 पॉइंट रोस्टर को लागू कर दिया।

दोबारा जब NDA सरकार सत्ता में आयी तो उसने जुलाई 2019 में इस अध्यादेश को The Central Government Institutions (Reservations in teacher cadre), Act 2019 में बदल दिया। और अभी यही चल रहा है।

🔹 यहाँ पर ये याद रखिए कि ये सिर्फ केन्द्रीय विश्वविद्यालय से संबंधित विवाद था। केन्द्रीय सेवाओं से संबंधित अन्य विभाग जैसे कि Department of Personal and Training (DoPT) पहले से ही 200 पॉइंट रोस्टर ही इस्तेमाल करता है। यानी कि central SSC एवं UPSC आदि के तहत आरक्षण 200 पॉइंट रोस्टर पर ही काम करता था।

अगर इतना समझ गए तो आइये अब हम shortfall और backlog के पीछे के गणित को समझ लेते हैं।

Shortfall और Backlog के पीछे का गणित

एक वर्ष में रिक्तियों को भरते समय, सभी तीन श्रेणियों, अर्थात् अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण की कमी (shortfall of reservation) को पूरा करने का प्रयास किया जाएगा, हालांकि, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी के लिए आरक्षित रिक्तियों की कुल संख्या वर्ष की रिक्तियों के 50% से अधिक नहीं है।

आरक्षित रिक्तियों को भरने पर 50% आरक्षण की सीमा केवल उन रिक्तियों पर लागू होगी जो वर्तमान वर्ष में उत्पन्न होती हैं या सीधी भर्ती के मामले में एससी, एसटी और ओबीसी की बैकलॉग आरक्षित रिक्तियों के मामले में उत्पन्न होती है या अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की बैकलॉग आरक्षित रिक्तियों के मामले में पहले के वर्षों में पदोन्नति पर उत्पन्न होती है; एक अलग और विशिष्ट समूह के रूप में माना जाएगा, और उस वर्ष की कुल रिक्तियों पर 50% आरक्षण की सीमा निर्धारित करने के लिए उस वर्ष की आरक्षित रिक्तियों के साथ विचार नहीं किया जाएगा।

नोट 1: किसी कैडर में किसी विशेष आरक्षित श्रेणी के आरक्षण की कमी (shortfall of reservation) का अर्थ है ‘कैडर में उस श्रेणी के लिए आरक्षित पदों की कुल संख्या’ और ‘उस श्रेणी के व्यक्तियों की संख्या के बीच का अंतर, जो आरक्षण द्वारा नियुक्त और पदों को धारण करने वाले हैं।

नोट 2 : किसी श्रेणी की बैकलॉग आरक्षित रिक्तियां वे रिक्तियां हैं जिन्हें पहले भर्ती वर्ष में उस श्रेणी के लिए आरक्षित रखा गया था, लेकिन उस श्रेणी से संबंधित उपयुक्त उम्मीदवारों की अनुपलब्धता के कारण पिछले भर्ती प्रयास में अधूरी रह गईं और अभी भी अधूरी पड़ी हैं।

आइये इसे उदाहरण से समझते हैं –

एक कैडर है जिसमें कुल 1000 पद हैं जो खुली प्रतियोगिता द्वारा अखिल भारतीय आधार पर सीधी भर्ती द्वारा भरे जाते हैं। सभी पद भरे जाने पर कैडर में आरक्षण द्वारा नियुक्त अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के कर्मचारियों की संख्या आदर्श रूप से क्रमशः 150, 75 और 270 होनी चाहिए।

मान लीजिए कि वर्ष 2020 में सभी 1000 पद भरे गए थे लेकिन आरक्षण द्वारा नियुक्त एससी, एसटी और ओबीसी कर्मचारियों की संख्या क्रमशः 130, 75 और 100 थी। इस प्रकार, उस वर्ष कैडर में 20 अनुसूचित जाति और 170 ओबीसी की कमी थी, हालांकि सभी पद भरे गए थे।

(A) मान लीजिए कि भर्ती वर्ष 2021 में कैडर में 200 रिक्तियां हुईं, जिनमें से 20 रिक्तियां एससी द्वारा, 10 एसटी द्वारा और बाकी अनारक्षित श्रेणी के उम्मीदवारों द्वारा खाली की गई थीं। इन पदों की रिक्ति के बाद, कैडर में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की कमी (shortfall) क्रमशः 40, 10 और 170 हो गई। हालांकि कैडर में एससी, एसटी और ओबीसी की एक बड़ी कमी थी, इनमें से केवल 100 रिक्तियों को आरक्षित रखा जा सकता था क्योंकि सभी 200 रिक्तियां वर्तमान रिक्तियां थीं और एक वर्ष में आरक्षण पर 50% की सीमा इन रिक्तियों पर लागू होगी।

(B) एससी और ओबीसी की कमी वर्तमान रिक्तियों की क्रमशः 15% और 27% से अधिक थी। इसलिए, वर्तमान रिक्तियों में से 15% सीधे एससी के लिए आरक्षित और 27% ओबीसी के लिए आरक्षित थे, यानी 30 रिक्तियां एससी के लिए और 54 ओबीसी के लिए आरक्षित थीं। एसटी की कमी 10 थी जो कुल रिक्तियों के 7.5% से कम है। इसलिए, केवल 10 रिक्तियां एसटी के लिए आरक्षित रखी गई थीं।

उपरोक्त सिद्धांत को लागू करते हुए, 94 रिक्तियां आरक्षित रखी गई। इस कमी को पूरा करने के लिए 6 {100-(30+54+10)} और रिक्तियों को आरक्षित रखा जाना है। इन 6 रिक्तियों को अनुसूचित जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के बीच इन श्रेणियों के लिए निर्धारित आरक्षण के प्रतिशत के अनुपात में विभाजित किया गया। 15:27, यानी एससी के लिए 2 और ओबीसी के लिए 4 (यहाँ आने वाले संख्या को निकटतम पूर्ण संख्या में पूर्णांकित किया गया है)। तथापि, ऐसा वितरण करते समय, यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि किसी भी श्रेणी के लिए आरक्षित रिक्तियों की संख्या उस श्रेणी की कमी से अधिक न हो।

इस प्रकार, वर्ष 2021 के लिए रिक्तियों के संबंध में आरक्षण का अंतिम निर्धारण अनुसूचित जाति के लिए 32, अनुसूचित जनजाति के लिए 10 और ओबीसी के लिए 58 था।

(C) मान लीजिए कि उनके लिए आरक्षित रिक्तियों के खिलाफ भर्ती वर्ष 2021 में केवल 20 अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों, 5 अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों और 50 ओबीसी उम्मीदवारों को नियुक्त किया जा सका। इस प्रकार, अनुसूचित जातियों की 12 रिक्तियां, अनुसूचित जनजातियों की 5 रिक्तियां और अन्य पिछड़ा वर्ग की 8 रिक्तियां जिन्हें आरक्षित रखा गया था, को भरा नहीं जा सका और वे रिक्त रहीं।

अनुसूचित जाति की ये 12 रिक्तियां, अनुसूचित जनजाति की 5 रिक्तियां और अन्य पिछड़ा वर्ग की 8 रिक्तियां जिन्हें आरक्षित रखा गया था लेकिन भर्ती प्रयास में खाली रह गई थी, उन्हें बाद के भर्ती वर्ष के लिए बैकलॉग आरक्षित रिक्तियों के रूप में माना जाएगा।

तो कुल मिलाकर वर्ष 2021 की भर्ती प्रक्रिया समाप्त होने के बाद, कुल 975 पदों को भरा गया (25 बैकलॉग रह गया), जिनमें से 130, 70 और 150 क्रमशः अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के थे। यह ध्यान दिया जा सकता है कि इस स्तर पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण की कमी क्रमशः 20, 5 और 120 थी। हालांकि, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के बैकलॉग आरक्षित रिक्तियों की संख्या क्रमशः 12, 5 और 8 थी।

(D) मान लीजिए कि भर्ती वर्ष 2022 में 200 रिक्तियां हुईं, जिनमें से 20 रिक्तियां एससी द्वारा, 10 एसटी द्वारा और 20 ओबीसी द्वारा खाली की गई। इस स्तर पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की कमी क्रमशः 40, 15 और 140 हो जाएगी।

इस वर्ष में कुल रिक्तियां 200+12+5+8=225 होगी, जिनमें से 200 वर्तमान रिक्तियां और 25 बैकलॉग रिक्तियां है। आरक्षण निर्धारित करते समय, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के 25 बैकलॉग आरक्षित रिक्तियों को एक अलग और विशिष्ट समूह के रूप में माना जाएगा और एससी के लिए 12, एसटी के लिए 5 और ओबीसी के लिए 8 आरक्षित रखा जाएगा। 200 वर्तमान रिक्तियों में से 100 से अधिक को आरक्षित नहीं रखा जा सकता है। वर्ष 2021 के समान सिद्धांतों को लागू करके, 200 वर्तमान रिक्तियों में से 28 को अनुसूचित जाति के लिए, 10 को एसटी के लिए और 62 को ओबीसी के लिए आरक्षित किया जा सकता है। इस प्रकार भर्ती वर्ष 2022 में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित रिक्तियों की संख्या, बैकलॉग आरक्षित रिक्तियों सहित, क्रमशः 40, 15 और 70 होगी। यदि आरक्षित रिक्तियों को भरने के लिए केवल 35 एससी, 12 एसटी और 50 ओबीसी उपलब्ध हो जाते हैं, तो एससी की 5 रिक्तियां, एसटी की 3 रिक्तियां और ओबीसी की 20 रिक्तियां खाली रखी जाएंगी और बाद के भर्ती वर्ष के लिए बैकलॉग आरक्षित रिक्तियां मानी जाएंगी।

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FAQs Related to Reservation (pdf)

References,
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https://indianexpress.com/article/explained/upsc-civil-services-examination-13-point-200-point-quota-roster-conundrum-5621525/#:~:text=A%20position%20in%20the%20roster,for%20which%20a%20vacancy%20arises.
https://dpe.gov.in/sites/default/files/Reservation_Brochure-2.pdf
https://www.bloombergquint.com/opinion/the-math-behind-reservation-in-government-jobs
https://documents.doptcirculars.nic.in/D2/D02adm/36012_2_96_Estt(Res).pdf
https://judgesaab.com/union-of-india-v-vivekananda-tiwari-reservations-in-teaching-posts-in-universities/
https://dopt.gov.in/sites/default/files/AR%202020-21%20English.pdf
R. K. Sabharwal And Ors vs State Of Punjab And Ors on 10 February, 1995
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