शिक्षाप्रद धार्मिक कहानी । धार्मिक लघु कथाएं

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शिक्षाप्रद धार्मिक कहानी

10+ शिक्षाप्रद धार्मिक कहानी


शिक्षाप्रद धार्मिक कहानी न. 1

ईश्वर प्राप्ति का अधिकार

गुरुकुल का प्रवेशोत्सव समाप्त हो चुका था, कक्षाएँ नियमित रूप से चलने लगी थीं। योग और अध्यात्म पर कुलपति स्कंधदेव के प्रवचन सुनकर विद्यार्थी बड़ा संतोष और उल्लास अनुभव करते थे।

एक दिन प्रश्नोत्तर-काल में शिष्य कौस्तुभ ने प्रश्न किया – गुरुदेव! क्या ईश्वर इसी जीवन में प्राप्त किया जा सकता है ?! स्कंधदेव एक क्षण चुप रहे। कुछ विचार किया और बोले – “इस प्रश्न का उत्तर तुम्हें कल मिलेगा और हाँ आज सायंकाल तुम सब लोग निद्रादेवी की गोद में जाने से पूर्व 108 बार वासुदेव मंत्र का जप करना और प्रातःकाल उसकी सूचना मुझे देना।’!

प्रात:काल के प्रवचन का समय आया। सब विद्यार्थी अनुशासनबद्ध होकर आ बैठे। कुलपति ने अपना प्रवचन प्रारंभ करने से पूर्व पूछा– “तुममें से किस-किस ने कल सायंकाल सोने से पूर्व कितने-कितने मंत्रों का उच्चारण किया।”

सब विद्यार्थियों ने अपने-अपने हाथ उठा दिए। किसी ने भी भूल नहीं की थी। सबने 108-108 मंत्रों का जप और भगवान का ध्यान कर लिया था। किंतु ऐसा जान पड़ा कि स्कंधदेव संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई। कौस्तुभ नहीं था, उसे बुलाया गया।

स्कंधदेव ने अस्त-व्यस्त कौस्तुभ के आते ही प्रश्न किया -“कौस्तुभ! क्या तुमने भी 108 मंत्रों का उच्चारण सोने से पूर्व किया था।! कौस्तुभ ने नेत्र झुका लिए, विनीत वाणी और सौम्य मुद्रा। उसने बताया -”गुरुदेव अपराध क्षमा करें, मैंने बहुत प्रयत्न किया किंतु जब जप की संख्या गिनने में चित्त चला जाता तो भगवान का ध्यान नहीं रहता था और जब भगवान का ध्यान करता तो गिनती भूल जाता। रात ऐसे ही गई और वह ब्रत पूर्ण न कर सका।!

स्कंधदेव मुसकराए और बोले -”बालको! कल के प्रश्न का यही उत्तर है। जब हम संसार के सुख, संपत्ति भोग की गिनती में लग जाते हैं तो हम भगवान का प्रेम भूल जाते है। उसे तो कोई भी पा सकता है, बाह्य कर्मकांड से चित्त हटाकर उसे कोई भी प्राप्त कर सकता है।”!


शिक्षाप्रद धार्मिक कहानी न. 2

आत्मज्ञान की प्राप्ति

महेंद्र पर्वत पर गंगा के सुरम्य तट पर दीर्घतपस नाम के एक ब्राह्मण अपनी धर्मपत्नी सहित निवास करते थे । दीर्घतपस स्वाध्यायशील, धार्मिक और ईश्वरपरायण महात्मा थे, उनकी धर्मपत्नी भी सुशील स्त्री थी।

समय पाकर उनके उन्हीं के गुणों वाले दो पुत्र जन्मे । बड़े का नाम पुण्य और छोटे का नाम पावन रखा गया। पुण्य बड़ा तपस्वी था। थोड़े ही समय में उसने आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया। अब उसे संसार से किसी प्रकार का न राग था न द्वेष, मोह न आसक्ति; वह निष्काम भावना से सांसारिक कर्त्तव्यों का पालन करता। पावन शिक्षित था सुशील था, किंतु उसे आत्मबोध न हुआ।

एक दिन दीर्घतपस का देहांत हो गया, उससे पुण्य को दुःख न हुआ पर पावन ने कई दिन पिता की स्मृति में रो-रो कर बिताएं। समय का संयोग कुछ दिन में ही माता का भी देहावसान हो गया। तब तो पावन पर एक तरह से वज्रपात ही हो गया। मारे दुःख के उसने कई दिन तक अन्न भी ग्रहण नहीं किया। पुण्य ही ऐसा था जिसे न तो पिता की मृत्यु का दुःख हुआ और न माता के निधन का।

उसने दोनों का मृतक संस्कार और श्राद्ध तर्पण शास्त्रीय विधान से संपन्न किया। काफी समय बीत जाने पर भी पावन का शोक जब समाप्त न हुआ तो एक दिन पुण्य ने उसे समीप बुलाकर समझाया -‘तात! हमारे माता-पिता ने इस लोक में धर्म और पुण्य का पर्याप्त अर्जन किया, सो वे जीवन मुक्त हो गए। शरीर तो वस्त्र की तरह है, आत्मा अनेक शरीर बदलती रहती है, उसके लिए दुःख किस बात का।”!

इतना समझाने पर भी पावन को बोध न हुआ तो पुण्य ने योग-दृष्टि से उसे उसके कई जन्मों का हाल दिखाया। वही पावन दशार्णव देश में वानर, तुषार में राजपुत्र, त्रिगर्त देश में गधा और शाल में वन पक्षी के रूप में जन्मा था। सौ जन्मों में अनेक योनियों का विवरण देखकर पावन का मोह छूटा और तब उसे आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई।


शिक्षाप्रद धार्मिक कहानी न. 3

सिद्धि से पहले

एक आवश्यक राज-काज के लिए मंत्री की तुरंत आवश्यकता पड़ी। उन्हें बुलाया गया तो मालूम पड़ा कि वे पूजा में बैठे हैं, इस समय

न आ सकेंगे। काम जरूरी था, राजा ने स्वयं ही मंत्री के पास पहुँचना उचित समझा। राजा के पहुँचने पर भी मंत्री उपासना पूरी होने तक जप ध्यान में बैठे ही रहे। पूजा समाप्त होने पर जब मंत्री उठे तो राजा ने पूछा -”भला ऐसी भी कौन महत्त्वपूर्ण बात है जिसके लिए तुम मेरी उपेक्षा करके भी लगे रहे ?!!

मंत्री ने कहा–‘“ राजन! मैं गायत्री जप कर रहा था। यह महामंत्र लोक और परलोक में कल्याण के सब साधन जुटाता है। इसका फल बहुत बड़ा है। इसी की मैं तन्मय होकर उपासना करता हूँ।”

राजा ने कहा–“तब तो इसे हम भी सीखेंगे और वैसा ही लाभ हम भी उठावेंगे।” मंत्री ने कहा -‘सीखने में हर्ज नहीं, पर आपको वैसा लाभ न मिल सकेगा जैसा बताया गया है। श्रद्धा और विश्वास के बिना मंत्र भी फल नहीं देते। मंत्र सीखने से पहले आपको श्रद्धा की साधना करनी चाहिए।”

राजा जिस काम से आए थे वह मंत्रणा करके वे वापस चले गए। पर उस मंत्र की बात उनके मस्तिष्क में जमी ही रही, जिसे मंत्री इतना महत्त्व देते हैं।

एक दिन राजा ने प्रसंगवश मंत्री से पूछा–‘ श्रद्धा के बिना मंत्र क्यों फल नहीं देता ?” मंत्री ने कुछ उत्तर न दिया चुप हो गए। पर थोड़ी देर में एक बालक कर्मचारी उधर से निकला तो मंत्री ने उसे पास बुलाकर आज्ञा दी -“राजा के गाल पर एक चपत लगा दो।”

बालक इस आज्ञा को सुनकर सन्‍न रह गया। पर उसने वैसा किया नहीं। मंत्री ने दो-तीन बार वही आज्ञा दी तो भी उस लड़के ने मंत्री का कहना नहीं माना और चुपचाप खड़ा रहा।

मंत्री की असभ्यता देखकर राजा को क्रोध आया और उसने लड़के को आज्ञा दी कि इस मंत्री के गाल पर दो चपत लगाओ। कर्मचारी लड़के ने तुरंत मंत्री के गाल पर दो चपत जड़ दिए।

मंत्री ने नम्नतापूर्वकत कहा -”राजन, यह आपके प्रश्न का उत्तर है। लड़के ने मेरा कहना नहीं माना। उसने आपको वैसी आज्ञा का अधिकारी और मुझे अनधिकारी माना। मंत्रों की भी यही बात है। वे श्रद्धावान और सत्पात्र की ही इच्छा पूरी करते हैं। इसलिए आपको अधिकारी बनने के लिए मैंने कहा था और मंत्र जप से भी पहले श्रद्धा सदाचार को अपनाने की प्रार्थना की थी।’!


शिक्षाप्रद धार्मिक कहानी न. 4

वासना का अभिशाप

रूपगर्विता अप्सरा वषु अपनी पूर्ण साज-सज्जा के साथ चल दी महर्षि दुर्वासा को उनके तप से विचलित करने के लिए। वषु ने सोचा सर्वत्र मेरा ही प्रभुत्व क्यों न रहे। सारा वन प्रांत गूँज उठा उसके थिरकते गीत और पायलों की झंकारों से।

दुर्वासा की कुटिया के समीप ही वह जा पहुँची । उन्मादकारी स्वर लहरी महर्षि के कर्ण कुहरों में प्रवेश करने लगी। ऋषि का ध्यान भंग हुआ। उन्होंने योग-दृष्टि से देखा तो सब कुछ समझने में उन्हें देर न लगी।

अप्सरा उन्हें लुभाने और पथभ्रष्ट करने आई है। तप को वासना परास्त करे, यह कल्पना उन्हें बुरी लगी। उन्हें क्षोभ हो आया, आँखें लाल हो गईं।

कुटी से बाहर निकलकर उस रूपगर्विता की थिरकन को एक क्षण के लिए ऋषि ने देखा और कहा -”अभागी ! तुझे जो सौरभ मिला था, उससे तू जगती की प्रसुप्त भक्ति भावना को जगा सकती थी, सरसता को अमृत की दिशा में मोड़ सकती थी, पर हाय री मूर्खा ! तू तो उलटा ही करने को उद्यत हो गई। जा, अपने कर्म का फल भोग। तू पक्षी की योनि में मारी-मारी फिरेगी। तेरे चार पुत्र होंगे पर वे अपंग ही बने रहेंगे।’!

महर्षि का शाप मिथ्या कैसे होता। वषु अप्सरा का कलेवर छोड़, एक साधारण सी चिड़िया बन गई। अंडे दिए, उनसे चार बच्चे निकले। पर वे चारों ही अपंग थे। रूपगर्विता अप्सरा के पास अब पश्चात्ताप ही शेष था।

कला की देवी वषु अपने नृत्य संगीत से आज भी दुर्वासना को भड़काकर जन मानस में अपनी प्रभुता जमाने में संलग्न है। पर लक्ष्य भ्रष्ट होने के कारण निराश्रित पक्षी की तरह ही उसे इधर-उधर मारी-मारी फिरना पड़ रहा है।

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों ही बच्चे कला के गर्भ से उत्पन होते हैं। पर वासना का लक्ष्य बन जाने से तो वे अपंग ही रहेंगे। कला की अप्सरा को आज भी शापित वषु की तरह पश्चात्ताप करना पड़ रहा है। वासना के लिए उसका किया हुआ नृत्य भला और किसी परिणाम पर पहुँचता भी कैसे ?


शिक्षाप्रद धार्मिक कहानी न. 5

कर्म करो तभी मिलेगा

कौरवों की राजसभा लगी हुई है। एक ओर कोने में पांडव भी बैठे हैं। दुर्योधन की आज्ञा पाकर दुःशासन उठता है और द्रोपदी कोघसीटता हुआ राजसभा में ला रहा है। आज दुष्टों के हाथ उस-अबला की लाज लूटी जाने वाली है। उसे सभा में नंगा किया जाएगा ।

वचनबद्ध पांडव शिर नीचा किए बैठे हैं। द्रोपदी अपने साथ होने वाले अपमान से दु:खी हो उठी। उधर सामने दुष्ट दु:शासन आ खड़ा हुआ।

द्रोपदी ने सभा में उपस्थित सभी राजों-महाराजों; पितामहों को रक्षा के लिए पुकारा, किंतु दुर्योधन के भय से और उसका नमक खाकर जीने वाले कैसे उठ सकते थे।

द्रोपदी ने भगवान को पुकारा, अंतर्यामी घट-घटवासी कृष्ण दौड़े आए कि आज भक्त पर भीर पड़ी है। द्रोपदी को दर्शन दिया और पूछा -”किसी को वस्त्र दिया हो तो याद करो।”

द्रोपदी को एक बात याद आई और बोली -”भगवन्‌! एक बार पानी भरने गई थी तो तपस्या करते हुए ऋषि की लँगोटी नदी में बह गई, तब उसे धोती में से आधी फाड़कर दी थी।’”

कृष्ण भगवान ने कहा -”द्रोपदी अब चिंता मत करो। तुम्हारी रक्षा हो जाएगी।” और जितनी साड़ी दुःशासन खींचता गया उतनी ही बढ़ती गई। दुःशासन हार कर बैठ गया, किंतु साड़ी का ओर-छोर ही नहीं आया।

यदि मनुष्य का स्वयं का कुछ किया हुआ न हो तो स्वयं विधाता भी उसकी सहायता नहीं कर सकता क्योंकि सृष्टि का विधान अटल है। जिस प्रकार विधान लगाने वाले विधायकों को स्वयं उसका पालन करना पड़ता है वैसे ही ईश्वरीय अवतार, महापुरुष, स्वयं भगवान भी अपने बनाए विधानों का उल्लंघन नहीं कर सकते। इससे तो उनका सृष्टि संचालन ही अस्त-व्यस्त हो जाएगा।

इस संबंध में उन लोगों को सचेत होकर अपना कर्म करना चाहिए जो सोचते हैं कि भगवान सब कर देंगे और स्वयं हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें। जीवन में जो कुछ मिलता है अपने पूर्व या वर्तमान कर्मों के फल के अनुसार।

बैंक बैलेंस में यदि रकम नहीं तो खातेदार को खाली हाथ लौटना पड़ता है। मनुष्य के कर्मों के खाते में यदि जमा में कुछ नहीं हो तो कुछ नहीं मिलने का। कर्म की पूँजी जब इकट्ठी करेंगे तभी कुछ मिलना संभव है।


शिक्षाप्रद धार्मिक कहानी न. 6

तुम एक दिन भी सहन न कर सके

एक जंगल के निकट एक महात्मा रहते थे। वे बड़े अतिथि- भक्त थे। नित्यप्रति जो भी पथिक उनकी कुटिया के सामने से गुजरता था उसे रोककर भोजन दिया करते थे और आदरपूर्वक उसकी सेवा किया करते थे।

एक दिन किसी पथिक की प्रतीक्षा करते-करते उन्हें शाम हो गई पर कोई राही न निकला। उस दिन नियम टूट जाने की आशंका में वे बड़े व्याकुल हो रहे थे।

उन्होंने देखा कि एक सौ साल का बूढ़ा थका-हारा चला आ रहा है। महात्मा जी ने उसे रोककर पैर धुलाए और भोजन परोसा। बूढ़ा बिना भगवान का भोग लगाए और धन्यवाद दिए तत्काल भोजन पर जुट गया।

यह सब देख महात्मा को आश्चर्य हुआ और बूढ़े से इस बात की शंका की बूढ़े ने कहा -” मैं न तो अग्नि को छोड़कर किसी ईश्वर को मानता हूँ न किसी देवता को ।”!

महात्मा जी उसकी नास्तिकतापूर्ण बात सुनकर बड़े क्रुद्ध हुए और उसके सामने से भोजन का थाल खींच लिया तथा बिना यह सोचे कि रात में वह इस जंगल में कहाँ जाएगा, कुटी से बाहर कर दिया।

बूढ़ा अपनी लकड़ी टेकता हुआ एक ओर चला गया। रात में महात्मा जी को स्वप्न हुआ, भगवान कह रहे थे – “साधु, उस बूढ़े के साथ किए तुम्हारे व्यवहार ने अतिथि-सत्कार का सारा पुण्य क्षीण कर दिया।’!

महात्मा ने कहा–” प्रभु ! उसे तो मैंने इसलिए निकाला कि उसने आपका अपमान किया था।” प्रभु बोले -“ठीक है, वह मेरा नित्य अपमान करता है तो भी मैंने उसे सौ साल तक सहा किंतु तुम एक दिन भी न सह सके।’ भगवान अंतर्धान हो गए और महात्मा जी की भी आँख खुल गई।


शिक्षाप्रद धार्मिक कहानी न. 7

घात नहीं करते

अश्वपति ने राज्य विस्तार तो नहीं किया पर समर्थ नागरिक तैयार करने के लिए जो भी उपाय संभव थे, उसने किए। यही कारण था कि उसके राज्य में सब स्वस्थ, वीर और बहादुर नागरिक थे। काना, कुबड़ा, दीन-हीन और आलसी उनमें से एक भी न था।

अश्वपति के राज्य में जन्म लेते ही बच्चे राज्याधिकारियों के नियंत्रण में सौंप दिए जाते थे। उनकी शिक्षा-दीक्षा का प्रबंध अश्वपति स्वयं करता था। उसका हर नवयुवक चरित्र बल, दृढ़ता, शौर्य और संयम की प्रतिमूर्ति था। यही कारण था कि उस छोटे से राज्य से कोई टक्कर नहीं ले पाता था।

प्रतापी सम्राट पोरस से युद्ध करने के बाद सिकंदर की सेना ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया, उस समय सिकंदर ने सोचा आस- पास के छोटे राज्य ही हस्तगत क्‍यों न कर लिए जाएँ। उसकी वक्र दृष्टि अमृतसर के समीप रावी नदी के तट पर बसे अश्वपति के राज्य पर पड़ी।

सिकंदर ने अश्वपति की वीरता की गाथाएँ पहले ही सुन रखी थीं, उसके सिपाही भी हिम्मत हार चुके थे, इसलिए उसने मुकाबले की अपेक्षा छल से रात में अश्वपति पर आक्रमण कर दिया।

युद्ध के लिए अनिश्चित अश्वपति के सैनिकों को सिकंदर के सिपाहियों ने छलपूर्वक काटा और इस तरह यह युद्ध भी यूनानियों के हाथ रहा। महाराज अश्वपति बंदी बना लिए गए।

सिकंदर ने अश्वपति के शौर्य की परीक्षा लेने के इरादे से उसे बंधनमुक्त कर दिया और संधि कर ली। इस खुशी में दोनों नरेशों का एक सम्मिलित दरबार आयोजित किया गया। अश्वपति अपने खूँख्वार लड़ाका कुत्तों के लिए विश्व- विख्यात था, चार कुत्ते हमेशा अश्वपति के साथ रहते थे। जब वह दरबार में पहुँचे तब वह कुत्ते भी उनके साथ थे।

सिकंदर ने उनके पहुँचते ही व्यंग किया -‘“महाराज ये भारतीय कुत्ते हैं।’” अश्वपति ने तुरंत उत्तर दिया–”हाँ यह छिपकर आक्रमण नहीं करते, शेरों से भी मैदान में लड़ते हैं।”

लड़ाई का आयोजन किया गया। उधर शेर इधर दो कुत्ते, लड़ाई छिड़ गई। शेर ने कुत्ते को लहू लुहान कर दिया पर कुत्तों ने भी शेर के छक्के छुड़ा दिए। शेष दो कुत्ते भी छोड़ दिए गए और तब शेर को भागते ही बना। पर कुत्तों ने उसके शरीर में ऐसे दाँत चुभाए कि शेर आहत होकर वहीं गिर पड़ा।

अश्वपति ने ललकार कर कहा–“’महाराज! आपकी सेना में कोई वीर है जो कुत्ते के दाँत शेर के मांस से अलग कर दे।” बारी-बारी से कई योद्धा उठे और कुत्तों की टाँगे पकड़ कर खींचने लगे, कुत्तों की टांगे टूट गईं पर वे उनके दाँत छुड़ा न सके।

सात फुट लंबे अश्वपति ने अपने अंगरक्षक को संकेत किया। वह उठकर शेर के पास पहुँचा और कुत्ते को पकड़ कर एक ही झटका लगाया कि शेर की हड्डी और मांस सहित कुत्ता भी खिंच गया। सिकंदर ने युद्ध जीत लिया था पर इस यथार्थता के आगे वह अपना सिर झुकाए बैठा था।


शिक्षाप्रद धार्मिक कहानी न. 8

शुभ कार्य तत्काल करो

कोई स्त्री अपने पिता के यहाँ से लौटी थी, अपने पति से कह रही थी -‘मेरा भाई विरक्त हो गया है। वह अगली दीवाली पर दीक्षा लेकर साधु होने वाला है। अभी से उसने तैयारी प्रारंभ कर दी है। वह अपनी संपत्ति की उचित व्यवस्था करने में लगा है।’”

पत्नी की बात सुनकर पति मुस्कुराया। स्त्री ने पूछा–”तुम हँसे क्यों ? हँसने की क्या बात थी।!” पति बोला-“और तो सब ठीक है, किंतु तुम्हारे भाई का वैराग्य मुझे बहुत अद्भुत लगा।

वैराग्य हो गया है दीक्षा लेने की तिथि अभी निश्चित हुई है और वह संपत्ति की उचित व्यवस्था में लगा है।’! भौतिक संपत्ति में बुद्धि और इस उत्तम काम में भी इतनी दूर की योजना! इस प्रकार की तैयारी करके त्याग नहीं हुआ करता। त्याग तो सहज ही हुआ करता है।

स्त्री को बुरा लगा वह बोली -“’ऐसे ज्ञानी हो तो तुम्हीं क्यों कुछ कर नहीं दिखाते।” ‘मैं तो तुम्हारी अनुमति की ही प्रतीक्षा में था।” पुरुष ने वस्त्र उतार दिए और एक धोती मात्र पहने घर से निकल पड़ा।

स्त्री ने समझा कि यह परिहास है। थोड़ी देर में उसका पति लौट आवेगा, परंतु वह तो लौटने के लिए गया ही नहीं था। सच है वैराग्य के लिए कोई तिथि नहीं सोची जाती।


शिक्षाप्रद धार्मिक कहानी न. 9

चावलों में कंकड़

संत पुरंदर गृहस्थ थे तो भी क्या लोभ, क्या काम और क्रोध उन्हें छू भी नहीं गए थे। दो-तीन घरों में भिक्षाटन करते, उससे जो दो मुट्ठी चावल और आटा मिल जाता उससे वे अपना और अपनी धर्मपत्नी सरस्वती देवी का उदर पोषण कर लेते और दिनभर लोकसेवा के कार्यों में जुटे रहते।

एक दिन विजय नगर के राजपुरोहित व्यास राय ने महाराज कृष्ण देवराय से कहा -“राजन ! संत पुरंदर गृहस्थ होकर भी राजा जनक की तरह विकार मुक्त हैं, दिनभर बेचारे पिछड़ों को ज्ञान दान देने, कंष्ट पीड़ितों की सेवा करने में लगे रहते हैं। स्वार्थ की बात तो उनके, मन में ही नहीं आती।’”

महाराज कृष्णदेव राय हँसे और बोलें–”गृहंस्थ में रहकर कौन तो निर्लोभ रहा, कौन काम-वासना से बचा ? यंदिं गृहस्थ में ऐसा संभव हो जाए तो संसार के सभी मनुष्य अपना शरीर सार्थक न कर लें।’!

कर सकते हैं–व्यास राय बोले–“’यदि लोग संत पुरंदर और देवी सरस्वती की भाँति निर्लोभ, सेवापगायण व सरल जीवन जीना सीख लें।” महाराज कुछ खिन्‍न से हो गए, बोले-“ऐसा ही है तो आप उनसे कुछ दिन यहीं हमारे यहाँ भिक्षाटन के लिए कह दें।”

व्यास राय ने संत पुरंदर से जाकर आग्रह किया–‘आप आगे से राजभवन से भिक्षा ले आया करें।’ संत पुरंदर ने कहा -”मैं जिन लोगों के बीच रहता हूँ, जिनकी सेवा करता हूँ उन अपने कुटुंबजनों से मिल गई भिक्षा ही पर्याप्त है।

दो ही पेट तो हैं उसके लिए राजभवन जाकर क्या करूँगा ?” पर व्यास राय तब तक बराबर जोर डालते रहे जब तक संत ने उनका आग्रह स्वीकार नहीं कर लिया।

संत पुरंदर राजभवन जाने लगे। वहाँ से मिले चावल ही उनके उदर पोषण के लिए पर्याप्त होते। संत अपनी सहज प्रसन्नता लिए हुए जाते, उसका अर्थ महाराज कुछ और ही लगाते।

एक दिन तो उन्होंने व्यास राय से कह भी दिया–“देख ली आपके संत की निस्पृहता! आजकल देखते नहीं कितने प्रसन्न रहते हैं ।’” व्यास राय बोले–” आपका तात्पर्य समझा नहीं ।”’ इस पर महाराज ने कहा– “आप मेरे साथ चलिए अभी बात स्पष्ट हो जाएगी।”” महाराज राजपुरोहित के साथ संत पुरंदर के घर पहुँचे, देखा उनकी धर्मपत्नी चावल साफ कर रही है।

महाराज ने पूछा-”बहन! यह क्या कर रही हैं ?’” इस पर वे बोलीं- ‘आजकल न जाने कहाँ से भिक्षा लाते हैं इन चावलों में कंकड़-पत्थर भरे पड़े हैं।” यह कहकर उन्होंने अब तक बीने कंकड़ उठाए और बाहर की तरफ उन्हें फेंकने चल पड़ीं। महाराज बोले– “ भद्रे, यह तो हीरे-मोती हैं जिन्हें आप कंकड़-पत्थर कहती हैं।’”

सरस्वती देवी हँसी और बोलीं–”पहले हम भी यही सोचते थे, पर अब ज़ब से मोह-माया से दूर हुआ हुआ हूँ, इनका मूल्य कंकड़- पत्थर के ही बराबर रह गया।”” महाराज यह उत्तर सुनकर अवाक रह गए। वे आगे और कुछ न बोल सके।


शिक्षाप्रद धार्मिक कहानी न. 10

संघर्ष से बड़ी शक्ति नहीं

द्रोणाचार्य कौरव सेना के सेनापति नियुक्त हुए। पहले दिन का युद्ध वीरतापूर्वक लड़े तो भी विजयश्री अर्जुन के हाथ रही। यह देखकर दुर्योधन को बड़ी निराशा हुई। वह गुरु द्रोणाचार्य के पास गए और कहा–‘ गुरुदेव ! अर्जुन तो आपका शिष्य मात्र है, आप तो उसे क्षणभर में परास्त कर सकते हैं, फिर यह देर क्यों ?”

द्रोणाचार्य गंभीर हो गए और कहा–” आप ठीक कहते हैं, अर्जुन मेरा शिष्य है, उसकी सारी विद्या से मैं परिचित हूँ, किंतु उसका जीवन कठिनाई से संघर्ष करने में रहा है और मेरा सुविधापूर्वक दिन बिताने का रहा है। विपत्ति ने उसे मुझसे भी अधिक बलवान बना दिया है।’!


अपकार का बदला उपकार

पंजाब केशरी महाराज रणजीत सिंह कहीं जा रहे थे। राज्य कर्मचारी भी साथ थे। एक बाग के पास से वे लोग गुजरे तो अचानक एक पत्थर आकर महाराज को लगा। अपराधी को पकड़ने के लिए कर्मचारी चारों ओर दौड़े।

आम तोड़ने के लिए बच्चे पेड़ों पर पत्थर फेंक रहे थे । उन्हीं में से एक महाराज को जा लगा था। बच्चों को पकड़ कर सामने उपस्थित किया गया। रणजीत सिंह हँस पड़े।

उन्होने बच्चों को मिठाई और उपहार देकर विदा किया और कहा–“बच्चों, ढेला मारने पर आम फल देता है, हमने भी चोट खाकर तुम्हें इनाम दिया है। बड़े होकर भूलना मत, अपकारी के साथ भी उपकार करना बड़ों की विशेषता होती है।”


चित्र-विचित्र

एक आदमी बड़ा नास्तिक था, वह कहता था कि यह सारा संसार स्वाभाविक है, क्रियाएँ प्राकृतिक-अपने आप होती हैं। एक दिन एक लड़का एक बड़ा सुंदर चित्र बनाकर लाया। वह आदमी उसे देखकर बड़ा प्रसन्‍न हुआ।

उसने पूछा–”यह शक्ल किसने खींची है।” तब लड़के ने कहा–“चाचा! मेरे ट्रेनिंग स्कूल में एक जगह एक कागज, रंगीन पेंसिलें और कलम दवात रखे थे। आप तो जानते ही हैं कि हर एक प्राकृतिक वस्तु में हरकत होनी स्वाभाविक है। झट अपने आप ही शक्ल खिंच गई।”’

यह सुन वह आदमी बोल पड़ा कि यह भी कभी हो सकता है ? झट ही लड़का बोल पड़ा–”यदि वह शक्ल बिना खींचने वाले के नहीं खिच सकती तो यह संसार बिना किसी कर्त्ता के अपने आप नहीं बन सकता।”!


भगवान अच्छा ही करता है

एक सिपाही छुट्टी लेकर अपने घर जा रहा था। मार्ग में वर्षा आने से उसके पास में कच्चे रंग की चुनरी, कागज के खिलौने, बताशे आदि जो वस्तुएँ थीं सब गलकर खराब हो गईं। सिपाही ईश्वर को गाली देने लगा कि उसने इसी समय वर्षा की।

आगे चला तो कुछ डाकू आड़ में बैठे थे, उन्होंने इस पर निशाना चलाया पर कारतूस सील गए थे इसलिए गोली न चली और सिपाही ने भागकर प्राण बचाए। तब तो वह ईश्वर को धन्यवाद देता हुआ क्षमा माँगने लगा और अपने अज्ञान पर पश्चात्ताप करने लगा।


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