इस लेख में हम बंदी प्रत्यक्षीकरण मामला 1976 (habeas corpus case 1976) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे, एवं इसके विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं को समझेंगे;

इसे ADM जबलपुर बनाम शिवकान्त शुक्ला मामला भी कहा जाता है और ये स्वतंत्र भारत में सबसे महत्वपूर्ण मामलों में से एक है।

ये मामला स्वतंत्रता का अधिकार (Right to freedom) एवं संवैधानिक उपचार का अधिकार (Right to constitutional remedy) से जुड़ा हुआ है, तो इसे समझने से पहले उसे जरूर समझ लें।

habeas corpus case 1976

Background of habeas corpus case 1976

25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी द्वारा देश में आंतरिक गड़बड़ी के आधार आपातकाल (Emergency) लगाया गया। आंतरिक गड़बड़ी (अब सशस्त्र विद्रोह) के आधार पर आपातकाल अनुच्छेद 352(1) के आधार पर लगाया जाता है।

जब अनुच्छेद 352 सक्रिय होता है तो उसके साथ ही दो और अनुच्छेद (अनुच्छेद 358 और अनुच्छेद 359) भी सक्रिय हो जाता है।

अनुच्छेद 358 तो अपने आप लागू हो जाता है जिसके तहत अनुच्छेद 19 निलंबित हो जाता है। वहीं अनुच्छेद 359 के तहत राष्ट्रपति को ये अधिकार मिल जाता है कि वे अपने विवेकानुसार किसी अन्य मूल अधिकार को भी निलंबित कर सकता है।

आपातकाल लगने के ठीक दो दिन बाद यानी कि 27 जून 1975 को राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 359 के तहत एक आदेश जारी किया और मूल अधिकार के तहत आने वाली अनुच्छेद 14, 21 और 22 को निलंबित कर दिया।

साथ ही आदेश में ये भी जोड़ दिया कि अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 226 का इस्तेमाल करके कोई निलंबित किए गए अधिकारों की बहाली के लिए न्यायालय नहीं जा सकता है।

[नोट – यहाँ दो बातें जानने योग्य है (1) अब अगर आपातकाल लगाया भी जाता है तो राष्ट्रपति अनुच्छेद 20 और 21 को निलंबित नहीं कर सकता है। ऐसा प्रावधान आपातकाल खत्म होने के बाद 1978 के 44वें संविधान संशोधन के माध्यम से संविधान में जोड़ा गया। (2) अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 226 मूल अधिकारों की रक्षा के लिए क्रमशः उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय को प्रदत अधिकार है।]

1971 में निवारक निरोध (Preventive detention) के लिए आंतरिक सुरक्षा देखरेख अधिनियम (Internal security maintenance act) यानी कि MISA बनाया गया। जिसका इस्तेमाल करते हुए सरकार ने हजारों लोगों को बंदी बना लिया और उसे उसकी स्वतंत्रता से वंचित कर दिया।

निरोध (detention)
मुख्य रूप से निरोध (detention) दो तरह की होती है –
(1) दंडात्मक निरोध (Punitive detention) – इसका आशय, अपराध के बाद किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करके स्वतंत्रता से वंचित कर देने से है।
(2) निवारक निरोध (Preventive detention) – इसका आशय, भविष्य में कोई व्यक्ति अपराध न कर बैठे इसीलिए उसे पहले ही गिरफ्तार करके उसकी स्वतंत्रता छीन लेने से है।
MISA इसी उद्देश्य के लिए बनाया गया एक कानून था। जिसके तहत आपातकाल के दौरान इन्दिरा गांधी ने जयप्रकाश नारायण, लालू प्रसाद यादव, मोरार जी देसाई आदि सहित सभी बड़े नेता को जेल में बंद कर दिया गया था।
habeas corpus case 1976

तो कुल मिलाकर स्थिति कुछ ऐसा था कि बड़े नेताओं सहित लगभग 40 हज़ार लोग निवारक निरोध कानून के तहत देशभर के जेलों में बंद थे और अपनी आजादी की मांग के लिए कोर्ट भी नहीं जा सकते थे क्योंकि अनुच्छेद 14, 21 और 22 निलंबित था।

फिर भी हजारों लोगों ने उच्च न्यायालय में इस आधार पर याचिका दायर कि की व्यक्तिगत स्वतंत्रता सिर्फ अनुच्छेद 21 से ही थोड़ी न मिलती है बल्कि ये तो प्राकृतिक कानून (natural law) (यानी कि जीने का अधिकार, न्याय का अधिकार आदि) एवं न्यायालय द्वारा समय-समय पर सुनाये गए फैसलों से भी मिलता है।

फिर भी उच्च न्यायालय के लिए सुनवाई करना काफी मुश्किल था क्योंकि अनुच्छेद 226 के तहत मिले अधिकार का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता था। इसीलिए जब उच्च न्यायालय ने MISA पर सुनवाई करने का फैसला लिया तो सरकारी वकीलों की तरफ से काफी विरोध हुआ।

ADM जबलपुर मामला

दरअसल MISA के तहत DM और ADM को ये अधिकार दिया गया था कि वे इस कानून के तहत लोगों को हिरासत में ले सकते हैं। जबलपुर ADM ने भी MISA के तहत बहुत सारे लोगों को हिरासत में लिया लेकिन उन लोगों ने इस कानून को बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas corpus) याचिका के तहत उच्च न्यायालय में चुनौती दिया। उच्च न्यायालय ने इसे स्वीकार भी किया। इसीलिए इसे habeas corpus case भी कहा जाता है।

[नोट – बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas corpus) उच्चतम एवं उच्च न्यायालय को प्राप्त एक अधिकार है जिसके तहत वो व्यक्ति को कोर्ट में हाजिर करने के लिए कह सकता है और अगर उसे गलत तरह से हिरासत में रखा गया होता है तो न्यायालय उसे रिहा कर सकता है।]

कहा जाता है उस समय लगभग 9 उच्च न्यायालयों ने इस पर सुनवाई का फैसला लिया। लेकिन ऐसा होते देख केंद्र सरकार ने MISA में संशोधन कर दिया और उसमें कुछ निम्नलिखित प्रावधान जुड़वा दिये-

(1) नियम बना दिया कि 3 महीने के बाद भी किसी व्यक्ति को अब हिरासत में रखा जा सकता है और उसके लिए अब सलाहकार बोर्ड (Advisory board) की जरूरत नहीं है।

दरअसल अनुच्छेद 22 के तहत ये प्रावधान था कि निवारक निरोध में रखे गए व्यक्ति को 3 महीने से ज्यादा तब तक नहीं रखा जा सकता है जब तक कि सलाहकार बोर्ड (Advisory board)** ऐसा करने को न कहे।

** सलाहकार बोर्ड में वे व्यक्ति शामिल होते हैं जो या तो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश है या न्यायाधीश रहे हैं या न्यायाधीश नियुक्त किए जाने के योग्य है।

(2) व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का स्रोत केवल अनुच्छेद 21 है न कि कोई प्राकृतिक कानून (natural law) या अन्य कानून।

यानी कि प्राकृतिक कानून आदि के आधार पर अब कोर्ट नहीं जाया जा सकता था।

और इस सबमें सबसे बड़ी बात ये थी कि इस संशोधित MISA को 9th Schedule यानी कि नौंवी अनुसूची में डाल दिया। [नौंवी अनुसूची क्या है इस पर एक अलग से लेख मौजूद है उसे जरूर पढ़ें, यहाँ जानने के लिए इतना समझ सकते हैं कि जिस किसी भी कानून को नौवीं अनुसूची में डाला जाता है उसकी समीक्षा न्यायालय द्वारा नहीं की जा सकती]

◾ अब केंद्र सरकार ने अपना स्टैंड रखा कि न्यायालय को अब सुनवाई करने का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि MISA नौवीं अनुसूची में है, अनुच्छेद 358 के तहत अनुच्छेद 19 पहले से ही निलंबित है और अनुच्छेद 359 के तहत अनुच्छेद 14, 21 और 22 को निलंबित कर दिया गया है। तो जब अनुच्छेद 21 और 22 ही निलंबित है तो फिर बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas corpus) याचिका पर सुनवाई करने का कोई अर्थ नहीं है।

मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष

ये मामला सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की एक संवैधानिक बेंच के पास गया। जिनके समक्ष सवाल ये था कि (1) क्या राष्ट्रपति को ये अधिकार है कि निवारक निरोध के नाम पर अनुच्छेद 359 का इस्तेमाल करते हुए किसी व्यक्ति को अनुच्छेद 21 के तहत मिली व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित किया जा सकता है और उसे न्यायालय में याचिका दायर करने से रोका जा सकता है? (2) क्या MISA के तहत हिरासत में लिए व्यक्तियों द्वारा उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण के तहत दायर याचिका को अनुच्छेद 359 के तहत दिये गए राष्ट्रपति के आदेश के आधार पर खारिज किया जा सकता है?

सुप्रीम कोर्ट का फैसला (Supreme Court decision)

बेंच ने 4-1 से फैसला सुनाते हुए सरकार द्वारा किए गए सभी कृत्य को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया (Process established by law) के आधार पर सही माना और एक तरह से सरकार को इन सभी कृत्यों से बरी कर दिया।

4 न्यायाधीशों (मुख्य न्यायाधीश ए.एन. रे, न्यायमूर्ति एम हमीदुल्ला बेग, न्यायमूर्ति पी एन भगवती और न्यायमूर्ति वाई.वी. चंद्रचूड़) के बहुमत ने आपातकाल की घोषणा और अनुच्छेद 21 के निलंबन को सही माना।

दूसरी बात कि राष्ट्रपति के आदेश के मद्देनजर नजरबंदी (Detention) के आदेश की वैधानिकता को चुनौती देने के लिए किसी भी व्यक्ति के पास अनुच्छेद 226 के तहत बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas corpus) या अन्य किसी किसी भी रिट याचिका को उच्च न्यायालय के समक्ष रखने का अधिकार नहीं है।

इसीलिए सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को आज भी उस पर लगा एक दाग की तरह देखा जाता है। सिर्फ एक न्यायाधीश एच आर खन्ना को छोड़कर सभी का मत एक समान था।

के एस पुत्तास्वामी मामला 2017

2017 में, सुप्रीम कोर्ट ने के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत सरकार मामले में स्वीकारा की एडीएम जबलपुर का मामला त्रुटिपूर्ण था और इस तरह से लगभग 40 वर्ष बाद एडीएम जबलपुर में दिये गए फैसले को खारिज कर दिया।

तो कुछ इस तरह से भूल-सुधार करने के बाद न्यायालय ने कहा “कोई भी सभ्य राज्य कानून के अधिकार के बिना जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अतिक्रमण पर विचार नहीं कर सकता है। न तो जीवन और न ही स्वतंत्रता राज्य द्वारा प्रदत्त इनाम हैं और न ही संविधान इन अधिकारों का निर्माण करता है बल्कि जीवन का अधिकार संविधान के आगमन से पहले भी मौजूद है।

आप को यहाँ बता दें कि यही वो मामला था जिसमें निजता (Privacy) को अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार माना गया।

कुल मिलाकर यही था habeas corpus case 1976, उम्मीद है समझ में आया होगा। नीचे अन्य लेखों का लिंक दिया जा रहा है उसे भी पढ़ें।

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Article Based On,
एम लक्ष्मीकान्त – भारत की राजव्यवस्था↗️
मूल संविधान भाग 3↗️
Habeus Corpus Case & Article 21↗️
Fundamental rights in India↗️
ADM Jabalpur: The Case that was but should never have been!↗️
SC overrules Emergency-era habeas corpus verdict↗️ आदि।

डाउनलोड habeas corpus case 1976

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