पंचायती राज का इतिहास एवं विकासक्रम

पंचायती राज का इतिहास एवं विकासक्रम बहुत ही दिलचस्प है क्योंकि भारत में प्राचीन समय से ही पंचायत गाँवों को चलाने का एक व्यवस्थित और प्रामाणिक व्यवस्था रहा है,

ये कितनी कारगर व्यवस्था है ये इस बात से भी पता चलता है कि आज भारत में ये सफलता पूर्वक काम कर रहा है और उम्मीद है आगे भी करेगा।

इस लेख में हम इसी विषय पर सरल और सहज चर्चा करेंगे, एवं इसके विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं को समझने की कोशिश करेंगे।

पंचायती राज का इतिहास

भारत में पंचायती राज का इतिहास एवं विकासक्रम

पंचायती राज स्थानीय स्व-शासन की एक व्यवस्था है और भारत में स्थानीय स्व-शासन की संकल्पना कोई नई नहीं है। वैदिक काल से लेकर ब्रिटिश काल तक ग्रामीण समुदायों ने इस व्यवस्था को जीवंत बनाए रखा। इस समय काल में कई साम्राज्य बने और ध्वस्त हुए, लेकिन इन ग्रामीण समुदायों ने अपने पंचायती अस्तित्व एवं भावना को सदैव कायम रखा। भारत में पंचायती राज के इतिहास को समझने की दृष्टि से 3 कालक्रमों में विभाजित किया जा सकता है:

(1) ब्रिटिश शासन काल के आरंभ से पहले पंचायती राज का इतिहास
(2) ब्रिटिश शासन काल के आरंभ से संविधान लागू होने के मध्य पंचायती राज का इतिहास
(3) संविधान लागू होने के बाद भारत में पंचायती राज का इतिहास। आइये इसे एक-एक कर के समझते हैं –

(1) ब्रिटिश शासन काल के आरंभ से पहले पंचायती राज का इतिहास

वैदिक युग: प्राचीन संस्कृत शास्त्रों में ‘पंचायतन’ शब्द का उल्लेख मिलता है, इसके अलावा ऋग्वेद में सभा एवं समिति जैसे इकाइयों का जिक्र मिलता है। हालांकि उस समय कोई नागरिक प्रशासन की अवधारणा अस्तित्व में नहीं था फिर भी ये इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कमोबेश ये एक लोकतांत्रिक निकाय था।

महाकाव्य युग:  रामायण के अध्ययन से पुर और जनपद (अर्थात् नगर और ग्राम) संकेत मिलता है। इसके अलावा, महाभारत के अनुसार, ग्राम के ऊपर 10, 20, 100 और 1,000 ग्राम समूहों की इकाइयाँ विद्यमान थीं।

जहां ‘ग्रामिक’ ग्राम का मुख्य अधिकारी होता था जबकि ‘दशप’ दस ग्रामों का प्रमुख होता था। विंश्य अधिपति 20, शत ग्राम अध्यक्ष 100 और ग्राम पति 1000 ग्रामों के प्रमुख होते थे। ये लोग अपने ग्रामों की रक्षा के लिये उत्तरदायी थे।

प्राचीन काल: कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ और मनु स्मृति से भी ग्रामों के स्थानीय स्वशासन के पर्याप्त साक्ष्य प्राप्त होते हैं।

मौर्य तथा मौर्योत्तर काल में भी ग्राम का मुखिया वृद्धों की एक परिषद (Council of Elders) की सहायता से ग्रामीण व्यवस्था को चलायमन बनाए रखा जो कि गुप्त काल में भी बना रहा, हालांकि नामकरण में कुछ परिवर्तन हुए; जैसे इस काल में ज़िला अधिकारी को विषयपति और ग्राम के प्रधान को ग्रामपति के रूप में जाना जाता था।

इस प्रकार, प्राचीन भारत में स्थानीय शासन विद्यमान थी जो कि परंपराओं और रीति-रिवाजों के आधार पर संचालित होती थी। पर इस व्यवस्था में महिलाओं की भूमिका संदिग्ध है क्योंकि आमतौर पर साक्ष्य यही बताते हैं कि वैदिक काल के बाद धीरे-धीरे समाज पुरुष प्रधान होता चला गया।

मध्य काल: सल्तनत काल के दौरान दिल्ली के सुल्तानों ने अपने राज्य को प्रांतों में विभाजित किया था जिन्हें  ‘विलायत’ कहा जाता था। जिसे कि अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर पर्याप्त शक्तियाँ प्राप्त थी

यहाँ ग्राम के शासन के लिये तीन महत्त्वपूर्ण अधिकारी होते थे- 
1. प्रशासन के लिये मुकद्दम 
2. राजस्व संग्रह के लिये पटवारी
3. पंचों की सहायता से विवादों के समाधान के लिये चौधरी

मुगल शासन के दौरान सामंतवादी ताकतों के बढ़ने से स्थानीय स्वशासन प्रणाली कमजोर होता गया।

(2) ब्रिटिश शासन काल के आरंभ से संविधान लागू होने के मध्य पंचायती राज का इतिहास

ब्रिटिश काल: ब्रिटिश शासन के अंतर्गत ग्राम पंचायतों की स्वायत्तता समाप्त हो गई और वे कमज़ोर हो गए।

जब अंग्रेज़ भारत आए तो उस समय ग्रामीण शासन पद्धति कायम थी हालांकि स्थिति अच्छी नहीं थी। चार्ल्स मेटकाफ ने इस व्यवस्था की सराहना की और पंचायतों को लघु गणराज्य कहा। अंग्रेजों ने अपने शासन विस्तार के लिए इस ग्रामीण व्यवस्था का खूब इस्तेमाल किया और उसकी स्वायत्ता को खत्म कर दिया, इस तरह के ब्रिटिश हस्तक्षेप के फलस्वरूप पंचायतों के प्रति लोग अपनी आस्था खोने लगे।

वर्ष 1857 के विद्रोह के बाद स्थिति थोड़ी बदलने लगी, शाही राजकोष पर दबाव बढ़ता गया और इस तरह से ब्रिटिश सरकार ने विकेन्द्रीकरण की नीति को अपनाया।

वर्ष 1870 के प्रसिद्ध मेयो प्रस्ताव (Mayo’s resolution) ने स्थानीय संस्थाओं की शक्तियों और उत्तरदायित्वों में वृद्धि कर उनके विकास को गति दी। साथ ही शहरी नगरपालिकाओं में निर्वाचित प्रतिनिधियों की अवधारणा को प्रस्तुत किया गया।

मेयो प्रस्ताव को और आगे बढ़ाते हुए, लॉर्ड रिपन ने वर्ष 1882 में इन स्थानीय संस्थाओं को उनका अत्यंत आवश्यक लोकतांत्रिक ढाँचा प्रदान किया। इसके अलावा 1907 में विकेन्द्रीकरण पर एक रॉयल आयोग का गठन किया गया जिसने 1909 में अपनी रिपोर्ट पेश की और ग्रामीण मुद्दों और स्थानीय कार्यों को ग्राम पंचायत के माध्यम से संचालित किए जाने की सिफ़ारिश की।

वर्ष 1919 के ‘मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार’ ने स्थानीय स्व-शासन के विषय को प्रांतों के अधिकार क्षेत्र में स्थानांतरित कर दिया। इसका अर्थ ये है कि स्थानीय स्व-शासन अब प्रान्तों में भारतीय मंत्रियों के नियंत्रण में था।

संगठनात्मक और राजकोषीय बाधाओं के कारण इसे बड़े पैमाने पर जीवंत संस्था के रूप में परिणत नहीं किया जा सका फिर भी वर्ष 1925 तक आठ प्रांतों ने पंचायत अधिनियमों को पारित कर लिया था और वर्ष 1926 तक छह देशी रियासतों ने पंचायत कानून पारित कर लिया था।

(3) संविधान लागू होने के बाद भारत में पंचायती राज का इतिहास

संविधान के अनुच्छेद 40 में पंचायतों का उल्लेख किया गया और अनुच्छेद 246 के माध्यम से स्थानीय स्वशासन से संबंधित किसी भी विषय के संबंध में कानून बनाने का अधिकार राज्य विधानमंडल को सौंपा गया।

चूँकि अनुच्छेद 40 नीति निदेशक तत्व का हिस्सा है और नीति निदेशक सिद्धांत बाध्यकारी सिद्धांत नहीं होता है, इसीलिए पूरे देश में इन निकायों के लिये सार्वभौमिक या एकसमान संरचना का अभाव रहा।

1947 में आजादी मिलने के साथ ही राज्यों में अन्तरिम सरकार का गठन हुआ। इसके तुरंत बाद सबसे पहले उत्तर प्रदेश में और उसके बाद बिहार में स्थानीय स्वशासन को सशक्त बनाने के लिए बिहार पंचायत राज अधिनियम 1947 लाया गया जिसे कि 1948 में पूरे राज्य में लागू किया गया। पर ये उस तरह का व्यवस्था नहीं था जिसे हम आज जानते है।

अगर आज के संदर्भ में बात करे तो स्थानीय स्व-शासन व्यवस्था ने ग्रामीण विकास की दिशा और दशा बदल के रख दी है, पर स्वतंत्र भारत में इसकी शुरुआत कुछ अच्छी नहीं रही……..ऐसा क्यों? आइये देखते हैं।

बलवंत राय मेहता समिति

ग्रामीण विकास को गति देने के लिए और इसमें लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए 1952 में सामुदायिक विकास कार्यक्रम की शुरुआत की गई। इस कार्यक्रम के सहयोग के लिए 1953 में राष्ट्रीय विस्तार सेवा की शुरुआत की गई।

जनवरी 1957 में भारत सरकार ने इसी सामुदायिक विकास कार्यक्रम 1952 तथा राष्ट्रीय विस्तार सेवा 1953 द्वारा किए कार्यों की जांच और उनके बेहतर ढंग से कार्य करने के लिए उपाय सुझाने के लिए एक समिति का गठन किया। इस समिति के अध्यक्ष बलवंत राय मेहता थे। समिति ने नवम्बर 1957 को अपनी रिपोर्ट सौंपी और लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण की योजना की सिफ़ारिश की जो की अंतिम रूप से पंचायती राज के रूप में जाना गया।

समिति द्वारा दी गई विशिष्ट सिफ़ारिशें इस प्रकार है:-

1. तीन स्तरीय पंचायती राज पद्धति की स्थापना – गाँव स्तर पर ग्राम पंचायत, ब्लॉक स्तर पर पंचायत समिति और जिला स्तर पर जिला परिषद

2. ग्राम पंचायत की स्थापना प्रत्यक्ष रूप से चुने प्रतिनिधियों द्वारा होना चाहिए, जबकि पंचायत समिति और जिला परिषद का गठन अप्रत्यक्ष रूप से चुने सदस्यों द्वारा होनी चाहिए।

3. सभी योजना और विकास के कार्य इन निकायों को सौंपे जाने चाहिए तथा इन निकायों को पर्याप्त स्रोत मिलने चाहिए ताकि ये अपने कार्यों और जिम्मेदारियों को संपादित करने में समर्थ हो सकें।

4. पंचायत समिति को कार्यकारी निकाय तथा जिला परिषद को सलाहकारी, समन्वयकारी और पर्यवेक्षण निकाय होना चाहिए।

5. जिला परिषद का अध्यक्ष, जिलाधिकारी होना चाहिए।

समिति की इन सिफ़ारिशों को राष्ट्रीय विकास परिषद द्वारा जनवरी, 1958 में स्वीकार किया गया। लेकिन परिषद ने कोई एक निश्चित फ़ारमैट तैयार नहीं किया और इसे राज्यों पर छोड़ दिया कि वे जिस तरह से इसे चाहे लागू करें।

◾राजस्थान देश का पहला राज्य था, जहां पंचायती राज की स्थापना हुई। इस योजना का उद्घाटन 2 अक्तूबर 1959 को राजस्थान के नागौर जिले में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा किया गया।

◾इसके बाद अधिकांश राज्यों ने इस योजना को प्रारम्भ किया और 1960 दशक के मध्य तक बहुत से राज्यों ने पंचायती राज संस्थाएं स्थापित भी कर लिया। लेकिन चूंकि केंद्र सरकार ने इसका कोई निश्चित ढांचा नहीं बनाया था इसीलिए राज्यों ने इसे अपने-अपने तरीके से लागू कर दिया।

जैसे कि राजस्थान ने त्रिस्तरीय पद्धति अपनाया, तमिलनाडु ने द्विस्तरीय पद्धति अपनाया और पश्चिमी बंगाल ने चार स्तरीय पद्धति अपनाई।

◾इसके अलावा, राजस्थान आंध्र-प्रदेश पद्धति में पंचायत समिति को शक्तिशाली बनाया गया जबकि महाराष्ट्र, गुजरात पद्धति में, जिला परिषद शक्तिशाली को शक्तिशाली बनाया गया।

अशोक मेहता समिति

दिसम्बर 1977 में, जनता पार्टी की सरकार ने अशोक मेहता की अध्यक्षता में पंचायती राज संस्थाओं पर एक समिति का गठन किया। इसने अगस्त 1978 में अपनी सौंपी और देश में पतनोन्मुख पंचायती राज पद्धति (Panchayati Raj System) को पुनर्जीवित और मजबूत करने हेतु 132 सिफ़ारिशें की।

इसकी कुछ मुख्य सिफ़ारिशें इस प्रकार है:

1. त्रिस्तरीय पंचायती राज पद्धति को द्विस्तरीय पद्धति में बदलना चाहिए। जिला स्तर पर जिला परिषद, और उससे नीचे मण्डल पंचायत (जिसमें 15 हज़ार से 20 हज़ार जनसंख्या वाले गाँव के समूह होने चाहिए)

2. राज्य स्तर से नीचे लोक निरीक्षण में विकेन्द्रीकरण के लिए जिला ही प्रथम बिन्दु होना चाहिए।

3. जिला परिषद कार्यकारी निकाय होना चाहिए और वह राज्य स्तर पर योजना और विकास के लिए जिम्मेदार बनाया जाये।

4. अपने आर्थिक स्रोतों के लिए पंचायती राज संस्थाओं के पास कर लगाने की अनिवार्य शक्ति हो।

5. न्याय पंचायत को इस विकास पंचायत से अलग निकाय के रूप में रखा जाना चाहिए। एक योग्य न्यायाधीश द्वारा इनका सभापतित्व किया जाना चाहिए।

6. पंचायती राज संस्थाओं के मामलों की देख रेख के लिए राज्य मंत्रिपरिषद में एक मंत्री की नियुक्त होनी चाहिए और पंचायती राज भंग होने की स्थिति में छह महीने के भीतर चुनाव करा लिया जाना चाहिए।

7. पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता दी जानी चाहिए। इससे उन्हे उपयुक्त हैसियत के साथ ही सतत सक्रियता का आश्वासन मिलेगा।

उस समय की जनता पार्टी सरकार के भंग होने के कारण, केन्द्रीय स्तर पर अशोक मेहता समिति की सिफ़ारिशें नजरंदाज कर दी गई। फिर भी तीन राज्य कर्नाटक, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश ने अशोक मेहता समिति की सिफ़ारिशों को ध्यान में रखकर पंचायती राज संस्थाओं के पुनरुद्धार के लिए कुछ कदम उठाए।

जी.वी.के. राव समिति

ग्रामीण विकास एवं गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम की समीक्षा करने के लिए योजना आयोग द्वारा 1985 में जी. वी. के. राव की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। इस समय तक पंचायती राज चरमरा सी गई थी इसलिए इन्होने इसे बिना जड़ का घास कहा और पंचायती राज पद्धति को मजबूत और पुनर्जीवित करने हेतु विभिन्न सिफ़ारिशें की, जो कि बहुत हद तक अशोक मेहता के सिफ़ारिशों के ही समान है जैसे –

1. जिला स्तरीय निकाय, अर्थात जिला परिषद को लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण में सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान दिया जाना चाहिए। यह कहा गया कि नियोजन एवं विकास की उचित इकाई जिला है तथा जिला परिषद को उन सभी विकास कार्यक्रमों के प्रबंधन के लिए मुख्य निकाय बनाया जाना चाहिए जो उस स्तर पर संचालित किए जा सकते है।

2. एक जिला विकास आयुक्त (District Development Commissioner) के पद का सृजन किया जाना चाहिए। इसे जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में कार्य करना चाहिए तथा उसे जिला स्तर के सभी विकास विभागों का प्रभारी होना चाहिए।

3. पंचायती राज संस्थाओं में नियमित निर्वाचन होने चाहिए।

एल.एम. सिंघवी समिति

1986 में राजीव गांधी सरकार ने लोकतंत्र व विकास के लिए पंचायती राज संस्थाओं का पुनरुद्धार पर एक अवधारणा पत्र तैयार करने के लिए एक समिति का गठन एल. एम. सिंघवी की अध्यक्षता में किया। इसमें निम्न सिफ़ारिश दी।

1. इन्होने सबसे मुख्य बात पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक रूप से मान्यता देने की करी क्योंकि इसे अब तक संवैधानिक मान्यता नहीं मिला हुआ था। इसने पंचायती राज विकास के नियमित स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव करने के संवैधानिक उपबंध बनाने की सलाह भी दी।

2. गाँव के समूह के लिए न्याय पंचायतों की स्थापना की बात कही।

3. ग्राम पंचायतों को ज्यादा व्यवहारिक बनाने के लिए गाँव का पुनर्गठन किया जाना। इसमें ग्राम सभा की महत्ता पर भी ज़ोर दिया तथा इसे प्रत्यक्ष लोकतंत्र की मूर्ति बताया।

4. गाँव की पंचायतों को ज्यादा आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराये जाने चाहिए।

थुंगन समिति

1988 में, संसद की सलाहकार समिति की एक उप समिति पी. के. थुंगन की अध्यक्षता में राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचे की जांच करने के उद्देश्य से गठित की गई। इस समिति में पंचायती राज व्यवस्था (Panchayati Raj System) को मजबूत बनाने के लिए सुझाव दिया। इस समिति ने निम्न अनुशंसाएँ की थी:

1. इन्होने भी पंचायती राज्य संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता की बात कही।
2. इन्होने गाँव, प्रखंड तथा जिला स्तरों पर त्रि-स्तरीय पंचायती राज को उपयुक्त बताया
3. जिला परिषद को पंचायती राज व्यवस्था की धुरी होना चाहिए और जिला परिषद का मुख्य कार्यकारी पदाधिकारी जिले के कलक्टर को बनाया जाना चाहिए।
4. पंचायती राज संस्थाओं का पाँच वर्ष का निश्चित कार्यकाल होनी चाहिए।
5. पंचायती राज पर केन्द्रित विषयों की एक विस्तृत सूची तैयार करनी चाहिए तथा उसे संविधान में समाहित करना चाहिए
6. पंचायती राज के तीनों स्तरों पर जनसंख्या के हिसाब से आरक्षण होनी चाहिए। महिलाओं के लिए भी आरक्षण होनी चाहिए।
7. हर राज्य में एक राज्य वित्त आयोग का गठन होना चाहिए। यह आयोग पंचायती राज संस्थाओं को वित्त के वितरण के पात्रता-बिन्दु तथा विधियाँ तय करेगा।

गाडगिल समिति

1988 में वी. एन. गाडगिल की अध्यक्षता में एक नीति एंव कार्यक्रम समिति का गठन काँग्रेस पार्टी ने किया था। इस समिति से इस प्रश्न पर विचार करने के लिए कहा गया कि पंचायती राज संस्थाओं (Panchayati Raj System) को प्रभावकारी कैसे बनाया जा सकता। इस समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में वहीं बातें दोहराई जैसे कि-

1. पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिया जाए।
2. गाँव, प्रखंड तथा जिला स्तर पर त्रि- स्तरीय पंचायती राज होना चाहिए।
3. पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल पाँच वर्ष सुनिश्चित कर दिया जाए इत्यादि।

गाडगिल समिति की ये अनुशंसाएँ एक संशोधन विधेयक के निर्माण का आधार बनी। इस विधेयक का लक्ष्य था – पंचायती राज संस्थाओं (Panchayati Raj System) को संवैधानिक दर्जा तथा सुरक्षा देना। पंचायती राज का संवैधानिकरण कैसे हुआ आइये इसे जानते हैं।

पंचायती राज का संवैधानिकरण

राजीव गांधी सरकार: राजीव गांधी सरकार ने पंचायती राज संस्थाओं के संवैधानिकरण और उन्हे ज्यादा शक्तिशाली और व्यापक बनाने हेतु जुलाई 1989 में 64वां संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश किया।

हालांकि अगस्त 1989 में लोकसभा ने यह विधेयक पारित किया, किन्तु राज्यसभा द्वारा इसे पारित नहीं किया गया। इस विधेयक का विपक्ष द्वारा जोरदार विरोध किया गया क्योंकि इसके द्वारा संघीय व्यवस्था में केंद्र को मजबूत बनाने का प्रावधान था।

वी.पी.सिंह सरकार: नवम्बर 1989 में वी पी सिंह के प्रधानमंत्रित्व में राष्ट्रीय मोर्चा सरकार ने कार्यालय संभाला और वी पी सिंह की अध्यक्षता में राज्यों के मुख्यमंत्रियों का 2 दिन का सम्मेलन हुआ। सम्मेलन में एक नए संविधान संशोधन विधेयक को पेश करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। परिणामस्वरूप सितंबर 1990 में लोकसभा में एक संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तुत किया गया। लेकिन सरकार के गिरने के साथ ही यह विधेयक भी समाप्त हो गया।

नरसिम्हा राव सरकार: नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्रित्व में काँग्रेस सरकार ने एक बार फिर पंचायती राज के संवैधानिकरण के मामले पर विचार किया। इसने प्रारम्भ के विवादास्पद प्रावधानों को हटाकर नया प्रस्ताव रखा और सितंबर 1991 को लोकसभा में एक संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तुत किया। अंततः यह विधेयक 73वें संविधान संशोधन अधिनियम 1992 के रूप में पारित हुआ और 24 अप्रैल 1993 को प्रभाव में आया।

आज भारत में पंचायती राज (Panchayati raj) की जो व्यवस्था है वो इसी अधिनियम – ”73वां संविधान संशोधन अधिनियम 1992” के तहत है। ये काफी दिलचस्प टॉपिक है, इसे हम अगले लेख में समझेंगे। लिंक नीचे है उसे जरूर समझें।

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Article Based On,
भारत की राजव्यवस्था↗️
मूल संविधान
पंचायत प्रशिक्षण पुस्तिका बिहार,
https://www.panchayat.gov.in/web/guest/home
पंचायती राज उत्तरप्रदेश आदि।

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