Parliamentary system of Government (संसदीय व्यवस्था)

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इस लेख में हम संसदीय व्यवस्था (Parliamentary System) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे

हमें संसदीय व्यवस्था की जरूरत क्यों पड़ी? भारत के लिए यह व्यवस्था क्यों उपयुक्त है? संसदीय व्यवस्था, अध्यक्षात्मक व्यवस्था (Presidential System) से किस प्रकार अलग है? इस प्रकार के सारे सवालों के जवाब इस लेख में आपको मिल जाएँगे।

संसदीय व्यवस्था और अध्यक्षात्मक व्यवस्था

▶Difference between parliamentary system and presidential system

Parliamentary System
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संसदीय व्यवस्था
(Parliamentary System)

▶ इतना तो हम सब जानते हैं कि लोकतंत्र दो प्रकार का होता है। प्रत्यक्ष लोकतंत्र (Direct democracy) और अप्रत्यक्ष लोकतंत्र (Indirect democracy)।

प्रत्यक्ष लोकतंत्र का जीता-जागता उदाहरण स्विट्ज़रलैंड है। और इसके अलावा लगभग सभी देश जहां लोकतंत्र है वे अप्रत्यक्ष लोकतंत्र के सहारे ही चलते हैं।

अप्रत्यक्ष लोकतंत्र का मतलब ऐसी व्यवस्था से है जहां जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों के द्वारा शासन चलाया जाता है। हर एक प्रतिनिधि किसी क्षेत्र विशेष के लोगों के समूह का प्रतिनिधित्व करते हैं। भारत में यही व्यवस्था है।

देश में एक ऐसी जगह होती हैं या यूं कहें कि देश की राजधानी, जहां पर ये चुने हुए प्रतिनिधि बैठते हैं। उसी जगह को भारत में संसद (Parliament) कहा जाता है। यहीं से पूरे देश का भाग्य लिखा जाता है।

अब उस चुने हुए प्रतिनिधियों में से कुछ कार्यपालिका बन जाएँगे और बाद बांकी सब विधायिका तो हैं ही। कार्यपालिका वे बनेंगे जो बहुमत में होंगे।

इसी कार्यपालिका और विधायिका के सम्बन्धों के आधार पर आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं आम तौर पर दो प्रकार के होते हैं। संसदीय व्यवस्था (Parliamentary System) और अध्यक्षात्मक व्यवस्था (Presidential System)।

चूंकि हमारा देश भारत संसदीय व्यवस्था पर आधारित है, हम इसी पर फोकस करेंगे। इसे समझने के लिए हम तुलनात्मक अध्ययन का सहारा लेंगे इसीलिए संसदीय व्यवस्था के साथ-साथ अध्यक्षात्मक व्यवस्था पर भी प्रकाश डालेंगे।

संसदीय व्यवस्था है क्या?
(What is Parliamentary System?)

संसदीय व्यवस्था का शाब्दिक अर्थ है – एक ऐसी व्यवस्था जिसका केंद्र संसद हो। दूसरे शब्दों में कहें तो इस व्यवस्था में लगभग सारी की सारी राजव्यवस्था संसद के इर्द-गिर्द ही घूमती है।

आइये इसे इस तरह से समझते हैं – इस व्यवस्था का आधार जनता है ➡➡ जनता संसद को चुनती है खासतौर पर लोकसभा को तो प्रत्यक्ष रूप से चुनती है ➡➡ वहाँ बहुमत प्राप्त दल अपना एक नेता चुनती हैं ➡➡ राष्ट्रपति उसे प्रधानमंत्री के पद पर नियुक्त करती है ➡➡ प्रधानमंत्री एक मंत्रिपरिषद का गठन करता है ➡➡ मंत्रिपरिषद कार्यपालिका की भूमिका निभाती है और इसी को तो सरकार कहते हैं ➡➡ यहीं कार्यपालिका न्यायपालिका का गठन करती है। कुल मिलाकर ये इसका एक बेसिक स्ट्रक्चर है।

संसदीय व्यवस्था की मुख्य विशेषताएं
(Key Features of Parliamentary System)

🔹 कार्यपालिका, विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है। और यहीं बात इस संसदीय व्यवस्था को खास बनाती है;

क्योंकि अगर अध्यक्षात्मक व्यवस्था की बात करें तो वहाँ ऐसा कुछ नहीं होता है। वहाँ कार्यपालिका विधायिका से स्वतंत्र होती है। अमेरिका का संसदीय सिस्टम इसका एक उत्तम उदाहरण है।

🔹 संसद, कार्यपालिका को बना भी सकती है और हटा भी सकती है। वो कैसे ? वो ऐसे कि संसद अविश्वास प्रस्ताव ला सकती है।

अविश्वास प्रस्ताव ये जानने के लिए होती है कि विधायिका का विश्वास अभी भी कार्यपालिका पर है कि नहीं । यानी कि सरकार अभी भी बहुमत में है कि नहीं।

इसी प्रकार कार्यपालिका भी चाहे तो संसद को बना भी सकती है और भंग भी कर सकती है। वो कैसे?

वो ऐसे कि प्रधानमंत्री के पास ये शक्ति होती है कि वे जब भी चाहे लोकसभा को भंग कर सकते है। लोकसभा भंग होने का मतलब है संसद भंग। इसी को कहते है अन्योन्याश्रय संबंध (Interdependent relationship)।

🔹 संसदीय व्यवस्था की ये एक बड़ी विशेषता है कि विधायिका और कार्यपालिका का संबंध अन्योन्याश्रित होता है।

ये व्यवस्था अध्यक्षात्मक व्यवस्था में नहीं होती है। तभी तो जैसा कि ऊपर भी कहा गया है कि अध्यक्षात्मक व्यवस्था में कार्यपालिका विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होता है।

ये जो अन्योन्याश्रय संबंध है, इससे कार्यपालिका और विधायिका के बीच टकराव खत्म हो जाता है और दोनों मिलकर काम करते हैं।

🔹 अब आप समझ रहे होंगे कि ये व्यवस्था लाने की क्यों जरूरत पड़ी क्योंकि उस समय हमारा देश आजाद ही हुआ था और अगर अध्यक्षात्मक प्रणाली अपना लिया जाता तो पता चलता कि,

संसद सदस्य देश के लिए कानून बनाने की जगह एक दूसरे से लड़ने में ही अपना आधा समय गुज़ार देते और एक नया बना देश के लिए ये बिलकुल भी अच्छी बात नहीं होती।

🔹 संसदीय व्यवस्था में राज्य का प्रधान अलग होता है और सरकार का प्रधान अलग होता है। यानी कि भारत की बात करें तो यहाँ राज्य का प्रधान राष्ट्रपति होता है वहीं सरकार का प्रधान प्रधानमंत्री होता है।

🔹 राष्ट्रपति के पास नाममात्र की शक्ति होती है। उनका एक प्रमुख काम बस संविधान की रक्षा करना है। बाद बाँकि सारी की सारी वास्तविक शक्तियाँ प्रधानमंत्री के पास होती है, इसलिए इस व्यवस्था को प्रधानमंत्रीय व्यवस्था (Prime Minister’s system) भी कहते है।

🔹 और प्रधानमंत्री चूंकि अपने मंत्रिमंडल की मदद से शासन चलाता है इसीलिए इसे मंत्रिमंडलीय व्यवस्था (Cabinet System) भी कहते हैं।

वहीं अध्यक्षात्मक व्यवस्था की बात करें तो वहाँ राज्य का प्रमुख और सरकार का प्रमुख एक ही व्यक्ति होता हैं और वो होता है वहाँ का राष्ट्रपति। इसीलिए तो इसे राष्ट्रपति व्यवस्था (Presidential System) भी कहते है।

क्योंकि यहाँ प्रधानमंत्री जैसी कोई चीज़ नहीं होती है। ये भी एक कारण है अमेरिकी राष्ट्रपति के इतना ताकतवर होने का।

🔹 अब सवाल ये उठता है कि संसदीय व्यवस्था में राज्य के प्रमुख के लिए अलग व्यक्ति और सरकार के प्रमुख के लिए अलग व्यक्ति की आवश्यकता आखिर क्यों पड़ती है?

देखिये बात दरअसल ये है कि संसदीय व्यवस्था उत्तरदायित्व के सिद्धांत (Principles of liability) पर आधारित होता है,

वहीं अध्यक्षात्मक व्यवस्था स्थिरता के सिद्धांत (Principles of stability) पर आधारित होता है। इसका क्या मतलब है?

▶ इसका मतलब ये है कि अध्यक्षात्मक व्यवस्था में एक बार अगर कोई व्यक्ति राष्ट्रपति बन जाता है तो वे अपने पूरे कार्यकाल तक राष्ट्रपति बना रहता है, कार्यकाल के बीच में उसे हटाना बहुत ही मुश्किल है;

ये कितना मुश्किल है इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते है कि अमेरिका में आज तक एक भी राष्ट्रपति को उसके कार्यकाल के बीच में हटाया नहीं गया है। बशर्ते की उसकी पद पर रहते हुए मृत्यु न हो गयी हो।

अब भारत में चूंकि संसदीय उत्तरदायित्व का सिद्धांत काम करता है इसीलिए इसकी कोई गारंटी नहीं होती है कि सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगा ही।

पर जब तक वो अपने पद पर रहेगा वो जनता के प्रति उत्तरदायी जरूर रहेगा।

🔹 अब जरा सोचिए अगर सरकार गिर गयी तो कोई तो हो जो नया सरकार बनने तक देश को चलयमान रख सकें और देश में संवैधानिक प्रभुत्व को बनाये रख सकें।

इसी स्थिति में राज्य के प्रमुख की भूमिका अहम हो जाती है। यानी कि राष्ट्रपति की भूमिका अहम हो जाती है।

चूंकि हम एक संघीय व्यवस्था वाले देश में रह रहें है और यहाँ राज्य विधानमंडल होता है जो कि राज्य के लिए संसद की तरह ही काम करता है।

केंद्र में प्रधानमंत्री की तरह ही वहाँ मुख्यमंत्री होता है। और मुख्यमंत्री का कार्यकाल भी अस्थिर होता है इसीलिए वहाँ राज्यपाल की व्यवस्था की गयी है।

ताकि सरकार न होने कि स्थिति में भी आम प्रशासन पर कोई इम्पैक्ट न पड़े। शायद अब आप समझ रहे होंगे कि राष्ट्रपति और राज्यपाल क्यों महत्वपूर्ण है।

🔹 भारत का संविधान, केंद्र और राज्य दोनों में सरकार के संसदीय स्वरूप की व्यवस्था करता है। अनुच्छेद 74 और 75 केंद्र में संसदीय व्यवस्था का उपबंध करते हैं और अनुच्छेद 163 और 164 राज्यों में। इन अनुच्छेदों में क्या है इसको आगे के लेख में विस्तार से समझेंगे।

🔹 संसदीय सरकार का जनक ब्रिटेन को माना जाता है। इसीलिए संसदीय सरकार को ‘सरकार का वेस्टमिन्सटर स्वरूप’ भी कहा जाता है; ये इसलिए कहा जाता है क्योंकि Palace of Westminster ब्रिटेन का संसद है।

सरकार का यह स्वरूप ब्रिटेन, जापान, कनाडा, भारत आदि में प्रचलित है।

दूसरी ओर, राष्ट्रपति सरकार को गैर-उत्तरदायी या गैर-संसदीय या निश्चित कार्यकारी व्यवस्था भी कहा जाता है और यह अमेरिका, ब्राज़ील,रूस, श्रीलंका आदि में प्रचलित है। 

संसदीय व्यवस्था के गुण
(Properties of parliamentary system)

सरकार की संसदीय व्यवस्था के निम्नलिखित गुण है।

विधायिका एवं कार्यपालिका के मध्य सामंजस्य
(Harmony between the legislature and the executive)

जैसा कि हमने ऊपर भी चर्चा किया है कि विधायिका और कार्यपालिका दोनों एक दूसरे पर परस्पर निर्भर रहते हैं। हालांकि दोनों का कार्य क्षेत्र अलग-अलग होता है। फिर भी कार्यपालिका विधायिका का ही एक अंग होता है।

🔷 इसे आप इस तरह से समझ सकते हैं कि एक सांसद विधायिका (Legislature) का तो हिस्सा होता ही है। पर साथ ही साथ वे एक ही समय में कार्यपालिका (Executive) का भी हिस्सा बन सकता है।

क्योंकि विधायिका तो वे सभी 545 (लोकसभा के लिए) सदस्य है। पर उसी में से कुछ सदस्य कार्यपालिका बन जाता है। या फिर दूसरे शब्दों में कहें तो मंत्री बन जाता है।

🔹 अगर अभी भी नहीं समझे तो आप इसे इस तरह से समझिए कि वर्तमान प्रधानमंत्री श्रीमान नरेंद्र मोदी एक सांसद हैं क्योंकि वे किसी संसदीय क्षेत्र से चुनाव जीत कर आए है।

अब चूंकि वे एक सांसद है इसीलिए वे विधायिका का भी हिस्सा है। फिर वे बहुमत प्राप्त दल के नेता भी तो हैं, इसीलिए वे प्रधानमंत्री भी है, वे प्रधानमंत्री है इसीलिए वे कार्यपालिका भी है।

उत्तरदायी सरकार
(Responsible government)

🔹 चूंकि इस व्यवस्था में कार्यपालिका हमेशा विधायिका के प्रति उत्तरदायी होता है। यानी की संसद के प्रति उत्तरदायी होता है।

संसद के प्रति उत्तरदायी होने का मतलब है जनता के प्रति उत्तरदायी होना; क्योंकि आखिर वे सब लोग जनता के ही तो प्रतिनिधि है।

🔹 अनुच्छेद 75 में कहा गया है कि मंत्रियों का संसद के प्रति सामूहिक उत्तरदायित्व होता है और विशेषकर लोकसभा के प्रति। जब प्रधानमंत्री की बात करेंगे तब अनुच्छेद 74 और 75 पर विस्तृत चर्चा करेंगे।

यहीं बात अध्यक्षात्मक व्यवस्था वाली सरकार में नहीं होती है, वहाँ का राष्ट्रपति और सचिव या फिर उसे कार्यपालिका कह लीजिये; अपने संसद के प्रति उत्तरदायी नहीं होता है।

वैकल्पिक सरकार की व्यवस्था
(Alternative government system)

यानी कि मौजूदा सरकार अगर अपना बहुमत खो देती है तो राष्ट्रपति विपक्षी दल को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकती है। इसे ही वैकल्पिक सरकार की व्यवस्था कहते हैं।

बहुमत प्राप्त दल का शासन और राजनैतिक एकरूपता
(Majority party rule and political uniformity)

इस व्यवस्था में सरकार वही होता हैं जिसके पास बहुमत होता है। इसीलिए उस बहुमत प्राप्त दल की समान विचारधारा होती है। इसी विचारधारा को केंद्र में रखकर वे चुनाव भी लड़ते हैं।

हालांकि गठबंधन सरकार के मामले में मंत्री सर्वसम्मति के प्रति बाध्य होते हैं और इस तरह की परिस्थिति में कई विचारधारा एक साथ भी आ सकती हैं।

संसदीय व्यवस्था का दोष
(Demerits of parliamentary system)

अस्थिर सरकार
(Unstable government)

हमने ऊपर भी चर्चा किया है कि इस व्यवस्था में कोई ठीक नहीं होता है कि सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगा की नहीं। खासकर के अगर गठबंधन की सरकार हो तब तो ये कहना और भी मुश्किल है।

नीतियों की निश्चितता का अभाव
(Lack of certainty of policies)

अब चूंकि कार्यकाल की अनिश्चितता होती है, जल्दी-जल्दी सरकार बदलती है इसीलिए नीतियों में कोई एकरूपता नहीं रह जाता है।

पिछली सरकार कोई योजना शुरू करता है और नई सरकार को वो योजना पसंद नहीं आता है तो वे उसे खत्म कर देते हैं। इससे कुल मिलाकर लॉस जनता का ही होता है।

▶नीतियों में निश्चितता से कोई देश कितनी जल्दी तरक्की कर सकता है उसका ज्वलंत उदाहरण चीन है।

मंत्रिमंडल की निरंकुशता
(Cabinet autocracy)

कई बार इसका उल्टा भी होता है, किसी दल को पूर्ण बहुमत मिल जाता है और बहुत सारे राज्यों में भी उसकी सरकार बन जाती है।

राज्यसभा में भी बहुमत में आ जाता है तो वो सरकार इतनी ताकतवर हो जाती है कि किसी की सुनती ही नहीं और निरंकुशता के रास्ते पर चल पड़ती है।

अकुशल व्यक्तियों द्वारा सरकार का संचालन
(Government run by unskilled people)

अब हमारे देश में चूंकि नेता का पढ़ा-लिखा होना आवश्यक नहीं होता है इसीलिए कई बार ऐसे व्यक्ति चुन कर भेज दिये जाते हैं जो अकुशल होता है सरकार चलाने में। और उसका खामियाजा जनता को भुगतना पड़ता है।

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