Share Market in Hindi 2 (शेयर बाज़ार बेसिक्स कॉन्सेप्ट)

Basics of Share Market Part 7

इस लेख में हम शेयर मार्केट के दूसरे भाग (Share Market Part 2) पर चर्चा करेंगे। ये लेख पिछले लेख का कंटिन्यूएशन है तो सीधे इस लेख को पढ़ने से पहले कम से कम ↗️पहले वाले लेख को जरूर पढ़ें।

ये लेख बेसिक्स ऑफ शेयर मार्केट सिरीज़ का एक हिस्सा है। उस सिरीज़ का ये 7वां लेख है, तो बिल्कुल ज़ीरो लेवल से समझने के लिए ↗️यहाँ क्लिक करें। अगर आप शुरू से पढ़ते आए है तो इस मैसेज को नजरंदाज करें।
Share Market Part 2

Share Market Main Concept

अभी तक हमने देखा कि प्राइवेट लिमिटेड कंपनी किस तरह से कुछ खास लोगों को शेयर बेचकर पैसे जुटाती है। अगर ये कंपनी चाहे तो प्राइवेट लिमिटेड बनकर ही रह सकती है पर उसकी कुछ सीमाएं है जैसे कि कंपनी में अधिकतम 200 सदस्य ही हो सकता है। लेकिन अगर वो पब्लिक लिमिटेड कंपनी (Public Limited Company) बनती है तो जितने चाहे उतने लोगों को ये अपना शेयर बेच सकता है या सदस्य बना सकता है, क्योंकि पब्लिक लिमिटेड की कोई सीमाएं (limitation) नहीं होता है।

दूसरी बात ये कि पब्लिक लिमिटेड में बदलने से कंपनी अपना शेयर आम जनता को जिसे खुदरा निवेशक (Retail investor) कहा जाता है; को बेच सकते हैं और सीधे आम जनता से पैसे उगाही कर सकते हैं।

यहाँ तक पहुँचते-पहुँचते कंपनी बड़ी होती जाती है जबकि शेयर छोटी होती जाती है। उदाहरण के लिए अगर मान लें कि हम रिलायंस कंपनी का एक शेयर 1000 रुपए में खरीदते हैं और रिलायंस कंपनी की अभी मार्केट वैल्यू 1000 करोड़ है तो आप उस कंपनी का सिर्फ 0.00001 परसेंट शेयर धारण करते हैं।

पब्लिक लिमिटेड होते ही स्टॉक एक्स्चेंज की भूमिका बढ़ जाती है। क्यों? क्योंकि एक कंपनी के रूप में आप सीधे एक-एक लोगों के पास जाकर तो शेयर बेचेंगे नहीं। आपको कोई तो प्लैटफ़ार्म चाहिए जहां से आप ये सारा काम कर सकें। यहीं प्लैटफ़ार्म प्रोवाइड करता है स्टॉक एक्स्चेंज (Stock exchange)।

एक बार स्टॉक एक्स्चेंज में लिस्ट होने के बाद कंपनी अपना शेयर मार्केट में बेच सकते हैं। जब पहली बार कंपनी अपना शेयर मार्केट में लॉंच करती है तो उसे कहा जाता है IPO यानी कि Initial Public Offering। इसका मतलब होता है कि कंपनी पहली बार अपने शेयर को पब्लिक को ऑफर कर रही है।

इस शेयर को अगर कोई व्यक्ति सीधे कंपनी से खरीदता है तो उसे प्राथमिक बाज़ार कहते हैं। इसके बारे में हम पहले भी पढ़ चुके हैं। हम पिछले लेख वाले मुकेश को ही उदाहरण के लिए लेते हैं। उस केस में मुकेश के कंपनी को और पैसे की जरूरत थी तो मुकेश अपनी कंपनी को पब्लिक लिमिटेड बना लिया और स्टॉक एक्सचेंज में रजिस्टर हो गया। इसके बाद मुकेश अपनी कंपनी का IPO लेकर आ गए। एक शेयर का दाम कितना होगा और उसे कितनी मात्रा में जारी करना है वो सब मुकेश पर निर्भर करता है। वो जितना चाहे उतना शेयर जारी कर सकता है और शेयर का दाम भी तय कर सकता हैं। क्योंकि उसे ही पता है कि उसे कितने पैसों की जरूरत है।

लेकिन एक बात याद रखिए कि मुकेश Authorized Shares से ज्यादा शेयर जारी नहीं कर सकता हैं। अगर मुकेश को Authorized Shares के हिसाब से उतना पैसा नहीं मिल पा रहा है जितना कि उसे चाहिए तो वो Authorized Shares को बढ़ा भी सकता हैं। इसके लिए उसे भारत सरकार के कंपनी एक्ट 2013 को फॉलो करना पड़ेगा।

अब मुकेश को जब आईपीओ जारी करना होगा तो वो स्टॉक एक्स्चेंज के पास जाएगा। स्टॉक एक्स्चेंज उसके शेयर को बेच देगा और निवेशक से पैसे लेकर वो मुकेश को दे देगा। मुकेश का काम यहाँ खत्म हो गया। उसे जितने पैसे चाहिए थे वो मिल गया। अब उस पैसे को वह कंपनी में लगा सकता है। यहाँ पर प्राथमिक बाज़ार खत्म होता है और शुरू होता द्वितीयक बाज़ार (secondary market)। यानी कि अब जो शेयर, शेयर मार्केट में फ्लोट कर रहा है उसकी आपस में ही खरीद-बिक्री शुरू हो जाएगी।

इसका क्या मतलब हुआ? इसका मतलब ये हुआ कि अभी मान लीजिये कि आपको रिलायंस कंपनी का शेयर चाहिए तो आप सीधे तो उससे खरीद नहीं सकते है क्योंकि ये बहुत पुरानी कंपनी है पता नहीं ये कब अपना IPO लेकर आया होगा, इसीलिए इसके शेयर को आप द्वितीयक मार्केट (Secondary market) से खरीदेंगे। द्वितीयक मार्केट से खरीदने का मतलब हुआ कि आप उस आदमी से रिलायंस का शेयर खरीद रहे है जो पहले ही उसका शेयर खरीद कर बैठा है।

अब सवाल ये आता है कि वो बेचेगा क्यूँ जब खरीद कर बैठा है। इसे इस तरह से समझिए मान लीजिये कि आपने रिलायंस का शेयर 1000 रुपए में खरीदा है। अब जैसे ही मार्केट ऊपर भागेगा यानी कि जैसे ही कंपनी प्रॉफ़िट कमाएगा या फिर उस शेयर की डिमांड मार्केट में बढ़ गई तो आपके 1000 शेयर की कीमत में भी तो वृद्धि होगी, मान लीजिये कि वो 1000 रुपए का शेयर 1500 रुपए का हो गया। तो जाहिर है कि आप सोचेंगे कि 50 परसेंट का रिटर्न मिल रहा है तो क्यूँ न इसे बेच दे। बस आप 1500 रुपए में इसे बेच देंगे आपके पास 1500 रुपए आ गए, कोई खरीदने वाला होगा वो उसे खरीद लेगा। अब फिर से सवाल आता है कि लोग खरीदेग क्यूँ जबकि अब उसका दाम 1500 रुपए हो चुका है, तो बात ये है कि जब आप खुद ही उस शेयर को 1000 में खरीदे थे तब आप भी यही सोच के खरीदे थे कि कुछ महीने या साल में ये अच्छा रिटर्न दे देगा। आपको अच्छा रिटर्न मिल गया यही सोच के दूसरा व्यक्ति भी खरीदेगा कि अभी तो इसका दाम 1500 रुपए है लेकिन कुछ महीने या साल में ये जरूर 2000 या उससे भी अधिक हो जायगा। क्योंकि कंपनी प्रॉफ़िट कमाएगी तो शेयर का मार्केट वैल्यू भी तो बढ़ेगा।

तो इसी तरह से शेयर मार्केट में शेयरों की खरीद-बिक्री होती रहती है लेकिन ये होती कैसे है आइये उसे जानते हैं।

Buy and Sell of Shares in Share Market

अब आपके मन में ये सवाल भी आ सकता है कि कोई भी कंपनी तो स्टॉक एक्स्चेंज की मदद से बेचेगा लेकिन आप कैसे उसे वहाँ से खरीदेंगे और बेचेंगे।

तो आपको बता दूँ कि आम आदमी शेयरों की खरीद-बिक्री कर सकें, इसी के लिए एक कान्सैप्ट आता है DeMAT अकाउंट का। आपने इसका नाम जरूर सुना होगा। आइये इसे समझते हैं ।

दरअसल पहले ये होता था कि जब भी कोई व्यक्ति शेयर खरीदता था तो उसे कागज पर छपा मिलता था। लेकिन अब चूंकि पूरी तरह से ऑनलाइन व्यवस्था है। इसीलिए DeMAT सिस्टम लाया गया है।

इसका मतलब होता है De Materialised रूप में शेयर, बॉन्ड इत्यादि को रखना। इसको आसान भाषा में आप इस तरह से समझ सकते हैं कि आपका शेयर बॉन्ड या डिबैंचर फ़िज़िकल रूप में न होकर Virtual रूप में होता है। इसीलिए इसको DeMAT अकाउंट कहा जाता है। जैसे कि आप बैंक में सेविंग्स अकाउंट खुलवाते है और उसमें पैसे रखते है उसी प्रकार DeMAT अकाउंट में शेयर, बॉन्ड, डिबैंचर आदि रखा जाता है।

◾ अब ये DeMAT अकाउंट खुलता कहाँ है? तो बता दूँ कि इस DeMAT अकाउंट के भारत सरकार ने ‘डिपॉज़िटरी’ बना रखा है। जहां पर ये अकाउंट खुलता है। अब ये डिपॉज़िटरी (Depository) क्या है?

डिपॉज़िटरी क्या है?
What is a depository?

डिपॉज़िटरी एक संस्थान है जो प्रतिभूतियों (Securities) को De Materialised फॉर्म में रखता है और इन्वेस्टर (Investor) और ट्रेडर को प्रतिभूतियों (Securities) को बेचने और खरीदने की सुविधा देता है।

इंडिया में दो डिपॉज़िटरी है – एक है NSDL और दूसरा है CDSL। यहाँ पर आप DeMAT अकाउंट खुलवा सकते हैं। लेकिन एक मिनट रुकिए आप यहाँ पर सीचे अकाउंट नहीं खुलवा सकते हैं। क्यों? क्योंकि बीच में एक और मिडिएटर होता है जो आपको DeMAT अकाउंट खुलवाने के लिए एक प्लैटफ़ार्म प्रदान करता है। उसे कहा जाता है डिपॉज़िटॉरि पार्टीसिपेंट्स (Depository Participants) यानी कि DP। ये एक मध्यस्थ की भूमिका निभाता है डिपॉज़िटरी और क्लायंट (Client) के बीच में।

अभी NSDL से 276 Depository Participants रैजिस्टर्ड है। जैसे कि आपने Zerodha का नाम सुना होगा। ये NSDL से ही रजिस्टर्ड है।
इसी प्रकार सीएसडीएल से 596 डीपी रजिस्टर्ड है। जैसे कि आपने एंजेल ब्रोकिंग का नाम सुना होगा।

तो ये जो कुल 872 डीपी है इसमें से किसी में भी आप को अकाउंट खोलना पड़ेगा। जब आप इसमें अकाउंट खोलेंगे तो आपका DeMAT अकाउंट भी खुल जाएगा और आपके सेविंग्स बैंक अकाउंट भी इसी के साथ लिंक रहेगा।

जब भी आप शेयर खरीदेंगे आपके सेविंग्स अकाउंट से पैसा कट जाएगा और शेयर आपके DeMAT Account में जमा हो जाएगा। आपको रोज पता चलता रहेगा कि अभी मार्केट की क्या स्थिति है मार्केट ऊपर चल रहा है या नीचे। आप अपने ट्रेडिंग अकाउंट में सब कुछ देख सकते हैं कि आपने कितने में शेयर खरीदा था अभी वो कितना का हो गया है इत्यादि-इत्यादि।

तो कुल मिलाकर पहले आता है स्टॉक एक्स्चेंज जिसके पास कंपनी लिस्टेड होता है और वे मार्केट से पैसा लेने के लिए अपना आईपीओ जारी करता है। लेकिन चूंकि आपको वहाँ से शेयर खरीदने के लिए DeMAT अकाउंट की जरूरत पड़ेगी। और DeMAT अकाउंट खोलता है डिपॉज़िटरी। जो कि डिपॉज़िटॉरि पार्टीसिपेंट्स (Depository Participants) की मदद से ऐसा कर पाता है।

इन सभी के ऊपर होता है सेबी (SEBI), जो सब की निगरानी करता है। यही वो संस्था है जो शेयर मार्केट में होने वाली सभी फ़्रौड को रोकता है। सब-कुछ बढ़िया से चलता रहे उसके लिए ये काम करता है।

कुल मिलाकर ये रहा शेयर मार्केट (Share Market) का बेसिक वर्किंग मॉडल। उम्मीद है आपको अच्छे से समझ में आया होगा।

अगले लेख में हम शेयर कितने प्रकार के होते हैं और उसकी विशेषताएँ क्या-क्या है; उसको देखेंगे। उतना समझ लेने के बाद आप किसी भी अन्य लेख को पढ़ सकते हैं जैसे कि – बॉन्ड मार्केट, डेरिवेटिव्स, बीमा, म्यूचुअल फ़ंड इत्यादि। ⬇️नीचे क्लिक करें

↗️Types of shares in Hindi
Types of shares

Share Market Part 2
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