संविधान निर्माण की कहानी । Story of making of Constitution

इस लेख में हम संविधान निर्माण की कहानी को जानेंगे और इसी के माध्यम से इसके महत्वपूर्ण पक्षों को भी एक्सप्लोर करेंगे, तो लेख को अंत तक जरूर पढ़ें।
संविधान निर्माण

संविधान निर्माण : एक परिचय
(Constitution making: an introduction)

भारतीय संविधान और संविधान निर्माण की कहानी अपने आप में विलक्षण है; जहां कई देशों को कई बार अपना संविधान बनाना पड़ा, वहीं कई देशों को संविधान बनाने के बाद जनमत संग्रह करवाना पड़ा ये देखने के लिए कि लोग इसे स्वीकार कर रहें हैं या नहीं।

पर भारतीय संविधान के साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ क्योंकि पहली बात तो भारतीय संविधान को जिन लोगों ने बनाया उनमें समाज का पहले से ही अटूट विश्वास था।

दूसरी बात ये कि संविधान निर्माण के समय किसी प्रावधान को संविधान का हिस्सा बनाने के लिए वोटिंग का सहारा नहीं लिया गया बल्कि आपसी सहमति से इस प्रकार के समस्याओं को सुलझाया गया।

और आपसी सहमति बनाना कितना मुश्किल रहा होगा ये बात आप इससे समझ सकते हैं कि संविधान सभा के कुछ महत्वपूर्ण सदस्यों के बीच आपस में बनती तक नहीं थी।

जैसे कि डॉ भीमराव अंबेडकर को काँग्रेस पसंद नहीं था, वहीं पंडित नेहरू को डॉ राजेंद्र प्रसाद पसंद नहीं था। पर ये काबिले तारीफ ही थी कि इस सब के बावजूद भी सहमति बना ली जाती थी। वैसे भी जिस संविधान को बनने में लगभग 3 साल लग गये हो, उस संविधान के बनने की कहानी दिलचस्प तो होगी ही। है कि नहीं।

संविधान निर्माण कैसे हुआ, इससे पहले ये जानना जरूरी है कि संविधान होता क्या है? आखिर इसका उद्देश्य क्या होता है? किसी देश के लिए संविधान जरूरी ही क्यों होता है?

आइये पहले संविधान के बेसिक्स को समझ लेते हैं ताकि हमारे दिमाग में संविधान की अहमियत और उसकी प्रासंगिकता स्पष्ट हो सकें।

संविधान क्या है?
(What is constitution?)

संविधान यानी कि श्रेष्ठ विधान; ये एक ऐसा दस्तावेज़ है जो व्यक्ति और राज्य के बीच सम्बन्धों को स्पष्ट करता है।

दूसरे शब्दों में, एक लोकतांत्रिक देश में व्यक्ति स्वतंत्रता का प्रतीक होता है या यूं कहें कि लोकतंत्र की अवधारणा ही इसी बात पर टिकी हुई है कि व्यक्ति स्वतंत्र रहें।

वहीं दूसरी ओर राज्य शक्ति का प्रतीक होता है यानी कि देश को चलाने के लिए सारी की सारी आवश्यक शक्तियाँ राज्य के पास होती है।

ऐसे में राज्य अपनी शक्तियों का गलत उपयोग न करें और व्यक्ति अपनी आजादी का गलत उपयोग न करें, इन्ही दोनों में संतुलन स्थापित करने के लिए जो दस्तावेज़ बनाए जाते हैं, वही संविधान है।

संविधान का उद्देश्य
(Purpose of constitution)

◼ राज्य की संरचना कैसी होगी, ◼ सरकार की प्रकृति कैसी होगी, ◼ शक्तियों का बंटवारा कैसे होगा, ◼ सरकार के अधिकार और कार्य तथा व्यक्ति के अधिकार और स्वतंत्रता क्या होगी, ◼ व्यक्ति और सरकार के बीच संबंध कैसा होगा, ◼ हम किस प्रकार के राज्य की स्थापना करना चाहते हैं इत्यादि संविधान के कुछ प्रमुख उद्देश्य हैं।

अब आते हैं संविधान निर्माण पर कि संविधान कैसे अस्तित्व में आया। संविधान निर्माण को समझने की दृष्टि से पाँच भागों में बाँट सकते हैं। 

संविधान निर्माण के पाँच चरण
(Five steps of constitution formation)

1. संविधान सभा गठन के पूर्व की स्थिति
2. प्रारम्भिक संविधान सभा का गठन 
3. गुलाम भारत के संविधान सभा की पहली कार्यवाही 
4. संविधान निर्माण और पंडित नेहरू का उद्देश्य प्रस्ताव
5. आजाद भारत का संविधान सभा

1.संविधान सभा गठन के पूर्व की स्थिति

संविधान निर्माण के लिए 1946 में एक संविधान सभा का गठन किया गया था। इसी संविधान सभा ने संविधान निर्माण को उसकी परिणति तक पहुंचाया था।

पर संविधान सभा का गठन कैसे हुआ ये समझने के लिए पहले के उन महत्वपूर्ण घटनाओं को समझना जरूरी है जिसके फलस्वरूप संविधान सभा अस्तित्व में आया। तो आइये देखते है वो क्या हैं। 

सर्वप्रथम 1922 में, महात्मा गांधी ने ये विचार रखा था कि भारतीयों के लिए एक संविधान होनी चाहिए। हालांकि ब्रिटिश सरकार 1919 में एक ऐसे दस्तावेज़ की नीव रख चुकी थी जिसमें ब्रिटिश भारत को चलाने के लिए नियम-क़ानूनों का संकलन था। पर एक महत्वपूर्ण चीज़ जो उसमें नहीं थी वो थी आजादी।

इसके बाद भी इस संबंध में कई बाते हुई पर 1934 में एक साम्यवादी नेता एम एन रॉय द्वारा एक संविधान निर्माण की बात कही गयी। इसके बाद धीरे-धीरे ये एक ज्वलंत मुद्दा बन गया।

हालांकि ब्रिटिश सरकार ने 1935 में भारत शासन अधिनियम के अंतर्गत एक ऐसी विस्तृत दस्तावेज़ पेश किया जो बिलकुल संविधान जैसा था। इसमें 321 धाराएँ और 10 अनुसूचियाँ थी। पर वहीं बात कि ये एक स्वतंत्र भारत का संविधान नहीं था।

हाँ वो बात अलग है कि हमारे वर्तमान संविधान में बहुत सारे प्रावधान इसी से लिए गए हैं। कुछ लोगों का तो यहाँ तक मानना है कि ये उसी का फोटो कॉपी है।

जो भी हो, आखिरकार 1938 में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने एक घोषणा की कि स्वतंत्र भारत के संविधान का निर्माण वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनी गयी संविधान सभा द्वारा होगी। 

एक तो उस समय ब्रिटिश सरकार द्वितीय विश्व युद्ध में रत था और दूसरी बात कि क्षेत्रीय स्तर पर भी कई प्रकार के आंदोलनों और आजादी की मांग करने वालों की स्थिति मजबूत होते देख ब्रिटिश सरकार ये स्वीकार करने लगी कि अब ज्यादा दिन तक औपनिवेशिक सत्ता कायम रखना बहुत ही ज्यादा मुश्किल है।

तो ऐसी स्थिति में जैसे ही पंडित नेहरू की बात ब्रिटिश सरकार तक पहुंची, उन्होने 1940 में इस प्रस्ताव को सैद्धांतिक तौर पर मान ली, और इसे अगस्त प्रस्ताव कहा गया।

ब्रिटिश सरकार ने संविधान निर्माण का एक प्रारूप तैयार किया और सन 1942 में उसे स्टाफोर्ड क्रिप्स के हाथों भारत भेजा। दरअसल ब्रिटिश सरकार ने सोचा था कि किसी जैसे ही विश्व युद्ध खत्म होगा, संविधान सभा बना दी जाएगी, पर मुस्लिम लीग ने इसे मानने से इंकार कर दिया।

क्योंकि मुस्लिम लीग भारत का विभाजन चाहते थे और अपनी बात पर अड़े थे कि हमरा पाकिस्तान चाही। तो मुस्लिम लीग को मनाने के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा फिर से एक प्रतिनिधिमंडल भेजा गया जिसे कैबिनेट मिशन के नाम से जाना जाता है।

इन्होंने मुस्लिम लीग को किसी तरह से समझा बुझा लिया। और एक तरह से संविधान बनने का रास्ता साफ हो गया। 

2. प्रारम्भिक संविधान सभा का गठन 

संविधान निर्माण के लिए एक संविधान सभा (Constituent Assembly) का होना जरूरी था। और ये संविधान सभा का गठन ब्रिटिश सरकार द्वारा बताए गये तरीकों के आधार पर होना था। 

ब्रिटिश सरकार ने संविधान सभा के निर्माण के लिए कुछ तरीके बताए गए थे। उसमें से कुछ निम्नलिखित है।

🧿 संविधान सभा में कुल सदस्य संख्या 389 आवंटित किया गया था। जिसमें से 93 सीटें देशी रियासतों और 296 सीटें ब्रिटिश भारत के लिए आवंटित किए गए थे। 

🧿 ये सीटें जनसंख्या के अनुपात में आवंटित की जानी थी मोटे तौर पर प्रत्येक 10 लाख लोगों पर 1 सीट की व्यवस्था की गयी थी। 

🧿 संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव उसी के समुदाय द्वारा उसी के प्रांतीय असेंबेली में किया जाना था। और देशी रियासतों के प्रतिनिधि का चुनाव रियासत प्रमुखों द्वारा किया जाना था। 

🔷संविधान सभा के लिए चुनाव

1946 के जुलाई-अगस्त में चुनाव सम्पन्न हुआ। 296 सीटों में से 208 सीटें भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस को, 73 सीटें मुस्लिम लीग को और और बची सीटें निर्दलीय उम्मीदवारों को मिला ।

देशी रियासतों ने इसका बहिष्कार कर दिया और इसमें हिस्सा नहीं लिया यानी कि अपने प्रतिनिधि को उनलोगों ने नहीं भेजा। 

3. गुलाम भारत के संविधान सभा की पहली कार्यवाही 

इसे गुलाम भारत के संविधान सभा इसीलिए कहा जाता है क्योंकि उस समय देश आजाद नहीं हुआ था और देशी रियासतों ने तो संविधान सभा का पहले ही बहिष्कार कर रखा था और अब मुस्लिम लीग ने भी इसका बहिष्कार कर दिया।

लॉर्ड माउंटबेटन जो कि उस समय भारत के वायसराय थे, उन्होने भी सोचा कि अब मुस्लिम लीग नामक इस बीबी को मानना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है तो उन्होने इसे तलाक दे दिया।

इसी के कारण जब 9 दिसम्बर 1946 को संविधान सभा की पहली बैठक हुई तो इसमें मात्र 211 सदस्यों ने हिस्सा लिया।

इसके बावजूद भी संविधान सभा ने उसी सदस्यों के साथ बैठक की और डॉ राजेंद्र प्रसाद को संविधान सभा का अध्यक्ष बना दिया गया। 

4. संविधान निर्माण और पंडित नेहरू का उद्देश्य प्रस्ताव

इसके ठीक चार दिन बाद 13 दिसम्बर 1946 को पंडित नेहरू ने ऐतिहासिक उद्देश्य प्रस्ताव को पढ़ा।

ये एक प्रस्तावना की तरह ही था। ग़ौरतलब कि आज के प्रस्तावना में बहुत सारी बातों को उसी में से लिया गया है। इस उद्देश्य प्रस्ताव में इस बात को रेखांकित किया गया कि हमारा भावी संविधान कैसा होगा और उस से संचालित देश कैसा होगा।  

इसमें कही गयी कुछ बातें बहुत महत्वपूर्ण है। जैसे कि –  

🧿 यह संविधान सभा भारत को एक स्वतंत्र, संप्रभु गणराज्य घोषित करती है और अपने भविष्य के प्रशासन के लिए संविधान के निर्माण की घोषणा करती है। (हालांकि उस समय तक भारत आजाद नहीं हुआ था।) 

🧿 ब्रिटिश भारत में शामिल सभी क्षेत्र तथा भारत के बाहर के कोई क्षेत्र जो इसमें शामिल होना चाहेंगे वे इस संघ का हिस्सा होंगे।

🧿 संप्रभु राज्य के सभी शक्तियों का स्रोत इसकी जनता होंगी। यानी कि जनता सर्वोपरि होगी।

🧿 भारत के सभी लोगों के लिए न्याय, सामाजिक आर्थिक और राजनैतिक स्वतंत्रता; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म की स्वतंत्रता सुनिश्चित की जाएगी। (इसे आप मौलिक अधिकार में भी पढ़ेंगे और प्रस्तावना में भी)

🧿 अल्पसंख्यकों एवं पिछड़े वर्गों तथा जनजातियों को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान की जाएगी। 
🧿 विधि के अनुरूप सभी काम होंगे तथा भारत को विश्व में उसका उचित स्थान और अधिकार दिलाया जाएगा।

ये थी उद्देश्य प्रस्ताव की कुछ मूल बातें । 26 जनवरी 1947 को इसे सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया। 

उसके कुछ समय बाद ही माउण्टबेटन ने और 3 जून 1947 को स्वतंत्रता की घोषणा कर दी।  ऐसा घोषणा किए जाने के बाद धीरे-धीरे लगभग सभी रियासतें इसमें शामिल हो गयी।

(कुछ को छोड़ कर जम्मू और कश्मीर, हैदराबाद, और जूनागढ़ जिसे बाद में शामिल करा लिया गया।)

5.आजाद भारत का संविधान सभा

जैसा कि हम जानते हैं, 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ और संविधान सभा एक स्वतंत्र निकाय बन गया जिसे अब किसी से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं थी।

इससे हुआ ये कि अब अब संविधान सभा अपनी पूरी क्षमता और गति के साथ काम करने लगे। 

[चूंकि अब देश भी चलाना था इसीलिए सभा दो रूपों मे काम करने लगी। एक संविधान बनाने का काम और दूसरा सामान्य विधि बनाने का काम जिससे की तत्कालीन प्रशासन को चलाया जा सकें।]

[मुस्लिम लीग चूंकि अब अलग होकर एक नया राज्य पाकिस्तान बना चुका था इसीलिए संविधान सभा में सीटों की संख्या कम हो गयी और अब केवल 299 सीटें ही रह गयी थी जिसमें से 70 देशी रियासतों के लिए और बाँकी ब्रिटिश प्रांत के लिए।]

संविधान निर्माण, व्यवस्थित और क्रमबद्ध तरीके से हो इसके लिए विभिन्न बड़ी और छोटी समितियों का गठन किया गया और सभी समितियों को उसके विशेषज्ञता और क्षमता के अनुसार कार्य सौप दिया गया। 

आइये जान लेते है कि वो कौन-कौन समितियां (Committees) थी। 

संविधान निर्माण के लिए निर्मित बड़ी समितियां 

1. संघ शक्ति समिति – जवाहर लाल नेहरू 
2. संघीय संविधान समिति – जवाहर लाल नेहरू 
3. प्रांतीय संविधान समिति – सरदार पटेल 
4. प्रारूप समिति – डॉ बी आर अंबेडकर 

5. मौलिक अधिकारों, अल्पसंख्यकों, जनजातियों एवं सीमांत क्षेत्रों के लिए सलाहकार समिति – सरदार पटेल
6. प्रक्रिया नियम समिति – डॉ राजेंद्र प्रसाद 
7. राज्यों के लिए समिति – जवाहर लाल नेहरू 
8. संचालन समिति – डॉ राजेंद्र प्रसाद 

इसमें से जो सबसे महत्वपूर्ण है वो हैं प्रारूप समिति। ये इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि संविधान के प्रारूप यानी कि ड्राफ्ट तैयार करने की जिम्मेवारी इसी की थी।

सब कुछ ड्राफ्ट पर ही टिका था क्योंकि ड्राफ्ट तैयार होने के बाद ही इस पर बहस होता, इसमें संशोधन होता और अंतिम संविधान अस्तित्व में आ पाता। 

संविधान निर्माण और प्रारूप समिति

प्रारूप समिति में कुल 7 सदस्य थे जिसके अध्यक्ष बी आर अंबेडकर थे। इसके अलावा और छह सदस्य क्रमशः  
🔳 एन गोपालस्वमी आयंगर 
🔳 अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर 
🔳 के एम मुंशी 
🔳 सैयद मोहम्मद सादुल्लाह 
🔳 एक माधव राव (इन्होंने बाद में बी एल मित्र की जगह ली।) 
🔳 टी टी कृष्णमचारी (इन्होंने डी पी खेतान की जगह ली।)  

संविधान का प्रभाव में आना
(Constitution comes into effect)

प्रारूप समिति द्वारा संविधान का पहला प्रारूप फ़रवरी 1948 में पेश किया गया। और इस में संशोधन कराने के लिए लोगों को 8 महीने का वक़्त दिया गया। 

जितने भी संशोधन के मांग आये। जरूरत अनुसार उसमें संशोधन करके आठ महीने बाद अक्तूबर 1948 में इसे फिर से प्रकाशित किया गया। 

4 नवम्बर 1948 को संविधान का अंतिम प्रारूप पेश किया गया। इस पर पाँच दिनों तक चर्चा हुई और 15 नवम्बर 1948 से इस पर खंडवार विचार और उस पर संविधान सभा में बहस होना शुरू हुआ। 

आखिरकार 17 अक्तूबर 1949 तक इसपर विचार और बहस चला। और उसके बाद इसपर तीसरे दौर का विचार होना शुरू हुआ।

डॉ अंबेडकर ने ‘The Constitution Age Settled by the Assembly be Passed’ नामक प्रस्ताव पेश किया और 26 नवम्बर 1949 को इसे पारित घोषित कर दिया गया।

जब ये बनकर तैयार हो गया तो इस संविधान में कुल 395 अनुच्छेद, 8 अनुसूचियाँ और एक प्रस्तावना थी। 

हालांकि जिस दिन ये पारित हुआ उस दिन सभी सदस्य नहीं आए थे  केवल 284 सदस्य ही उपलब्ध थे तो उन्होने ही इस पर हस्ताक्षर किए।

और एक बात और याद रखने वाली है कि सम्पूर्ण संविधान को 26 जनवरी 2950 को लागू किया गया। 

संविधान निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के कारण डॉ अंबेडकर को भारतीय संविधान के पिता से संबोधित किया जाता है। 

संविधान निर्माण तथ्य 

संविधान बनने में 2 साल 11 महीने और 18 दिन का समय लगा। इस के दौरान संविधान सभा की कुल 11 बैठकें हुई लगभग 60 देशों के संविधान को खंगाला गया।

कहा जाता है कि उस समय इसमें लगभग 64 लाख रुपए खर्च आया। उस समय के हिसाब से ये काफी ज्यादा रकम था।

मूल संविधान प्रेम बिहारी नारायण रायजदा द्वारा इटलीक शैली में लिखा गया, तथा इसका सौंदर्यीकरण शांतिनिकेतन के कलाकार द्वारा हुआ।

मूल प्रस्तावना प्रेम बिहारी नारायण द्वारा लिखा गया तथा सौंदर्यीकरण राम मनोहर सिन्हा द्वारा हुआ।

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मौलिक अधिकार : एक परिचय
मौलिक अधिकार

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