भाषा उत्पत्ति के सिद्धांत

इस लेख में हम भाषा उत्पत्ति के सिद्धांत पर सरल एवं सहज चर्चा करेंगे एवं इसके विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं को समझने का प्रयास करेंगे;

तो अच्छी तरह से समझने के लिए इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें और साथ ही इससे संबंधित अन्य लेखों को भी पढ़ें, लिंक लेख के अंत में दिया हुआ है।

भाषा उत्पत्ति के सिद्धांत

| भाषा क्या है?

भाषा संप्रेषण (Communication) का एक माध्यम है। दूसरे शब्दों में कहें तो अपने विचारों, मनोभावों या कल्पनाओं आदि को अभिव्यक्त करने का माध्यम, भाषा है।

विकिपीडिया के अनुसार, भाषा, संप्रेषण का एक संरचित प्रणाली (structured system) है जो कि बोलने, लिखने, हाव-भाव या संकेतों पर आधारित होता है।

भाषा विद्वान हेनरी स्वीट के अनुसार, “भाषा शब्दों में संयुक्त भाषण-ध्वनियों के माध्यम से विचारों की अभिव्यक्ति है।

भाषा कमाल की चीज़ है आप इस लेख को पढ़ रहे हैं यानी कि भाषा अपनी भूमिका निभा रहा है। पर भाषा की उत्पत्ति कैसे हुई, ये आज भी किसी रहस्य से कम नहीं है। ऐसा क्यों है, इस लेख को खत्म करते-करते आप समझ जाएँगे।

| भाषा उत्पत्ति के सिद्धांत

भाषा उत्पत्ति का कोई सीधा-सपाट सिद्धांत नहीं है, यानी कि ये अभी भी उस स्थिति में नहीं हैं कि सीधे-सीधे कहा जा सके कि, ‘अच्छा तो! भाषा की उत्पत्ति ऐसे हुई है’, बल्कि जब आप इसे आगे पढ़ेंगे तो आप इसके कुछ अजीबो-गरीब सिद्धांत पढ़ कर शायद हंस भी पड़े।

खैर, भाषा के उत्पत्ति पर विचार करने के लिए आमतौर पर विद्वान दो मार्गों का सहारा लेते हैं – 1. प्रत्यक्ष मार्ग (Deductive method) और, 2. परोक्ष मार्ग (Inductive method)

1. प्रत्यक्ष मार्ग (Deductive method)

इसका सीधा सा मतलब ये है कि प्राचीन अवस्था से चलते हुए भाषा के विकसित होते रूपों का अध्ययन। इसके अंतर्गत दसियों ऐसे सिद्धांत आते हैं जो भाषा उत्पत्ति को बताने की कोशिश करते हैं लेकिन सबमें कुछ त्रुटियाँ है, फिर भी कुछ को ऐसे ही नकारा नहीं जा सकता है। तो आइये एक-एक करके देखते हैं-

| दैवी सिद्धांत (Divine theory)

इस सिद्धांत के मानने वालों का कहना है कि चूंकि हमें परम पिता परमेश्वर ने बनाया है तो जाहिर है भाषा भी उन्होने ही दिया होगा। कुल मिलाकर ये सिद्धांत इस बात पर बल देता है कि भाषा ईश्वर की देन हैं।

आलोचना – इस सिद्धांत की समस्या ये है कि सभी धर्मों के लोग अपने धर्म के भाषा को श्रेष्ठ मानते हैं जबकि अगर ईश्वर एक ही है तो फिर भाषा भी तो एक ही होना चाहिए, पर ऐसा तो है नहीं, इसीलिए आज के इस तार्किक युग में तर्कों की कसौटी पर ये कसाए नहीं कसता। इसीलिए भाषा उत्पत्ति के दैवी सिद्धांत को आज बहुत ज्यादा तवज्जो नहीं मिलती है।

कहा जाता है कि इसकी पुष्टि के लिए मिस्र के राजा सिमैटिक ने एक बार दो अलग-अलग भाषा बोलने वाले बच्चे को एक साथ बहुत दिनों तक एक साथ रखा और ये देखने की कोशिश की कि आखिर ये बच्चा कौन सी भाषा में बोलेगा, लेकिन जब समय आने पर उसे बोलने को कहा गया तो दोनों के मुंह से एक ही शब्द निकला – ‘बोकोस’ जिसका मतलब था रोटी। यानी कि दोनों बच्चों ने उस नौकर की आवाज सुनी जो कि उसे रोटी देने आता था।

इसी प्रकार का एक प्रयोग अकबर ने भी किया लेकिन जब बच्चा को समय आने पर बुलवाया गया तो वो गूंगा हो चुका था, कुछ बोल ही नहीं पाया। जबकि भाषा ईश्वरीय होता तो उसे भाषा जन्म के साथ ही आनी चाहिए थी।

| संकेत सिद्धांत या निर्णय सिद्धांत

इसके प्रतिपादक फ्रांसीसी विचारक रुसो हैं। इसमें इनका मानना ये है कि आदि मानव शारीरिक भाव-भंगिमा या हाव-भाव के माध्यम से अपने आप को अभिव्यक्ति करता था लेकिन एक समय आया होगा जब उसने उस भाव-भंगिमा के लिए शब्द का गठन किया होगा। और फिर उसी शब्द से भाषा की उत्पत्ति हुई होगी।

आलोचना – जब इंसान के पास पहले भाषा था ही नहीं तो फिर उसने संकेत को कैसे शब्द का रूप दिया होगा। इसी से मिलता-जुलता एक और सिद्धांत है-

| सामाजिक समझौता सिद्धांत (social contract theory)

इसके प्रतिपादक रूसो, थॉमस हॉब्स और जॉन लॉक है। इस सिद्धांत के अनुसार जब प्राचीन मानवों को सामान्य संकेत से काम चला सकना मुश्किल हो गया होगा तक समुदाय ने मिल जुल कर के एक समझौता किया होगा कि अमुक वस्तु के लिए हमलोग अमुक शब्द का इस्तेमाल करेंगे, और इस तरह से एक समझौते के तहत भाषा का निर्माण हुआ होगा।

आलोचना – मानव समाज समझौता तक पहुँचने के लिए विचार-विमर्श किया कैसे? क्योंकि उससे पहले तो कोई भाषा नहीं था। दूसरी बात ये कि उस समय एक ही समुदाय तो था नहीं फिर सभी समुदाय जो इस समझौते में भाग नहीं ले पाये होंगे, वो कैसे भाषा को जाने होंगे, या उसे कैसे समझाया होगा। इसी

| धातु सिद्धांत (Root theory) या डिंगडौंगवाद

इस सिद्धांत का मूल प्रवर्तक प्लेटो हैं। बाद में जर्मन विद्वान हैइज़ (Heyse) तथा उसके उपरांत मैक्समूलर ने इसको एक व्यवस्थित रूप दिया।

इस सिद्धांत के संदर्भ में इन लोगों का कहना है कि सृष्टि के आरंभ में आदि मानव में एक ऐसा स्वाभाविक अभिव्यक्ति क्षमता था जिससे कि चार सौ से पाँच सौ मूल धातु की उत्पत्ति हुई। कालांतर में उसी मूल धातु से नया-नया शब्द बनाया गया। इसीलिए इसे धातु सिद्धांत (Root theory) कहा जाता है।

इसको डिंगडौंग सिद्धांत भी कहा जाता है। इसके समर्थन में कहा जाता है कि प्रत्येक वस्तु का अपना एक नैसर्गिक ध्वनि होता है, और ये ध्वनि तब निकलता है जब उस पर किसी चीज़ से चोट किया जाता है। जैसे कि अगर घंटा पर अगर चोट किया जाये तो एक ध्वनि निकलती है इसे इंग्लिश में डिंगडौंग कहा जाता है इसीलिए इसे डिंगडौंग सिद्धांत कहा गया। इसे रणन सिद्धांत भी कहा जाता है।

आलोचना – जब मनुष्य में मूल धातु बनाने की क्षमता उस समय थी तो फिर ये खत्म क्यों हो गया। दूसरी बात कि अगर शब्द बनाने के लिए धातु का होना आवश्यक है तो फिर चीनी शब्द और भाषा कैसे बना होगा, क्योंकि उसमें मूल धातु नहीं होता है। इसीलिए यह सिद्धांत भी स्वीकार करने योग्य नहीं है।

| अनुकरण सिद्धांत (Bo-bow theory) या ऑनामाटोपोयक सिद्धांत (onomatopoeic theory)

जिस प्रकार से डिंगडौंग सिद्धांत में जड़ वस्तु से ध्वनि उत्पन्न होता था और फिर उससे भाषा बनती थी। उसी तरह से इस सिद्धांत में जड़ और चेतन वस्तु दोनों से पहले ध्वनि निकलती है फिर उससे शब्द बनता है और फिर उससे भाषा बनती है। जैसे कि कोयल की कू-कू, बिल्ली की म्याऊँ-म्याऊँ आदि। इसीलिए इसे अनुकरण सिद्धांत कहा जाता है।

इसे ऑनामाटोपोयक सिद्धांत इसीलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें शब्‍दों का ध्वनि-विन्‍यास वास्‍तविक ध्वनियों के अनुसार होता है। जैसे कि कोई पटाखा फूटता है तो हमारे मुंह से अपने आप निकलता है फटाक…। तो ये जो शब्द है वो बिल्कुल वैसे ही जैसे पटाखे फूटने पर आवाज निकलता है।

मैक्समूलर इस सिद्धांत का उपहास करने हेतु इसे बो-बो सिद्धांत (Bo-bow theory) कहा। क्योंकि ये कुत्ते की आवाज है।

आलोचना – प्रत्येक भाषा में कुछ शब्द अनुकरणमूलक होते हैं लेकिन फिर भी उसकी संख्या इतनी कम है कि वो पूरे भाषा को प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है। हम ऐसा थोड़ी न कह सकते हैं कि भाषा की उत्पत्ति इस भौं-भौं या म्याऊँ-म्याऊँ आदि से हुआ होगा, वैसे भी उत्तरी अमरीका के एक भाषा ‘अथवक्कन’ में एक भी अनुकरणमूलक शब्द नहीं है फिर भी वो भाषा है।

| आवेग सिद्धांत या मनोभावाभिव्यक्ति सिद्धांत (Pooh-Pooh theory या Interjectional Theroy)

इस सिद्धांत के अनुसार मानव विभिन्न अवसर पर अपने दु:ख, सुख, घृणा, क्रोध, हर्ष आदि भाव व्यक्त करता है। उसी समय हस्त संकेत या शारीरिक संकेत के स्थान पर मानव मुंह से कुछ बोली या ध्वनि उत्पन्न हो जाता है जैसे कि ओह, आह, छि; अरे मईया रे! आदि। इसी से भाषा की उत्पत्ति हुई होगी।

ये सुनकर ही अजीब लगता है कि क्या इस तरह से भी भाषा की उत्पत्ति हो सकती है। इसीलिए इसकी आलोचना भी होती है।

आलोचना – भिन्न-भिन्न भाषा में एक ही भाव को व्यक्त करने के लिए अलग-अलग शब्द का इस्तेमाल किया जाता है जबकि भाव के आधार पर तो सभी शब्द एक समान ही होना चाहिए। जैसे कि अगर उत्तर भारत के किसी बंदे को चोट लग जाये, या उसकी कुटाई हो रही हो तो उसके मुंह से अरे मईयो रे! जैसे शब्द निकलता है लेकिन अन्य देशों में तो ऐसा नहीं होता है।

और वैसे भी इस तरह से शब्दों की संख्या इतनी कम है कि ये पूरे भाषा को प्रतिनिधित्व नहीं दे सकता है। इसीलिए इसे भी भाषा की उत्पत्ति का सही कारण नहीं माना जाता है।

| श्रम परिहरण मूलकतावाद या यो हे हो सिद्धांत (YO-he-ho theory)

इनके अनुसार मनुष्य परिश्रम करने के बाद जब श्वास-प्रश्वास (breathing) क्रिया द्वारा परिश्रम और थकान को दूर करता है उस समय उसके मुंह से कुछ ध्वनि निकलता है, जैसे कि सड़क बनाने वाला , धोबी, मल्लाह, आदि हियो-हियो , हूँ-हूँ, छो-छी, हइयो-हइयो आदि जैसे शब्द निकालता है।

इस तरह के शब्द निकालने के बाद उसे थोड़ी राहत मिलती है और इसी से भाषा की उत्पत्ति हुई होगी। हम जानते हैं कि इस प्रकार के शब्द का भाषा में कुछ विशेष भूमिका नहीं होता है इसीलिए भाषा के प्रधान के रूप में इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

| विकासवाद का सिद्धांत (theory of evolution)

आज का समय विकासवाद को बहुत मानता है। डार्विन ने विकासवाद का सिद्धांत दिया था हालांकि उसका संबंध उस समय इन्सानों के विकास से था लेकिन भाषा के संबंध में भी ये तर्कपूर्ण लगता है। भाषा मनुष्य की एक सामाजिक निधि है और विकासवाद के अनुरूप इसका भी आरंभ हुआ है।

दरअसल विकासवाद का मानना है कि भाषा का विकास सिर्फ आदिम युग में नहीं हुआ है बल्कि ये तो सतत होता ही रहा है, अभी भी हो रहा है। जैसे-जैसे ज्ञान-विज्ञान का प्रयोजन बढ़ता है, पहले से उपलब्ध शब्द के आधार पर नवीन शब्द की रचना हो जाती है। कहा जाता है कि इसी क्रम में भाषा का विकास हुआ होगा।

हालांकि विज्ञान अभी तक इस को सिद्ध नहीं कर सका है कि मनुष्य ने सोचना कब से आरंभ किया। जब ये निर्णय हो जाएगा तब संभवतः मानव भाषा के आरंभ भी पता चल जाएगा। कहने का अर्थ है कि यह सिद्धांत तार्किक तो है लेकिन अभी भी असपष्ट है।

| संपर्क सिद्धांत (Contact theroy)

प्रसिद्ध विद्वान जी. रेवेज इस सिद्धांत के प्रतिपादक हैं। इन्होने मनोविज्ञान के आधार पर इस सिद्धांत को प्रस्तुत किया। इनका मानना ये है कि आदि मानव जब एक दूसरे के साथ या फिर अपने चारों तरफ के वातावरण के संपर्क में आया होगा तब उसके इस सक्रियता के कारण ध्वनि उत्पन्न हुई होगी, पहले तो ये बस चिल्लाने-चीखने तक सीमित रहा होगा लेकिन धीरे-धीरे इसका इस्तेमाल उद्देश्यपूर्ण होता गया होगा और परिणामस्वरूप भाषा उत्पन्न हुआ होगा।

आलोचना – ये तो मानने वाली बात है कि भाषा उत्पत्ति में जरूर मनोवैज्ञानिक योगदान रहा होगा लेकिन इससे भाषा उत्पत्ति सिद्ध नहीं होता है।

| संगीत सिद्धांत (music theory)

आदि मानव भावुक रहता होगा, इसी लिए प्रेम एवं सुख-दु:ख के अवसर पर वो गुनगुनाता होगा एवं इसी गुनगुनाने से शब्द बना होगा और उस शब्द से भाषा की उत्पत्ति हुई होगी। इस सिद्धांत को प्रो. हडसन woo woo Theory यानी कि प्रेम सिद्धांत कहते हैं।

यह सिद्धांत भी एक अनुमान से ज्यादा कुछ भी नहीं है, आदि मानव के समय में संगीत जैसा कोई चीज़ था भी या नहीं ये भी विवादित है, ऐसे में इस सिद्धांत को स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

| समन्वित सिद्धांत (Synthesis Theory)

प्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक हेनरी स्वीट भाषा की उत्पत्ति के संबंध में विकासवाद के सिद्धांत को नकारते नहीं हैं बल्कि उनके विचार में भाषा उत्पत्ति में विकासवाद का सिद्धांत अन्य सिद्धांतों से ज्यादा मान्य और तार्किक है लेकिन उसके साथ ही अनुकरण, भावावेशाभिव्यक्तिवाद, प्रतीकवाद आदि का भी योगदान है।

अनुकरण, यानी कि किसी भी जड़ या चेतन वस्तु से निकले ध्वनि के अनुकरण से भाषा की उत्पत्ति और भावावेशाभिव्यक्ति, यानी कि दु:ख, सुख, क्रोध, घृणा आदि जैसे भाव की अभिव्यक्ति से शब्दों का बनना और उससे भाषा का बनना।

प्रतीकात्मक कहने से स्वीट महोदय का तात्पर्य ये है कि अनुकरण और भावावेशाभिव्यक्ति के अतिरिक्त शेष सभी शब्द प्रतीकात्मक है। जैसे-जैसे मानव क्रिया का विकास होता है वैसे-वैसे इस तरह से शब्द का निर्माण होता है। जैसे कि पीने की क्रिया के दौरान ओठ हिलने से ‘पी’ स्वर निकला होगा इसी से संस्कृत में ‘पिबती’ और हिन्दी में ‘पीना’ शब्द बना होगा।

इसी से मिलता-जुलता एक सिद्धांत है इंगित सिद्धांत (Gestural Theory), इसमें माना जाता है कि मानव अपने ही अंग से होने वाले क्रिया से उत्पन्न ध्वनि से शब्द बनाया होगा और फिर उसी से भाषा बना होगा। जैसे कि पानी पीते समय ओठ के बार-बार हिलने और श्वास को बार-बार खींचने से पा-पा की ध्वनि निकली होगी इसी से ‘पीना’ शब्द बना होगा।

आलोचना – ये सिद्धांत तर्कसंगत तो लगता है क्योंकि इसमें विकासवाद के साथ-साथ अन्य सिद्धांतों का समावेश है। लेकिन प्रतीकात्मक शब्द के विषय में अवश्य कुछ न कुछ संशय है। क्योंकि प्रतीकात्मक शब्द प्रणाली स्पष्ट नहीं है और साथ ही इस आधार पर शब्द की उत्पत्ति को खोज़ना बहुत ही मुश्किल है। और ये थोड़ा अजीब भी लगता है कि चूंकि खाने के समय ‘खा’ स्वर निकला होगा इसीलिए उससे हिन्दी में खाना बन गया होगा। फिर इंग्लिश में eat कैसे बना होगा ये सोचने वाली बात है।

2. परोक्ष मार्ग (Inductive method)

परोक्ष मार्ग से आशय है, आधुनिक भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन कर प्राचीन भाषा तक पहुँचने का प्रयास करना। इस क्षेत्र में गैस्पर्सन महोदय ने काफी काम किया और उन्होने बताया कि भाषा के मूल तक पहुँचने के लिए निम्नलिखित तीन रूपों में भाषा का अध्ययन किया जाना चाहिए;

(1) बच्चों के भाषा का अध्ययन

बच्चों के भाषा के अध्ययन से देखा जा सकता है कि किस तरह बच्चा प्रारंभ में भाषाविहीन होता है, उस समय वो अपने भावों की अभिव्यक्ति हंस कर या रो कर करता है। फिर जैसे-जैसे वो बड़ा होता जाता है अपने अनुकरण प्रवृति के द्वारा वो भाषा सीखता जाता है।

यहाँ पर इस सिद्धांत में समस्या ये आती है कि बच्चा वही भाषा सीखता है या अनुकरण करता है जो कि उसके परिवेश में बोला जा रहा होता है न कि प्राकृतिक रूप से उसका स्वयं सृजन करता है।

(2) प्राचीन असभ्य भाषा का अध्ययन

भाषा की उत्पत्ति के लिए आदि मानव को संदर्भ को रूप में बहुत इस्तेमाल किया जाता है। तो अगर आदि मानव से भाषा की शुरुआत हुई है तो फिर इसे आज भी चेक किया जा सकता है क्योंकि विश्व में आज भी ऐसे अनेक जनजातियां है जो कि आदि मानव की तरह ही अपना जीवन जीते हैं, तो क्यों न उसका वैज्ञानिक अध्ययन किया जाए।

जाहिर है इसका प्रयास भी किया गया इसमें कुछ सफलता भी मिली लेकिन कई वैज्ञानिकों का ये दावा है कि इन जनजातियों की जो भाषा आज से हज़ार वर्ष पूर्व था वहीं आज भी है इसीलिए यह सिद्धांत भी भाषा की उत्पत्ति को सिद्ध करने के लिए काफी नहीं है।

(3) भाषा संबंधी ऐतिहासिक खोज

इस सिद्धांत को अपेक्षाकृत ज्यादा वैज्ञानिक और सफल माना जाता है क्योंकि इसमें भाषा के वर्तमान साहित्यिक रूप को उसके वर्तमान से लेकर प्राचीनतम स्वरूप का अध्ययन किया जाता है, इसके पश्चात दोनों की तुलना की जाती है और फिर भाषा के मूल तक पहुँचने की कोशिश की जाती है।

कुल मिलाकर भाषा उत्पत्ति के ढेरों सिद्धांत गढ़ें गए हैं लेकिन उसमें से कोई भी एक ऐसा सिद्धांत नहीं है जो पूरी तरह से भाषा उत्पत्ति के सिद्धांत को समझा सके। सभी सिद्धांतों में कुछ न कुछ खामियाँ हैं, कुछ सिद्धांतों को देखकर तो ऐसा लगता है कि मानो हम भी इस तरह के एक-दो सिद्धांत बना सकते हैं।

जो भी हो, पर भाषा के संबंध में वर्तमान स्थिति कुछ ऐसी ही है। इसीलिए जो आपको उपयुक्त लगे उसे मान सकते हैं। नीचे भाषा से संबन्धित अन्य लेखों का लिंक दिया जा रहा है, बेहतर समझ के लिए उसे भी अवश्य पढ़ें।

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भाषा का वर्गीकरण – आकृतिमूलक

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