Financial Market and Money Market (वित्तीय बाज़ार और मुद्रा बाज़ार)

Basics of Share Market Part 2

इस लेख में हम वित्तीय बाज़ार (Financial Market) और उसके प्रकार जैसे कि मुद्रा बाज़ार (Money Market) को सरल और सहज भाषा में समझेंगे, तो लेख को अंत तक जरूर पढ़ें।
Financial Market in Hindi

ये लेख बेसिक्स ऑफ शेयर मार्केट का एक भाग है। अगर आप शेयर मार्केट से जुड़े सभी कॉन्सेप्ट को समझना चाहते है तो क्रम से पढ़ें। ये दूसरे नंबर का लेख है। पहला पार्ट आप ↗️यहाँ क्लिक करके पढ़ सकते हैं। अगर पढ़ चुके हैं तो इस मैसेज को नजरंदाज करें।

Financial Market in Hindi

बाज़ार क्या है?
What is the market?

आसान भाषा में कहें तो ऐसी जगह जहां पर वस्तुओं और सेवाओं की खरीद-बिक्री हो बाज़ार कहलाता है। किसी भी अर्थव्यवस्था में पैसा (Money) एक सर्कल में घूमता रहता है। पैसा तो एक निश्चित मात्रा में ही होता है, वहीं घूम कर कभी इसके पास तो कभी उसके पास आ जाता है।

इस व्यवस्था में सब को कुछ न कुछ प्रॉफ़िट चाहिए होता है। और ये प्रॉफ़िट आता कैसे है? जब हम जितना निवेश करते हैं उससे अधिक प्राप्त करते हैं तो प्रॉफ़िट होता है। अब हम कहीं निवेश करेंगे तभी तो प्रॉफ़िट होगा, कोई बेचेगा और कोई दूसरा उसे खरीदेगा तभी तो प्रॉफ़िट होगा। ये सब काम हम जहां करते हैं उसी को तो मार्केट कहते हैं।

मार्केट में किस तरह से खरीद-बिक्री होगी ये वस्तुओं और सेवाओं के डिमांड और सप्लाइ पर निर्भर करता है। अब सवाल आता है कि ये वित्तीय बाज़ार या Financial Market क्या है?

वित्तीय बाज़ार(Financial Market)

आप किसी भी अर्थव्यवस्था के बारे में सोचिए वहाँ पर दो प्रकार के लोग आपको मिल ही जाएँगे। एक तो वे लोग होंगे जिसके पास अतिरिक्त पैसे है, और दूसरे वे लोग होंगे जिसे पैसे की जरूरत है। इन्ही दोनों समूहों के बीच जो लेन-देन होता है उसी को वित्तीय बाज़ार या Financial Market कहते हैं।

अब लेन देन तभी तो होगा जब दोनों पक्षों को किसी न किसी प्रकार का फायदा हो। जाहिर है जो पैसा देगा उसे ब्याज चाहिए तो उसका फायदा उसे ब्याज के रूप में मिल जाता है। वहीं जो पैसा ले रहा है वो कुछ ऐसा करेगा जिससे कि उसे प्रॉफ़िट हो, जैसे कि वो बिज़नस कर सकता है।

ये जो वित्तीय बाज़ार है ये संगठित (Organized) भी हो सकता है और असंगठित (Unorganized) भी।

जैसे कि अगर कोई व्यक्ति किसी साहूकार से पैसे लेता है तो ये असंगठित हुआ क्योकि ये किसी खास नियम-कानून के दायरे में नहीं आता है। वहीं जो लेन-देन किसी खास कानून के दायरे में रहकर सम्पन्न होता है संगठित वित्तीय बाज़ार (Organized financial market) कहा जाता है।

वित्तीय बाज़ार के प्रकार
Types of financial market

वित्तीय बाज़ार के मुख्य रूप से दो भाग होते हैं – 1. मुद्रा बाज़ार (Money Market) 2. पूंजी बाज़ार (Capital Market)

मुद्रा बाज़ार (Money Market)

वित्तीय बाज़ार का ऐसा भाग जहां कम समय के लिए लेन-देन होता है। यहाँ लेन-देन का मतलब है उधारी लेना या फिर उधारी देना तथा खरीदना या फिर बेचना।

दूसरे शब्दों में कहें तो ये एक ऐसा बाज़ार है जहां कम समय के लिए फ़ंड की जरूरत को पूरा किया जाता है। इसका क्या मतलब हुआ?

कोई भी व्यक्ति दीर्घकालिक निवेश करके कोई कंपनी स्थापित कर लेती है लेकिन सिर्फ उतने से तो काम बनता नहीं है जाहिर है सिर्फ कंपनी के स्थापना से उत्पादन थोड़ी न शुरू हो जाएगा।

उत्पादन को शुरू करने के लिए या उसे जारी रखने के लिए या फिर उसमें वृद्धि के लिए प्रतिदिन कुछ न कुछ खर्चने पड़ते हैं ये जो छोटे-छोटे खर्चे होते हैं इसे कार्यशील पूंजी (working capital) कहा जाता है जो प्रतिदिन की कमी को पूरा करने में काम आता है। ये कार्यशील पूंजी मुद्रा बाज़ार से आता है।

कुल मिलाकर कहें तो मुद्रा बाज़ार किसी अर्थव्यवस्था का एक अल्पाधिक वित्तीय बाज़ार होता है। इस बाज़ार में मुद्रा का विनिमय (Exchange) व्यक्तियों या समूहों जैसे कि वित्तीय संस्थान, बैंक, सरकार, कंपनियाँ आदि के बीच होता है। इसमें से एक पार्टी ऐसा होगा जिसके पास अतिरिक्त मुद्रा होगी और एक पार्टी ऐसी होगा जिसे मुद्रा की जरूरत होगी।

यहाँ पर एक बात याद रखिए कि मुद्रा बाज़ार अल्पकालिक पूंजी जरूरतों को पूरा करता है और ये अल्पकाल आमतौर पर 364 दिन तक का होता है यानी कि अगर आप 364 दिनों से ज्यादा दिनों के लिए कहीं से ऋण लेते हैं तो वो दीर्घकालिक पूंजी जरूरत में गिना जाएगा जो कि पूंजी बाज़ार का एक हिस्सा है। इसकी चर्चा हम आगे करने वाले है।

मुद्रा बाज़ार के प्रकार
Types of money market

मुद्रा बाज़ार (Money Market) के दो रूप होते हैं – असंगठित मुद्रा बाज़ार (Unorganized money market) और संगठित मुद्रा बाज़ार (Organized money market)

असंगठित मुद्रा बाज़ार
Unorganized money market

ये मुद्रा बाज़ार तो प्राचीन काल से ही अस्तित्व में रहा है। वो कैसे? मान लीजिये कि आपको अपने खेत के लिए खाद खरीदने के लिए पैसे नहीं है तो आप शायद यही सोचेंगे कि चलो अपने आस-परोस से किसी व्यक्ति से ही ले लेते हैं क्योंकि कुछ ही समय की तो बात है। ये जो लेन-देन है उसे असंगठित मुद्रा बाज़ार कहा जाता है। यानी कि दूसरे शब्दों में कहें तो इसकी गतिविधि किसी संस्था द्वारा विनियमित नहीं होती है।

उदाहरण के लिए आप साहूकार को ही ले लीजिये इसको नियंत्रित करने वाला कोई होता नहीं है। अपने स्वयं के धन को ये जितनी मर्जी उतनी इंटरेस्ट रेट पर किसी को देते हैं। इसीलिए ये असंगठित मुद्रा बाज़ार कहलाते हैं।

संगठित मुद्रा बाज़ार
Organized money market

जैसा कि ये नाम से ही स्पष्ट है कि इस बाज़ार को विनियमित करने के लिए कोई मान्यता प्राप्त संस्था होता है। मान लीजिये आपने किसी बैंक से 2 महीने के लिए लोन लिया तो यहाँ बैंक चूंकि खुद एक मान्यताप्राप्त संस्थान है और वो रिजर्व बैंक द्वारा विनियमित होता है जो कि एक मान्यता प्राप्त संस्था है। इसीलिए यहाँ जो लेन-देन हुआ उसे संगठित मुद्रा बाज़ार कहा जाता है।

भारत में संगठित मुद्रा बाज़ार 1980 के दशक में विकसित होना शुरू हुआ। और आज ये काफी विस्तार ग्रहण कर चुका है। आज भारत में संगठित मुद्रा बाज़ार के आमतौर पर आठ घटक माने जाते हैं। आइये उन सभी पर संक्षिप्त में चर्चा कर लेते हैं।

1. ट्रेजरी बिल (Treasury bills)

इसका चलन 1986 में शुरू हुआ था। इसका इस्तेमाल भारत सरकार अपनी लघु अवधि की धन आवश्यकता की पूर्ति के लिए करता है। वर्तमान में भारत सरकार द्वारा 91 दिन, 182 दिन और 364 दिन तक के लिए ट्रेजरी बिल जारी किए जाते हैं। आमतौर पर इसमें बैंक या वित्तीय संस्थान ही निवेश करते है।

2. जमा प्रमाण पत्र (Certificate of Deposit) CD

इसका प्रचलन 1989 में शुरू हुआ था। इसका उपयोग भारत के बैंको द्वारा तात्कालिक धन की कमी की पूर्ति के लिए किया जाता है। बैंक इसे अपने ग्राहकों को लघुअवधि के लिए जारी करता है। ये व्यापार योग्य (Tradable) होता है इसीलिए अगर ग्राहक चाहे तो इसे बाज़ार में बेच भी सकता है।

याद पर एक बात याद रखिए कि 1993 में आरबीआई ने अखिल भारतीय वित्त संस्थानों (All india financial institutions) को भी जमा प्रमाण पत्र जारी करने की अनुमति दे है। अभी फिलहाल चार अखिल भारतीय वित्त संस्थान भारत में है ये हैं – Exim Bank, NABARD, SIDBI और NHB।

ये जो चार संस्थान है ये 3 वर्षों तक के लिए जमा प्रमाण पत्र जारी कर सकता है, जबकि इसको छोड़कर सभी बैंक या वित्तीय संस्थान ज्यादा से ज्यादा 364 दिन तक के लिए ही जारी कर सकता है।

3. वाणिज्यिक पत्र (Commercial Paper)

इसका चलन 1990 में शुरू हुआ था। इसका उपयोग कॉर्पोरेट सेक्टर द्वारा लघुअवधि के लिए पूंजी आवश्यकता की पूर्ति की जाती है। लेकिन वही कंपनी इसे जारी कर सकता है जो स्टॉक एक्स्चेंज में सूचीबद्ध हो और उसकी कार्यकारी पूंजी (working capital) 5 करोड़ रुपए से कम न हो। इस तरह के कंपनियों को आरबीआई द्वारा मान्यता प्राप्त किसी साख एजेंसी (Credit Rating Agency) से साख प्रमाण पत्र लेना अनिवार्य होता है।

4. वाणिज्यिक बिल (Commercial Bill) CB

ये भी 1990 में चलन में आया था। इसका इस्तेमाल अखिल भारतीय वित्त संस्थानों, गैर-बैंकिंग वित्त कंपनियों, अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों, मर्चेंट बैंकों, सहकारी बैंकों तथा म्यूचुअल फ़ंड कंपनियों द्वारा किया जाता है।

5. कॉल मुद्रा बाज़ार (Call money market) CMM

यह एक अंतर बैंक मुद्रा बाज़ार (Interbank Money Market) है क्योंकि ये आमतौर पर बैंक या वित्तीय संस्थाओं के मध्य लेन-देन के लिए ही इस्तेमाल होता है। ये बाज़ार एक दिवसीय धन के लेन-देन के लिए फेमस है जिसे कि एक रात का उधार (Overnight Borrowing) या फिर Money at call भी कहा जाता है।

वैसे यहाँ 14 दिनों तक के लिए भी उधार दिया जाता है लेकिन इसका इस्तेमाल लोग कम ही करते हैं। आमतौर पर अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक (Scheduled Commercial Bank) एवं सहकारी बैंक इस बाज़ार में ऋण आवंटित करने के साथ-साथ इससे ऋण लेते भी है वही LIC, IDBI, तथा NABARD इस बाज़ार में केवल ऋण आवंटनकर्ता के रूप में कार्य करते हैं।

6. मुद्रा बाज़ार म्यूचुअल फ़ंड (Money Market Mutual Funds)

ये 1992 से चलन में है। ये वैयक्तिक स्तर पर लघु-अवधि निवेश की सुविधा देता है। इसकी खासियत ये है कि शेयर मार्केट का ज्ञान न रखने वाला व्यक्ति भी इस माध्यम से पैसा निवेश करके लाभ कमा सकता है।

वैसे म्यूचुअल फ़ंड लघुअवधि के साथ-साथ दीर्घावधि के लिए भी होता है। और इसका इस्तेमाल आमतौर पर दीर्घावधि में पैसा कमाने के लिए ही होता है। इसे विस्तार से समझने के लिए यहाँ क्लिक करें।

7. रेपो एवं प्रतिवर्ती रेपो (Repo and Reverse Repo)

भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा वर्ष 1992 में रेपो तथा 1996 में प्रतिवर्ती रेपो (Reverse Repo) को चलन में लाया गया। रेपो के अंतर्गत आरबीआई छोटी अवधि के लिए बैंकों को उधार देते हैं। वहीं प्रतिवर्ती रेपो के अंतर्गत बैंक, आरबीआई को छोटी अवधि के लिए उधार देती है।

जिस ब्याज दर पर आरबीआई छोटी अवधि के लिए बैंकों को उधार देता है उसे रेपो रेट कहा जाता है और जिस रेट पर आरबीआई, बैंकों से छोटी अवधि के लिए उधार लेता है उसे प्रतिवर्ती रेपो रेट कहा जाता है।

8. नकद प्रबंधन बिल (Cash management bill) CMB

2010-11 से प्रचलन में है। ये एक तरह से ट्रेजरी बिल की तरह ही है। इसका इस्तेमाल भारत सरकार द्वारा तात्कालिक धन की कमी को पूरा करने के लिए किया जाता है। लेकिन इसे 91 दिनों से कम की परिपक्वता अवधि (Maturity period) के लिए जारी किया जाता है।

तो ये था मुद्रा बाज़ार (Money market) का कान्सैप्ट जो कि वित्तीय बाज़ार का एक हिस्सा है। उम्मीद है आपको समझ में आया होगा।

✔️अब हम अगले लेख में वित्तीय बाज़ार के दूसरे हिस्से ⏬ पूंजी बाज़ार (Capital Market) के बारे में जानेंगे क्योंकि यहीं वो मार्केट है जहां से शेयर बाज़ार का कॉन्सेप्ट निकलता है।

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