Directive Principles of State Policy (राज्य के नीति निदेशक तत्व)

इस लेख में हम राज्य के नीति निदेशक तत्व (Directive Principles of State Policy) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे एवं इसके विभिन्न पहलुओं को समझने की कोशिश करेंगे तो लेख को अंत तक जरूर पढ़ें।

Directive Principles of State Policy

राज्य के नीति निदेशक तत्व (Directive Principles of State Policy)

🧿 राज्य के नीति निदेशक तत्व का शाब्दिक अर्थ है – राज्य के नीति को निर्देशित करने वाले तत्व। जब संविधान बनाया गया था उस समय लोगों को शासन करने का और देशहीत में कानून बनाने का कोई तजुर्बा नहीं था।

खासकर के राज्यों के लिए जो कि एक लंबे औपनिवेशिक काल के बाद शासन संभालने वाले थे। और जैसा कि हम जानते है कि हमारे देश में राजनेताओं के लिए पढ़ा-लिखा होना कोई अनिवार्य नहीं है,

ऐसे में जब वे देश या राज्य का सत्ता संभालेंगे और जनहित में कानून बनाएँगे तो हो सकता है वो देशहित में कम और व्यक्ति हित में ज्यादा हो।

संविधान सभा के बुद्धिजीवी (Intellectual) और दूरदर्शी (Visionary) सदस्यों ने ये पहले ही भांप लिया था इसीलिए उन्होने राज्य के नीति निदेशक तत्व जैसे क्लॉज़ को जोड़ा ताकि,

जब भी राज्य कोई कानून बनाए तो कम से कम कुछ बेसिक बातों का ध्यान अवश्य रखें। 

🧿 दूसरी बात ये थी कि सारे क़ानूनों को उसी समय लागू करने और उसका क्रियान्वयन कराने के लिए देश के पास उतना वित्तीय संसाधन उपलब्ध नहीं था।

क्योंकि कई क़ानूनों के तहत संस्थान या प्रशासनिक इकाईयों आदि की स्थापना करनी पड़ती है। और देश की हालत उस समय बहुत ख़स्ता था।

🧿 तीसरी बात ये थी कि देश अभी-अभी आजाद हुआ ही था। उसको अपने पैरों पर खड़े करने की चुनौती थी वही देश में व्यापक विविधता एवं पिछड़ापन एवं अशिक्षा था।

ऐसे में आम लोगों को तो ये तक पता नहीं था कि उसके अधिकार क्या-क्या है या फिर कौन से अधिकार है जो उसे मिलना ही चाहिए।

इस स्थिति में अगर सारे क़ानूनों को लागू कर दिया जाता तो, कार्यपालिका और न्यायपालिका पर और भी दबाव आ जाता और इसके क्रियानन्वयन करने में बहुत बाधाएँ आती। 

इसीलिए यही ठीक समझा गया कि इस तरह के प्रावधानों को राज्य के नीति निदेशक तत्व बना दिया जाये ताकि भविष्य में जैसे-जैसे इनके लिए क़ानूनों की जरूरत पड़ती जाएगी वैसे-वैसे इसे लागू किया जा सके।

🧿 इसका उल्लेख संविधान के भाग 4 के अनुच्छेद 36 से अनुच्छेद 51 तक में किया गया है। और ये विचार आयरलैंड के संविधान से लिया गया है। 

नीति निदेशक तत्वों की विशेषताएं
(Features of Directive Principles of State Policy)

🧿 दरअसल राज्य के नीति निदेशक तत्व (Directive Principles of State Policy) इस बात को सुनिश्चित करता है कि एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना कैसे की जाये। 

दूसरे शब्दों कहें तो एक लोककल्याणकारी राज्य की स्थापना के लिए ये जरूरी है कि राज्य कानून बनाते समय इसमें लिखी बातों का ध्यान रखें।

🧿 मौलिक अधिकारों की तरह ये कोई बाध्यकारी कानून नहीं है। यानी कि जहां पर मौलिक अधिकारों के हनन पर सीधे सुप्रीम कोर्ट जाया जा सकता है।

वहीं राज्य के नीति निदेशक तत्व के हनन पर किसी कोर्ट में नहीं जा सकते। मतलब कि ये वाद योग्य नहीं है।

🧿 जहां मौलिक अधिकार एक अधिकार है वहीं यह एक कर्तव्य की तरह है। यानी कि राज्य चाहे तो इसे लागू कर भी सकता है और चाहे तो नहीं भी।

कुल मिलाकर कहें तो इसका एक ही मकसद है एक लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना। कितना हो पाया है, इसपर आप खुद ही विचार करें।

राज्य के नीति निदेशक तत्व के प्रावधान
(Provisions of Directive Principles of State Policy)

संविधान के इस पूरे भाग में 16 अनुच्छेद है और कई उप-अनुच्छेद भी है, इस सब को याद रखना आसान नहीं है और जरूरी भी नहीं।

इसलिए हम उस अनुच्छेद पर ज्यादा फोकस करेंगे जो अक्सर चर्चा में रहता है और जिस पर या तो कानून बन चुका है या फिर भविष्य में बनने की पूरी उम्मीद है। जहां vvi लिखा है उसे तो कम से कम जरूर याद रखें।

🔰अनुच्छेद 36

अनुच्छेद 36 में लिखा है कि यहाँ राज्य का मतलब वहीं है जो भाग 3 में अनुच्छेद 12 में है। चूंकि इसका शीर्षक ही है राज्य के नीति निर्देशक तत्व यानि कि इसमें भी राज्य शब्द आता है,

तो अनुच्छेद 36 में कहा गया है कि राज्य का मतलब यहाँ वहीं है जो मूल अधिकारों वाले भाग के अनुच्छेद 12 में वर्णित है। मतलब कि यहाँ इसे ऐसे समझिए कि अनुच्छेद 12 = अनुच्छेद 36 

🔰अनुच्छेद 37

अब जैसा कि हम जानते है ये मौलिक अधिकार की तरह बाध्यकारी नहीं है। ये तो बस एक सिफ़ारिश है न की कोई ऐसा कानून जो बाध्यकारी हो।

तो अनुच्छेद 37 में यही कहा गया है कि भले ही ये कोई बाध्यकारी कानून नहीं है पर राज्यों का ये कर्तव्य होगा कि इसे लागू करें। 

राज्य के नीति निर्देशक तत्व का प्रावधान अनुच्छेद 38 से शुरू होता है। मैं यहाँ सभी अनुच्छेदों की चर्चा कर रहा हूँ पर आपको केवल उसी पर ज्यादा फोकस करना है जिस अनुच्छेद के आगे vvi लिखा हो।

अनुच्छेद 38 से लेकर 51 तक जो निदेशक तत्वों की चर्चा की गयी है। उसे आमतौर पर तीन भागों में बाँट दिया जाता है।

🧿 पहला – समाजवादी सिद्धान्त वाले निदेशक तत्व,
🧿 दूसरा – गांधीवादी सिद्धांत वाले निदेशक तत्व,
🧿 तीसरा – उदार बौद्धिक सिद्धांत वाले निदेशक तत्व।
आइये एक-एक करके इन तीनों को समझते हैं।

Directive Principles of State Policy and Socialist Theory

समाजवादी सिद्धांत 

समाजवादी का क्या मतलब होता है उससे तो हम पहले से ही परिचित है। फिर भी जिसे नहीं पता उसके लिए बता देता हूँ कि –

ऐसा सिद्धान्त जिसमें एक व्यक्ति की जगह पर पूरे समाज को वरीयता दी जाये। और समाज के कल्याण के लिए सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक स्तर पर समानता स्थापित करने का प्रयास किया जाये।

एक बात यहाँ पर याद रखिये कि इसके अंतर्गत जितने भी अनुच्छेद आएंगे सब कहीं न कहीं समानता स्थापित करने से संबन्धित है।

🔰अनुच्छेद 38

अनुच्छेद 38 समाज में समानता स्थापित करने की बात करता है जो कि अनुच्छेद 14 से 18 तक में भी वर्णित है।

मतलब कि सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय सुनिश्चित करना और समाज में बिना किसी भेदभाव के सभी को एक समान अवसर उपलब्ध कराना।

Directive Principles of State Policy and Bank Nationalization

🔰अनुच्छेद 39 (vvi)

आर. सी. कूपर बनाम भारत सरकार मामला 1970

अनुच्छेद 39 के ‘B’ और ‘C’ प्रावधान बहुत ही इंपोर्टेंट है। इन्दिरा गांधी ने जब 1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था।

तब 1970 में आर. सी. कूपर नामक एक व्यक्ति ने भारत सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर दिया।

🔷 दरअसल बात ये था कि अनुच्छेद 31 के तहत एक प्रावधान था कि जब भी सरकार किसी की संपत्ति को अधिगृहीत करेगा।

तो उस संपत्ति के मालिक को सरकार द्वारा क्षतिपूर्ति दिया जाएगा। यानी कि जितना संपत्ति सरकार ने अधिगृहीत किया है उस समय के बाज़ार भाव के हिसाब से उतने रूपये संपत्ति मालिक को सरकार देगा।

अब इन्दिरा गांधी ने तो बैंकों का अधिग्रहण कर लिया पर सरकार के पास उतना पैसा नहीं था कि सबको क्षतिपूर्ति कर सकें।

यहाँ याद रखिए कि इन्दिरा गांधी इसी अनुच्छेद 39 ‘B’ और ‘C’ के आधार पर बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था।

जबकि आर. सी. कूपर अनुच्छेद 31 के तहत अपने मूल अधिकारों के हनन को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर किया था।

दोनों ही अपने-अपने जगह पर सही था क्योंकि अनुच्छेद 31 के हिसाब से कूपर को क्षतिपूर्ति मिलना चाहिए था। ये उसमें प्रावधान था।

जबकि अनुच्छेद 39 ‘B’ कहता है – सामूहिक हित के लिए समुदाय के भौतिक संसाधनों का सम वितरण । इसका मतलब है कि सामूहिक हित के लिए देश के भौतिक संसाधनों को सब में बराबर-बराबर बांटा जा सकता है।

और अनुच्छेद 39 ‘C’ कहता है कि – धन और उत्पादन के संकेन्द्रण को रोकना। यानी कि किसी भी स्थिति में धन को एक जगह इकट्ठा न होने दिया जाये।

और उस समय बैंक वाले यही कर रहे थे खूब माल छाप रहे थे। दूसरी तरफ जनता खाने के लिए भी तरस रहे थे। इन्दिरा गांधी ने शायद यही सोचकर बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था। क्योंकि उनका नारा भी था – गरीबी हटाओ।

पर 1970 में आर. सी. कूपर वो केस जीत गया और सरकार केस हार गयी। और वो कानून रद्द कर दिया गया। क्यों कर दिया गया?

क्योंकि मौलिक अधिकारों को बचाने की ज़िम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट पर है। राज्य के नीति निदेशक तत्व का हनन भी होता है तो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

क्यों नहीं पड़ता? इसे अभी-अभी हमने ऊपर पढ़ा है। यहीं था आर. सी. कूपर बनाम भारत सरकार मामला।

🔷 इसीलिए इन्दिरा गांधी 1971 में जब पूर्ण बहुमत के साथ सरकार में आई तो 25वां संविधान संशोधन करके आर. सी. कूपर मामले के फैसले को पलट दिया।

उन्होने अनुच्छेद 31 में ये लिखवा दिया कि – सरकार अगर कोई कानून अनुच्छेद 39 के खंड B और C के तहत बनाती है तो उसे अनुच्छेद 14, 19 और 31 के आधार पर सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज नहीं किया जा सकता।

और दूसरी बात उन्होने अनुच्छेद 31 में से क्षतिपूर्ति (Compensation) शब्द को हटवा कर के रकम (Amount) लिखवा दिया।

क्योंकि उस केस में इन्दिरा गांधी को इस प्रावधान ने बहुत परेशान किया था। अब चूंकि उन्होने रकम लिखवा दिया था इसका मतलब ये था कि सरकार जितना चाहेगी, संपत्ति के मालिक को उतना ही मिलेगा।

ये था पूरा मामला। इस तरह से इन्दिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया।

🔰अनुच्छेद 39 के अन्य प्रावधान

अब अनुच्छेद 39 के ‘B’ और ‘C’ को तो जान ही गए है बांकी बचे प्रावधानों को भी जान लेते हैं। वैसे इसे याद रखना जरूरी नहीं है। फिर भी बता देते हैं।

🔷 अनुच्छेद 39 ‘A’ – सभी नागरिकों को जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार। 🔷 अनुच्छेद 39 ‘D’ – पुरुषों और स्त्रियों को समान काम के लिए समान वेतन।
🔷 अनुच्छेद 39 ‘E’ – सभी कर्मकारों को स्वास्थ्य और शक्ति तथा बालकों को अवस्था के दुरुपयोग से संरक्षण।
🔷 अनुच्छेद 39 ‘F’ – बालकों को स्वास्थ्य विकास के अवसर।

🔷 अनुच्छेद 39 ‘G’ – इसे 42वें संविधान संशोधन 1976 के द्वारा इसमें जोड़ा गया था। इसमें गरीबों और वंचितों को मुफ्त विधिक सहायता उपलब्ध करने की बात की गयी है।

🔰अनुच्छेद 41

ये भी समानता की बात करता है । ये बेरोजगार लोगों को और बुढ़ापे के लिए लोक सहायता की व्यवस्था की बात करता है।

🔰अनुच्छेद 42

ये भी सामाजिक न्याय से संबन्धित है। इसमें कहा गया है कि – काम की मानवोचित और न्यायसंगत दशाओं और प्रसूति सहायता का उपबंध करना।

🔰अनुच्छेद 43

सभी कर्मकारों के लिए निर्वाह मजदूरी, शिष्ट जीवन स्तर तथा सामाजिक और सांस्कृतिक अवसर।

🔰अनुच्छेद 43 A

उद्योगों में प्रबंध के कार्यों में कर्मकारों को भाग लेने के लिए कदम उठाना।

🔰अनुच्छेद 47

पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊंचा करना तथा लोक स्वास्थ्य का सुधार करना । 

ये रही समाजवादी सिद्धांतों वाली राज्य के नीति निदेशक तत्व।
अब बात करते हैं गांधीवादी सिद्धांत के बारे में –

Directive Principles of State Policy and Gandhian Theory

गांधीवादी सिद्धान्त 

ये सिद्धान्त गांधी के विचारधारों पर आधारित है। गांधी जी के बारे में अगर आप थोड़ा भी जानते है तो आपको पता होगा कि स्वदेशी, सर्वोदय और स्वच्छता गांधी जी के विचार में प्रमुखता से शामिल रहा है

गांधी जी के इन्ही उद्देश्यों और सपने की पूर्ति के लिए निदेशक तत्व में इसे शामिल किया गया है। क्योंकि आपको पता होगा कि 1948 में जब गांधी जी कि मृत्यु हुई थी तब संविधान बन ही रहा था।

अगर वे जिंदा होते तो कुछ नीचे बताए गए कुछ प्रावधान तो जरूर उसी समय कानून बन गया होता। पर शायद नहीं थे इसीलिए नीति निदेशक तत्व का हिस्सा बना।

🔰अनुच्छेद 40 (vvi)

स्थानीय स्वशासन: गांधी जी पंचायती राज्य व्यवस्था के पुरजोर समर्थक थे, वे चाहते थे कि स्थानीय स्वशासन का गठन किया जाये और सभी आवश्यक शक्तियाँ उनको दी जाये।

उनका ये सपना 1993 में जाकर पूरा हुआ, जब पंचायती राज व्यवस्था को लागू किया गया।

🔰अनुच्छेद 43 (vvi)

ग्रामीण क्षेत्रों में कुटीर उद्योग को प्रोत्साहन, गांधी जी स्वदेशी के बहुत बड़े समर्थक थे। इसीलिए वे हमेशा आत्मनिर्भर होने पर जोर देते थे।

🔰अनुच्छेद 43 B (vvi)

सहकारी समितियों का स्वैच्छिक गठन, स्वायत संचालन और व्यावसायिक प्रबंधन को बढ़ावा देना। इस क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है।

🔰अनुच्छेद 46 (vvi)

अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजातियों और समाज के कमजोर वर्गों के शैक्षणिक एवं आर्थिक हितों को प्रोत्साहन और सामाजिक अन्याय और शोषण से सुरक्षा।

ये क्यों महत्वपूर्ण है इसे समझने के लिए आप ↗️संविधान की मूल संरचना वाला लेख जरूर पढ़ें।

🔰अनुच्छेद 48

गाय, बछरा व अन्य दुधारू पशुओं की बली पर रोक और उनकी नस्लों में सुधार को प्रोत्साहन।  

ये रही राज्य के नीति निदेशक तत्व का गांधीवादी सिद्धांत,
आइये अब उदार बौद्धिक सिद्धांत के बारे में जानते हैं।

Directive Principles of State Policy and Liberal Intellectual Theory

उदार बौद्धिक सिद्धांत 

जाहिर है ये उदारवादी विचार धारा से संबन्धित है – उदार का मतलब ही है जो सबके प्रति समान सोच रखता हो भले ही इंसान हो या फिर प्रकृति।

🔰अनुच्छेद 44 (vvi)

ये एक समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) की बात करता है ये । जो अब तक संभव नहीं हो सका है। पर ये अक्सर चर्चा में रहता है तो आप इसे जरूर याद रखें।

🔰अनुच्छेद 45

सभी बालकों को 14 वर्ष तक निशुल्क शिक्षा की बात करता है। आपको याद होगा, इसे अनुच्छेद 21 ‘क’ के तहत मौलिक अधिकार का हिस्सा बना दिया गया है।  

🔰अनुच्छेद 48

कृषि कार्यों मे आधुनिक वैज्ञानिक प्रणालियों का उपयोग

🔰अनुच्छेद 48 A

पर्यावरण का संरक्षण तथा संवर्धन और वन्य तथा वन्य जीवों की रक्षा।

🔰अनुच्छेद 49

राष्ट्रीय महत्व वाले ऐतिहासिक धरोहरों, स्थान और वस्तुओं का संरक्षण करना।

🔰अनुच्छेद 50

राज्य के लोक सेवाओं में, न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक करना।

🔰अनुच्छेद 51

अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा कि अभिवृद्धि करना तथा राष्ट्रों के बीच न्यायपूर्ण और सम्मानपूर्ण सम्बन्धों को बनाए रखना, संधि बाध्यता का आदर करना, अंतर्राष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता से निपटाना।

Directive Principles of State Policy and Amendments

🧿 अनुच्छेद 39 ‘G’, अनुच्छेद 43 ‘A’, अनुच्छेद 48 ‘A’ को 42वें संविधान संसोधन अधिनियम 1976 के माध्यम से जोड़ा गया। इससे पहले ये नहीं था।

🧿 44वां संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद 38 में एक लाइन जोड़ी गयी – आय, प्रतिष्ठा और अवसरों के असमानता को समाप्त करना।

🧿 86 वें संसोधन 2002 से अनुच्छेद 45 के विषय-वस्तु को बदला गया। 97वां संशोधन 2011 में 43 ‘B’ को जोड़ा गया।

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