Central Council of Ministers in Hindi (केंद्रीय मंत्रिपरिषद)

इस लेख में हम केंद्रीय मंत्रिपरिषद (Central Council of Ministers) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे। ये लेख संघीय कार्यपालिका का एक हिस्सा है।
Central Council of Ministers

भारत का केन्द्रीय मंत्रिपरिषद

हमने देखा था संघीय कार्यपालिका में राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद और महान्यायवादी (Attorney General) शामिल होते हैं। हमने राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की चर्चा इस की है। सभी का लिंक नीचे एक क्रम से दिया हुआ है।

खासतौर पर इस लेख को पढ़ने से पहले प्रधानमंत्री वाले लेख को अवश्य पढ़ लें क्योंकि प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद दोनों एक ही प्रकार के अनुच्छेद से संबन्धित है। इससे आपको समझने में आसानी होगी।

Central Council of Ministers

🔰 हमने प्रधानमंत्री वाले लेख में देखा था की संसदीय व्यवस्था में रहने के कारण यहाँ प्रधानमंत्री ही वास्तविक कार्यपालक होता है। लेकिन प्रधानमंत्री अकेले तो होता नहीं है यहाँ मंत्रिपरिषद भी होता है और प्रधानमंत्री उसी मंत्रिपरिषद का अध्यक्ष होता है।

तो कुल मिलाकर कहें तो हमारी राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था की मुख्य कार्यकारी अधिकारी मंत्रिपरिषद होती है, जिसका नेतृत्व प्रधानमंत्री करता है।

हमने अनुच्छेद 74 और अनुच्छेद 75 के बारे में प्रधानमंत्री वाले लेख में पढ़ा था। वहाँ पर हमने पढ़ा था की अनुच्छेद 74 के अनुसार केंद्र में राष्ट्रपति को सहायता एवं परामर्श देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगा जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करेंगे। और अनुच्छेद 75 के अनुसार प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा और प्रधानमंत्री के सलाहनुसार अन्य मंत्रियों की नियुक्ति भी राष्ट्रपति ही करेगा। लेकिन इन दोनों अनुच्छेदों में और अन्य प्रावधान भी है जो मंत्रिपरिषद और प्रधानमंत्री से संबन्धित है तथा इसे और व्याख्यायित करता है। इसके अलावा अनुच्छेद 77, अनुच्छेद 78 और अनुच्छेद 88 भी इसी से संबन्धित है, तो आइये इसे विस्तार से समझते हैं।

केन्द्रीय मंत्रिपरिषद और संवैधानिक प्रावधान
Central Council of Ministers and Constitutional Provisions

अनुच्छेद 74

जैसे कि हमने अभी ऊपर पढ़ा है कि अनुच्छेद 74 के अनुसार केंद्र में राष्ट्रपति को सहायता, सलाह एवं परामर्श देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगा जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करेंगे। इसके साथ ही राष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद के परामर्श के अनुसार ही कार्य करेगा।

वैसे यदि राष्ट्रपति चाहे तो वह एक बार मंत्रिपरिषद से पुनर्विचार के लिए कह सकता है लेकिन मंत्रिपरिषद अगर उसी बात पर अड़े रहे तो राष्ट्रपति को वही करना पड़ेगा। ये बात 42वें एवं 44वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा स्पष्ट रूप से कहा गया है।

◼ दूसरी बात ये है कि जो भी सलाह मंत्रियों द्वारा राष्ट्रपति को दी जाती है उस सलाह की जांच किसी न्यायालय द्वारा नहीं की जा सकती। इसका फायदा होता ये है कि गोपनियता तो मेनटेन होता ही है साथ ही मंत्री कुछ भी सलाह देने को स्वतंत्र होता है।

अनुच्छेद 75

अनुच्छेद 75 के तहत हमने एक प्रावधान की चर्चा ऊपर की है जो ये कहता है कि ◼ प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा और प्रधानमंत्री के सलाहनुसार अन्य मंत्रियों की नियुक्ति भी राष्ट्रपति ही करेगा। इसके अलावा इसके अन्य प्रावधान निम्न है।

प्रधानमंत्री सहित मंत्रिपरिषद के सदस्यों की कुल संख्या, लोकसभा की कुल संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी। इस उपबंध का समावेश 91वें संविधान संशोधन विधेयक 2003 द्वारा किया गया है।

संसद के किसी भी सदन का किसी भी राजनीतिक दल का सदस्य, यदि दल-बदल के आधार पर संसद की सदस्यता के अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा तो ऐसा सदस्य मंत्री पद के लिए भी अयोग्य होगा।

मंत्री, राष्ट्रपति के प्रसाद्पर्यंत पद धारण करेंगे। इसका क्या मतलब है इसकी चर्चा आगे की गई है

मंत्रिपरिषद, लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होगा। इसका क्या मतलब है इसे आगे विस्तार से समझते है, क्योंकि ये बहुत ही महत्वपूर्ण टर्म है।

राष्ट्रपति, मंत्रियों को पद एवं गोपनियता की शपथ दिलाएगा। कैसे दिलाएगा उसी चर्चा आगे करते हैं।

अगर कोई व्यक्ति जो कि किसी सदन का सदस्य नहीं है वो अगर कोई मंत्री बनता है तो छह माह तक वो मंत्री बने रह सकता है लेकिन उसके आगे मंत्री बने रहने के लिए उसे किसी सदन का सदस्य होना पड़ेगा। नहीं तो उसे अपना मंत्रिपद त्यागना पड़ता है।

मंत्रियों के वेतन एवं भत्ते, संसद द्वारा निर्धारित किए जाएँगे।

अनुच्छेद 77

अनुच्छेद 77 – भारत सरकार द्वारा कार्यवाहियों के संचालन के बारे में हैं। इसके प्रावधान निम्न है।

भारत सरकार की समस्त कार्यपालक कार्यवाहियाँ राष्ट्रपति के नाम से की जाएगी और उसी प्रकार अभिव्यक्त भी होगी।

राष्ट्रपति के नाम से पारित आदेशों तथा अन्य दस्तावेजों को इस प्रकार अधिप्रमाणित किया जाएगा जैसा कि राष्ट्रपति द्वारा बनाए जाने वाले नियमों में निर्दिष्ट हो। इसके अतिरिक्त इस प्रकार अधिप्रमाणित किए गए किसी आदेश अथवा प्रपत्र की वैधता पर इस आधार पर कोई प्रश्न नहीं किया जाएगा कि उक्त आदेश अथवा प्रपत्र राष्ट्रपति द्वारा निर्मित अथवा निष्पादित हैं।

राष्ट्रपति, भारत सरकार की कार्यवाहियों को और सुगम बनाने के लिए साथ ही मंत्रियों के बीच कार्यों का आवंटन करने के संबंध में नियम बनाएँगे।

अनुच्छेद 78

अनुच्छेद 78 – मंत्रिपरिषद के अध्यक्ष के रूप में प्रधानमंत्री के कर्तव्य के बारे में है इसे हम प्रधानमंत्री वाले लेख में भी पढ़ चुके हैं। फिर भी यहाँ देख लेते हैं।

प्रधानमंत्री का यह कर्तव्य होगा कि – 1. वह राष्ट्रपति को संघ के प्रशासन से संबन्धित मामलों के बारे में मंत्रिपरिषद द्वारा लिए गए निर्णयों तथा विधायन के प्रस्तावों के बारे में सूचित करें।

2. अगर राष्ट्रपति द्वारा संघ के प्रशासन आदि से संबन्धित मामलों तथा प्रस्तावित विधायनों के बारे में कोई सूचना मांगता है तो प्रधानमंत्री उसे राष्ट्रपति को उपलब्ध करवाएगा।

3. यदि राष्ट्रपति चाहे कि किसी ऐसे मामले को मंत्रिपरिषद के विचारार्थ भेजा जाए जिसपर कि किसी मंत्री द्वारा निर्णय लिया जा चुका है लेकिन जिस पर मंत्रीपरिषद ने विचार नहीं किया है, तो प्रधानमंत्री उसे मंत्रिपरिषद के विचारार्थ भेजेगा।

अनुच्छेद 88

अनुच्छेद 88 सदन में मंत्रियों के अधिकार से संबन्धित है।

एक मंत्री अगर चाहे तो जिस सदन का वो सदस्य नहीं है उसकी कार्यवाही में भी भाग ले सकता है वहाँ वो बोल भी सकता है लेकिन बस मतदान नहीं कर सकता। मतदान तो वे अपने सदन में ही कर सकता है।

मंत्रियों द्वारा ली जाने वाली शपथ

मंत्रिपद ग्रहण करने से पूर्व राष्ट्रपति उसे पद एवं गोपनियता की शपथ दिलाता है। अपनी शपथ में वह कहता है मैं –

1. भारत के संविधान में सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूँगा 2. भारत की अखंडता और संप्रभुता को अक्षुण्ण रखूँगा 3. अपने कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक और शुद्ध अन्तःकरण से निर्वहन करूंगा 4. भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और विधि अनुसार न्याय करूंगा।

अपनी गोपनियता की शपथ में मंत्री शपथ लेते है कि – जो विषय संघ के मंत्री के रूप में मेरे विचार के लिए लाया जाएगा अथवा मुझे ज्ञात होगा उसे किसी व्यक्ति या व्यक्तियों को तब तक के सिवाय जबकि ऐसे मंत्री के रूप में अपने कर्तव्यों के सम्यक, निर्वहक के लिए ऐसा करना अपेक्षित हो, मैं प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से संसूचित या प्रकट नहीं करूंगा।

🔷हमारे संविधान में उप-प्रधानमंत्री के बारे में कुछ भी नहीं कहा गया है, इसीलिए जब 1990 में देवीलाल द्वारा उप-प्रधानमंत्री पद की शपथ ली गई तो इसे इस आधार पर न्यायालय में चुनौती दी गयी थी कि ये तो असंवैधानिक है क्योंकि संविधान में इसके बारे में कोई व्यवस्था ही नहीं है। लेकिन दिलचस्प बात ये रहा कि न्यायालय ने इस शपथ को वैध ठहराया। यानी कि अब कोई अगर उप-प्रधानमंत्री भी बनना चाहे तो बन सकता है।

केन्द्रीय मंत्रिपरिषद की संरचना
Structure of the Central Council of Ministers

केन्द्रीय मंत्रिपरिषद (Central council of ministers) में मंत्रियों की तीन श्रेणियाँ होती है – कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री व उपमंत्री। उनके बीच अंतर उनके पदक्रम, वेतन तथा राजनैतिक महत्व के आधार पर होता है। इन सभी मंत्रियों का प्रमुख प्रधानमंत्री है, जो सरकार का उच्चतम कार्यकारी है।

⏫वर्तमान केन्द्रीय मंत्रिपरिषद (central council of ministers) की संरचना देखने के लिए यहाँ क्लिक करें।

कैबिनेट मंत्रियों के पास केंद्र सरकार के महत्वपूर्ण मंत्रालय जैसे, गृह, रक्षा, वित्त, विदेश व अन्य मंत्रालय होते हैं। वे कैबिनेट के सदस्य होते हैं और इसकी बैठकों में भाग लेते हैं तथा नीति निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। अत: इनके उत्तरदायित्व की परिधि सम्पूर्ण केंद्र सरकार पर है।

⏫इन्दिरा गांधी के समय से कीचेन कैबिनेट काफी चर्चा में रहता है, अगर आप उसके बारे में जानना चाहते हैं तो यहाँ क्लिक करें।

राज्य मंत्रियों को कैबिनेट मंत्री के साथ सहयोगी बनाया जा सकता है अथवा मंत्रालय से संबन्धित कोई विशेष कार्य सौंपा जा सकता है। दोनों ही मामलों में वे कैबिनेट मंत्री की देखरेख, सलाह तथा उसकी ज़िम्मेदारी पर कार्य करते हैं।

राज्य मंत्रियों को मंत्रालय या विभागों का स्वतंत्र प्रभार भी दिया जा सकता है। जब ऐसा होता है वे अपने मंत्रालय का कार्य, कैबिनेट मंत्री की तरह ही पूरी शक्ति व स्वतंत्रता से करते हैं। हालांकि वे कैबिनेट के सदस्य नहीं होते है तथा उनकी बैठकों में भाग नहीं लेते हैं। वे तब तक बैठक में भाग नहीं लेते, जब तक उन्हे उनके मंत्रालय से संबन्धित किसी कार्य हेतु विशेष रूप से आमंत्रित नहीं किया जाये।

उप-मंत्रियों को मंत्रालयों का स्वतंत्र प्रभार नहीं दिया जाता है। उन्हें कैबिनेट अथवा राज्य मंत्रियों को उनके प्रशासनिक, राजनैतिक और संसदीय कार्यों में सहायता के लिए नियुक्त किया जाता है। वे कैबिनेट के सदस्य नहीं होते तथा कैबिनेट की बैठक में भाग नहीं लेते हैं। याद रखिए कि ये सभी मंत्रिपरिषद के ही भाग होते है।

इसके अलावा यहाँ यह उल्लेख करना आवश्यक है कि मंत्रियों की एक और श्रेणी भी है, जिन्हे संसदीय सचिव (Parliamentary secretary) कहा जाता है। वे मंत्रिपरिषद की अंतिम श्रेणी में आते है। उनके पास कोई विभाग नहीं होता है। वे वरिष्ठ मंत्रियों के साथ उनके संसदीय कार्यों में सहायता के लिए नियुक्त होते हैं हालांकि 1967 के राजीव गांधी की सरकार के प्रथम विस्तार को छोड़कर, कोई भी संसदीय सचिव अब तक नियुक्त नहीं किया गया है।

कई बार मंत्रिपरिषद में उप-प्रधानमंत्री को भी शामिल किया जा सकता है। उप-प्रधानमंत्री मुख्यतः राजनैतिक कारणों से नियुक्त किया जाता है इसीलिए ये हो भी सकते हैं और नहीं भी।

⏫यहाँ पर वैसे मंत्रिमंडल और मंत्रीपरिषद के बीच अंतर स्पष्ट हो जाता है लेकिन फिर भी अगर आप इसे विस्तार से समझना चाहते हैं तो यहाँ क्लिक करके इस लेख को अवश्य पढ़ें।

केन्द्रीय मंत्रिपरिषद के मंत्रियों के उत्तरदायित्व
Responsibilities of Ministers of Central Council of Ministers

सामूहिक उत्तरदायित्व

सरकार कि संसदीय व्यवस्था की कार्य प्रणाली का मौलिक सिद्धांत उसके सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत है। जैसा कि हमने ऊपर देखा है कि अनुच्छेद 75 स्पष्ट रूप से कहता है कि मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होगा। इसका अर्थ है कि सभी मंत्रियों की उनके सभी कार्यों और निर्णयों के लिए लोकसभा के प्रति संयुक्त ज़िम्मेदारी होगी।

सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत यह भी है कि मंत्रिमंडल के निर्णय सभी केन्द्रीय मंत्रियों तथा अन्य मंत्रियों के लिए बाध्यकारी हैं। यानी कि सभी मंत्रियों का यह कर्तव्य है कि वो मंत्रिमंडल के निर्णयों को माने तथा संसद के बाहर और भीतर उसका समर्थन करें। यदि कोई मंत्री मंत्रिमंडल के किसी निर्णय से असहमत है और उसके लिए तैयार नहीं है, तो उसे त्यागपत्र देना होगा। पूर्व में कई मंत्रियों ने मंत्रिमंडल के साथ अपने मतभेद के चलते कई बार त्यागपत्र दिये हैं।

उदाहरण के लिय 1953 में डॉ. बी आर अंबेडकर ने हिन्दू कोड बिल पर अपने साथियों के साथ के साथ मतभेद के चलते त्यागपत्र दे दिया था। इसी प्रकार आरिफ़ मोहम्मद ने मुस्लिम महिला (तलाक से बचाव का अधिकार) अधिनियम 1986 के विरोध में त्यागपत्र दे दिया था।

जब लोकसभा, मंत्रिपरिषद के विरुद्ध एक अविश्वास प्रस्ताव पारित करती है तो सभी मंत्रियों को (जिसमें कि राज्यसभा के मंत्री भी शामिल हों सकते है) को त्यागपत्र देना पड़ता है। इसके अतिरिक्त मंत्रिपरिषद राष्ट्रपति को इस आधार पर लोकसभा को विघटित करने की सलाह भी दे सकता है कि सदन अब अपना जनमत खो चुकी है और नए चुनाव की मांग करता है। हालांकि राष्ट्रपति, लोकसभा में विश्वास मत खोए हुए मंत्रिपरिषद की सलाह मानने हेतु बाध्य नहीं होता है।

व्यक्तिगत उत्तरदायित्व

अनुच्छेद 75 में व्यक्तिगत उत्तरदायित्व का सिद्धांत भी वर्णित हैं। यह कहता है कि मंत्री राष्ट्रपति के प्रसाद्पर्यंत अपने पद पर बने रहेंगे जिसका अर्थ है कि केवल प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति किसी मंत्री को उस समय भी हटा सकता है जब मंत्रिपरिषद को लोकसभा में विश्वास मत प्राप्त है। विचारों में मतभेद के कारण अथवा किसी मंत्री के कार्यों से संतुष्ट न होने के कारण प्रधानमंत्री उसे त्यागपत्र देने के लिए भी कह सकता है अथवा राष्ट्रपति को उसे बर्खास्त करने की सलाह से सकता है।

मंत्रियों का कोई विधिक उत्तरदायित्व नहीं

ब्रिटेन में राष्ट्रपति की जगह राजा होता है और वहाँ के राजा अगर किसी सार्वजनिक काम के लिए कोई आदेश देता है तो संबन्धित मंत्री को उस पर हस्ताक्षर करना पड़ता है। यदि वह आदेश किसी कानून का उल्लंघन करता है तो उसका उत्तरदायित्व मंत्री पर होता है न कि राजा पर। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वहाँ ये माना जाता है कि राजा कभी गलत नहीं हो सकता है। जबकि इसके लिए उस अमुक मंत्री को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है।

दूसरी ओर भारत में, संविधान में किसी भी मंत्री के लिए किसी भी प्रकार की विधिक ज़िम्मेदारी का कोई उपबंध नहीं है। भारत में आवश्यक नहीं है कि राष्ट्रपति द्वारा जनहित में जारी किसी आदेश पर कोई मंत्री हस्ताक्षर करे। यहाँ तक कि मंत्री द्वारा राष्ट्रपति को दी गयी किसी सलाह की जांच भी न्यायालय के क्षेत्र से बाहर होता है।

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