प्रेरणादायक हिंदी कहानियां PDF

इस पेज पर 10 बेहतरीन प्रेरणादायक हिंदी कहानियां संकलित की गई है, साथ ही आप इसके पीडीएफ़ को भी डाउनलोड कर सकते हैं;

जब भी हम अपने जीवन में भटकाव महसूस करते हैं तब प्रेरणा हमें अपने लक्ष्य की दिशा में कर्म करने को उत्प्रेरित करता है। इस प्रेरणा के कई स्रोत हो सकते हैं, ये माता-पिता, परिवार और समाज भी हो सकते हैं और प्रेरक कहानियां भी। तो आइये इन कहानियों को पढ़ते हैं।

प्रेरणादायक हिन्दी कहानियां

10 प्रेरणादायक हिंदी कहानियां

भोजन मुफ्त में नहीं मिलता

एक बार एक राजा ने इतिहास की सारी समझदारी भरी बातों को लिखवाने का निर्णय लिया ताकि आने वाली पीढ़ियों तक उसे पहुंचाया जा सके।

उन्होने अपने सलाहकारों को बुला कर ये सारी बातें बतायी। सलाहकारों ने काफी मेहनत के बाद इतिहास की सारी समझदारी भरी बातों पर कई किताबें लिखी और राजा के समक्ष पेश किया।

इतनी सारी किताबों को देखकर राजा को लगा की इतनी सारी किताबें लोग पढ़ नहीं पायेंगे इसीलिए उन्होने अपने सलाहकारों को इसे और छोटा कर लाने को कहा ।

सलाहकारों ने इसपर फिर से काम किया और इस बार उन सारी किताबों को संक्षिप्त करके एक किताब में तब्दील कर फिर से राजा के समक्ष पेश किया गया।

राजा को वो एक किताब भी काफी मुश्किल लगी। सलाहकारों ने फिर से उस पर काम किया और इस बार उस एक किताब को एक चैप्टर (अध्याय) मे तब्दील कर फिर से राजा के समक्ष पेश किया पर ये भी राजा को काफी लंबा लगा।

राजा को कुछ ऐसा चाहिए था जिसे आने वाली पीढ़ियाँ समझ सकें। फिर से सलाहकारों ने उस पर काम करके उसे सिर्फ एक पन्ने मे संक्षिप्त करके राजा के समक्ष पेश किया पर राजा को ये भी काफी लंबा लगा।

आखिरकार वे राजा के पास सिर्फ एक वाक्य ले कर आए और राजा उस वाक्य से पूरी तरह से संतुष्ट हो गया ।

राजा ने निर्णय लिया की आने वाली पीढ़ियों तक अगर समझदारी भरी सिर्फ एक वाक्य पहुंचाना हो तो वह यह वाक्य होगा, ”भोजन मुफ्त मे नहीं मिलता”!


धन, वैभव और सफलता

एक गाँव में एक लकड़हारा अपनी पत्नी और बेटे के साथ रहता था। वो दिन भर लकड़ी काटता और पास के बाज़ार में बेच आता था उससे जो आमदनी होती थी उसी से उसका परिवार चलता था।

एक दिन की बात है वो अपने घर में भोजन कर रहा था तभी दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। उसने अपने लड़के से दरवाजा खोलकर देखने के लिए कहा कि बाहर कौन है।

लड़के ने दरवाजा खोला तो बाहर चार साधू खड़े थे। उन्होने लड़के को अपना नाम क्रमशः धन, वैभव, सफलता और श्रम बताते हुए कहा की हमें भूख लगी है। लड़का दौड़ कर गया और पिताजी को सारी बातें बतायी।

लकड़हारे ने चारों साधुओं को आदर सहित अंदर लाने को कहा। लड़का दरवाजे पर गया और चारों साधुओं को अंदर आने को कहा; पर साधुओं ने एक शर्त रखते हुए कहा की हम में से कोई एक ही अंदर जाएगा और जो भी अंदर जाएगा वो अपने नाम का प्रभाव ले कर जाएगा।

लड़का फिर से पिताजी के पास गया और ये बातें बतायी। अब लकड़हारा सोच में पड़ गया की किसे बुलाया जाए। लकड़हारे की पत्नी सफलता को बुलाना चाहती थी, वो खुद धन को बुलाना चाहता था।

दोनों विचलित हो गये थे वे सोच नहीं पा रहे थे की किसे बुलाया जाए ! तभी लड़के ने कहा की हमलोग वैसे भी मेहनत करके कमाते है और खाते है तो क्यूँ न श्रम को बुलाया जाए।

लकड़हारा आखिरकार मान गया। लड़का दरवाजे पर जाकर श्रम को अंदर आने को कहा पर जैसे ही श्रम अंदर आने लगा बाकी के तीन साधू भी पीछे-पीछे अंदर आने लगे; तो लड़के ने उत्सुकतावश पूछा की मैंने तो सिर्फ श्रम को बुलाया है तो फिर आपलोग क्यूँ अंदर आ रहे हैं। बाकियों ने बड़ा खूबसूरत जवाब देते हुए कहा कि – जहां श्रम होगा वहाँ हमलोग तो होंगे ही।

इस कहानी से हमें यही शिक्षा मिलती है कि अगर हम सच्चे मन से मेहनत करें तो हमें धन, वैभव और सफलता तीनों मिलती है।


सत्संकल्प अधूरे नहीं रहते

शीमक कठिन शीत ज्वर से पीड़ित हैं, उनके पुत्र-पौत्रों ने उपचार की अच्छी व्यवस्था की है तो भी वे औषधि नाममात्र को ही ले रहे हैं, उनका कथन है कि औषधि का काम विष के प्रभाव को रोकना भर है, रोग को नष्ट करना नहीं, वह काम तो प्रकृति स्वयं ही करती है। तब हम उसमें हस्तक्षेप क्यों करें?

पर उनके इस कथन का भी वही अर्थ लगाया गया जो अब तक लगाया जाता रहा था अर्थात शीमक बड़ा कृपण (कंजूस) है। घर में अथाह धनराशि होते हुए भी वह न तो अच्छा खा सकता है, न अच्छा पहन सकता है, बाल-बच्चों को देना तो दूर, अब जब उसका अपना ही जीवन संकट में पड़ गया, तब भी पैसे का इतना मोह- छि: शीमक की कृपणता कलंक नहीं तो और क्या है?

बहुत बार तो शीमक को कई ऐसे व्यक्ति भी मिले थे, जो उसके मुख पर ही कह गए थे -*शीमक इतनी कृपणता तो न किया करो, कभी कुछ दान, कभी कुछ पुण्य, तीर्थ-यात्रा, ब्राह्मण भोज, नगर भोज कुछ तो ऐसा कर डालो, जिससे यह धन ठिकाने लग जाए। मर गए तब वह धन किसी और के हाथ लग गया तो तुम्हारी इस कमाई का क्या लाभ ?’!

शीमक हँस पड़ते और अच्छा! अच्छा !! कहकर उस प्रसंग को टाल देते। ऐसे अवसर आते तो दूर दृष्टि डालते हुए शीमक की मुख-मुद्रा देखने से प्रतीत होता था, मानों वे सुदूर भविष्य में कुछ खोजना चाहते हैं, यह आज तक उनके पुत्र परिजन भी नहीं समझ सके थे।

आज जितने चिंतित शीमक बैठे थे, उससे अधिक विकल आचार्य महीधर दिखाई दे रहे थे। उन्होंने बड़े परिश्रम के साथ वेदों का भाष्य किया था। भाष्य भी ऐसा कि जो भी विद्वान उसे पढ़ता धन्य हो जाता, किंतु धन के अभाव के कारण आज स्वयं महीधर इतने निराश हो गए थे कि उन्हें अपना इतना सारा तप ही निरर्थक लगने लगा था।

वे चाहते थे कि वेदों का यह भाष्य घर-घर पहुँचे ताकि बौद्धों के प्रभाव को रोका जा सके पर उनकी आकांक्षा, आकांक्षा ही रही। कोई उपाय बन नहीं सका।

शीमक ने जब यह समाचार सुना तो चुपचाप घर से निकल पड़ा। कहाँ गया शीमक, कई दिन तक खोज की गई पता न चला। बहुत दिन बाद जब महीधर के वेद-भाष्य घर-घर पहुँचने लगे, तब लोगों ने इतना भर सुना कि कोई एक देवपुरुष उनके पास आया था और उसने अपनी सारी संपत्ति उन्हें देकर कहा था–” आचार्य प्रवर! सदिच्छाएँ धन के अभाव में रुकती नहीं, यह रही मेरी जीवनभर की कमाई, इसे काम में लेकर मेरा जीवन धन्य करें।’!

उसके बाद फिर उस महापुरुष के कभी दर्शन नहीं हुए। कहते हैं, शीमक वानप्रस्थ ग्रहण कर अंतिम साधना के लिए अंतर्वासी हो गया था।


धन यहाँ न सही कहीं और सही

एक व्यक्ति के पास बहुत धन था, पर स्वभाव से वह था कंजूस। न स्वयं खा-पी सके और न किसी को दे ही सके। घर में अपने धन को इसलिए नहीं रखता था कि कोई चोर-डाकू न चुरा ले। अतः गाँव के बाहर एक जंगल में गड्ढा करके अपना सारा धन गाड़ आया। दूसरे-तीसरे दिन जाता और उस स्थान को चुपचाप देख आता। उसे अपने पर बड़ा गर्व था।

एक बार एक चोर को शक हुआ, वह कंजूस के पीछे-पीछे चुपचाप गया और छिपकर देख आया। उसे समझते देर न लगी कि इस स्थान पर अवश्य कोई मूल्यवान वस्तु दबी है।

जब कंजूस चक्कर लगाकर घर चला आया तो उस चोर ने खुदाई करके सारा धन प्राप्त कर लिया और वहाँ से रफूचक्कर हो गया।

दूसरे दिन जब वह कंजूस फिर अपने छिपे धन को देखने गया तो उसे जमीन खुदी हुई दिखाई दी। आस-पास मिट्टी का ढेर लग रहा था और बीच में एक खाली गड़्ढा था। उसका सारा धन जा चुका था। इतनी बड़ी हानि वह सहन नहीं कर सका।

माथा पकड़कर जोर से रोने-चिल्लाने लगा–” हाय मैं तो लुट गया, मेरे सारे जीवन की कमाई चोर ले गए।” रोना-चिल्लाना सुनकर जंगल में रहने वाले आस-पास के कई आदमी आ गए। उन्होंने पूछकर सारी स्थिति जानी।

एक आदमी ने समझाते हुए कहा–“’ सेठ जी ! धन तो आपके काम पहले भी न आया था और न आपके जीवन में आ सकता था। हाँ, उस पर आपका अधिकार अवश्य था और उसे यहाँ छिपाकर रख छोड़ा था। अब धन यदि यहाँ से कहीं और जगह चला गया तो आपकी कौन सी हानि हो गई, क्योंकि आपके लिए तो वह बेकार ही था, तभी तो आप उसे गाड़ कर रखते थे। ऐसी स्थिति में दु:खी होने की क्या आवश्यकता है।”


बीमारियों पर श्राप

बात उस समय की है जब बीमारियाँ एक पहाड़ पर रहा करती थीं। पर्वत उन्हें अपनी पुत्री की तरह पालता-पोसता। बीमारियाँ उसका अनुग्रह मानतीं और कोई भी उपकार करने की इच्छुक बनी रहतीं, पर पहाड़ को उनकी सेवाओं की आवश्यकता नहीं थी।

कुछ दिन बीते। एक किसान को कृषि-योग्य भूमि की कुछ कमी पड़ी। और कहीं जमीन थी नहीं थी, चूंकि वह पहाड़ ही बहुत सारी जमीन दबाए खड़ा था। इसीलिए परिश्रमी किसान पहाड़ काटने और उसे चौरस बनाने में जुट गया।

किसान ने बहुत सी भूमि कृषि योग्य कर ली। यह देखकर दूसरे किसान भी जुट पड़े। किसानों की संख्या देखते-देखते सैकड़ों तक जा पहुँची। इस तरह निरंतर काया कटते देखकर पहाड़ घबराया और अपने बचाव के उपाय खोजने लगा।

और कुछ तो समझ में नहीं आया-हाँ, उसे अपने कोटर में पल रही बीमारियों की याद अवश्य आ गई। सो उसने सब बीमारियों को इकट्ठा किया और पूछा–*’ क्या आप लोग हमारे उपकार चुकाएँगी ?!’

बीमारियाँ तो पहले ही कह चुकी थीं। उन्होंने कहा -” आप सहर्ष आदेश दें, हम आपकी क्या सेवा कर सकते हैं?” पहाड़ ने फावड़े और कुदाल चलाते हुए किसानों की ओर संकेत किया और कहा–”पुत्रियो! देखो यह रहे मेरे शत्रु, मुझे काटकर जर्जर किए दे रहे हैं। तुम सब की सब इन पर झपट पड़ो और मेरा नाश करने वालों का सत्यानाश कर डालो।”

अपने-अपने आयुध लेकर बीमारियाँ आगे बढ़ीं और किसानों के शरीर से लिपट गईं। पर किसान तो अपनी धुन में लगे थे। फावड़े जितना तेजी से चलाते, पसीना उतना ही अधिक निकलता और सारी बीमारियाँ धुलकर नीचे गिर जातीं। बहुत उपक्रम किया, पर बीमारियों की एक न चली। एक अच्छा स्थान छोड़कर उन्हें गंद-वासिनी बनना पड़ा सो अलग।

पहाड़ ने जब देखा कि बीमारियाँ उसकी रक्षा नहीं कर सकीं, तो वह बड़ा कुपित हुआ और शाप दिया – मैंने तुम्हें पुत्रियों की तरह पाला फिर भी तुम मेरा थोड़ा सा काम भी न कर सकीं। अब तुम जहाँ हो वहीं पड़ी रहो।’”

तब से बीमारियाँ हमेशा गंदगी में प्रश्रय पाती हैं और मेहनत-कस अनपढ़ हों तो भी स्वस्थ जीवन जीते हैं -यही नियम अब तक चला आ रहा है।


मन नहीं लगता

नव-दीक्षित शिष्य ने कहा–““गुरुदेव! उपासना में मन नहीं लगता। भगवान की ओर चित्त दृढ़ नहीं होता।’!

गुरु ने गंभीर दृष्टि डालकर शिष्य को देखा और जैसे कोई बात समझ में आ गई हो, बोले–‘सच ही कहते हो वत्स! यहाँ ध्यान लगेगा भी नहीं। अन्यत्र चलकर साधना करेंगे, वहाँ ध्यान लगेगा।

आज सायंकाल ही यहाँ से प्रस्थान करेंगे।” *सायंकाल !’ शिष्य कुछ चिंतित स्वर में प्रश्न कर बैठा, जिसका गुरु ने कोई उत्तर न दिया।

सूर्यास्त के साथ ही वे दोनों एक ओर चल पड़े। गुरु के हाथ में मात्र एक कमंडल था, शिष्य के हाथ में थी एक झोली जिसे वह बहुत यत्नपूर्वक सँभाले हुए चल रहा था। मार्ग में एक कुआँ आया। शिष्य ने शौच की आशंका व्यक्त की। दोनों रुक गए । बहुत सावधानी से उसने झोला गुरु के पास रखा और शौच के लिए चल दिया। जाते-जाते उसने कई बार झोले की ओर दृष्टि डाली।

“गड़ाम !’ एक तीव्र प्रतिध्वनि भर सुनाई दी और झोले में पड़ी ‘कोई वस्तु कुएँ में जा समाई। शिष्य दौड़ा हुआ आया और चिंतित स्वर में बोला -” भगवन्‌! झोले में सोने की ईंट थी सो क्या हुई ?”! कुएँ में चली गई, अब कहें तो चलें, कहें तो फिर वहीं लौट चलें जहाँ से आए हैं, अब ध्यान न लगने की चिंता कहीं न रहेगी।

एक दीर्घ श्वास छोड़ते हुए शिष्य ने कहा -*’सच ही गुरुदेव! आसक्ति का मन से परित्याग किए बिना कोई भी किसी काम में मन नहीं लगा सकता।”


दीपक की कहानी

ये कहानी है एक परिवार की। सायंकाल होती तो घर के सब काम-काज ठप पड़ जाते। आग जलाकर सब बैठ जाते और अंधकार को मनमाना कोसते। कोई कहता भगवान को भी लगता है, बुद्धि नहीं थी, अंधकार बनाकर रख दिया, तो कोई कहता, इस अंधकार में तो दम घुटता है, भगवान ने हमारे साथ बड़ा अत्याचार किया।

यह क्रम वर्षों चलता रहा पर उस परिवार के लोगों को अंधकार से बचने का उपाय न सूझा। बड़े बेटे का हुआ विवाह तब आई बहू। घर के सदस्यों में एक की वृद्धि हुई। पर यह छोटी सी वृद्धि भी बहुत बड़ी थी, क्योंकि बहू पढ़ी लिखी और समझदार थी।

‘पहला दिन पहली साँझ। उसके पति ने कहा–“घर में इतना अंधकार है प्रिये! तुम्हारा स्वागत कैसे करें। इस दुष्ट अंधकार को भगवान न बनाता तो उसका क्या बिगड़ जाता।”!

‘पति के भोलेपन पर पत्नी को हँसी आ गई। उसने कहा–” मेरे देवता! अंधकार कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं, प्रकाश के न होने का ही दूसरा नाम अंधकार है।”’ पति था अनपढ़ उसे तब भी कुछ समझ में नहीं आया।

फिर तो बहू उठी और एक दीपक लाई। उसमें घर में से तेल डाला फिर थोड़ी रूई लाई। बत्ती बनाकर दिये में डाली और फिर उसे आग से जला दिया। वर्षों से घिरा घर का ढेर सारा अंधकार पल भर में सिमट कर न जाने कहाँ अस्त हो गया। घर के सब लोग खुशी से झूम उठे, सबने बहू की आरती उतारी और उसका दही मिसरी से स्वागत किया।


आसक्ति ही बंधन

काकभुशुंडि जी के मन में एक बार यह जानने की इच्छा हुई कि क्या संसार में ऐसा भी कोई दीर्घजीवी व्यक्ति है, जो विद्वान भी हो पर उसे आत्मज्ञान न हुआ हो? इस बात का पता लगाने के लिए महर्षि वशिष्ठ से आज्ञा लेकर निकल पड़े।

ग्राम ढूँढ़ा, नगर ढूँढ़े, बन और कंदराओं की खाक छानी तब कहीं जाकर विद्याधर नामक ब्राह्मण से भेंट हुई, पूछने पर मालूम हुआ कि उनकी आयु चार कल्प की हो चुकी है और उन्होंने वेद शास्त्र का परिपूर्ण अध्ययन किया है। शास्त्रों के श्लोक उन्हें ऐसे कंठस्थ थे, जैसे तोते को राम नाम। किसी भी शंका का समाधान वे मजे से कर देते थे।

काकभुशुंडि जी को उनसे मिलकर बड़ी प्रसन्नता हुई, किंतु उन्हें बड़ा आश्चर्य यह था कि इतने विद्वान होने पर भी विद्याधर को लोग आत्मज्ञानी क्यों नहीं कहते।

यह जानने के लिए काकभुशुंडि जी चुपचाप विद्याधर के पीछे घूमने लगे। विद्याधर एक दिन नीलगिरि पर्वत पर वन-विहार का आनंद ले रहे थे, तभी उन्हें कण्वद की राजकन्या आती दिखाई दी, नारी के सौंदर्य से विमोहित विद्याधर प्रकृति के उन्मुक्त आनंद को भूल गए, कामावेश ने उन्हें इस तरह दीन कर दिया जैसे मणिहीन सर्प।

वे राजकन्या के पीछे इस तरह चल पड़े जैसे मृत पशु की हड्डियाँ चाटने के लिए कुत्ता। उस समय उन्हें न शास्त्र का ज्ञान रहा, न पुराण का।राजकन्या की उपेक्षा से भी उन्हें बोध नहीं हुआ। वे उसके पीछे लगे चले गए, सिपाहियों ने समझा यह कोई विक्षिप्त व्यक्ति है इसलिए उन्हें पकड़ कर बंदीगृह में डाल दिया।

कारागृह में पड़े विद्याधर से काकभुशुंडि ने पूछा–“’मुनिवर! आप इतने विद्वान होकर भी यह नहीं समझ सके कि आसक्ति ही आत्मज्ञान का बंधन है। यदि आप कामासक्त न होते तो आज यह दुर्दशा क्यों होती।”! यह सुनते ही विद्याधर के ज्ञान के नेत्र खुल गए और उन्हें आत्मज्ञान हो गया।


जो सिर काटे आपना

ज्ञान प्राप्ति के लिए अति उत्सुक एक भक्त कबीर के पास पहुंचा। बहुत दिनों तक आग्रह करने पर एक दिन कबीर ने कहा -‘वत्स, पैर के नीचे की शिला को उठाओ। ‘शिष्य ने तुरंत शिला उठाई। दोनों भीतर उसमें घुस गए।

अंदर एक दरवाजे पर लिखा था -‘अपने कान काटने वाला इस दरवाजे को खोल सकेगा!। कबीर ने अपने दोनों कान काट डाले। वह दरवाजा खुला और कबीर अंदर गए और पुनः दरवाजा बंद हो गया।

भक्त ने खोलने का प्रयत्न किया तो अंदर से आवाज आई कि मैंने जैसा किया वैसा करने पर ही द्वार खुलेगा। भक्त ने भी अपने कान काटे और दरवाजा खुल गया; इस तरह से वो भी अंदर गया।

दूसरे दरवाजे पर इसी प्रकार लिखा था कि पहले अपने नाक को काटो फिर दरवाजा खुलेगा। कबीर नाक काटकर अंदर घुस गए। भक्त ने भी अनुसरण किया और वह अंदर दाखिल हुआ।

तीसरे पर लिखा था -‘जिसको अंदर आना हो वह पहले अपना सिर काटे’। कबीर तो सिर उड़ा कर अंदर चले गए पर भक्त बाहर ही रहा।

नाक, कान और मस्तक जाने के बाद क्या उपयोग ? वह इसी विचार में डूबा हुआ था कि उसे नींद आ गई। जब नींद खुली तो वहाँ दूर से कबीर आते दिखाई दिए। “क्या मेरी राह देख रहे हो ‘- कबीर ने पूछा। “मैं तो कुछ समझ ही नहीं सका, गुरुदेव ! ”

यह रहस्य सरलता से समझ में आने लायक नहीं है। तो क्या गुरुदेव मेरे नाक-कान अब सदा के लिए गए? “वे तो गए ही, इसमें क्या संदेह ?’ “पर भगवान! आपके तो कान-नाक पूर्ववत हो गए हैं।

मेरे भी पूर्ववत कीजिए न प्रभू!” *यह कैसे हो सकता है? सिर काटा होता तो सब अंग मेरे समान पूर्ववत हो जाते।’


बुरी संगति से दुर्गति

एक चित्रकार को किसी अत्यंत सौम्य किशोर का चित्र बनाना था। ऐसे लड़के की तलाश में चित्रकार देश-विदेश में वर्षों तक मारा-मारा फिरा। बहुत कठिनाई से उसे एक ऐसा लड़का मिला, जिसके रोम-रोम से सज्जनता टपकती थी। उसे सामने बिठा कर चित्र बनाया गया।

चित्र बहुत ही सुंदर बना। उसे बाजार में बहुत पसंद किया गया, भारी बिक्री हुई। चित्रकार की सर्वत्र प्रशंसा होने लगी। उसे धन भी बहुत मिला।

वर्षों बाद चित्रकार को सूझा कि वह एक अत्यंत घृणित और दुष्ट भाव भंगिमा वाले अपराधी का भयंकर चित्र बनाएगा। इसके लिए वह अपराधियों के अड्डे, बंदीगृह और दुराचारियों के आवास स्थानों में भ्रमण करने लगा।

अंत में एक बड़ी डरावनी आकृति का मनुष्य मिला। चित्रकार ने उसका चित्र बनाया और वह भी बहुत बिका। सज्जनता और दुष्टता की दो परस्पर विरोधी प्रतिकृतियों का यह अद्भुत जोड़ा, चित्र जगत में बहुत विख्यात हो गया।

एक दिन वही दुष्ट, दुराचारी चित्रकार से मिलने जा पहुँचा। चित्रकार ने उंसका परिचय पूछा तो उसने कहा -‘“यह दोनों चित्र मेरे ही आपने बनाए हैं। जब मैं बालक था तब सौम्य था और जब अधेड़ हुआ तो मैं ही ऐसा भयंकर दुष्ट हो गया।

क्या आप इस रहस्य को जानते हैं ? ”चित्रकारं अवाक रह गया। उसने पूछा–” तुम…..तुम….तुम, भला इस प्रकार कैसे इतने परिवर्तित हो गए ?” अधेड़ ने मुँह ढक लिया। उसकी आँखें बरसने लगीं। रुँधे गले से बोला–““बुरी संगति ने मेरी यह दुर्गति बनाई। चित्रकार ! संगति तुम्हारी कला से भी अधिक प्रभावशाली है।’!

◼️◼️◼️

| संबन्धित अन्य प्रेरणादायक हिंदी कहानियां

प्रेरक लघु कहानियां
प्रेरणादायक हिंदी कहानियां 1- Inspirational story in hindi for everyone
प्रेरणादायक हिंदी कहानियां 2- motivational stories in hindi
प्रेरणादायक हिंदी कहानियां 2- Short Hindi Motivational Story
प्रेरक लघुकथा
प्रेरणादायक हिंदी कहानियां 3- Short Hindi Motivational Story
प्रेरणादायक हिंदी कहानियां 4- motivational story in hindi for students

डाउनलोड प्रेरणादायक हिंदी कहानियां Pdf

[ प्रेरणादायक हिंदी कहानियां, courtesy – prabhat khabar newspaper and internet archive (pt. shriram sharma aacharya) ]

पसंद आया तो शेयर कीजिये

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *