शेयर मार्केट कैसे काम करता है? – भाग 2

इस लेख में हम सरल और सहज हिन्दी में उदाहरण के साथ समझेंगे कि शेयर मार्केट कैसे काम करता है; इस पूरे कॉन्सेप्ट की चर्चा दो भागों में की गई है।

आप अभी इसके दूसरे भाग को पढ़ रहे हैं। तो सीधे इस लेख को पढ़ने से पहले कम से कम पहले वाले लेख को जरूर पढ़ें।

नोट – अगर आप शेयर मार्केट के बेसिक्स को ज़ीरो लेवल से समझना चाहते हैं तो आपको पार्ट 1 से शुरुआत करनी चाहिए। अगर वो समझ चुके है या सिर्फ शेयर मार्केट के काम करने के तरीके को ही समझना है तो फिर जारी रखें।

शेयर मार्केट कैसे काम

| पिछले लेख में हमने समझा…

शेयर मार्केट कैसे काम करता है के पिछले लेख में हमने एक उदाहरण के जरिये समझा था कि किस तरह से कोई बिज़नस प्रोपराइटरशिप (Proprietorship) से पार्टनरशिप (partnership) और फिर प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बन जाती है। प्राइवेट लिमिटेड कंपनी कुछ खास लोगों या वित्तीय संस्थाओं आदि को शेयर बेचकर पैसे जुटाती है। अगर ये कंपनी चाहे तो प्राइवेट लिमिटेड बनकर ही रह सकती है लेकिन उसकी कुछ सीमाएं है जैसे कि कंपनी में अधिकतम 200 सदस्य ही हो सकता है। पर अगर वो कंपनी पब्लिक लिमिटेड कंपनी (Public Limited Company) बनती है तो जितने चाहे उतने लोगों को ये अपना शेयर बेच सकती है या सदस्य बना सकती है, क्योंकि पब्लिक लिमिटेड की सीमाएं (limitation) सीमित नहीं होती है।

दूसरी बात ये कि पब्लिक लिमिटेड में बदलने से कंपनी अपना शेयर आम जनता यानी कि खुदरा निवेशक (Retail investor) को बेच सकता है और सीधे आम जनता से पैसे उगाही कर सकता है। कुल मिलाकर कहने का अर्थ ये है कि पूरी तरह से किसी कंपनी को शेयर मार्केट यानी कि द्वितीयक प्रतिभूति बाज़ार का हिस्सा बनने हेतु पब्लिक लिमिटेड बनाना पड़ता है। ऐसा होने के बाद क्या होता है आइये समझते हैं,

| शेयर मार्केट कैसे काम करता है? – कॉन्सेप्ट

जब कोई कंपनी उस स्तर तक पहुँचती है जहां वे पब्लिक लिमिटेड बन सकती है तब तक ये कंपनी बहुत बड़ी हो जाती है जबकि उसका शेयर छोटा होता जाता है। उदाहरण के लिए अगर मान लें कि हम रिलायंस कंपनी का एक शेयर 1000 रुपए में खरीदते हैं और रिलायंस कंपनी की अभी मार्केट वैल्यू 1000 करोड़ रुपया है तो आप उस कंपनी का सिर्फ 0.00001 परसेंट शेयर धारण करते हैं।

पब्लिक लिमिटेड होते ही स्टॉक एक्स्चेंज की भूमिका बढ़ जाती है। क्यों? क्योंकि एक कंपनी सीधे एक-एक लोगों के पास जाकर तो शेयर बेचेंगे नहीं। कोई तो प्लैटफ़ार्म चाहिए जहां से ये सारा काम हो सकें। यहीं प्लैटफ़ार्म उपलब्ध करवाता है स्टॉक एक्स्चेंज (Stock exchange)।

एक बार स्टॉक एक्स्चेंज में लिस्ट होने के बाद कंपनी अपना शेयर मार्केट में बेच सकते हैं। जब पहली बार कंपनी अपना शेयर मार्केट में लॉंच करती है तो उसे कहा जाता है IPO यानी कि Initial Public Offering। इसका मतलब होता है कि कंपनी पहली बार अपने शेयर को पब्लिक को ऑफर कर रही है।

इस शेयर को अगर कोई व्यक्ति सीधे कंपनी से खरीदता है तो उसे प्राथमिक बाज़ार कहते हैं। इसके बारे में हम पहले भी पढ़ चुके हैं। हम पिछले लेख वाले मुकेश को ही उदाहरण के लिए लेते हैं। उस केस में मुकेश के कंपनी को और पैसे की जरूरत थी तो मुकेश अपनी कंपनी को पब्लिक लिमिटेड बना लिया और स्टॉक एक्सचेंज में रजिस्टर हो गया। इसके बाद मुकेश अपनी कंपनी का IPO लेकर आया। एक शेयर का दाम कितना होगा और उसे कितनी मात्रा में जारी करना है वो सब मुकेश पर निर्भर करता है। वो जितना चाहे उतना शेयर जारी कर सकता है और शेयर का दाम भी तय कर सकता हैं। क्योंकि उसे ही पता है कि उसे कितने पैसों की जरूरत है।

लेकिन एक बात याद रखिए कि मुकेश Authorized Shares से ज्यादा शेयर जारी नहीं कर सकता हैं। अगर मुकेश को Authorized Shares के हिसाब से उतना पैसा नहीं मिल पा रहा है जितना कि उसे चाहिए तो वो Authorized Shares को बढ़ा भी सकता हैं। इसके लिए उसे भारत सरकार के कंपनी एक्ट 2013 को फॉलो करना पड़ेगा।

अब मुकेश को जब आईपीओ जारी करना होगा तो वो स्टॉक एक्स्चेंज के पास जाएगा। स्टॉक एक्स्चेंज उसके शेयर को बेच देगा और निवेशक से पैसे लेकर वो मुकेश को दे देगा। मुकेश का काम यहाँ खत्म हो गया। उसे जितने पैसे चाहिए थे वो मिल गया। अब उस पैसे को वह कंपनी में लगा सकता है। यहाँ पर प्राथमिक बाज़ार खत्म होता है और शुरू होता द्वितीयक बाज़ार (secondary market)। यानी कि अब जो शेयर, शेयर मार्केट में फ्लोट कर रहा है उसकी आपस में ही खरीद-बिक्री शुरू हो जाएगी।

इसका सब का क्या मतलब हुआ?

इसका मतलब ये हुआ कि अभी मान लीजिये कि आपको रिलायंस कंपनी का शेयर चाहिए तो आप सीधे तो उससे खरीद नहीं सकते है क्योंकि ये बहुत पुरानी कंपनी है पता नहीं ये कब अपना IPO लेकर आया होगा, इसीलिए इसके शेयर को आप द्वितीयक मार्केट (Secondary market) से खरीदेंगे। द्वितीयक मार्केट से खरीदने का मतलब हुआ कि आप उस आदमी से रिलायंस का शेयर खरीद रहे है जो पहले ही उसका शेयर खरीद कर बैठा है और अब वो बेचना चाहता है।

अब सवाल ये आता है कि वो बेचेगा क्यूँ जब खरीद कर बैठा है। इसे इस तरह से समझिए मान लीजिये कि आपने रिलायंस का शेयर 1000 रुपए में खरीदा है। अब जैसे ही मार्केट ऊपर भागेगा यानी कि जैसे ही कंपनी प्रॉफ़िट कमाएगा या फिर उस शेयर की डिमांड मार्केट में बढ़ गई तो आपके 1000 रुपए के शेयर की कीमत में भी तो वृद्धि होगी, मान लीजिये कि वो 1000 रुपए का शेयर 1500 रुपए का हो गया। तो जाहिर है कि आप सोचेंगे कि 50 परसेंट का रिटर्न मिल रहा है तो क्यूँ न इसे बेच दे। बस आप 1500 रुपए में इसे बेच देंगे आपके पास 1500 रुपए आ गए, कोई खरीदने वाला होगा वो उसे खरीद लेगा।

अब फिर से सवाल आता है कि लोग खरीदेग क्यूँ जबकि अब उसका दाम 1500 रुपए हो चुका है, तो बात ये है कि जब आप खुद ही उस शेयर को 1000 में खरीदे थे तब आप भी यही सोच के खरीदे थे कि कुछ महीने या साल में ये अच्छा रिटर्न दे देगा। आपको अच्छा रिटर्न मिल गया यही सोच के दूसरा व्यक्ति भी खरीदेगा कि अभी तो इसका दाम 1500 रुपए है लेकिन कुछ महीने या साल में ये जरूर 2000 या उससे भी अधिक हो जाएगा। क्योंकि कंपनी प्रॉफ़िट कमाएगी तो शेयर का मार्केट वैल्यू भी तो बढ़ेगा।

तो इसी तरह से शेयर मार्केट में शेयरों की खरीद-बिक्री होती रहती है लेकिन ये होती कैसे है आइये उसे जानते हैं।

| शेयर मार्केट में शेयरों की खरीद-बिक्री

अब आपके मन में ये सवाल भी आ सकता है कि कोई भी कंपनी तो स्टॉक एक्स्चेंज की मदद से बेचेगा लेकिन आप कैसे उसे वहाँ से खरीदेंगे और बेचेंगे।

तो आपको बता दूँ कि आम आदमी शेयरों की खरीद-बिक्री कर सकें, इसी के लिए एक कॉन्सेप्ट आता है DeMAT अकाउंट का। आपने इसका नाम जरूर सुना होगा। आइये इसे समझते हैं ।

डी-मैट अकाउंट क्या है?

दरअसल पहले ये होता था कि जब भी कोई व्यक्ति शेयर खरीदता था तो उसे कागज पर छपा (यानी कि भौतिक रूप में) मिलता था। इससे कई प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न होती थी जैसे कि नकली अंतरण, खराब हो जाने या खो जाने का डर आदि। इसी तरह के समस्याओं से निपटने के लिए और इंटरनेट आधारित सेवा देने के उद्देश्य से भौतिक प्रतिभूतियों को इलैक्ट्रौनिक रूप से बदल दिया गया। इसे विभौतिकीकरण (DeMaterialization) कहा जाता है। इसे शॉर्ट में DeMAT (डी-मैट) कहा जाता है। इसी के अकाउंट को DeMAT (डी-मैट) अकाउंट कहा जाता है।

कुल मिलाकर इसका मतलब होता है De Materialised रूप में शेयर, बॉन्ड इत्यादि को रखना। इसको आसान भाषा में आप इस तरह से समझ सकते हैं कि आपका शेयर बॉन्ड या डिबैंचर फ़िज़िकल रूप में न होकर Virtual रूप में होता है, जैसे कि आप बैंक में सेविंग्स अकाउंट खुलवाते है और उसमें पैसे रखते है उसी प्रकार DeMAT अकाउंट में शेयर, बॉन्ड, डिबैंचर आदि रखा जाता है।

अब ये DeMAT अकाउंट खुलता कहाँ है? – इस DeMAT अकाउंट के भारत सरकार ने ‘डिपॉज़िटरी’ बना रखा है और यहीं पर ये अकाउंट खुलता है। अब सवाल ये आता है कि ये डिपॉज़िटरी (Depository) क्या है?

डिपॉज़िटरी क्या है?

डिपॉज़िटरी एक संस्थान है जो प्रतिभूतियों (Securities) को विभौतिकीय (De Materialised) फॉर्म में रखता है और निवेशक (Investor) और ट्रेडर को प्रतिभूतियों (Securities) को बेचने और खरीदने की सुविधा देता है।

इंडिया में दो डिपॉज़िटरी है – एक है NSDL और दूसरा है CDSL। यहाँ पर आप DeMAT अकाउंट खुलवा सकते हैं। लेकिन यहाँ पर सीचे अकाउंट नहीं खुलवा सकते हैं। क्यों? क्योंकि बीच में एक और मिडिएटर होता है जो आपको DeMAT अकाउंट खुलवाने के लिए एक प्लैटफ़ार्म प्रदान करता है। उसे कहा जाता है डिपॉज़िटॉरी पार्टीसिपेंट्स (Depository Participants) यानी कि DP। ये एक मध्यस्थ की भूमिका निभाता है डिपॉज़िटरी और क्लायंट (Client) के बीच में।

अभी NSDL से 276 Depository Participants रैजिस्टर्ड है। जैसे कि आपने Zerodha का नाम सुना होगा। ये NSDL से ही रजिस्टर्ड है। इसी प्रकार CSDL से 596 डीपी रजिस्टर्ड है। जैसे कि आपने एंजेल ब्रोकिंग का नाम सुना होगा।

तो ये जो कुल 872 डीपी है इसमें से किसी में भी आप को अकाउंट खोलना पड़ेगा। जब आप इसमें अकाउंट खोलेंगे तो आपका DeMAT अकाउंट भी खुल जाएगा और आपके सेविंग्स बैंक अकाउंट भी इसी के साथ लिंक रहेगा।

जब भी आप शेयर खरीदेंगे आपके सेविंग्स अकाउंट से पैसा कट जाएगा और शेयर आपके DeMAT Account में जमा हो जाएगा। आपको रोज पता चलता रहेगा कि अभी मार्केट की क्या स्थिति है मार्केट ऊपर चल रहा है या नीचे। आप अपने ट्रेडिंग अकाउंट में सब कुछ देख सकते हैं कि आपने कितने में शेयर खरीदा था अभी वो कितना का हो गया है इत्यादि-इत्यादि।

कुल मिलाकर शेयर बाज़ार

पहले आता है स्टॉक एक्स्चेंज जिसके पास कंपनी लिस्टेड होता है और वे मार्केट से पैसा लेने के लिए अपना आईपीओ जारी करता है। लेकिन चूंकि शेयर खरीदने के लिए DeMAT अकाउंट की जरूरत पड़ती है और DeMAT अकाउंट खोलता है डिपॉज़िटरी; जो कि डिपॉज़िटॉरि पार्टीसिपेंट्स (Depository Participants) की मदद से ऐसा कर पाता है। इसी सिस्टम के तहत शेयर मार्केट काम करता है।

इस सब के ऊपर होता है सेबी (SEBI), जो सब की निगरानी करता है। यही वो संस्था है जो शेयर मार्केट में होने वाली सभी कदाचार को रोकता है और सब-कुछ बढ़िया से चलता रहे उसके लिए ये नियम, परिनियम आदि बनाता है।

कुल मिलाकर शेयर मार्केट कैसे काम करता है; ये रहा उसका बेसिक्स, उम्मीद है समझ में आया होगा। अगले लेख में हम शेयर कितने प्रकार के होते हैं और उसकी विशेषताएँ क्या-क्या है; उसको देखेंगे। इतना समझ लेने के बाद आप किसी भी अन्य लेख को पढ़ सकते हैं जैसे कि – बॉन्ड मार्केट, डेरिवेटिव्स, बीमा, म्यूचुअल फ़ंड इत्यादि। सभी का लिंक एक क्रम में नीचे मिल जाएगा-

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| शेयर मार्केट सिरीज़

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