प्रेरक हिन्दी कहानियाँ । Short Hindi Motivational Story

प्रेरक हिन्दी कहानियाँ

इस लेख में हम कुछ बेहतरीन प्रेरक हिन्दी कहानियाँ पढ़ने वाले हैं।

प्रेरक हिन्दी कहानियाँ

1.समय निकालना पड़ता है?

एक बार की बात है। दिल्ली में एक रिटायर्ड अधिकारी अपनी पत्नी के साथ रहा करते थे। उनका एक लड़का था, जो अमेरिका में एक सॉफ्टवेयर कंपनी में कार्यरत था

उनकी एक बेटी भी थी, जो सिंगापुर में एक मैनेजमेंट कंसलटेंट के पद पर कार्यरत थी। एक बार उनके पिता ने अपने लड़के को फोन किया, कहा, बेटा, मैं तुम्हारी माँ को आज तलाक दे रहा हूँ, मैंने सोचा यह निर्णय लेने से पहले मैं तुनको सब बता दूँ।

पिता की बात सुन कर बेटा अवाक रह गया। बोला, पिता जी, ये आप क्या बोल रहें है? माँ को आप इस उम्र में तलाक दे रहे है, आप ऐसा कैसे कर सकते हैं?

पिता ने कहा, मैं तुम्हारी माँ की रोज की चिक-चिक से तंग आ गया हूँ अब मैं उसके साथ नहीं रह सकता, तुम ये बात अपनी बहन को भी बता दो।

यह सब सुन कर बदहवास बेटे ने सिंगापूर अपनी बहन को फोन किया और सारी बात बताई। बेटी ने भी घबरा कर अपने पिता को फोन मिलाया, पिता जी, ये मैं क्या सुन रही हूँ? आप ऐसा कैसे कर सकते हैं?

माँ को ऐसे कैसे छोड़ सकते हैं? पिता ने कहा, देखो मैंने यह निर्णय ले लिया है, अब हमारा एक साथ रहना संभव नहीं है और मैं आज ही तलाक के कागजात पर दस्तखत करने जा रहा हूँ।

बेटी ने कहा, पिता जी, ऐसा मत कीजिये, आप ठहरिए, मैं और भाई अगले दो दिनों में इंडिया आ रहे हैं आपके पास, हम आपसे बात करेंगे, आखिर आप यह क्या कर रहे हैं?

आपको मेरी कसम, जब तक हम आपके पास पहुँच नहीं जाते, ऐसा कुछ भी नहीं कीजिएगा। बेटी ने पिता की सहमति मिलते ही फोन रख दिया।

अब वह पिता अपनी पत्नी की ओर घूमा और बोला, बधाई हो! वे दोनों दो दिन बाद हमारे पास आ रहे हैं, पति की बात सुन कर पत्नी के चेहरे पर मुस्कुराहट तैर गयी और आंखो में अपने बच्चों को देखने की ललक छा गयी। 

दरअसल वे दोनों कई सालों से अपने पिता के कितना भी कहने पर बस यही कहता था कि समय नहीं मिलता है जो वहाँ आएंगे ।

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2.सही समय और सही निर्णय

एक बार की बात है। किसी शहर में एक प्रोफेसर साहब अपने 25 साल के बेटे के साथ रहते थे।

वह अपने बेटे की हमेशा कनफ्यूज्ड रहेने की आदत से बेहद परेशान थे। उनका बेटा कभी भी सही समय पर कोई काम नहीं करता, कोई निर्णय नहीं ले पाता,

इस वजह से कई बार उसकी नौकरी छुटती। लेकिन उसे यह बात समझ ही नहीं आती थी कि जीवन में सही निर्णय कब लिया जाये।

प्रोफेसर साहब हमेशा उससे कहा करते, यदि समय पर निर्णय नहीं लोगे, तो तुम्हें नुकसान उठाना पड़ेगा, लेकिन बेटे के कान पर जूं नहीं रेंगति।

एक दिन प्रोफेसर साहब को एक युक्ति सूझी। उन्होने अपने बेटे को अपने लैब में बुलाया। बेटा वहाँ पहुंचा, तो उसने देखा कि प्रोफेसर साहब ने एक मेंढक मँगवा रखा है।

उन्होने चूल्हे पर एक पतीले में पानी चढ़ाया और उसे उबलने दिया। पानी जब पूरा उबाल गया, तो उन्होने मेंढक को उस पानी में दाल दिया।

मेंढक को जैसे ही पानी गरम लगा, तो उसने तुरंत छलांग लगाई और खौलते पानी से बाहर आ गया। बेटे को कुछ समझ नहीं आया कि यह क्या हो रहा है।

प्रोफेसर साहब ने बेटे को बैठने और वहाँ जो भी कुछ हो रह है, देखते रहने का इशारा किया। अब उन्होने एक दूसरे पतीले में पानी लिया, उसमें उस मेंढक को डाल दिया और पानी को गरम करने लगे।

थोड़ी देर में पानी खौल गया, लेकिन मेंढक ने उस पानी से बाहर छलांग नहीं लगाया और कुछ देर में डूब कर मर गया। बेटे को यह सब देख कर आश्चर्य हुआ।

अब प्रोफेसर साहब ने उससे पूछा, बेटे, अब जरा बताओ कि पहले मेंढक ने बाहर छलांग लगा दी, लेकिन अब वह मर गया, इसका क्या कारण है?

बेटा कुछ समझ नहीं पाया। प्रोफेसर साहब ने कहा, पहले जब मेंढक को खौलते पानी में डाला गया, तो उसे पानी के गरम होने का अहसास हो गया और उसने छलांग लगा दी,

पर बाद में जैसे- जैसे पानी गरम होने लगा, मेंढक अपनी अंदरूनी ऊर्जा को खर्च कर स्वयं को उस पानी के लायक बनाता रहा और जब पानी पूरी तरह गरम हो गया,

तब तक उस मेंढक के अंदर इतनी ऊर्जा नहीं बची थी कि वह बाहर छलांग लगा पाता, क्योंकि उसने अपनी सारी ऊर्जा खुद को पानी के तापमान के बराबर में खर्च कर दी थी।

यदि पानी के गरम होने की शुरुआत में वह मेंढक सही निर्णय लेकर छलांग लगा देता, तो उसकी यह गयी नहीं होती, इसीलिए जीवन में सही समय पर आकलन कर सही निर्णय लेना बेहद आवश्यक है,

पिता की बात सुन कर बेटे की आंखों में चमक आ गयी, मानो उसे जीवन को देखने का एक नया नजरिया मिल गया हो।

टाटा समूह के चेयरमैन रतन टाटा ने कहा था। मैं नहीं जानता कि कभी- कभी मैं जो निर्णय लेता हूँ वह सही है या गलत,

लेकिन यह तय है कि अपने लिए गए निर्णय को हकीकत बनाने के लिए से एड़ी-चोटी एक कर देता हूँ और फिर वह निर्णय सही समय पर लिया गया सही निर्णय साबित होता है।  

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3.उपदेश से करनी भली

एक गाँव में एक बूढ़ा मुखिया रहता था। काफी उम्र हो जाने के बाद वह एक उपदेशक बन गया

अपने गाँव के चौपाल पर बैठ कर वह लोगों को यही समझाया करता था कि अगर जीवन में सुख-समृद्धि से रहना है, तो कभी किसी पर क्रोध नहीं करना चाहिए।

एक बार एक युवक उस गाँव से गुजर रहा था, उसके कान में भी उस बूढ़े की बात पड़ी। उसे उसकी बात बहुत अच्छी लगी।

उसे, उस बूढ़े से मिलकर कुछ और बात करने की उत्सुकता हुई। तो उसने बूढ़े से फिर पूछा, बाबा, जीवन में शांति से रहना है तो क्या करना चाहिए?

बूढ़े ने फिर वही बात दोहराया, यदि शांति से रहना चाहते हो तो कभी किसी पर क्रोध मत करना, चाहे तुम्हारे सामने जो भी परिस्थिति हो, क्योंकि क्रोध विवेक को खा जाता है और फिर इंसान सही गलत का भेद भूल जाता है।

युवक ने पूछा, जी, क्या कहा आपने? मैंने कहा कि तुम जीवन में कभी किसी पर क्रोध मत करना।

युवक ने बात नहीं सुनने का नाटक किया और फिर पूछा, जी, मैंने सुना नहीं, क्या करना चाहिए, क्या कहा आपने ? बूढ़े ने कहा, अरे भाई, किसी पर किसी भी परिस्थिति में क्रोध नहीं करना चाहिए, यही जीवन में सुखी रहने का मंत्र है।

युवक ने फिर बात नहीं सुन पाने का नाटक किया और बोला, बाबा, मैं आपकी बात सुन नहीं पाया, क्या कहा था आपने? बाबा ने फिर कहा, कान खोल कर सुन लो, किसी भी परिस्थिति में कभी भी किसी पर क्रोध कदापि नहीं करना।

इस बार बाबा की आवाज में तल्खी थी। युवक ने एक बार फिर नही सुनने का नाटक करते हुए कहा, जी बाबा, मैं ठीक से सुन नहीं पाया, फिर से बोलिए-

इस बार बूढ़ा चिल्लाया, अबे गधे, मैंने कितनी बार कहा कि जीवन में सुखी रहना है, तो किसी पर कभी भी क्रोध मत कर, पर तू सुनता ही नहीं, बहरा हो गया है क्या?

युवक ने फिर बोला, जी बाबा आपने ठीक कहा मैंने सुना नहीं, एक बार फिर बोलिए क्या कहा था आपने।

अब बूढ़े का गुस्सा सातवें आसमान पर था, उसने पास रखी एक छड़ी उठा ली और युवक को घूरते हुए कहा, अब अगर तुमने मेटी बात नहीं सुनी, तो मार मार कर इस छड़ी से तेरी पीठ लाल कर दूंगा,

मैंने कहा कि किसी भी परिस्थिति में किसी पर क्रोध नहीं करना चाहिए, अब बता तूने सुना कि नहीं, नहीं सुना तो अभी तेरी खबर लेता हूँ। युवक मुस्कराया और उठ कर अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा।

अगर उस बूढ़े की तरह हमें भी उपदेश देने की आदत है, तो सबसे पहले हमें स्वयं उस उपदेश के सिद्धांतों पर चल कर अपनी प्रामाणिकता साबित करनी होगी, अन्यथा कोई भी हमारी बात को गंभीरता से नहीं लेगा।

यदि कोई असफल व्यक्ति लोगों को सफलता के मंत्र बताने लगे, तो उसका उपहास तय है।

यदि कोई सिगरेट पीनेवाला व्यक्ति धूम्रपान से होनेवाली बीमारियों पर प्रवचन देने लगे, तो उसके दोस्त मित्र ही उसकी हंसी उड़ाने का कोई भी अवसर नहीं छोड़ेंगे। 

हमारी यही तो परेशानी यह है कि हम हमेशा दूसरों को सुधारने में लग जाते है पर खुद अपने ऊपर वह बात लागू नहीं करते।

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