नगरपालिका, नगर निगम, शहरी स्थानीय स्वशासन UPSC

पहले भारत में दो स्तर पर ही सरकारें हुआ करती थी – केंद्र और राज्य। लेकिन 1992 में शहरी स्थानीय स्वशासन की व्यवस्था की गई। नगरपालिका शहरी स्थानीय स्वशासन ही है;

इस लेख में हम भारत में नगरपालिका (Municipalities in India) के इतिहास, उसके प्रकार, संवैधानिक प्रावधान, वर्तमान परिदृश्य पर सरल और सहज चर्चा करेंगे।

नगरपालिका

विषय सूची

भारत में नगरपालिका का इतिहास

आधुनिक भारत में अगर नगर विकास पर नजर डाले तो ब्रिटिश काल के दौरान 1687 – 88 में भारत का पहला नगर निगम मद्रास में स्थापित हुआ। उसके बाद 1726 में बंबई तथा कलकता में भी नगर निगम स्थापित हुए।

उन्नीसवीं शताब्दी के शुरुआती दौर में भारत के लगभग सभी शहरों में नगरपालिका प्रशासन के किसी न किसी रूप का अनुभव हुआ था।

नगर निगम या यूं कहें कि शहरी स्थानीय स्वशासन को उस समय बहुत प्रोत्साहन मिला जब 1870 में लॉर्ड मेयो ने वित्तीय विकेन्द्रीकरण के सिद्धांत को अपनाया और आगे चलकर 1882 में भारत के तत्कालीन वायसराय, लॉर्ड रिपन, (जिन्हें स्थानीय स्व-शासन के पिता के रूप में जाना जाता है) ने स्थानीय स्व-शासन का एक प्रस्ताव पारित किया जो भारत में नगरपालिका शासन के लोकतांत्रिक रूपों का नेतृत्व करता है।

फिर इसके बाद शक्तियों की पृथक्करण पर सिफ़ारिशें देने के लिए हॉब हाउस की अध्यक्षता में 1907 में रॉयल कमीशन ऑन डीसेंट्र्लाइजेशन की नियुक्त हुई, जिनसे 1909 में अपनी रिपोर्ट सौंपी।

1919 में, भारत सरकार अधिनियम ने संकल्प की आवश्यकता को शामिल किया और लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार की शक्तियां तैयार की गईं। 1935 में भारत सरकार के एक अन्य अधिनियम ने राज्य या प्रांतीय सरकार के पूर्वावलोकन के तहत स्थानीय सरकार को लाया और विशिष्ट अधिकार दिए गए।

पंचायती राज व्यवस्था की तरह ही केंद्र सरकार द्वारा स्वतंत्रता पश्चात स्थानीय नगर शासन की कार्य प्रणाली में सुधार के लिए समय-समय पर ढेरों समितियों एवं आयोगों का गठन किया गया। अंततः 1992 में आकर वो सफर खत्म हुआ जब 74वें संविधान संशोधन के द्वारा स्थानीय शहरी शासन को संवैधानिक मान्यता दिया गया। ये कुछ इस तरह से हुआ।

भारत में नगरपालिका की वर्तमान व्यवस्था

1992 में संविधान में जिस प्रकार 73वां संशोधन करके स्थानीय शासन (Local government) के तहत पंचायती राज व्यवस्था को लाया गया उसी प्रकार 1992 में ही एक और संशोधन हुआ यानी कि 74वां संविधान संशोधन और उसी के अंतर्गत शहरी स्थानीय स्वशासन (Urban local self-government) की व्यवस्था की गई।

आजादी के बाद तेजी से बढ़ते शहरों ने शहरी स्वशासन की जरूरत को बढ़ाया लेकिन संविधान में चूंकि ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी इसीलिए संविधान संशोधन करके इस व्यवस्था को इसमें डाला गया। यहाँ ये जान लेना जरूरी है कि शहर क्या होता है? दरअसल शहर उसे कहते है जहां के 75% या उससे अधिक जनसंख्या वर्ग (पुरुष) गैर -कृषि कार्यों में संलग्न होने रहते हैं।

संशोधन के द्वारा संविधान में एक नया भाग 9 ‘क’ शामिल किया गया जिसके तहत अनुच्छेद 243P से लेकर 243ZG तक शहरी स्वशासन के प्रावधानों को सम्मिलित किया गया और इस पूरे चैप्टर को ”नगरपालिकाएं (Municipalities) नाम दिया गया।

इसके साथ ही अनुच्छेद 243W के तहत एक 12वीं अनुसूची भी संविधान में जोड़ा गया जिसमें नगरपालिकाओं की 18 कार्यकारी विषय-वस्तुओं का उल्लेख है। यानी कि ये वो विषय है जिन पर नगरपालिकाएँ शासन कर सकती है। इन विषयों को आप नीचे देख सकते हैं।

12वीं अनुसूची में वर्णित विषय

इसमें नगरपालिकों के कार्य क्षेत्र के साथ 18 क्रियाशील विषयवस्तु समाहित हैं:
1.शहरी योजना जिसमें नगर की योजना भी शामिल है,
2. भूमि उपयोग का विनियमन और भवनों का निर्माण
3. आर्थिक एवं सामाजिक विकास योजना
4. सड़कें एवं पुल,
5. घरलु, औद्योगिक एवं वाणिज्यिक प्रयोजनों के लिए जल प्रदाय
6. लोक स्वास्थ्य स्वच्छता सफाई और कूड़ा-कर्कट प्रबंच,
7. अग्निशामन सेवाएँ
8. नगर वानिकी, पर्यावरण संरक्षण एवं पारिस्थितिकी आयामों की अभिवृद्धि,
9. समाज के कमजोर वर्गों के हितों का संरक्षण, जिनमें मानसिक रोगी व विकलांग रोगी शामिल है,
10. झुग्गी-झोपरियों में सुधार,
11. शहरी निर्धनता उन्मूलन,
12. नगरीय सुख-सुवधाओं जैसे पार्क, उद्यान, खेल के मैदानों की व्यवस्था,
13. सांस्कृतिक, शैक्षिक व सौन्दर्य पक्ष में अभिवृद्धि,
14. शवाधान, दाहक्रिया और विद्युत शवगृह,
15. पशुओं के प्रति क्रूरता पर रोक लगाना,
16. जन्म व मृत्यु से संबन्धित महत्वपूर्ण सांख्यिकी,
17. जन सुविधाएं जिनमें मार्गों पर विद्युत व्यवस्था, बस स्टैंड तथा जन सुविधाएं सम्मिलित है,
18. वधशालाओं एवं चर्म शोधशाखाओं का विनियमन।

यहाँ पर ये याद रखिए कि इसी अनुच्छेद के 243A से लेकर अनुच्छेद 243O तक पंचायती राज व्यवस्था का प्रावधान किया गया है। तो कुल मिलाकर शहरी शासन का मतलब है शहरी क्षेत्र के लोगों द्वारा चुने प्रतिनिधियों से बनी सरकार। ये जो चुने हुए शहरी सरकार होते हैं उसका अधिकार क्षेत्र शहर में कितना होगा ये उस राज्य के सरकार द्वारा तय किया जाता है।

शहरी स्थानीय शासन के ढेरों रूप है, जैसे कि महानगर निगम (Municipal Corporation) या नगर निगम, नगर पालिका परिषद (Municipal Council), नगरपालिका (Municipality), अधिसूचित क्षेत्र समिति (Notified Area Committee), शहरी क्षेत्र समिति (Urban area committee), छावनी बोर्ड (Cantonment Board), पत्तन न्यास (Port trust) और विशेष उद्देश्य के लिए गठित एजेंसी (Special purpose agency), आदि।

वैसे, अनुच्छेद 243Q के तहत निम्न तीन तरह की नगरपालिकाओं की संरचना का उपबंध किया गया है: 1. नगर पंचायत (Nagar Panchayat) – परिवर्तित क्षेत्र के लिए, यानी कि वैसे क्षेत्र जो ग्रामीण क्षेत्र से शहरी क्षेत्र मे परिवर्तित होने की स्थिति में आ रहा है। 2. नगरपालिका परिषद (Municipal Council) – छोटे शहरी क्षेत्रों के लिए 3. नगरपालिका निगम (municipal Corporation) – बड़े शहरी क्षेत्रों के लिए। शहरी स्थानीय शासन के इस भाग को एक अलग लेख में समझाया गया है – शहरी स्थानीय शासन के प्रकार

शहरी स्थानीय स्व-शासन का संवैधानिकरण

राजीव गांधी सरकार ने अपने शासनकाल के दौरान, अगस्त 1989 में लोकसभा में 65वीं संविधान संशोधन पेश किया। इस संशोधन विधेयक का मूल मकसद था शहरी स्थानीय शासन को संवैधानिक दर्जा देना और उसे सुरक्षा प्रदान करना। लोकसभा से इसे पास करा लिया गया लेकिन राज्यसभा में ये पास न हो सका। 1990 में वी पी सिंह की सरकार ने भी इसे लाने की कोशिश की पर सरकार ही गिर गई और और फिर से ये अटक गया।

फिर अगली कोशिश सितंबर 1991 में पी वी नरसिम्हाराव सरकार द्वारा की गई, उन्होने इस प्रयोजनार्थ 74वां संविधान संशोधन विधेयक को सदन में पेश किया और इस बार ये दोनों सदनों से पास हो गया और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद एक कानून का रूप ले लिया इसे ही और इस बार ने 74वां संविधान संधोशन अधिनियम कहा जाता है जिसे कि 1 जून 1993 से लागू किया गया। तो अंततः यहाँ आकार शहरी स्थानीय शासन साकार हो गया।

1992 का 74वें संशोधन अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ

हमने ऊपर भी चर्चा किया है कि इस अधिनियम के तहत संविधान में अनुच्छेद 243P से लेकर अनुच्छेद 243ZG तक शामिल किया गया है, जिसकी विशेषताएँ निम्नलिखित है:

अनुच्छेद 243P में स्थानीय स्व-शासन से संबन्धित कुछ शब्दावलियों (terminologies) की परिभाषा दी गई है, जैसे कि – (1) समिति या परिषद (committee) उसे कहा जाएगा जो अनुच्छेद 243S में लिखा हुआ है, (2) महानगरीय क्षेत्र (Metropolitan area) उसे कहा जाएगा जिसकी जिस जगह की जनसंख्या 10 लाख से अधिक हो और 1 या उससे अधिक जिलों को कवर करता हो, या दो या अधिक नगर पालिका उसके अंदर आता हो, (3) नगरपालिका एक स्व-शासन संस्था है जो अनुच्छेद 243Q के तहत बताया गया है, इत्यादि।

अनुच्छेद 243Q के तहत निम्न तीन तरह की नगरपालिकाओं की संरचना का उपबंध किया गया है: 1. नगर पंचायत (Nagar Panchayat) – परिवर्तित क्षेत्र के लिए, यानी कि वैसे क्षेत्र जो ग्रामीण क्षेत्र से शहरी क्षेत्र मे परिवर्तित हो रहा है। 2. नगरपालिका परिषद (Municipal Council) – छोटे शहरी क्षेत्रों के लिए 3. नगरपालिका निगम (municipal Corporation) – बड़े शहरी क्षेत्रों के लिए।

नगरपालिका की संरचना

अनुच्छेद 243R के तहत नगरपालिका के सभी सदस्य प्रत्यक्ष तौर पर नगरपालिका क्षेत्र के लोगों द्वारा चुने जाएँगे। इस उद्देश्य के लिए, प्रत्येक नगरपालिकाओं को निर्वाचन क्षेत्रों में बांटा जाएगा, जिसे वार्ड (Ward) कहा जाएगा।

राज्य विधानमंडल नगरपालिका में निम्न व्यक्तियों के प्रतिनिधित्व की भी व्यवस्था करता है: 1. वह व्यक्ति जिसे नगरपालिका के प्रशासन का विशेष जान अथवा अनुभव हो (लेकिन ऐसे व्यक्ति को नगरपालिका की सभा में वोट डालने का अधिकार नहीं होगा।) 2. निर्वाचन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले लोकसभा या राज्य विधानसभा के सदस्य, जिनमें नगरपालिका का पूर्ण या अंशतः क्षेत्र आता हो। 3. राज्यसभा और राज्य विधानपरिषद के सदस्य जो नगर क्षेत्र में मतदाता के रूप पंजीकृत हो। 4. समिति के अध्यक्ष (वार्ड समितियों के अतिरिक्त)।

इसके अलावा राज्य विधानमंडल, नगरपालिका के अध्यक्ष को कैसे चुना जाएगा; उसे भी निश्चित कर सकता है।

वार्ड समिति का गठन और संरचना अनुच्छेद 243S के तहत तीन लाख या अधिक जनसंख्या वाली नगरपालिका के क्षेत्र के तहत एक या अधिक वार्डों को मिलाकर वार्ड समिति होगी। वार्ड समिति की संरचना, क्षेत्र और वार्ड समिति में पदों को भरने के संबंध में राज्य विधानमंडल उपबंध बना सकता है। यह वार्ड समिति के साथ-साथ समिति की बनावट के लिए भी उपबंध बना सकता है।

पदों का आरक्षण (Reservation of seats)

अनुच्छेद 243T के तहत यह अधिनियम अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति को उनकी जनसंख्या और कुल नगरपालिका क्षेत्र की जनसंख्या के अनुपात में प्रत्येक नगरपालिका में आरक्षण प्रदान करता है।

इसके अलावा कुल सीटों के एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए (इसमें अनुसूचित जाति व जनजाति महिलाओं से संबन्धित आरक्षित सीटें भी हैं) आरक्षित होगी।

राज्य विधानमंडल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं हेतु नगरपालिकाओं में अध्यक्ष पद के आरक्षण हेतु विधि निर्धारित कर सकता है।

राज्य विधानमंडल किसी भी नगरपालिका या अध्यक्ष पद पर पिछड़ी जतियों (Backward castes) के आरक्षण के लिए भी उपबंध बना सकता है।

नगरपालिका का कार्यकाल

अनुच्छेद 243U के तहत यह अधिनियम प्रत्येक नगरपालिका की कार्यकाल अवधि 5 वर्ष निर्धारित करता है। हालांकि इसे इसकी अवधि से पूर्व भी समाप्त किया जा सकता है। लेकिन ऐसा करने के बाद एक नई नगरपालिका का गठन किया जाएगा। यहाँ दो स्थितियाँ है; 1. यदि अगले चुनाव के लिए 6 महीने से कम का समय बचा है और तब नगरपालिका विघटित हुआ है तो चुनाव कराने की जरूरत नहीं है। लेकिन, (2) अगर अगर पाँच साल से पहले नगरपालिका को विघटित कर दिया हो और दुबारा चुनाव होने में 6 महीने से अधिक का समय है तो फिर चुनाव कराया जाएगा, लेकिन ये नया गठित नगरपालिका पाँच वर्षो के लिए नहीं बल्कि उसी शेष अवधि के लिए रहेगा, जो उस कार्यकाल में बचा था।

सदस्यों के लिए निरर्हताएँ (Disqualifications)

अनुच्छेद 243V के तहत चुने जाने पर या नगरपालिका के चुने हुए सदस्य निम्न स्थितियों में निरर्ह (Disqualified) घोषित किए जा सकते है: 1. संबन्धित राज्य के विधानमंडल के निर्वाचन के प्रयोजन हेतु प्रचलित किसी विधि के अंतर्गत। 2. राज्य विधान द्वारा बनाए गई किसी विधि के अंतर्गत, फिर भी किसी व्यक्ति को 25 वर्ष से कम आयु को शर्त पर निरर्ह घोषित नहीं किया जा सकेगा, यदि वह 21 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो। इसके बाद निरर्हता संबन्धित सारे विवाद, राज्य विधान द्वारा नियुक्त अधिकारियों के समक्ष ही प्रस्तुतु किए जा सकेंगे।

नगरपालिकाओं के चुनाव संबन्धित सभी मामलों पर राज्य विधानमंडल उपबंध बना सकता है।

नगरपालिका की शक्तियाँ एवं ज़िम्मेदारी

राज्य विधानमंडल, नगरपालिकाओं को आवश्यकतानुसार ऐसी शक्तियाँ और अधिकार दे सकता है जिससे कि स्व-शासन संस्था एक स्वस्थ्य सरकारी संस्था के रूप में कार्य करने में सक्षम हों। इस तरह की योजना में उपयुक्त स्तर पर नगरपालिकाओं के अंतर्गत शक्तियों और ज़िम्मेदारी आती है, जो निम्न हैं: 1. आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के कार्यक्रमों को तैयार करना। 2. आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के कार्यक्रमों को कार्यान्वित करना, जो उन्हे सौंपे गए हैं, जिसमें 12वीं अनुसूची के 18 मामले भी सम्मिलित हैं।

टैक्स लगाने की शक्ति और नगरपालिका की निधि

अनुच्छेद 243X के तहत राज्य विधायिका निम्न करारोपन की शक्तियाँ दे सकती है 1. नगरपालिका को वसूली, उपर्युक्त कर निर्धारण, चुंगी, यात्री कर, शुल्क लेने का अधिकार 2. यह नगरपालिकाओं को राज्य सरकार द्वारा करों, चुंगी, पथकर और शुल्क एकत्र करने का काम सौंप सकती है। 3. राज्य की संचित निधि से नगरपालिकाओं को सहायता के रूप में अनुदान प्रदान है। 4 नगरपालिकाओं में जमा होने वाली सभी राशि संग्रहण की विधियाँ तैयार कर सकती है।

वित्त आयोग (Finance Commission)

अनुच्छेद 243Y के तहत वित्त आयोग भी प्रत्येक 5 वर्ष में नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति का पुनरावलोकन करेगा और राज्यपाल को निम्न सिफ़ारिशें करेगा: 1. सिद्धान्त जो नियंत्रित होंगे: (a) राज्य और नगरपालिकाओं में राज्य सरकार दारा एकत्र किए गए कुल करों, चुंगी, मार्ग कर एवं संग्रहीत शुल्कों का बंटवारा। (b) करों, चुंगी, पथकर, और शुल्कों का निर्धारण जो कि नगरपालिकाओं को सौंपे जा सकते हैं। (c) राज्य की संचित निधि से नगरपालिकाओं को दिये जाने वाले सहायता अनुदान।

2. नगरपालिका को वित्तीय स्थिति के सुधार के लिए आवश्यक उपाय। राज्यपाल आयोग द्वारा की गई सिफ़ारिशों और कार्यवाही रिपोर्ट को राज्य विधानमंडल के समक्ष प्रस्तुत करेगा।

यहाँ याद रखिए कि केन्द्रीय वित्त आयोग भी राज्य में नगरपालिकाओं के पूरक स्रोतों की राज्य की संचित निधि में वृद्धि के लिए आवश्यक उपायों के बारे में सलाह दे सकता है।

नगरपालिकाओं के लेखाओं का लेखा परीक्षण

अनुच्छेद 243Z के तहत राज्य विधानमंडल नगरपालिकाओं के लेखाओं के अनुरक्षण और ऐसे लेखाओं को लेखा परीक्षण के संबंध में उपबंध बना सकता है।

नगरपालिका का चुनाव

अनुच्छेद ZA के तहत निर्वाचन प्रक्रियों की देख-रेख, निर्देशन एवं नियंत्रण और नगरपालिकाओं के सभी चुनावों का प्रबंधन राज्य चुनाव आयोग (State election commission) के अधिकार में होगा।

केन्द्रीय शासित राज्यों पर लागू

अनुच्छेद 243ZB के तहत भारत का राष्ट्रपति इस अधिनियम के उपबंधों को किसी भी केंद्रशासित क्षेत्र में लागू करने के संबंध में निर्देश दे सकता है, सिवाय कुछ छूटों और परिवर्तनों के जिन्हे वे विशिष्ट समझें।

छूट प्राप्त क्षेत्र

अनुच्छेद 243ZC के तहत यह अधिनियम राज्यों के अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति क्षेत्रों पर लागू नहीं होता है। इसके साथ ही यह अधिनियम पश्चिम बंगाल की दार्जिलिंग गोरखा हिल परिषद कि शक्तियों और कार्यवाही को प्रभावित नहीं करता।

जिला योजना समिति

अनुच्छेद 243ZD के तहत, प्रत्येक राज्य जिला स्तर पर एक जिला योजना समिति का गठन करेगा जो कि पंचायतों एवं नगरपालिकाओं द्वारा तैयार योजना को संगठित करेगी और जिला स्तर पर एक विकास योजना का प्रारूप तैयार करेगी। राज्य विधानमंडल इस संबंध में निम्नलिखित उपबंध बना सकता है: 1. इस तरह की समितियों की संरचना, 2. इन समितियों के सदस्यों के निर्वाचन का तरीका, 3. इन समितियों की जिला योजना के संबंध में कार्य, 4. इन समितियों के अध्यक्ष के निर्वाचन का ढंग।

इस अधिनियम के अनुसार जिला योजना समिति के 4/5 भाग सदस्य जिला पंचायत और नगरपालिका के निर्वाचित सदस्य द्वारा स्वयं में से चुने जाएँगे। समिति के इन सदस्यों की संख्या जिले की ग्रामीण एवं शहरी जनसंख्या के अनुपात में होनी चाहिए।

इस प्रकार की समितियों का अध्यक्ष, विकास योजनाओं को राज्य सरकार को प्रेसित करेगा।

प्रारूप विकास आयोजना (Draft development plan) को तैयार करते समय जिला आयोजना समिति निम्नलिखित को ध्यान में रखेगी: 1. इसके संबंध में

(a) पंचायतों एवं नगरपालिकाओं के बीच साझे हितों के मामले, जैसे- जल तथा अन्य भौतिक तथा प्राकृतिक संसाधनों की हिस्सेदारी, आधारभूत संरचना का समन्वित विकास तथा पर्यावरण संरक्षण। (2) वित्तीय अथवा अन्य प्रकर के उपलब्ध संशधनों का परिमाप।

2. ऐसी संस्थाओं एवं संगठनों से परामर्श लेगी जैसा कि राज्यपाल निर्दिष्ट करें।

महागरीय योजना समिति

अनुच्छेद 243ZE के तहत प्रत्येक महानगर क्षेत्र में विकास योजना के प्रारूप को तैयार करने के लिए एक महानगरीय योजना समिति होगी। राज्य विधानमण्डल इस संबंध में निम्न उपबंध बना सकता है: (a) इस तरह की समितियों की संरचना, (b) इन समिति के सदस्यों के निर्वाचन का तरीका, (c) केंद्र सरकार, राज्य सरकार तथा अन्य ऐसी संस्थाओं का इन समितियों में प्रतिनिधित्व जो इसके कार्य सही ढंग से करने के लिए जरूरी हो, (d) महनगरीय क्षेत्रों के लिए योजनाओं तथा समन्वयता के संबंध में इन समितियों के कार्य, (e) इन समितियों में अध्यक्ष के चुनाव का ढंग।

इस अधिनियम के अंतर्गत महनगरीय योजना समिति के 2/3 सदस्य महानगर क्षेत्र में नगरपालिका के निर्वाचित सदस्यों एवं पंचायतों के अध्यक्षों द्वारा स्वयं में से चुने जाएँगे। समिति के इन सदस्यों की संख्या उस महनगरीय क्षेत्र मे नगरपालिका एवं पंचायतों की जनसंख्या के अनुपात में समानुपाती होनी चाहिए।

इस तरह की समितियों का अध्यक्ष, विकास योजना राज्य सरकार को भेजेगा। प्रारूप विकास योजना तैयार करते समय महनगरीय आयोजना समिति निम्नलिखित का ध्यान रखेगी: 1. इसके संबंध में,

(a) महानगरीय क्षेत्र में नगरपालिकाओं एवं पंचायतों द्वारा तैयार योजनाओं का। (b) नगरपालिकाओं एवं पंचायतों के बीच साझे हितों में मामले जैसे- समन्वित आयोजना, जल तथा अन्य भौतिक एवं प्राकृतिक संशोधनों की हिस्सेदारी, आधारभूत संरचना का समन्वित विकास एवं पर्यावरण संरक्षण। (c) भारत सरकार एवं राज्य सरकार द्वारा निर्धारित लक्ष्य एवं प्राथमिकताएं। (d) महानगरीय क्षेत्र में भारत सरकार अथवा राज्य सरकार द्वारा किए जाने वाले निवेश का परिमाप एवं प्रकृति तथा उपलब्ध वित्तीय एवं अन्य संसाधन।

2. ऐसी संस्थाओं एवं संघटनों से परामर्श प्राप्त करेगी जैसकि राज्यपाल निर्दिष्ट करें।

वर्तमान विधियों एवं नगरपालिकाओं की निरंतरता

अनुच्छेद 243ZF के तहत, कहीं किसी कानून में कुछ और क्यों न लिखा हो, राज्यों कों इस अधिनियम पर आधारित नगरपालिकाओं के नए तंत्र को 1 जून, 1993 से अधिकतम एक वर्ष की अवधि के भीतर अपनाना होगा। यद्यपि इस अधिनियम के लागू होने से पूर्व अस्तित्व में सभी नगरपालिकाएँ जारी रहेंगी बशर्ते कि राज्य विधानमंडल उन्हे विघटित न करें।

निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालय के हस्तक्षेप पर रोक

अनुच्छेद 243ZG के तहत यह अधिनियम नगरपालिकाओं के चुनाव संबंधी मामलों में न्यायालय के हस्तक्षेप पर रोक लगाता है।

ये रहा भारत में नगरपालिकाओं (Municipalities in India) की वर्तमान स्थिति, इसके अलावा भारत में कितने प्रकार के शहरी स्थानीय शासन है, उसे अगले लेख में समझिए। लिंक नीचे दिया हुआ है।

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Article Based On,
भारत की राजव्यवस्था↗️
मूल संविधान
Municipal governance in India – Wikipedia
uRBAN LOCAL BODIES IN INDIA आदि।

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