केंद्रीय मंत्रिपरिषद (Central Council of Ministers in Hindi)

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इस लेख में हम केंद्रीय मंत्रिपरिषद (Central Council of Ministers) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे, एवं इसके विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं को समझने का प्रयास करेंगे।
Central Council of Ministers

भारत का केंद्रीय मंत्रिपरिषद (Central Council of Ministers of India)

संघीय कार्यपालिका में राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद और महान्यायवादी (Attorney General) शामिल होते हैं। खासतौर पर इस लेख को पढ़ने से पहले प्रधानमंत्री वाले लेख को अवश्य पढ़ लें क्योंकि प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद दोनों एक ही प्रकार के अनुच्छेद से संबन्धित है। इससे समझने में आसानी होगी।

▪️ हमने प्रधानमंत्री वाले लेख में देखा था की संसदीय व्यवस्था में रहने के कारण यहाँ प्रधानमंत्री ही वास्तविक कार्यपालक होता है। लेकिन प्रधानमंत्री अकेले तो होता नहीं है यहाँ मंत्रिपरिषद भी होता है और प्रधानमंत्री उसी मंत्रिपरिषद का अध्यक्ष होता है।

तो कुल मिलाकर कहें तो हमारी राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था की मुख्य कार्यकारी अधिकारी मंत्रिपरिषद होती है, जिसका नेतृत्व प्रधानमंत्री करता है।

केंद्रीय मंत्रिपरिषद और संवैधानिक प्रावधान

अनुच्छेद 74 – राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद

इस अनुच्छेद में 2 क्लॉज़ हैं जो कि निम्नलिखित है-

(1) राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करेंगे।

यहाँ से दो बातें पता चलती है पहला कि एक मंत्रिपरिषद होगा उसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करेंगे, दूसरी बात कि ये राष्ट्रपति को सलाह देने के लिए होंगे।

हालांकि संविधान में लिखा हुआ है कि मंत्रिपरिषद द्वारा की गई सलाह को राष्ट्रपति पुनर्विचार के लिए भी कह सकता है लेकिन पुनर्विचार के बाद जो सलाह दी जाएगी उसे राष्ट्रपति को मानना ही पड़ेगा।

(2) इस अनुच्छेद के क्लॉज़ 2 में लिखा है किइस प्रश्न की किसी न्यायालय में जांच नहीं की जाएगी की क्या मंत्रियों ने राष्ट्रपति को कोई सलाह दी, और यदि दी तो क्या दी।

इसका मतलब ये है कि मंत्रिपरिषद, राष्ट्रपति को सलाह देता है या नहीं इससे कोई फर्क पड़ता नहीं है क्योंकि ये जांच का विषय नहीं है।

अनुच्छेद 75 – मंत्रियों के बारे में अन्य उपबंध

इस अनुच्छेद में 6 क्लॉज़ हैं, जो कि निम्नलिखित है-

(1) प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा और मंत्रिपरिषद के मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री की सलाह पर करेगा।

91वां संविधान संशोधन 2003 के माध्यम से इसमें एक प्रावधान ये जोड़ दिया गया कि मंत्रिपरिषद में प्रधानमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या लोकसभा के सदस्यों की कुल संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी। यानी कि लगभग 80 -81 सदस्य ही मंत्रिपरिषद का हिस्सा हो सकता है।

(2) मंत्री, राष्ट्रपति के प्रसाद्पर्यंत अपने पद धारण करेंगे, यानी कि राष्ट्रपति चाहे तो मंत्रियों को अपने पद से हटा सकता है। कैसे?

जैसा कि हम जानते हैं, राष्ट्रपति उन्ही व्यक्तियों को मंत्री नियुक्त कर सकता है जिनकी सिफ़ारिश प्रधानमंत्री द्वारा की जाती है और प्रधानमंत्री चूंकि केंद्रीय मंत्रिपरिषद का अध्यक्ष होता है इसीलिए प्रधानमंत्री चाहे तो किसी मंत्री को त्यागपत्र देने को कह सकता है अथवा राष्ट्रपति को उसे बर्खास्त करने की सलाह दे सकता है। मंत्रिपरिषद राष्ट्रपति के प्रसाद्पर्यंत काम कर रहे होते हैं इसीलिए राष्ट्रपति उस अमुक मंत्री को पद से हटा सकता है।

(3) मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होगी। (इसका मतलब आगे समझाया गया है)

सामूहिक उत्तरदायित्व (Collective responsibility) का मतलब ये है कि सभी मंत्रियों की उनके सभी कार्यों और निर्णयों के लिए लोकसभा के प्रति संयुक्त ज़िम्मेदारी होगी। वे सभी एक दल की तरह काम करेंगे, भले ही किसी निर्णय से कोई व्यक्तिगत रूप से सहमत न हो लेकिन मंत्रिपरिषद के रूप में सार्वजनिक तौर पर उसे स्वीकारना होगा और उस निर्णय के लिए वे भी उत्तरदायी होंगे। (इसके बारे में आगे और बात की गई है)

(4) किसी मंत्री द्वारा अपना पद ग्रहण करने से पहले, राष्ट्रपति उसको पद की गोपनीयता की शपथ दिलाएगा।

केंद्रीय मंत्रिपरिषद के मंत्रियों द्वारा ली जाने वाली शपथ

अनुच्छेद 75(4) के तहत, मंत्री का पद ग्रहण करने से पूर्व राष्ट्रपति उसे पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलवाता है।

पद की शपथ लेते हुए मंत्री कहता है कि –

मैं, अमुक ईश्वर की शपथ लेता हूँ कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूँगा, मैं भारत की प्रभुता एवं अखंडता अक्षुण्ण रखूँगा, मैं संघ के मंत्री के रूप में श्रद्धापूर्वक एवं शुद्ध अन्तःकरण से अपने पद के दायित्यों का निर्वहन करूंगा, मैं भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और विधि के अनुसार न्याय करूंगा।

मंत्री गोपनियता की शपथ के रूप में कहता है – मैं, अमुक; ईश्वर की शपथ लेता हूं कि जो विषय मेरे विचार के लिए लाया जाएगा अथवा मुझे ज्ञात होगा, उसे किसी व्यक्ति या व्यक्तियों को तब के सिवाय जबकि ऐसे मंत्री के रूप में अपने कर्तव्यों के सम्यक निर्वहन के लिए अपेक्षित हो, मैं प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से संसूचित या प्रकट नहीं करूंगा।

याद रखने योग्य Facts –

(1) मंत्री ऊपर बताए गए दो शपथ के अलावे भी दो अन्य शपथ लेता है- एक तो चुनाव लड़ने के लिए नामांकन पत्र दाखिल करते समय और दूसरा सदन के सदस्य के रूप में (जो कि पीठासीन अधिकारी के समक्ष लिया जाता है)। कुल मिलाकर मंत्री चार प्रकार का शपथ लेता है, जो कि संविधान के अनुसूची 3 में वर्णित है।

(2) हमारे संविधान में उप-प्रधानमंत्री के बारे में कुछ भी नहीं कहा गया है, इसीलिए जब 1990 में देवीलाल द्वारा उप-प्रधानमंत्री पद की शपथ ली गई तो इसे इस आधार पर न्यायालय में चुनौती दी गयी थी कि ये तो असंवैधानिक है क्योंकि संविधान में इसके बारे में कोई व्यवस्था ही नहीं है। लेकिन दिलचस्प बात ये रहा कि न्यायालय ने इस शपथ को वैध ठहराया। यानी कि अब कोई अगर उप-प्रधानमंत्री भी बनना चाहे तो बन सकता है।

(5) कोई मंत्री, जो निरंतर छह मास की किसी अवधि तक संसद के किसी सदन का सदस्य नहीं है, उस अवधि की समाप्ति पर मंत्री नहीं रहेगा।

◼ 1997 में उच्चतम न्यायालय ने एक निर्णय दिया कि एक व्यक्ति को जो किसी भी सदन का सदस्य न हो, 6 माह के लिए प्रधानमंत्री या मंत्री नियुक्त किया जा सकता है। हालांकि इस समायावधि में उसे संसद के किसी भी सदन का सदस्य बनना पड़ेगा, अन्यथा वह प्रधानमंत्री या मंत्री के पद पर नहीं बना रहेगा।

इसका सीधा सा मतलब ये है कि अगर कोई व्यक्ति किसी सदन का सदस्य नहीं भी है तब भी वे कम से कम 6 महीने के लिए मंत्री बन सकता है। और अगर वे इस दौरान किसी सदन के सदस्य बन जाएं तो फिर वे सरकार विघटित होने तक मंत्री बने रह सकते हैं।

◼ संविधान के अनुसार, मंत्री संसद के दोनों सदनों में से किसी का भी सदस्य हो सकता है। उदाहरण के लिए इन्दिरा गांधी (1966), देवगौड़ा (1996), मनमोहन सिंह (2004 और 2009 में राज्यसभा के सदस्य थे), एस जयशंकर (वर्तमान विदेश मंत्री, राज्यसभा के सदस्य हैं) आदि।

(6) मंत्रियों के वेतन और भत्ते ऐसे होंगे जो संसद, विधि द्वारा, समय-समय पर अवधारित करे।

कहने का अर्थ ये है कि मंत्रियों के वेतन और भत्ते कितने होंगे ये संसद द्वारा समय-समय पर निर्णय लिया जाता है। दरअसल संविधान के अनुच्छेद 106 के तहत सांसदों को यह अधिकार मिला है कि वे कानून बनाकर अपने वेतन का निर्धारण करें। 2018 तक सांसद समय-समय पर अपने वेतन में संशोधन के लिए कानून पारित करते थे। चूंकि सांसद अपने वेतन खुद तय करते हैं, इसलिए हितों के टकराव का सवाल खड़ा होता है।

2010 में लोकसभा में इस विषय पर चर्चा के दौरान कई सांसदों ने सुझाव दिया था कि सांसदों के वेतन को तय करने के लिए एक ऐसी व्यवस्था तैयार की जानी चाहिए जिसमें सांसद या संसदीय समिति शामिल न हो।

इसी को ध्यान में रखकर 2018 में संसद ने फाइनांस एक्ट 2018 के जरिए सांसदों के वेतन को निर्धारित करने वाले कानून में संशोधन किया। इस एक्ट में प्रावधान ये है कि सांसदों के वेतन, दैनिक भत्ते और पेंशन में हर पांच वर्षों में बढ़ोतरी की जाएगी। ये बढ़ोतरी लागत मुद्रास्फीति सूचकांक (Cost Inflation Index) के आधार पर की जाएगी।

लागत मुद्रास्फीति सूचकांक (Cost Inflation Index)
लागत मुद्रास्फीति सूचकांक भारत सरकार द्वारा जारी एक महंगाई सूचकांक है जो ये बताता है कि पहले के मुक़ाबले महंगाई कितनी बढ़ गई है। इसके लिए 2001-02 को आधार वर्ष और उसकी लागत मुद्रास्फीति 100 मान लिया गया है। इसी को आधार बनाकर हर साल का लागत मुद्रास्फीति सूचकांक जारी किया जाता है। उदाहरण के लिए, 2020-21 के लिए CII 301 है, यानी कि 2001-02 में जितनी वस्तुएँ या सेवाएँ 100 रुपए में मिल जाती थी वो 2020-21 में 301 रुपए में मिल रहा है। भारत सरकार इसी को आधार बनाकर सांसदों के वेतन को बढ़ाती है।
केंद्रीय मंत्रिपरिषद

सांसदों और मंत्रियों के वेतन और भत्ते 

विशेषता(रुपए प्रति माह में)
वेतन  1,00,000
निर्वाचन क्षेत्र भत्ता 70,000
कार्यालयी भत्ता60,000
इसमें सेकार्यालयी भत्ता20,000
 सचिवीय सहायता40,000
प्रधानमंत्री का सत्कार भत्ता3,000
कैबिनेट मंत्रियों का सत्कार भत्ता 2,000
राज्य मंत्रियों का सत्कार भत्ता1,000
डेप्युटी मंत्रियों का सत्कार भत्ता600
केंद्रीय मंत्रिपरिषद

अनुच्छेद 74 और 75 के अलावे भी कुछ अन्य अनुच्छेद हैं जो इस विषय से संबन्धित हैं; जैसे कि

अनुच्छेद 77भारत सरकार के कार्य का संचालन

भारत सरकार की समस्त कार्यपालक कार्यवाहियाँ राष्ट्रपति के नाम से की जाएगी और उसी प्रकार अभिव्यक्त भी होगी।

राष्ट्रपति के नाम से पारित आदेशों तथा अन्य दस्तावेजों को इस प्रकार अधिप्रमाणित किया जाएगा जैसा कि राष्ट्रपति द्वारा बनाए जाने वाले नियमों में निर्दिष्ट हो। इसके अतिरिक्त इस प्रकार अधिप्रमाणित किए गए किसी आदेश अथवा प्रपत्र की वैधता पर इस आधार पर कोई प्रश्न नहीं किया जाएगा कि उक्त आदेश अथवा प्रपत्र राष्ट्रपति द्वारा निर्मित अथवा निष्पादित हैं।

राष्ट्रपति, भारत सरकार का कार्य अधिक सुविधापूर्वक किए जाने के लिए और मंत्रियों में उक्त कार्य के आवंटन के लिए नियम बनाएगा।

अनुच्छेद 78 – राष्ट्रपति को जानकारी देने आदि के संबंध में मंत्रिपरिषद के अध्यक्ष के रूप में प्रधानमंत्री के कर्तव्य

प्रधानमंत्री का यह कर्तव्य होगा कि – 1. वह राष्ट्रपति को संघ के प्रशासन से संबन्धित मामलों के बारे में मंत्रिपरिषद द्वारा लिए गए निर्णयों तथा विधायन के प्रस्तावों के बारे में सूचित करें।

2. अगर राष्ट्रपति द्वारा संघ के प्रशासन आदि से संबन्धित मामलों तथा प्रस्तावित विधायनों के बारे में कोई सूचना मांगता है तो प्रधानमंत्री उसे राष्ट्रपति को उपलब्ध करवाएगा।

3. यदि राष्ट्रपति चाहे कि किसी ऐसे मामले को मंत्रिपरिषद के विचारार्थ भेजा जाए जिसपर कि किसी मंत्री द्वारा निर्णय लिया जा चुका है लेकिन जिस पर मंत्रीपरिषद ने विचार नहीं किया है, तो प्रधानमंत्री उसे मंत्रिपरिषद के विचारार्थ भेजेगा।

अनुच्छेद 88 – सदनों के बारे में मंत्रियों और महान्यायवादी के अधिकार

एक मंत्री अगर चाहे तो जिस सदन का वो सदस्य नहीं है उसकी कार्यवाही में भी भाग ले सकता है वहाँ वो बोल भी सकता है लेकिन बस मतदान नहीं कर सकता। मतदान तो वे अपने सदन में ही कर सकता है। उदाहरण के लिए अमित शाह लोकसभा सदस्य है लेकिन चूंकि वे एक मंत्री हैं इसीलिए वे राज्यसभा की कार्यवाहियों में भी भाग ले सकते हैं। (यही बात महान्यायवादी पर भी लागू होता है)

केंद्रीय मंत्रिपरिषद की संरचना (Structure of the Central Council of Ministers)

केंद्रीय मंत्रिपरिषद (Central council of ministers) में मंत्रियों की तीन श्रेणियाँ होती है – कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री व उपमंत्री। उनके बीच अंतर उनके पदक्रम, वेतन तथा राजनैतिक महत्व के आधार पर होता है। इन सभी मंत्रियों का प्रमुख प्रधानमंत्री है, जो सरकार का उच्चतम कार्यकारी है।

वर्तमान केंद्रीय मंत्रिपरिषद (central council of ministers) की सूची देखने के लिए यहाँ क्लिक करें एवं पीडीएफ़ डाउनलोड करने के लिए यहाँ क्लिक करें।

कैबिनेट मंत्रियों के पास केंद्र सरकार के महत्वपूर्ण मंत्रालय जैसे, गृह, रक्षा, वित्त, विदेश व अन्य मंत्रालय होते हैं। वे कैबिनेट के सदस्य होते हैं और इसकी बैठकों में भाग लेते हैं तथा नीति निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। अत: इनके उत्तरदायित्व की परिधि सम्पूर्ण केंद्र सरकार पर है। दूसरे शब्दों में कहें तो मंत्रिपरिषद का ये एक छोटा रूप है जो शासन व्यवस्था में सबसे प्रमुख भूमिका निभाता है इसीलिए इसी को सरकार माना जाता है।

⏫ इन्दिरा गांधी के समय से कीचेन कैबिनेट काफी चर्चा में रहता है। (इसे यहाँ से समझें – कीचेन कैबिनेट)

राज्य मंत्रियों को कैबिनेट मंत्री के साथ सहयोगी बनाया जा सकता है अथवा मंत्रालय से संबन्धित कोई विशेष कार्य सौंपा जा सकता है। दोनों ही मामलों में वे कैबिनेट मंत्री की देखरेख, सलाह तथा उसकी ज़िम्मेदारी पर कार्य करते हैं।

राज्य मंत्रियों को मंत्रालय या विभागों का स्वतंत्र प्रभार भी दिया जा सकता है। जब ऐसा होता है वे अपने मंत्रालय का कार्य, कैबिनेट मंत्री की तरह ही पूरी शक्ति व स्वतंत्रता से करते हैं। हालांकि वे कैबिनेट के सदस्य नहीं होते है तथा उनकी बैठकों में भाग नहीं लेते हैं। वे तब तक बैठक में भाग नहीं लेते, जब तक उन्हे उनके मंत्रालय से संबन्धित किसी कार्य हेतु विशेष रूप से आमंत्रित नहीं किया जाये।

उप-मंत्रियों को मंत्रालयों का स्वतंत्र प्रभार नहीं दिया जाता है। उन्हें कैबिनेट अथवा राज्य मंत्रियों को उनके प्रशासनिक, राजनैतिक और संसदीय कार्यों में सहायता के लिए नियुक्त किया जाता है। वे कैबिनेट के सदस्य नहीं होते तथा कैबिनेट की बैठक में भाग नहीं लेते हैं। याद रखिए कि ये सभी मंत्रिपरिषद के ही भाग होते है।

इसके अलावा यहाँ यह उल्लेख करना आवश्यक है कि मंत्रियों की एक और श्रेणी भी है, जिन्हे संसदीय सचिव (Parliamentary secretary) कहा जाता है। वे मंत्रिपरिषद की अंतिम श्रेणी में आते है। उनके पास कोई विभाग नहीं होता है। वे वरिष्ठ मंत्रियों के साथ उनके संसदीय कार्यों में सहायता के लिए नियुक्त होते हैं हालांकि 1967 के राजीव गांधी की सरकार के प्रथम विस्तार को छोड़कर, कोई भी संसदीय सचिव अब तक नियुक्त नहीं किया गया है।

कई बार मंत्रिपरिषद में उप-प्रधानमंत्री को भी शामिल किया जा सकता है। उप-प्रधानमंत्री मुख्यतः राजनैतिक कारणों से नियुक्त किया जाता है इसीलिए ये हो भी सकते हैं और नहीं भी।

मंत्रिपरिषद और मंत्रिमंडल के बीच अंतर

मंत्रिपरिषद मंत्रिमंडल
मंत्रिपरिषद एक बड़ा निकाय है जिसमें 60 से 70 मंत्री होते हैं।वहीं मंत्रिमंडल एक लघु निकाय है जिसमें 15 से 20 मंत्री होते है।
मंत्रिपरिषद में मंत्रियों की तीनों श्रेणियां – कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री व उपमंत्री शामिल होता है।वहीं मंत्रिमंडल में केवल कैबिनेट मंत्री शामिल होते है। अत: यह मंत्रिपरिषद का ही एक भाग है।
मंत्रिपरिषद का कोई सामूहिक कार्य नहीं होता हैं और यह सरकारी कार्यों हेतु एक साथ बैठक नहीं करती है।मंत्रिमंडल के कार्यकलाप सामूहिक होते है, यह समान्यतः हफ्ते में एक बार बैठक करती है और सरकारी कार्यों के संबंध में निर्णय करती है।
मंत्रिपरिषद को वैसे तो सभी शक्तियाँ प्राप्त हैं परंतु कागजों में। इसके कार्यों का निर्धारण मंत्रिमंडल करती है और यह मंत्रिमंडल के निर्णयों को लागू करती है।मंत्रिमंडल वास्तविक रूप में मंत्रिपरिषद की शक्तियों का प्रयोग करती है और उसके लिए कार्य भी करती है। ये मंत्रिपरिषद को राजनैतिक निर्णय लेकर निर्देश देती है तथा ये निर्देश सभी मंत्रियों पर बाध्यकारी होते हैं।
मंत्रिपरिषद एक संवैधानिक निकाय है। इसका विस्तृत वर्णन संविधान के अनुच्छेद 74 तथा 75 में किया गया है।मंत्रिमंडल एक निकाय है जिसे 44वें संविधान संशोधनअधिनियम द्वारा शामिल किया गया था। अत: यह संविधान के मूल स्वरूप में शामिल नहीं था।
विस्तार से समझें यहाँ क्लिक करके।

केंद्रीय मंत्रिपरिषद के मंत्रियों के उत्तरदायित्व

सामूहिक उत्तरदायित्व (Collective responsibility)

सरकार कि संसदीय व्यवस्था की कार्य प्रणाली का मौलिक सिद्धांत उसके सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत है। जैसा कि हमने ऊपर देखा है कि अनुच्छेद 75 स्पष्ट रूप से कहता है कि मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होगा। इसका अर्थ है कि सभी मंत्रियों की उनके सभी कार्यों और निर्णयों के लिए लोकसभा के प्रति संयुक्त ज़िम्मेदारी होगी।

सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत कहता है कि मंत्रिमंडल के निर्णय सभी केन्द्रीय मंत्रियों तथा अन्य मंत्रियों के लिए बाध्यकारी हैं। यानी कि सभी मंत्रियों का यह कर्तव्य है कि वो मंत्रिमंडल के निर्णयों को माने तथा संसद के बाहर और भीतर उसका समर्थन करें। यदि कोई मंत्री, मंत्रिमंडल के किसी निर्णय से असहमत है और उसके लिए तैयार नहीं है, तो उसे त्यागपत्र देना होगा।

पूर्व में कई मंत्रियों ने मंत्रिमंडल के साथ अपने मतभेद के चलते कई बार त्यागपत्र दिये हैं। उदाहरण के लिय 1953 में डॉ. बी आर अंबेडकर ने हिन्दू कोड बिल पर अपने साथियों के साथ के साथ मतभेद के चलते त्यागपत्र दे दिया था। इसी प्रकार आरिफ़ मोहम्मद ने मुस्लिम महिला (तलाक से बचाव का अधिकार) अधिनियम 1986 के विरोध में त्यागपत्र दे दिया था।

जब लोकसभा, मंत्रिपरिषद के विरुद्ध एक अविश्वास प्रस्ताव पारित करती है तो सभी मंत्रियों को (जिसमें कि राज्यसभा के मंत्री भी शामिल हों सकते है) को त्यागपत्र देना पड़ता है। इसके अतिरिक्त मंत्रिपरिषद राष्ट्रपति को इस आधार पर लोकसभा को विघटित करने की सलाह भी दे सकता है कि सदन अब अपना जनमत खो चुकी है और नए चुनाव की मांग करता है। हालांकि राष्ट्रपति, लोकसभा में विश्वास मत खोए हुए मंत्रिपरिषद की सलाह मानने हेतु बाध्य नहीं होता है।

व्यक्तिगत उत्तरदायित्व

अनुच्छेद 75 में व्यक्तिगत उत्तरदायित्व का सिद्धांत भी वर्णित हैं। यह कहता है कि मंत्री राष्ट्रपति के प्रसाद्पर्यंत अपने पद पर बने रहेंगे जिसका अर्थ है कि केवल प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति किसी मंत्री को उस समय भी हटा सकता है जब मंत्रिपरिषद को लोकसभा में विश्वास मत प्राप्त है। विचारों में मतभेद के कारण अथवा किसी मंत्री के कार्यों से संतुष्ट न होने के कारण प्रधानमंत्री उसे त्यागपत्र देने के लिए भी कह सकता है अथवा राष्ट्रपति को उसे बर्खास्त करने की सलाह से सकता है।

मंत्रियों का कोई विधिक उत्तरदायित्व नहीं

ब्रिटेन में राष्ट्रपति की जगह राजा होता है और वहाँ के राजा अगर किसी सार्वजनिक काम के लिए कोई आदेश देता है तो संबन्धित मंत्री को उस पर हस्ताक्षर करना पड़ता है। यदि वह आदेश किसी कानून का उल्लंघन करता है तो उसका उत्तरदायित्व मंत्री पर होता है न कि राजा पर। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वहाँ ये माना जाता है कि राजा कभी गलत नहीं हो सकता है। जबकि इसके लिए उस अमुक मंत्री को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है।

दूसरी ओर भारत में, संविधान में किसी भी मंत्री के लिए किसी भी प्रकार की विधिक ज़िम्मेदारी का कोई उपबंध नहीं है। भारत में आवश्यक नहीं है कि राष्ट्रपति द्वारा जनहित में जारी किसी आदेश पर कोई मंत्री हस्ताक्षर करे। यहाँ तक कि मंत्री द्वारा राष्ट्रपति को दी गयी किसी सलाह की जांच भी न्यायालय के क्षेत्र से बाहर होता है।

कुल मिलाकर यही है केंद्रीय मंत्रिपरिषद (Central Council of Ministers), उम्मीद है समझ में आया होगा। नीचे अन्य लेखों का लिंक दिया जा रहा है उसे भी अवश्य पढ़ें।

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डाउनलोड केंद्रीय मंत्रिपरिषद

Article Based On,
एम लक्ष्मीकान्त – भारत की राजव्यवस्था↗️
मूल संविधान भाग 5↗️
संविधान की तीसरी अनुसूची
PRS – मंत्रियों के वेतन और भत्ते आदि।

मंत्रिपरिषद और मंत्रिमंडल
Kitchen cabinet

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