types of urban local governance (शहरी स्थानीय शासन के प्रकार)

इस लेख में हम शहरी स्थानीय स्वशासन के प्रकारों (types of urban local governance) और उसके विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं को सरल और सहज भाषा में चर्चा करेंगे, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें। इससे पहले हम भारत में नगर निगम (Municipalities in India) के इतिहास, संवैधानिक प्रावधान, वर्तमान परिदृश्य आदि पर चर्चा कर चुके हैं।
Types of Urban local governance

types of urban local governance in general

शहर उसे कहते है जहां के 75 या उससे अधिक जनसंख्या वर्ग (पुरुष) गैर -कृषि कार्यों में संलग्न रहते हैं। आजादी के बाद तेजी से बढ़ते शहरों ने शहरी स्वशासन की जरूरत को बढ़ाया लेकिन लगभग 45 वर्षों तक शहरी स्थानीय शासन में कोई एकरूपता नहीं आ पाया, इसका कारण ये था कि इसके संबंध में कोई ठोस केंद्रीय कानून नहीं था।

इसीलिए 1992 में 74वां संविधान संशोधन करके शहरी स्थानीय शासन को संवैधानिक दर्जा और संरक्षण दिया गया। इस संशोधन अधिनियम से इस क्षेत्र में एकरूपता आई और भारत में तीसरे स्तर (layer) की सरकार गठित हुई। (केंद्र और राज्य सरकार क्रमश: पहले और दूसरे स्तर की सरकार है)

आज शहरी स्थानीय शासन के ढेरों प्रकार है, जैसे कि
महानगर निगम (Municipal Corporation) या नगर निगम,
नगर पालिका परिषद (Municipal Council),
नगरपालिका (Municipality),
अधिसूचित क्षेत्र समिति (Notified Area Committee),
शहरी क्षेत्र समिति (Urban area committee),
छावनी बोर्ड (Cantonment Board),
पत्तन न्यास (Port trust) और
विशेष उद्देश्य के लिए गठित एजेंसी (Special purpose agency), आदि।

types of urban local governance according to 74th amendment act 1992

वैसे, 74वें संविधान संशोधन अधिनियम के अनुसार अनुच्छेद 243Q के तहत निम्न तीन तरह की नगरपालिकाओं की संरचना का उपबंध किया गया है: 1. नगर पंचायत (Nagar Panchayat) – परिवर्तित क्षेत्र के लिए, यानी कि वैसे क्षेत्र जो ग्रामीण क्षेत्र से शहरी क्षेत्र में परिवर्तित हो रही है। 2. नगरपालिका परिषद (Municipal Council) – छोटे शहरी क्षेत्रों के लिए 3. नगरपालिका निगम (municipal Corporation) – बड़े शहरी क्षेत्रों के लिए।

types of urban local governance according to census 2011

इसी प्रकार 2011 के जनगणना के अनुसार, प्रमुख शहरीकृत क्षेत्रों को इस प्रकार वर्गीकृत किया गया था-

[1] वैधानिक नगर (Statutory city): सभी प्रशासनिक इकाइयाँ, जिसे नगर निगम, नगर पालिका, छावनी बोर्ड, अधिसूचित नगर क्षेत्र समिति, नगर पंचायत जैसे कानूनी शब्दावली के रूप में परिभाषित किया गया है, वैधानिक शहरों के रूप में जाना जाता है। भारत की 2011 की जनगणना के अनुसार, देश में 4041 वैधानिक शहरी स्थानीय निकाय (ULB) थे।

[2] जनगणना नगर (Census town): वे सभी प्रशासनिक इकाइयां जो निम्नलिखित तीन मानदंडों को एक साथ पूरा करता हो: (i) 5,000 व्यक्तियों की न्यूनतम आबादी; ii) गैर-कृषि गतिविधियों में लगे मुख्य कामकाजी (पुरुष) आबादी का 75 प्रतिशत और उससे अधिक; और iii) प्रति वर्ग किलोमीटर पर कम से कम 400 व्यक्तियों की आबादी का घनत्व। इसे जनगणना नगर कहा जाता है। 2011 की जनगणना के अनुसार, देश में 3,784 जनगणना शहर थे।

यहाँ पर वैधानिक नगर (Statutory city) की बात करें तो ये कई प्रकार के होते हैं, लेकिन मोटे तौर पर इसे चार भागों में बांटा जा सकता है।

1. नगर निगम (Municipal corporation)
2. नगर परिषद् या नगर पालिका (Municipality) (municipal council, municipal board, municipal committee)
3. नगर क्षेत्रीय समिति (Town area committee)
4. अधिसूचित क्षेत्र परिषद या नगर पंचायत (Notified area council or Nagar Panchayat)

1. नगर निगम (Municipal corporation)

भारत में नगर निगम जिसे कि महानगर पालिका भी कहा जाता है; राज्य सरकार के द्वारा गठित विभाग हैं जो महानगरीय शहर के विकास के लिए काम करते हैं, जहां कि आबादी 1 मिलियन (10 लाख) से अधिक होती है।

नगर निगम का निर्माण बड़े शहरों, जैसे- दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, हैदराबाद, बंगलुरु तथा अन्य शहरों के लिए है। यह संबन्धित राज्य विधानमंडल की विधि द्वारा राज्यों में स्थापित हुई है तथा भारत की संसद के अधिनियम द्वारा केंद्रशासित क्षेत्रों में।

नगर निगम में तीन प्राधिकरण है जिनमें परिषद (Council), स्थायी समिति (standing Committee) तथा आयुक्त (Commissioner) आते हैं।

परिषद (Council), निगम की विचारात्मक एवं विधायी शाखा है इसमें जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित पार्षद होता है तथा कुछ नामित व्यक्ति भी होते हैं जिनका नगर प्रशासन में ऊंचा ज्ञान तथा अनुभव होता है। संक्षेप में, परिषद की संरचना अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा महिलाओं का आरक्षण सहित 74वें संविधान अधिनियम द्वारा शासित होती है।

परिषद का प्रमुख महापौर (मेयर) होता है। उसकी सहायता के लिए उप महापौर होता है। ज़्यादातर राज्यों में उसका चुनाव एक साल एक नवीनीकरणीय कार्यकाल के लिए होता है। वास्तव में वह एक आलंकारिक व्यक्ति (Figurative person) होता है तथा निगम का औपचारिक प्रधान होता है। उसका प्रमुख कार्य परिषद की बैठकों की अध्यक्षता करना है।

स्थायी समिति (standing Committee) परिषद के कार्य को सुगम बनाने के लिए गठित की जाती है जो कि आकार में बहुत बड़ा होता है। वह लोक कार्य, शिक्षा, स्वास्थ्य, कर निर्धारण, वित्त व अन्य को देखती है। वह अपने क्षेत्रों में निर्णय लेती है।

नगर निगम आयुक्त (Municipal corporation commissioner) परिषद और स्थायी समिति द्वारा लिए निर्णयों को लागू करने के लिए जिम्मेदार है। यानी कि वह नगर पालिका का मुख्य कार्यकारी अधिकारी होता है। वह राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है और साधारणतः आईएएस रैंक का ऑफिसर होता है।

2. नगर परिषद् या नगर पालिका (Municipality) (municipal council, municipal board, municipal committee)

भारत में, एक नगरपालिका, नगर परिषद या नगर पालिका परिषद एक शहरी स्थानीय निकाय है जो 100,000 या उससे अधिक पर 10 लाख से कम आबादी वाले शहर का प्रशासन करती है। हालाँकि, इसके अपवाद भी हैं, क्योंकि पहले नगर पालिकाएं 20,000 से अधिक आबादी वाले शहरी केंद्रों में गठित की गई थीं, इसलिए सभी शहरी निकायों को पहले नगर पालिका के रूप में वर्गीकृत किया गया था, भले ही उनकी आबादी 100,000 से कम हो।

नगरपालिकाएँ कस्बों और छोटे शहरों के प्रशासन के लिए स्थापित की जाती है। निगमों की तरह यह भी राज्य में राज्य विधानमंडल द्वारा और केंद्रशासित राज्यों में भारत की संसद के द्वारा गठित की गई है।

यह अन्य नामों, जैसे नगरपालिका परिषद, नगरपालिका समिति, नगरपालिका बोर्ड, उपनगरीय नगरपालिका, शहरी नगरपालिका तथा अन्य से भी जानी जाती है। नगर निगम की तरह, नगरपालिका के पास भी परिषद, स्थायी समिति तथा मुख्य कार्यकारी अधिकारी नामक अधिकारी होते हैं।

परिषद का प्रधान अध्यक्ष होता है। नगर निगम के महापौर के विपरीत नगर प्रशासन में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। परिषद की बैठकों की अध्यक्षता के अलावा यह कार्यकारी शक्तियों का भी उपयोग करता है। उपाध्यक्ष उसका सलाहकार होता है।

स्थायी समिति परिषद के कार्य को सुगम बनाने के लिए गठित की जाती है। वह लोक कार्य, शिक्षा, स्वास्थ्य, कर निर्धारण, वित्त तथा अन्य को देखती है।

मुख्य कार्यकारी अधिकारी नगरपालिका के दैनिक प्रशासन का जिम्मेदार होता है। वह राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है।

3. नगर क्षेत्रीय समिति (Town area committee)

नगर क्षेत्रीय समिति छोटे कस्बों में प्रशासन के लिए गठित की जाती है। ये एक उप नगरपालिका आधिकारिक इकाई होता है और इसे सीमित नागरिक सेवाएँ जैसे जल निकासी, सड़कें, मार्गों में प्रकाश व्यवस्था और संरक्षण की ज़िम्मेदारी दी जाती है।

इसे राज्य विधानमंडल के एक अलग अधिनियम द्वारा गठित किया जाता है। इसका गठन, कार्य और अन्य मामले अधिनियम द्वारा निर्धारित किए जाते है। इसे पूर्ण या आंशिक रूप से राज्य सरकार द्वारा निर्वाचित या नामित किया जा सकता है।

4. अधिसूचित क्षेत्र परिषद या नगर पंचायत (Notified area council or Nagar Panchayat)

भारत में एक नगर पंचायत या अधिसूचित क्षेत्र समिति का मतलब वैसे क्षेत्र से है जो ग्रामीण क्षेत्र से शहरी क्षेत्र में परिवर्तित हो रही है। 11,000 से अधिक और 25,000 से कम निवासियों के साथ एक शहरी केंद्र को नगर पंचायत के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। राज्य सरकार द्वारा नगर पंचायत की संरचना और कार्यों का निर्धारण किया जाता है।

प्रत्येक नगर पंचायत में एक समिति होती है जिसमें वार्ड सदस्यों के साथ एक अध्यक्ष होता है। सदस्यों में न्यूनतम दस निर्वाचित वार्ड सदस्य और तीन नामित सदस्य होते हैं। नगर पंचायत के सदस्यों को नगर पंचायत के कई वार्डों से वयस्क मताधिकार के आधार पर पाँच वर्षों के लिए चुना जाता है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग और महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित हैं। पार्षदों या वार्ड सदस्यों को नगर पंचायत में चुनावी वार्डों से प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा चुना जाता है

इसके अलावे भी कुछ अन्य शहरी स्थानीय शासन होते हैं, आइये उसे भी समझ लेते हैं।

Other types of urban local governance

छावनी परिषद (Cantonment council)

सैन्य क्षेत्र में सिविल जनसंख्या के प्रशासन के लिए छावनी परिषद (Cantonment council) की स्थापना की जाती है। इसे 2006 के छावनी अधिनियम के उपबंधों के तहत गठित किया गया है, यह केन्द्र सरकार के रक्षा मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन कार्य करता है। अत: ऊपर दी गई स्थानीय शहरी इकाइयों के विपरीत जो कि राज्य द्वारा प्रशासित और गठित की गई है, छावनी परिषद केंद्र सरकार द्वारा गठित और प्रशासित की जाती है।

फिलहाल भारत में 64 छावनी बोर्ड हैं जिसे कि जनसंख्या के आधार पर चार श्रेणियों में बांटा गया है, अर्थात
श्रेणी I – पचास हजार से अधिक जनसंख्या
श्रेणी II – दस हजार से अधिक जनसंख्या लेकिन पचास हजार से कम
श्रेणी III – दो हजार पांच सौ से अधिक जनसंख्या लेकिन दस हजार से कम
श्रेणी IV – जनसंख्या दो हजार पांच सौ से अधिक नहीं

एक छावनी परिषद में आंशिक रूप से निर्वाचित या नामित सदस्य होते है। निर्वाचित सदस्य (Elected member) 3 वर्ष की अवधि के लिए, जबकि नामित सदस्य (Nominated member) उस स्थान पर लंबे समय तक रहते है। सेना अधिकारी जिसके प्रभाव में वह स्टेशन हो, परिषद का अध्यक्ष होता है और सभा की अध्यक्षता करता है। परिषद के उपाध्यक्ष का चुनाव उन्ही निर्वाचित सदस्यों द्वारा 3 वर्ष की अवधि के लिए होता है।

एक छावनी बोर्ड में आठ निर्वाचित सदस्य, तीन नामित सैन्य सदस्य, तीन पदेन सदस्य (स्टेशन कमांडर, गैरीसन इंजीनियर और वरिष्ठ कार्यकारी चिकित्सा अधिकारी) और जिला मजिस्ट्रेट का एक प्रतिनिधि होता है।

पहली श्रेणी के छावनी बोर्ड में निम्नलिखित सदस्य होते हैं: 1. केंद्र का नेतृत्व करने वाला सैन्य अधिकारी 2.छावनी में कार्यरत एक कार्यपालिक अभियंता 3. छावनी में कार्यरत एक स्वास्थ्य अधिकारी 4. जिलाधिकारी द्वारा नामित एक प्रथम श्रेणी दंधाधिकारी 5. केंद्र का नेतृत्व करने वाले सैन्य अधिकारी द्वारा नामित तीन सैन्य अधिकारी। 6. छावनी क्षेत्र के लोगों द्वारा निर्वाचित आठ सदस्य 7.छावनी बोर्ड का मुख्य कार्यकारी अधिकारी।

छावनी परिषद के कार्यकारी अधिकारी की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा होती है। यह परिषद और इसकी समिति के सारे प्रस्तावों एवं निर्णयों को लागू करता है और इस प्रयोजन हेतु गठित केन्द्रीय कैडर से सम्बद्ध होता है।

छावनी परिषद द्वारा किए गए कार्य नगरपालिका के समान होते है। यह अनिवार्य कार्यों एवं वैचारिक कार्यों में वैधानिक रूप से श्रेणीबद्ध है। आय के साधनों में दोनों, कर एवं गैर कर राजस्व शामिल है।

न्यास पत्तन (Trust port)

न्यास पत्तन की स्थापना बन्दरगाह क्षेत्रों जैसे मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और अन्य में मुख्य रूपों से दो उद्देश्यों के लिए की जाती है: 1. बन्दरगाहों की सुरक्षा व व्यवस्था 2. नागरिक सुवधाएँ प्रदान करना

न्यास पत्तन का गठन संसद के एक अधिनियम द्वारा किया गया है। उसमें निर्वाचित और गैर निर्वाचित दोनों प्रकार के सदस्य सम्मिलित है। इसका एक आधिकारिक अध्यक्ष होता है। इसके नागरिक कार्य काफी हद तक नगरपालिका की तरह होते है।

विशेष उद्देश्य हेतु अभिकरण (Special purpose agency)

यह कार्यक्रम पर आधारित एजेंसी है न की क्षेत्र पर आधारित। यानी कि इसे राज्य द्वारा विशेष कार्यों के नियंत्रण के लिए गठित किया जाता है। इन्हें एक उद्देशीय या व्यापक उद्देशीय या विशेष उद्देशीय इकाई के रूप में भी जाना जाता है। कुछ इस तरह की इकाई इस प्रकार है:

1. नगरीय सुधार न्यास 2. शहरी सुधार प्राधिकरण 3. जलापूर्ति एवं माल निकासी बोर्ड 4. आवासीय बोर्ड 5. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड 6. विद्युत आपूर्ति बोर्ड 7. शहरी यातायात बोर्ड

यह स्वयात इकाई के रूप में कार्य करती है और स्थानीय शहरी प्रशासन द्वारा सौंपें कार्यों को स्वतंत्र रूप से करती है। अत: ये स्थानीय नगरपालिका इकाई के अधीनस्थ नहीं है।

ये रहा शहरी स्थानीय शासन के प्रकार (types of urban local governance), आइये इसके कुछ अन्य पहलुओं को समझते हैं।

Important Facts

नगरपालिका कर्मी (Municipal personnel)

भारत में तीन प्रकार के नगरपालिका कार्मिक है। नगर सरकारों में कार्यरत कार्मिक इन तीनों में से से किसी एक अथवा तीनों से संबन्धित हो सकते हैं:

1. पृथक कार्मिक प्रणाली: इस प्रणाली में प्रत्येक स्थानीय निकाय अपने कार्मिकों की नियुक्ति प्रशासन एवं नियंत्रण स्वयं करता है। ये कार्मिक अन्य स्थानीय निकायों में स्थानांतरणीय नहीं किए जा सकते।

2. एकीकृत कार्मिक प्रणाली: इस प्रणाली में राज्य सरकार नगरपालिका कार्मिकों की नियुक्त, प्रशासन तथा नियंत्रण करती है। इनमें कार्मिकों का विभिन्न स्थानीय निकायों में स्थानांतरण होता रहता है। यह व्यवस्था आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश राजस्थान, मध्यप्रदेश आदि में लागू है।

3. समेकित कार्मिक प्रणाली: इस प्रणाली में नगरपालिका कार्मिक राज्य सेवाओं के सदस्य होते है। इनका स्थानांतरण केवल स्थानीय निकायों में ही नहीं बल्कि राज्य सरकार के विभिन्न विभागों में भी हो सकता है। यह व्यवस्था ओड़ीशा, बिहार, कर्नाटक, पंजाब, हरियाणा तथा अन्य राज्यों में लागू है।

आय का जरिया (Source of income)

शहरी स्थानीय निकायों के आय के पाँच साधन है। वे साधन इस प्रकर है:

1. कर राजस्व: स्थानीय करों से प्राप्त राजस्व के अंतर्गत कर, मनोरंजन कर, विज्ञापन कर, पेशा कर, जल कर, मवेशी कर, प्रकाश कर, तीर्थ कर, बाज़ार कर, नए पुलों पर मार्ग कर, चुंगी तथा अन्य कर आते हैं। चुंगी जो स्थानीय क्षेत्र में आने वाली चीजों पर लयाया कर है जो उनके इस्तेमाल तथा बिक्री पर भी लगती है ये चुंगियाँ कई राज्यों मे हटा दी गई है संपत्ति कर राजस्व में सर्वाधिक महत्व का है।

2. गैर कर राजस्व: इस स्रोत के अंतर्गत आते है – निगम संपत्ति, फीस, जुर्माना, रॉयल्टी लाभ, लाभांश, ब्याज, उपयोग फीस, जुर्माना तथा अन्य अदायतियाँ। जन सुविधा शुल्क, जैसे जल, स्वच्छता, मलवाहन फीस आदि।

3. अनुदान: इसमें केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा निगम निकायों को कई विकास परियोजना संरचना परियोजना शहरी सुधार प्रक्रम तथा अन्य योजनाएँ संचालित करने हेतु केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा किए जाने वाले विभिन्न अनुदान शामिल है।

4. हस्तांतरण: इसके अंतर्गत आता है राज्य सरकार से शहरी स्थानीय निकायों को निधि का हस्तांतरण। यह हस्तांतरण राज्य वित्त आयोग की अनुशंसाओं के आधार पर होता है।

5. कर्ज: शहरी स्थानीय निकाय अपने व्यय के लिए राज्य सरकार तथा वित्तीय संस्थानों से भी कर्ज लेते है। पर वे राज्य सरकार की अनुमति से ही वित्तीय संस्थाओं या अन्य संस्थाओं स कर्ज ले सकते है।

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