Federal System of India (भारत की संघीय व्यवस्था)

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इस लेख में हम भारत की संघीय व्यवस्था (Federal System of India) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे, एवं इसके विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं को समझने की कोशिश करेंगे।
Federal System of India

भारत की संघीय व्यवस्था का परिचय(Introduction of Federal System of India)

▶ पिछले लेख में हमने संसदीय व्यवस्था (Parliamentary system) पर चर्चा किया था। जहां हमने समझा कि किस तरह सारी चीज़ें संसद के इर्द-गिर्द ही घूमती रहती है।

हमने देखा था कि राज्यों के पास भी अपना विधानमंडल (Legislature) होता है जो कि एक प्रकार से वहाँ का संसद होता है। और राज्य का अपना सरकार होता है और वो भी केंद्र से स्वतंत्र। ये जो विशेषताएँ है ये दरअसल संघीय व्यवस्था (Federal System) से ही आती हैं और इस लेख में हम इसी पर तो बात करेंगे।

संघवाद (Federalism)

संघवाद, यानी कि एकल राजनैतिक व्यवस्था के अंतर्गत एक ऐसा मिश्रित शासन व्यवस्था जहां एक केंद्रीय सरकार होती है और कई प्रांतीय सरकार और दोनों की शक्तियों का विभाजन इस तरह से किया जाता है जिससे कि दोनों स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकने और उसे क्रियान्वित कर सकने में सक्षम हो सके।

परिसंघ (Confederation)
संघ से थोड़ा अलग परिसंघ होता है (इसे महासंघ भी कहा जाता है)। ये एक ऐसी राजनैतिक व्यवस्था को कहा जाता है जिसमें दो या उस से अधिक लगभग पूर्णतः स्वतंत्र राष्ट्र या कोई संस्था समझौता कर लें कि बाक़ी विश्व के साथ वे एक ही राष्ट्र की तरह सम्बन्ध रखेंगे। जैसे कि यूरोपियन यूनियन
संघों की तुलना में परिसंघों के सदस्यों को अधिक स्वतंत्रता होती है। परिसंघों में कभी-कभी केवल नाम मात्र की केन्द्रीय सरकार होती है जिसके पास कोई असली शक्तियां नहीं होती।

🔹 federation लैटिन Foedus से बना है, जिसका मतलब होता है – संधि या समझौता। कहने का अर्थ ये है कि जब हम संघीय व्यवस्था कहते हैं तो इसका मतलब दो या अधिक इकाइयों के बीच हुए किसी संधि या समझौते के तहत बना का राजनैतिक व्यवस्था से होता है। अमेरिका को विश्व का सबसे पुराना संघीय व्यवस्था वाला देश कहा जाता है।

संघीय व्यवस्था वाला देश कैसे बनता हैं?

संघीय व्यवस्था वाला देश दो तरीके से बनता है; (1) जब स्वतंत्र राज्य मिलकर एक बड़े व मजबूत संघ का निर्माण करें। उदाहरण के USA (2) जब एक बड़ा या एकीकृत राज्य ही संघ में परिवर्तित हो जाये। उदाहरण के लिए कनाडा (भारत को भी इसी श्रेणी में रखा जाता है)

अगर आपने अनुच्छेद 1 पढ़ा हो तो उसमें साफ-साफ लिखा है कि इंडिया यानी कि भारत राज्यों का संघ होगा (India, that is Bharat, shall be a Union of States) ।

वहाँ अगर आप एक चीज़ पर गौर करें तो एक विरोधाभास नजर आता है। विरोधाभास ये है कि संघ के लिए आमतौर पर इंग्लिश में फेडरल (Federal) शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन अनुच्छेद 1 के इंग्लिश वर्जन को पढ़ें तो कहीं भी फेडरल शब्द नहीं मिलता बल्कि उसकी जगह पर यूनियन (Union) शब्द का जिक्र किया गया है। तो आखिर इसका क्या मतलब है? आइये इसे समझते हैं

भारतीय संघीय व्यवस्था की समझ (Understanding of federal system of India)

🔹 जब अमेरिका ब्रिटेन से आजाद हुआ तो वहाँ के 13 राज्यों ने एक समझौता किया कि अलग-अलग रहने से अच्छा है कि हम सब मिलकर एक केंद्र बनाये और उसको कुछ शक्तियाँ दे दें। ऐसा ही हुआ उन 13 राज्यों ने मिलकर एक संघ या देश बनाया जिसे ‘यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका‘ नाम दिया।

धीरे-धीरे और राज्य बनते गए और इसमें जुड़ते गए अभी 50 राज्य है। चूंकि वहाँ पर राज्यों या फिर कह लें कि छोटे-छोटे स्वतंत्र क्षेत्रों ने मिलकर संघ बनाया है, इसीलिए वहाँ राज्य को ज्यादा शक्तियाँ दी गयी है।

🔹 वहाँ पहले लोग उस राज्य के नागरिक होते हैं फिर अमेरिका के, और सबसे बड़ी बात ये है कि कोई भी राज्य जब भी चाहे वो इस संघ को छोड़कर जा सकता है। कानून बनाने के लिए भी केंद्र से ज्यादा विषय राज्यों के पास है।

पर भारत के साथ ऐसा नहीं है क्योंकि ये कनाडाई मॉडल पर आधारित है जहां राज्यों ने मिलकर केंद्र नहीं बनाया बल्कि केंद्र पहले से था बाद में राज्य को इसमें एक संधि पत्र पर हस्ताक्षर करके जोड़ा गया। इसीलिए तो इसे ‘यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ इंडिया‘ नहीं कहा जाता है बल्कि ‘रिपब्लिक ऑफ इंडिया‘ कहा जाता है।

🔹 अगर सारे राज्यों ने मिलकर इंडिया बनाया होता तो आज भारत में कम से कम 550 राज्य होते। क्योंकि लगभग इतने ही राज-राजवारे थे।

डॉ. अंबेडकर ने इसे स्पष्ट करते हुए कहा था कि ‘भारतीय संघ अमेरिका की तरह राज्यों के बीच किसी समझौते का परिणाम नहीं है।’ इसीलिए किसी भी राज्य को इस संघ से बाहर जाने का कोई अधिकार नहीं है।

भारतीय संघ में केंद्र को, राज्यों की तुलना में ज्यादा शक्ति दी गयी है ताकि वे एक अविभावक की भूमिका निभाये और सभी को एक साथ लेकर चलें। दूसरे शब्दों में कहें तो ये एक प्रकार से भारत का एकात्मक स्वरूप (Unitary form) है इसीलिए संविधान में यूनियन (Union) शब्द का इस्तेमाल किया गया है।

एकात्मक स्वरूप का क्या मतलब है; इसे आगे समझते हैं

भारत की संघीय व्यवस्था की विशेषताएं (Features of Federal System of India)

कोई देश संघीय व्यवस्था (Federal system) वाला देश है कि नहीं उसे निम्नलिखित विशेषताओं से पहचाना जा सकता है –

शक्तियों का विभाजन (Division of powers)

संघीय व्यवस्था की एक मूल विशेषता, शक्तियों का विभाजन है। यानी कि इसमें दो प्रकार की सरकार होती है केंद्र सरकार और राज्य सरकार एवं शक्तियाँ दोनों में बाँट दी जाती है।

🔹 भारत की बात करें तो यहाँ शक्तियों को बांटने के लिए तीन सूचियाँ बनायी गयी है। संघ सूची (Union list), राज्य सूची (State list) और समवर्ती सूची (Concurrent list)

संघ सूची के विषयों पर केंद्र कानून बनाती है, जैसे कि रक्षा, विदेश, संचार आदि। राज्य सूची के विषयों पर राज्य कानून बनाती है जैसे कि स्थानीय प्रशासन, सार्वजनिक कानून आदि। और समवर्ती सूची के विषयों पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बनाती है।

केंद्र और राज्य के मध्य शक्तियों के इस तरह से बंटवारे के कारण इसे द्वैध राजपद्धति भी कहा जाता है।

🔹 अमेरिका, स्विट्ज़रलैंड, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, रूस, ब्राज़ील, अर्जेन्टीना आदि में सरकार का संघीय मॉडल (Federal Model) है।

संघीय व्यवस्था के जो आधारभूत तत्व हैं वे सभी देश के लगभग समान ही होते हैं, हाँ अलग-अलग देशों में इसे अलग-अलग तरह से प्रयोग में लाये जाते हैं। अमेरिका, स्विट्ज़रलैंड और ऑस्ट्रेलिया को परंपरागत संघीय व्यवस्था वाला देश कहा जाता है।

कुछ देशों के फेडरल सिस्टम कुछ अलग रूप लिए हुए भी हो सकते हैं। जैसे भारत की ही बात करें तो शक्तियों का विभाजन तो है लेकिन केंद्र के पास बहुत ही ज्यादा शक्ति है जबकि राज्यों के पास कम।

लिखित संविधान और उसकी सर्वोच्चता (Written constitution and its supremacy)

संघीय व्यवस्था के सही संचालन के लिए जरूरी होता है कि एक लिखित संविधान (Written constitution) हो और उस संविधान में ये बात साफ-साफ लिखा हो कि शक्तियों का बंटवारा कैसे किया गया है तथा किसको कितनी शक्ति दी गयी है। ताकि केंद्र और राज्य के मध्य इस बात को लेकर कभी विवाद न हो कि कितनी शक्तियाँ किसके पास है।

संविधान की सर्वोच्चता (Supremacy of the constitution) इसलिए जरूरी है ताकि एक निश्चित कानूनी व्यवस्था कायम रह सकें, एक ठोस, स्पष्ट और टिकाऊ कानून व्यवस्था बनी रह सकें और संसद निरंकुश न हो सकें।

भारत की बात करें तो यहाँ लिखित संविधान भी है, और संविधान की सर्वोच्चता भी। गौरतलब है कि केशवानन्द भारती मामले में संविधान की सर्वोच्चता को संविधान का मूल ढांचा माना गया था।

स्वतंत्र न्यायालय और न्यायिक पुनर्निरीक्षण की शक्ति (Independent Court and Power of judicial review)

स्वतंत्र न्यायालय का मतलब है इसका कार्यपालिका एवं विधायिका से होना। दूसरे शब्दों में कहें तो सरकार के क्षेत्राधिकार से बाहर होना।

न्याय व्यवस्था को दुरुस्त रखने, कानून का शासन बनाए रखने और लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोगों का विश्वास बनाए रखने के लिए न्यायालय का स्वतंत्र होना बहुत ही जरूरी होता है। (यहाँ से पढ़ें – हमारा सुप्रीम कोर्ट कितना स्वतंत्र है?)

दूसरी बात है न्यायिक पुनर्निरीक्षण की शक्ति – न्यायालय की स्वतंत्रता को और अधिक बूस्ट देता है न्यायिक पुनर्निरीक्षण की शक्ति, क्योंकि इसके तहत ये विधायिका द्वारा बनाए गए विधियों की संविधान की कसौटियों पर जाँच करता है एवं उपयुक्त प्रतीत नहीं होने पर इसे खारिज कर देता है या उसमें बदलाव ला देता है।

गौरतलब है कि न्यायालय की न्यायिक समीक्षा की शक्ति संविधान की मूल ढांचा का हिस्सा है। (यहाँ से पढ़ें – सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक समीक्षा की शक्ति)

🔹 अगर भारत के संविधान के संशोधन की प्रक्रिया के बारे में आपने पढ़ रखा हो तो आपको पता होगा कि भारत में संविधान संशोधन करना न तो कठोर है और न ही लचीला।

दूसरे शब्दों में इसे कहें तो ये कठोर भी है और लचीला भी। यानी कि अगर गठबंधन की सरकार है तो उसे संविधान संशोधन करने में कुछ कठिनाइयाँ आ सकती है लेकिन अगर अगर सरकार पूर्ण बहुमत में हो तो उसके लिए तो ये बाएँ हाथ का काम हो जाता है।

🔹 ऐसी स्थिति में कहीं केंद्र सरकार संविधान में संशोधन करके संघीय व्यवस्था को हानि न पहुंचा सकें, न्यायालय अपनी न्यायिक पुनर्निरीक्षण (judicial review) की शक्ति का इस्तेमाल करता है।

भारत की संघीयता (Federalism of india)

कुल मिलाकर उपरोक्त आधार पर अगर भारत का मूल्यांकन करें तो ये एक संघीय व्यवस्था वाला देश प्रतीत होता है। या दूसरे शब्दों में कहें तो उपरोक्त व्यवस्था भारत को संघीय व्यवस्था वाला देश बनाता है।

बात सिर्फ इतनी नहीं है। भारतीय संविधान में बहुत सारे ऐसे प्रावधान है और कभी-कभी ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती है जो भारत को एकात्मक व्यवस्था वाला देश बनाता है। वो कैसे? आइये देखते हैं।

Unitary System (एकात्मक व्यवस्था)

🔹 एकात्मक व्यवस्था (Unitary System) – इसका सीधा सा मतलब ये होता है कि एक केंद्र होगा और सारी की सारी शक्तियाँ उसी में निहित होगी। जैसे कि ब्रिटेन को ले लीजिये।

ऐसा नहीं है कि इस तरह के सिस्टम में क्षेत्रीय सरकार नहीं हो सकता है। बिलकुल हो सकता है और होता भी है पर वो स्वतंत्र सरकार नहीं होता हैं, वो केंद्र के अधीन ही काम करता है। जैसे कि भारत में केंद्रशासित प्रदेश को ले लीजिये, वहाँ का अपना प्रशासक तो होता है पर वो केंद्र सरकार के अधीन काम करता है।

🔹 कुल मिलाकर इस व्यवस्था में शक्तियों का बंटवारा नहीं होता है। सारी शक्तियों का उपभोग केंद्र ही करता है। इसीलिए इसे एकात्मक व्यवस्था कहा जाता है। ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, चीन, इटली, बेल्जियम, नोर्वे, स्वीडन, स्पेन आदि में सरकार का एकात्मक स्वरूप है।

इस व्यवस्था से छोटे देशों को तो आसानी से चलाया जा सकता है पर जब बात बड़े देशों जैसे इंडिया और अमेरिका की आती है तो ये व्यवस्था उतनी उपयुक्त साबित नहीं होती है।

Difference between federal system and unitary system

Federal System of India
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भारत की संघीय व्यवस्था में एकात्मक तत्व (Unitary elements in Federal System of India)

भारत का संविधान केंद्र के पक्ष में बहुत सारे ऐसे प्रावधान करता है जो भारत को एकात्मक व्यवस्था वाला देश बनाता है। इन प्रावधानों को आप नीचे देख सकते हैं;

आपातकाल का प्रावधान और सशक्त केंद्र (Emergency provision and strong center)

🔹 जब भी आपातकाल (Emergency) लगाया जाता है पूरे देश या उस अमुक राज्य पर सीधे केंद्र का नियंत्रण स्थापित हो जाता है। उस स्थिति में राज्य की सारी शक्तियाँ भी केंद्र के पास आ जाती है और केंद्र ताकतवर हो जाता है। ऐसी स्थिति में संघीय व्यवस्था (Federal System) खत्म हो जाता है और एकात्मक व्यवस्था (Unitary System) लागू हो जाता है।

🔹 दूसरी बात ये कि केंद्र के पास वैसे भी राज्यों से अधिक शक्तियाँ होती है। केंद्र सूची को देखेंगे तो उस सूची में लगभग 100 विषय है, जबकि राज्य सूची में मात्र 60 – 61 विषय हैं। ऊपर से समवर्ती सूची का कानून भी केंद्र बना सकता है। और जो इन तीनों सूचियों में नहीं लिखा हुआ है उसपर भी केंद्र कानून बना सकता है। इस तरह से केंद्र बहुत ज्यादा सशक्त हो जाता है।

इसके अलावा बहुत सारी चीज़ें तो ऐसी है कि केंद्र बिना राज्य को पूछे कर सकता है जैसे कि किसी राज्य की सीमा बदलना हो, किसी राज्य को अन्य राज्य में मिलना हो। इत्यादि।

एकल संविधान और एकल नागरिकता (Single constitution and single citizenship)

पूरे देश के लिए चूंकि एक ही संविधान है राज्य को हमेशा केंद्र पर निर्भर रहना पड़ता है। और दूसरी बात कि भारत में चूंकि एकल नागरिकता का प्रावधान है इसीलिए हम सिर्फ भारत के नागरिक होते है न कि किसी राज्य का। ये भी केंद्र सरकार में एकात्मक गुण को दर्शाता है।

अखिल भारतीय सेवाएँ और राज्यपाल (All India Services and Governor)

जितने भी आईएएस और आईपीएस ऑफिसर होते हैं वो केंद्र सरकार नियुक्त करता है। और केंद्र सरकार इसके द्वारा राज्य प्रशासन पर एक प्रकार से नियंत्रण रखता है। क्योंकि राज्य सरकार उसे चाह कर भी हटा नहीं सकते बस उसे स्थानांतरित कर सकते हैं।

राज्यपाल की नियुक्ति

राज्यपाल की नियुक्त केंद्र करता है और यह केंद्र के एक एजेंट के रूप में काम करती है। उसका काम भी केंद्र के पक्ष में ज्यादा झुका होता है।

एकीकृत निर्वाचन एवं लेखा जांच मशीनरी

भारत का निर्वाचन आयोग न केवल केन्द्रीय चुनाव कराता है बल्कि विधानमंडल का भी चुनाव भी यही कराता है। इसके अलावा लेखा जांच की बात करें तो, भारत का नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक केंद्र के अलावा राज्यों के लेखाओं की भी जांच करता है।

राज्य विषयों पर केंद्र द्वारा कानून बनाना

कुछ ऐसी स्थितियाँ बनती है जब राज्य विषयों पर भी केंद्र कानून बनाता है जैसे कि (1) अगर राज्यसभा पूर्ण बहुमत से इस संबंध में एक प्रस्ताव पारित करें (2) अगर देश में राष्ट्रीय आपातकाल लगा हो (3) अगर किसी अंतर्राष्ट्रीय संधि एवं समझौते को लागू करवाना हो, आदि।

इस तरह से उपरोक्त प्रावधानों के आधार पर अगर देश का मूल्यांकन करे तो केंद्र ज्यादा ताकतवर नजर आता है और राज्य उसके सामने कुछ भी नहीं। ये हमारे देश के एकात्मक स्वरूप को दर्शाता है।

हालांकि ये एक तरह से सही भी है, अगर राज्यों को ज्यादा शक्ति दी जाती और अपना संविधान और अपना नागरिकता चुनने की आजादी दी जाती तो राज्य तो छोटी से विवाद पर भी उससे अलग हो जाते और अपना देश बना लेते।

🔹 आप इसका उदाहरण जम्मू कश्मीर से ले सकते हैं; कुछ समय पहले तक जहां का अपना संविधान होता था और वहाँ का अपनी नागरिकता। ऐसी स्थिति में वहाँ के बहुत सारे लोग खुद को इंडियन मानते ही नहीं थे। तो भारत जैसे विविधतापूर्ण संवेदनशील देश में ऐसी स्थिति न आए इसके लिए जरूरी है कि केंद्र थोड़ा ताकतवर रहें। यानी कि उसमें एकात्मकता का भाव हो।

संघीय व्यवस्था और पंचायती राज (Federal System of India and Panchayati Raj)

🔷 चूंकि भारत में 1993 से पंचायती राज व्यवस्था भी काम कर रहा है और उसे भी कुछ शक्तियाँ दी गयी है। यानी कि भारत में अब तीन स्तरीय सरकार हो गया है। इसीलिए भारत को अब बहुसंघीय व्यवस्था (Poly-federal system) भी कहा जाता है। ये व्यवस्था भारत के अलावा ब्राज़ील, अर्जेन्टीना और नाइजीरिया में भी है।

भारत की संघीय व्यवस्था की आलोचना (Criticism of Federal system of India)

🔹 कुछ लोग भारत को अर्द्ध-संघात्मक व्यवस्था (Quasi-Federal System) वाला देश भी कहते हैं। क्योंकि भारत संघ तो है ही लेकिन केंद्र शक्तिशाली है।

भारत संघीय चरित्र वाला केन्द्रीय राज्य है न कि केन्द्रीय चरित्र वाला संघीय राज्य

के सी वाघमारे

🔹 वही ज़्यादातर लोग सिर्फ संघात्मक व्यवस्था (Federal System) कहते हैं क्योंकि उन लोगों का मानना है कि एक संघ बनने के लिए जितने भी चीज़ें होनी चाहिए सब यहाँ मौजूद है। जैसे कि – पॉल एप्पलबी का भी मानना है कि यह पूरी तरह से संघीय है।

उच्चतम न्यायालय ने भी 1994 में बोम्मई मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि भारतीय संविधान संघीय है और ये इसकी मूल विशेषता है।

वहीं के. संथानम का कहना है कि भारतीय संविधान एकात्मक हैं क्योंकि वित्तीय मामलों में केंद्र का प्रभुत्व है तथा राज्य हमेशा केन्द्रीय अनुदान पर निर्भर रहता है। इसके साथ ही केंद्र नीति आयोग द्वारा राज्यों के विकास कार्य में भी हस्तक्षेप करता है।

भारत की संघीय व्यवस्था इतना मिश्रित गुणों वाला हैं कि आलोचना तो होगा ही, पर एक बात तो तय है कि भारत की संघीय व्यवस्था को संविधान का मूल ढांचा माना गया है और इसीलिए ये बना रहेगा।

भारतीय संघीय व्यवस्था एक सहकारी संघ व्यवस्था है।

ग्रेनविल ऑस्टिन

यहाँ से पढ़ें – सहकारी संघवाद क्या है?)

कुल मिलाकर ये है भारत की संघीय व्यवस्था (Federal System of India), उम्मीद है समझ में आया होगा। नीचे अन्य लेखों का लिंक है उसे भी जरूर विजिट करें।

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