State Legislature (राज्य विधानमंडल: गठन, कार्य, आदि)

इस लेख में हम राज्य विधानमंडल (State Legislature) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे तथा इसके गठन, कार्य, विशेषाधिकार आदि को समझेंगे।
State Legislature

राज्य विधानमंडल एक तरह से संसद की ही प्रतिकृति है, इसीलिए अगर आपको ↗️संसद (Parliament) की अच्छी समझ है तो आप इसे आसानी से समझ जाएँगे।

State Legislature in Hindi

जिस प्रकार संसद की भूमिका देश की राजनीतिक व्यवस्था में है, लगभग उसी प्रकार की भूमिका राज्य की राजनीतिक व्यवस्था में विधानमंडल की होती है।

संविधान के छठे भाग में अनुच्छेद 168 से 212 तक राज्य विधानमण्डल की गठन, कार्यकाल, अधिकारियों, प्रक्रियाओं, विशेषाधिकार तथा शक्तियों आदि के बारे में बताया गया है। हालांकि ये सारी चीज़ें है तो संसद की तरह ही पर इसमें कुछ विभेद पाया जाता है। क्या है वो विभेद आइये देखते हैं।

राज्य विधानमंडल का गठन
(Formation of State Legislature)

जैसे कि संसद की बात करें तो वहाँ दो सदन होते हैं (राज्यसभा और लोकसभा)। लेकिन राज्य विधानमण्डल के गठन में कोई एकरूपता नहीं है। किसी राज्य में सिर्फ एकसदनीय व्यवस्था है तो किसी राज्य में द्विसदनीय व्यवस्था। यानी कि किसी राज्य में विधानसभा और विधानपरिषद दोनों होते हैं जबकि कुछ राज्यों में सिर्फ विधानसभा होते हैं।

वर्तमान के सात राज्यों (आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक) को छोड़ दे जहां कि द्विसदनीय व्यवस्था है तो बाकी के जितने भी राज्य है सब में एक सदनीय व्यवस्था ही है।

जिन राज्यों में एक सदनीय व्यवस्था है वहाँ राज्य विधानमंडल में राज्यपाल एवं विधानसभा शामिल होते हैं। और जिन राज्यों में द्विसदनीय व्यवस्था है, वहाँ विधानमंडल में राज्यपाल, विधानसभा और साथ में विधानपरिषद भी शामिल होते हैं। विधानपरिषद को उच्च सदन कहा जाता है, जबकि विधानसभा निचला सदन।

संविधान सभा ने विधानपरिषद कॉन्सेप्ट की आलोचना करते हुए कहा था कि विधानपरिषद विधानमंडल के विधायी कार्य को विलंब करेगा और ये राज्य का खर्चा भी बढ़ाएगा। इसीलिए इसे एक वैकल्पिक व्यवस्था बनाया गया।

यानी कि यदि किसी राज्य को विधानपरिषद की स्थापना या गठन करना है तो राज्य अपनी इच्छा व आर्थिक स्थिति का ध्यान रख कर ऐसा कर सकता है। उदाहरण के लिए आंध्र प्रदेश ने 1957 में विधानपरिषद का गठन किया और उसी तरह 1985 में इसे समाप्त कर दिया गया। पुनः 2007 में आंध्र प्रदेश में विधान परिषद को पुनर्जीवित किया गया। इसी प्रकार तमिलनाडु ने विधानपरिषद को 1986 में समाप्त कर दिया गया।

संविधान ने संसद को यह अधिकार दिया है कि वो राज्य विधानपरिषद का गठन एवं विघटन कर सकती है। कैसे? यदि किसी राज्य को विधानपरिषद चाहिए या अगर किसी राज्य में विधानपरिषद पहले से है और वो उसे हटाना चाहता है तो उस राज्य के विधान सभा को इस संबंधी में एक संकल्प पारित करना होगा। इस तरह का कोई विशेष प्रस्ताव राज्य विधानसभा द्वारा पूर्ण बहुमत से पारित होना जरूरी होता है। यानी कि ये बहुमत कुल मतों एवं उपस्थित सदस्यों के दो तिहाई से कम नहीं होना चाहिए।

⚫इस तरह की जो कार्यवाही होती है उसे अनुच्छेद 368 के तहत संविधान संशोधन नहीं माना जाता है, यानी कि ये बस एक सामान्य विधान की तरह पारित किया किया जाता है।

राज्य विधानमंडल की सदस्यता
(Membership of State Legislature)

1. अर्हताएँ (Qualifications)

कोई व्यक्ति विधानमंडल का सदस्य का सदस्य तभी चुना जा सकता है जब संविधान द्वारा उल्लिखित निम्न अर्हताओं को वो पूरा करता हो। 1. उसे भारत का नागरिक होना चाहिए। 2. उसे चुनाव आयोग द्वारा अधिकृत किसी व्यक्ति के समक्ष शपथ लेनी पड़ती है, जिसमे वह संकल्प करता है कि (1) वह भारत के संविधान के प्रति सच्ची निष्ठा रखेगा, तथा, (2) भारत की संप्रभुता एवं अखंडता को अक्षुण्ण रखेगा।

3. उसकी आयु विधानसभा के स्थान के लिए कम से कम 25 वर्ष और विधानपरिषद के स्थान के लिए कम से कम 30 वर्ष होनी चाहिए।

4. उसमें संसद द्वारा निर्धारित अन्य अर्हताएँ भी होनी चाहिए, जैसे कि – जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के तहत सदन ने निम्नलिखित अतिरिक्त अर्हताओं का निर्धारण किया है :-

(1) विधानपरिषद में निर्वाचित होने वाला व्यक्ति विधानसभा का निर्वाचक होने की अर्हता रखता हो और उसमें राज्यपाल द्वारा नामित होने के लिए संबन्धित राज्य का निवासी होना चाहिए।

(2) अनुसूचित जाति / जनजाति का सदस्य होना चाहिए यदि वह अनुसूचित जाति / जनजाति की सीट के लिए चुनाव लड़ता है। हालांकि अनुसूचित जाति या जनजाति का सदस्य उस सीट के लिए भी चुनाव लड़ सकता है, जो उसके लिए आरक्षित न हो।

2. निरर्हताएं (Disqualification)

संविधान के अनुसार, कोई व्यक्ति राज्य विधानपरिषद या विधानसभा के लिए नहीं चुना जा सकता, 1. यदि वह केंद्र या राज्य सरकार के तहत किसी लाभ के पद पर है 2. यदि वह विकृत चित्त है और सक्षम न्यायालय की ऐसी घोषणा विद्यमान है। 3. यदि वह घोषित दिवालिया हो। 4. यदि वह भारत का नागरिक न हो या उसने विदेश में कहीं नागरिकता स्वेछा से अर्जित कर ली हो या वह किसी विशेषी राज्य के प्रति निष्ठा रखता हो 5. यदि संसद द्वारा निर्मित किसी विधि द्वारा या उसके अधीन निरर्हित कर दिया जाता है।

जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के तहत संसद ने कुछ अतिरिक्त निरर्हताएं निर्धारित की है, 1. वह चुनाव में किसी प्रकार के भ्रष्ट आचरण अथवा चुनावी अपराध का दोषी नहीं पाया गया हो। 2. उसे किसी ऐसे अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया गया हो जिसके लिए उसे दो या अधिक वर्षों कि कैद की सजा मिली हो। लेकिन किसी व्यक्ति का किसी निरोधात्मक कानून के अंतर्गत निरुद्ध करना अयोग्यता नहीं मानी जाएगी।

3. वह निर्धारित समय सीमा के अंदर चुनावी खर्च संबन्धित विवरण प्रस्तुत करने में विफल नहीं रहा हो। 4. उसका किसी सरकारी ठेके, कार्य अथवा सेवाओं में कोई रुचि नहीं हो। 5. वह किसी ऐसे निगम में लाभ के पद पर कार्यरत नहीं हो अथवा उसका निदेशक या प्रबंधकीय एजेंट नहीं हो, जिसमें सरकार की कम से कम 25 हिस्सेदारी हो। 6. वह भ्रष्टाचार अथवा सरकार के प्रति विश्वासघात के कारण सरकारी सेवा हटाया गया हो। 7. उसे विभिन्न समूहों के बीच वैमनष्य बढ़ाने अथवा घूसखोरी के अपराध में दोषी नहीं ठहराया गया हो। 8. उसे अश्लीलता, दहेज तथा सती प्रथा आदि जैसे सामाजिक अपराधों में संलिप्तता अथवा इन्हे बढ़ावा देने के लिए दंडित नहीं किया गया हो।

उपरोक्त निरहरताओं के संबंध मेन किसी सदस्य के प्रति यदि प्रश्न उठे तो राज्यपाल का निर्णय अंतिम होगा। हालांकि इस मामले में वह चुनाव आयोग की सलाह लेकर काम करता है।

दल-बदल के आधार पर निरर्हता

संविधान के दसवीं अनुसूची के तहत यदि कोई व्यक्ति दल-परिवर्तन के आधार पर निरर्ह होता है तो वह राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन की सदस्यता के लिए निरर्ह रहेगा।

इस तरह के मामलों का निपटारा विधानसभा में अध्यक्ष और विधानपरिषद में सभापति करता है। हालांकि इनके द्वारा लिया गया फैसला न्यायिक समीक्षा की परिधि में आता है। (1992 से)

3. शपथ (Oath)

विधानमण्डल के प्रत्येक सदन का प्रत्येक सदस्य सदन में सीट ग्रहण करने से पहले राज्यपाल या उसके द्वारा इस कार्य के लिए नियुक्त व्यक्ति के समक्ष शपथ लेगा।

इस शपथ में विधानमण्डल का सदस्य प्रतिज्ञा करता है कि वह, 1. भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखेगा। 2. भारत की प्रभुता व अखंडता को अक्षुण्ण रखेगा। 3. प्रदत कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक निर्वहन करेगा।

बिना शपथ लिए कोई भी सदस्य सदन में न तो मत दे सकता है और न ही कार्यवाही में भाग ले सकता है। अगर कोई व्यक्ति ऐसा करता है तो उस पर प्रतिदिन पाँच सौ रुपए जुर्माना लगेगा।

4. स्थानों का रिक्त होना

निम्नलिखित मामलों में विधानमंडल का सदस्य पद छोड़ता है/छोड़ना पड़ता है।

1. दोहरी सदस्यता : एक व्यक्ति एक समय में विधानमंडल के दोनों सदनों का सदस्य नहीं हो सकता। यदि कोई व्यक्ति दोनों सदनों के लिए निर्वाचित होता है तो राज्य विधानमंडल द्वारा निर्मित विधि के उपबंधों के तहत एक सदन से उसकी सीट रिक्त हो जाएगी।

2. निरर्हता : राज्य विधानमण्डल का कोई सदस्य यदि निरर्ह पाया जाता है, तो उसका पद रिक्त हो जाएगा।

3. त्यागपत्र : कोई सदस्य अपना लिखित इस्तीफा विधान परिषद के मामले में सभापति और विधानसभा के मामले में अध्यक्ष को दे सकता है। त्यागपत्र स्वीकार होने पर उसका पद रिक्त हो जाएगा।

4. अनुपस्थिति : यदि कोई सदस्य बिना पूर्व अनुमति के 60 दिनों तक बैठकों से अनुपस्थित रहता है तो सदन उसके पद को रिक्त घोषित कर सकता है।

5. अन्य मामले : किसी सदस्य का पद रिक्त हो सकता है:- (1) यदि न्यायालय द्वारा उसके निर्वाचन को अमान्य ठहरा दिया जाये, (2) यदि उसे सदन से निष्काषित कर दिया जाये, (3) यदि वह राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के पद पर निर्वाचित हो जाये और (4) यदि वह किसी राज्य का राज्यपाल निर्वाचित हो जाये।

विधानमंडल के पीठासीन अधिकारी
(Presiding Officer of State Legislature)

राज्य विधानमण्डल के प्रत्येक सदन का अपना पीठासीन अधिकारी होता है। विधानसभा के लिए अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष और विधान परिषद के लिए सभापति एवं उप सभापति होते हैं। विधानसभा के लिए सभापति का पैनल एवं विधान परिषद के लिए उपसभाध्यक्ष का पैनल भी नियुक्त होता है। इस विषय पर एक अलग से एक लेख उपलब्ध है आप उसे जरूर पढ़ें। यहाँ से पढ़ें

कोरम (गणपूर्ति) : किसी भी कार्य को करने के लिए उपस्थित सदस्यों की एक न्यूनतम संख्या को कोरम कहते हैं। यह सदन में कुल सदस्यों का दसवां हिस्सा होता है। यदि सदन की बैठक के दौरान कोरम न हो तो यह पीठासीन अधिकारी का कर्तव्य है की सदन को स्थगित करे या कोरम पूरा होने तक सदन को स्थगित रखे।

सदन में मतदान : किसी भी सदन की बैठक में सभी मामलों को उपस्थित सदस्यों के बहुमत के आधार पर तय किया जाता है और इसमें पीठासीन अधिकारी का मत सम्मिलित नहीं होता है। कुछ मामले जिन्हे विशेष रूप से संविधान में तय किया गया है, जैसे : विधानसभा अध्यक्ष को हटाना या विधान परिषद के सभापति को हटाना इनमें सामान्य बहुमत की बजाय विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। पीठासीन अधिकारी सामान्य स्थिति में मत नहीं द सकते, लेकिन बराबर मतों की स्थिति में निर्णायक मत दे सकते हैं।

मंत्रियों एवं महाधिवक्ता के अधिकार

सदन का सदस्य होने के नाते प्रत्येक मंत्री एंव महाधिवक्ता को यह अधिकार है कि वह सदन की कार्यावही में भाग ले, बोले एवं सदन से सम्बद्ध समिति जिसके लिए वह सदस्य रूप में नामित है, वोट देने के अधिकार के बिना भी भाग ले। संविधान के इस उपबंध के लिए दो कारण है: 1. एक मंत्री उस सदन की कार्यवाही में भी भाग ले सकता है जिसका वह सदस्य नहीं है। 2. एक मंत्री जो सदन का सदस्य नहीं है, दोनों सदनों की कार्यवाही में भाग ले सकता है।

राज्य विधानमंडल के विशेषाधिकार
(Privileges of State Legislature)

राज्य विधानमंडल के विशेषाधिकार राज्य विधानमंडल के सदनों, इसकी समितियों और इसके सदस्यों को मिलने वाले विशेष अधिकारों, उन्मुक्तियों और छूटों का योग है। ये इनकी कार्यवाहियों की स्वतंत्रता और प्रभाविता को सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य है। इन विशेषाधिकारों के बिना सदन न तो अपना प्राधिकार, मर्यादा और सम्मान अनुरक्षित रख सकते है और न ही अपने सदस्यों को उनके विधायी उत्तरदायित्वों के निर्वहन में किसी बढ़ा से सुरक्षा प्रदान कर सकते।

संविधान ने राज्य विधानमंडल के विधेषाधिकारों को उन व्यक्तियों को भी विस्तारित किया है, जो राज्य विधानमंडल के सदन या इसकी किसी समिति की कार्यवाहियों में बोलने और भाषा लेने के लिए अधिकृति है। इसमें राज्य के महाधिवक्ता और राज्य मंत्री सम्मिलित हैं।

यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि राज्य विधानमंडल के विशेषाधिकार राज्यपाल को प्राप्त नहीं होते हैं, जोकि राज्य विधानमंडल का अभिन्न अंग है।

राज्य विधानमंडल के विशेषाधिकारों को दो मुख्य श्रेणियों में बांटा जा सकता है – एक जिन्हे राज्य विधानमंडल के प्रत्येक सदन द्वारा संयुक्त रूप से प्राप्त क्यी जाता है और दूसरे जिन्हे सदस्य व्यक्तिगत रूप से प्राप्त करते है।

सामूहिक विशेषाधिकार (Collective privilege)

प्रत्येक सदन को मिलने वाले सामूहिक विधानमंडलीय विशेषाधिकार इस प्रकार है:

1. इसे यह अधिकार है कि यह अपने प्रतिवेदनों वाद-विवादों और कार्यवाहियों को प्रकाशित करे और यह अधिकार भी है कि अन्यों को इसके प्रकाशन से प्रतिबंधित करे।

2. यह अपरिचितों को इसकी कार्यवाहियों से अपवर्जित कर सकती है और कुछ महत्वपूर्ण मामलों में गुप्त बैठक कर सकती है।
3. यह अपने प्रक्रिया और कार्य संचालन नियमों में विनियमित कर सकती है और ऐसी मामलों पर निर्णय ले सकती है।
4. यह भर्त्सना, फटकार या कारावास द्वारा विशेषाधिकारों के उल्लंघन या सभा की अवमानना के लिए सदस्यों सहित बाह्य व्यक्तियों को दंडित कर सकती है। अपने सदस्यों को यह निलंबित या निष्काषित भी कर सकते हैं।
5. इसे सदस्य के पकड़े जाने, गिरफ्तार होने दोषसिद्ध कारावास और छोड़े जाने के संबंध में तत्काल सूचना प्राप्त करने का अधिकार है।
6. यह जांच प्रारम्भ कर सकती है और साक्षियों को उपस्थित होने का आदेश दे सकती है और संगत पत्रों और रिकार्डों को भेज सकती है।
7. न्यायालय सभा या इसकी समितियों की जांच नहीं कर सकती
8. पीठासीन अधिकारी की अनुमति के बिना किसी व्यक्ति को गिरफ्तार और कसी विधिक प्रक्रिया को को सभा परिसर में नहीं किया जा सकता।

व्यक्तिगत विशेषाधिकार (Personal privilege)

सदस्य को मिलने वाले व्यक्तिगत विशेषाधिकार इस तरह है: 1. उन्हे सदन चलने के 40 दिन पहले और 40 दिन बाद तक गिरफ्तार नहीं किया जा सकता । यह छूट केवल सिविल मामले में है, आपराधिक या प्रतिबंधिक निषेध मामले में नहीं।

2. राज्य विधानमंडल में उन्हे बोनले की स्वतंत्रता है। उसके द्वार किसी कार्यवाही या समिति में दिये गए मत या विचार को किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है। यह स्वतंत्रता संविधान के उपबंधों और राज्य विधानमंडल की प्रक्रिया का विनियमन करने के लिए नियमों और स्थायी आदेशों के अनुरूप है। 3. वे न्यायिक सेवाओं से मुक्त होते हैं। जब सदन चल रहा हो, वे साक्ष्य देने या किसी मामले में बतौर गवाह उपस्थित होने से इंकार कर सकता है।

तो ये रहा राज्य विधानमंडल (State Legislature) के बारे में कुछ आधारभूत बातें, आपने देखा होगा कि ये संसद के समान ही है। इससे संबन्धित कुछ अन्य लेख भी है जो नीचे दिये गए है, उसे भी पढ़ें।

⚫⚫⚫

State Legislature
⏬Download PDF

State Legislature Related Articles⬇️

विधानसभा और विधानपरिषद
State Legislative Procedure

Follow me on….

अन्य बेहतरीन लेख⬇️

Indian Parliament in hindi
एंटी ऑक्सीडेंट

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *