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बुद्ध एक महान शख़्सियत थे, उनके विचारों से ये बातें और भी स्पष्ट होती है, उनके विचार आज भी हमें प्रभावित करता है क्योंकि वे आज भी प्रासंगिक है।

बुद्ध की प्रेरणादायक कहानी

गौतम बुद्ध की प्रेरणादायक कहानी


धर्म का सौदा

भगवान बुद्ध एक बार काशी में एक किसान के घर भिक्षा माँगने चले गए। भिक्षा पात्र आगे बढ़ाया। किसान ने एक बार उन्हें ऊपर से नीचे तक देखा। शरीर पूर्णांग था।

संयोग से वह किसान कर्म पूजक था। गहरी आँखों से देखता हुआ बोला–“मैं तो किसान हूँ। अपना परिश्रम करके अपना पेट भरता हूँ। साथ में और भी कई व्यक्तियों का। तुम क्यों बिना परिश्रम किए भोजन प्राप्त करना चाहते हो?!

बुद्ध ने अत्यंत ही शांत स्वर में उत्तर दिया–”मैं भी तो किसान हूँ। मैं भी खेती करता हूँ।”’ किसान ने आश्चर्य से भरकर प्रश्न किया–‘फिर……..अब भिक्षा क्‍यों माँग रहे हैं?”

भगवान बुद्ध ने किसान की शंका का समाधान करते हुए कहा– क्योंकि वत्स! वह खेती आत्मा की है। मैं ज्ञान के हल से श्रद्धा के बीज बोता हूँ। तपस्या के जल से सींचता हूँ। विनय मेरे हल की हरिस, विचारशीलता फाल और मन नरैली है। सतत अभ्यास का यान, मुझे उस गंतव्य की ओर ले जा रहा है जहाँ न दुःख है न संताप, मेरी इस खेती से अमरता की फसल लहलहाती है।

ऐसे में, यदि तुम मुझे अपनी खेती का कुछ भाग दो…….और मैं तुम्हें अपनी खेती का कुछ भाग दूँ तो क्‍या यह सौदा अच्छा न रहेगा। किसान की समझ में बात आ गई और वह तथागत के चरणों में अवनत हो गया।


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पंडित और मूर्ख

श्रावस्ती के दो युवकों में बड़ी प्रगाढ़ मैत्री थी, दोनों ही दूसरों की जेब काटने का धंधा करते थे। एक दिन भगवान बुद्ध का एक स्थान पर प्रवचन चल रहा था। अच्छा अवसर जानकर दोनों मित्र वहीं जा पहुँचे।

उनमें से एक को भगवान बुद्ध के प्रवचन बहुत अच्छे लगे और वह ध्यानावस्थित होकर उन्हें सुनने लगा। दूसरे ने कई जेबें इस बीच साफ कर लीं। शाम को दोनों घर लौटे। एक के पास धन था, दूसरे के पास सद्विचार।

गिरहकट.ने व्यंग्य करते हुए कहा–“तू बड़ा मूर्ख है रे, जो दूसरों की बातों से प्रभावित हो गया। अब इस पांडित्य का ही भोजन पका और पेट भर।” अपने पूर्व कृत-कर्मों से दु:खी दूसरा गिरहकट बुद्ध के पास लौटा और उनसे सब हाल कहा।

बुद्ध ने समझाया-‘वत्स! जो अपनी बुराइयों को मानकर उन्हें निकालने का प्रयत्न करता है वही सच्चा पंडित है, पर जो बुराई करता हुआ भी पंडित बनता है वही मूर्ख है।’!


सधन्यवाद वापस

एक बार की बात है, भगवान बुद्ध ज्ञान का प्रचार करने के क्रम में घूमते हुए एक ब्राह्मण के घर ठहरे। उस समय ब्राह्मण बुद्ध से काफी खफा रहते थे क्योंकि ब्राह्मणों को लगता था कि बुद्ध ने उसके धर्म को नुकसान पहुंचाया है।

खैर, ब्राह्मण को मालूम हुआ कि वह बुद्ध हैं तो उसने जी भरकर गालियाँ दीं, अपशब्द कहे और तुरंत उसके घर से निकल जाने को कहा। बुद्ध देर तक सुनते रहे।

जब उस ब्राह्मण ने बोलना बंद किया तो उन्होंने पूछा–“द्विजवर ! आपके यहाँ कोई अतिथि आते होंगे तो आप उनका सुंदर भोजन और मिठाई से स्वागत करते होंगे।” इसमें क्या शक–उसने उत्तर दिया।

और यदि किसी कारणवश मेहमान खाने से इंकार कर दे तो आप उन पकवानों को फेंक देते होंगे। “फेंक क्‍यों देते हैं, हम स्वयं ग्रहण कर लेते हैं”–उन्होंने विश्वासपूर्वक उत्तर दिया।

“तो हम आपकी यह गालियों की भेंट स्वीकार नहीं करते, अपनी वस्तु आप ग्रहण करिए।’” यह कहकर बुद्ध मुसकुराते हुए वहाँ से चल पड़े।


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निष्ठा की भूख

शौरपुच्छ नामक वणिक ने एक बार भगवान बुद्ध से कहा– “भगवान मेरी सेवा स्वीकार करें। मेरे पास एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ हैं, वह सब आपके काम आएंगे।’ बुद्ध कुछ न बोले चुपचाप चले गए।

कुछ दिन बाद वह पुन: तथागत की सेवा में उपस्थित हुआ और कहने लगा–“’ देव! यह आभूषण और वस्त्र ले लें दु:खियों के काम आएँगे मेरे पास अभी बहुत सा द्रव्य शेष है।” बुद्ध बिना कुछ कहे वहाँ से उठ गए। शौरपुच्छ बड़ा दु:खी था कि वह गुरुदेव को किस तरह प्रसन्न करे!

वैशाली में उस दिन महान धर्म-सम्मेलन था हजारों व्यक्ति आए थे। बड़ी व्यवस्था जुटानी थी। सैकड़ों शिष्य और भिक्षु काम में लगे थे। आज शौरपुच्छ ने किसी से कुछ न पूछा, काम में जुट गया। रात बीत गई, सब लोग चले गए पर शौपुरच्छ बेसुध कार्य-निमग्न रहा।

बुद्ध उसके पास पहुँचे और बोले–‘“शौरपुच्छ, तुमने प्रसाद पाया या नहीं।’” शौरपुच्छ का गला रुँध गया। भाव-विभोर होकर उसने तथागत को सादर प्रणाम किया। बुद्ध ने कहा–““वत्स, परमात्मा किसी से धन और संपत्ति नहीं चाहता, वह तो निष्ठा का भूखा है। लोगों को निष्ठाओं में ही वह रमण किया करता है, आज तुमने स्वयं यह जान लिया।’!


कुमारिल का पश्चाताप

बौद्ध धर्म की नास्तिकवादी विचारधारा का खंडन करने के लिए कुमारिल भट्ट ने प्रतिज्ञा की और उसे पूरा करने के लिए उन्होंने तक्षशिला के विश्वविद्यालय में बौद्ध धर्म का गहन अध्ययन पूरा किया।

उन दिनों की प्रथा के अनुसार छात्रों को आजीवन बौद्ध धर्म के प्रति आस्थागत रहने की प्रतिज्ञा करनी पड़ती थी, तभी उन्हें विद्यालय में प्रवेश मिलता था। कुमारिल ने झूठी प्रतिज्ञा ली और शिक्षा समाप्त होते ही बौद्ध मत का खंडन और वैदिक धर्म का प्रसार आरंभ कर दिया।

अपने प्रयत्न में उन्हें सफलता भी बहुत मिली। शास्त्रार्थ की धूम मचाकर उन्होंने शून्यवाद की निस्सारता सिद्ध करके लड़खड़ाती हुई वैदिक मान्यताएँ फिर मजबूत बनाईं।

कार्य में सफलता मिली पर कुमारिल का अंत:करण विक्षुब्द ही रहा। गुरु के सामने की हुई प्रतिज्ञा एवं उन्हें दिलाए हुए विश्वास का घात करने के पाप से उनकी आत्मा हर घड़ी दु:खी रहने लगी।

अंत में उन्होंने इस पाप का प्रायश्चित करने के लिए अग्नि में जीवित जल जाने का निश्चय किया। इस प्रायश्चित के करुण दृश्य को देखने देश भर के अगणित विद्वान पहुँचे, उन्हीं में आदि शंकराचार्य भी थे।

उन्होंने कुमारिल को प्रायश्चित न करने के लिए समझाते हुए कहा–“आपने तो जनहित के लिए वैसा किया था फिर प्रायश्चित क्यों करें ?” इस पर कुमारिल ने कहा–“अच्छा काम भी अच्छे मार्ग से ही किया जाना चाहिए, कुमार्ग पर चलकर श्रेष्ठ काम करने की परंपरा गलत है।

मैंने आपत्ति धर्म के रूप में वह छल किया पर उसकी परंपरा आरंभ नहीं करना चाहता। दूसरे लोग मेरा अनुकरण करते हुए अनैतिक मार्ग पर चलते हुए अच्छे उद्देश्य के लिए प्रयत्न करने लगें तो इससे धर्म और सदाचार ही नष्ट होगा और तब प्राप्त हुए लाभ का कोई मूल्य न रह जाएगा।

अतएव सदाचार की सर्वोत्कृष्टता प्रतिपादित करने के लिए मेरा प्रायश्चित करना ही उचित है।’! कुमारिल प्रायश्चित की अग्नि में जल गए, उनकी प्रतिपादित आस्था सदा अमर रहेगी।


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जन्म से सब शूद्र ही होते हैं !

भगवान बुद्ध अनाथ पिंडक के जैतवन में ग्रामवासियों को उपदेश कर रहे थे। शिष्य अनाथ पिंडक भी समीप ही बैठा धर्मचर्चा का लाभ ले रहा था। तभी सामने से महाकाश्यप मौद्गल्यायन, सारिपुत्र, चुंद और देवदत्त आदि आते हुए दिखाई दिए।

उन्हें देखते ही बुद्ध ने कहा– “वत्स ! उठो, यह ब्राह्मण मंडली आ रही है, उसके लिए योग्य आसन का प्रबंध करो।’! अनाथ पिंडक ने आयुष्मानों की ओर दृष्टि दौड़ाई, फिर साश्चर्य कहा–” भगवन्‌। आप संभवत: इन्हें जानते नहीं । ब्राह्मण तो इनमें कोई एक ही है, शेष कोई क्षत्रिय, कोई वैश्य और कोई अस्पृश्य भील है।!”

गौतम बुद्ध अनाथ पिंडक के वचन सुनकर हँसे और बोले–“तात।! जाति जन्म से नहीं, गुण, कर्म और स्वभाव से पहचानी जाती है। श्रेष्ठ रागरहित, धर्मपरायण, संयमी और सेवाभावी होने के कारण ही इन्हें मैंने ब्राह्मण कहा है। ऐसे पुरुष को तू निश्चय ही ब्राह्मण मान, जन्म से तो सभी जीव शूद्र होते हैं।’!


सुजाता की खीर और बुद्ध का आत्म-साक्षात्कार

सुजाता ने खीर दी, बुद्ध ने उसे ग्रहण कर परम संतोष का अनुभव किया। उस दिन उनकी जो समाधि लगी तो फिर सातवें दिन जाकर टूटी। जब वे उठे, उन्हें आत्म-साक्षात्कार हो चुका था। निरंजरा नदी के तट पर प्रसन्‍नमुख आसीन भगवान बुद्ध को देखने गई सुजाता बड़ी विस्मित हो रही थी कि यह सात दिन तक एक ही आसन पर कैसे बैठे रहे ?

तभी सामने से एक शव लिए जाते हुए कुछ व्यक्ति दिखाई दिए। उस शव को देखते ही भगवान बुद्ध हँसने लगे। सुजाता ने प्रश्न किया–”योगिराज! कल तक तो आप शव देखकर दु:खी हो जाते थे, आज वह दुःख कहाँ चला गया?!

भगवान बुद्ध ने कहा–” बालिके ! सुख-दुःख मनुष्य की कल्पना मात्र है। कल तक जड़-वस्तुओं में आसक्ति होने के कारण यह भय था कि कहीं वह न छूट जाए, वह न बिछुड़ जाए।

यह भय ही दुःख का कारण था, आज मैंने जान लिया कि जो जड़ है, उसका तो गुण ही परिवर्तन है, पर जिसके लिए दुःख करते हैं, वह तो न परिवर्तनशील है न नाशवान। अब तू ही बता जो सनातन वस्तु पा ले, उसे नाशवान वस्तुओं का क्या दुःख ।’! सुजाता यह उत्तर सुनकर प्रसन्‍न हुई और स्वयं भी आत्म-चिंतन में लग गई।


प्रमादी की पहचान

एक दिन भिक्षु संगाम जी ने भगवान बुद्ध से पूछा–” भगवन्‌! संसार के प्रमाद में पड़े हुए की क्या पहचान है ?”’ भगवान बुद्ध ने तत्काल कोई उत्तर न दिया और बातें करते रहे।

दूसरे दिन कुंडिया नगर की कोलिय पुत्री सुप्पवासा के यहाँ उनका भोज था। सुप्पवासा सात वर्ष तक गर्भ धारण करने का कष्ट भोग चुकी थी। भगवान बुद्ध की कृपा से ही उसे इस कष्ट से छुटकारा मिला था, इसी प्रसन्नता में वह भिक्षु-संघ को भोज दे रही थी।

जब सुप्पवासा तथागत को भोजन करा रही थी, उसका पति नवजात शिशु को लिए पास ही खड़ा था। सात वर्ष तक गर्भ में रहने के कारण बालक जन्म से ही विकसित था। देखने में अति सुंदर। उसके हँसने और क्रीड़ा करने की गतिविधियाँ बड़ी मनमोहक थीं। बार-बार माँ की गोद में जाने के लिए मचल रहा था।

भगवान बुद्ध ने मुस्कराते हुए पूछा-“बेटी सुप्पवासा! तुझे ऐसे-ऐसे पुत्र मिलें तो कितने और पुत्रों की कामना तू कर सकती है ?” सुप्पवासा ने कहा–” भगवन्‌! ऐसे सात पुत्र हों तो अच्छा है।’! संगाम जी बगल में ही बैठे थे।

कल तक जो प्रसव पीड़ा से बुरी तरह व्याकुल थी, आज फिर पुत्रों की कामना कर रही है, यह देखकर संगाम जी बड़े आश्चर्यचकित हुए। बुद्ध ने हँसकर कहा–”संगाम जी चौंकिए मत, तुम्हारे कल के प्रश्न का उत्तर यही तो है।”


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योग्यता की परख

अंकमाल नामक एक युवक भगवान बुद्ध के सामने उपस्थित हुआ और बोला–” भगवन्‌! मैं संसार की कुछ सेवा करना चाहता हूँ, आप मुझे जहाँ भी भेजना चाहें भेज दें ताकि मैं लोगों को धर्म का रास्ता दिखा सकूँ।”

बुद्ध हँसे और बोले–‘“तात! संसार को कुछ देने के पहले अपने पास कुछ होना आवश्यक होता है, जबकि तुम्हारे पास ऐसा कुछ भी नहीं है, जाओ पहले अपनी योग्यता बढ़ाओ फिर संसार की भी सेवा करना।”

अंकमाल वहाँ से चल पड़ा और विभिन्न प्रकार के कलाओं के अभ्यास में जुट गया। बाण बनाने से लेकर चित्रकला तक, मल्लविद्या से लेकर मल्लाहकारी तक जितनी भी कलाएँ हो सकती हैं उन सबका उसने 10 वर्ष तक कठोर अभ्यास किया।

अंकमाल इस सब में इतना अच्छा हो गया कि सारे देश में उसकी ख्याति फैल गई। अपनी प्रशंसा से आप प्रसन्‍न होकर अंकमाल अभिमानपूर्वक लौटा और तथागत की सेवा में उपस्थित हुआ।

अपनी योग्यता का बखान करते हुए उसने कहा–” भगवन्‌! अब मैं 64 कलाओं का ज्ञाता हूँ और अब मैं संसार के प्रत्येक व्यक्ति को कुछ न कुछ सिखा सकता हूँ।”

भगवान बुद्ध मुसकराए और बोले–“अभी तो तुम कलाएँ सीखकर आए हो, परीक्षा दे लो तब उन पर अभिमान करना।” अगले दिन भगवान बुद्ध एक साधारण नागरिक का वेष बदल कर अंकमाल के पास गए और उसे अकारण खरी-खोटी सुनाने लगे।

अंकमाल क्रुद्ध होकर मारने दौड़ा तो बुद्ध वहाँ से मुसकराते हुए वापस लौट पड़े। उसी दिन दो बौद्ध श्रमण वेष बदल कर अंकंमाल के समीप जाकर बोले–“आचार्य ! आपको सम्राट हर्ष ने मंत्रिपद देने की इच्छा व्यक्त की है। क्या आप उसे स्वीकार करेंगे”

अंकमाल को लोभ आ गया, उसने कहा–“हाँ-हाँ, क्यों नहीं, अभी चलो।” दोनों श्रमण भी “मुस्कुरा दिए और चुपचाप लौट आए।

अंकमाल हैरान था–बात क्या है ? थोड़ी देर बाद भगवान बुद्ध पुनः उपस्थित हुए। उनके साथ आम्रपाली थी। अंकमाल जितनी देर तथागत वहाँ रहे आम्रपाली की ही ओर बार-बार देखता रहा। बात समाप्त कर तथागत आश्रम लौटे।

सायंकाल अंकमाल को बुद्ध देव ने पुन: बुलाया और पूछा– “वत्स! क्या तुमने क्रोध, काम और लोभ पर विजय की विद्या भी सीखी है ?” अंकमाल को दिनभर की सब घटनाएँ याद हो आईं। उसने लज्जा से अपना सिर झुका लिया और उस दिन से आत्मविजय की साधना में संलग्न हो गया।


निराश न लौटाओ

भगवान बुद्ध मृत्यु-शैया पर पड़े थे। उनकी जीवन-ज्योति के अस्त होने में कुछ ही विलंब था। सुभद्र नामक साधु ने यह समाचार सुना तो वह अपनी धर्म संबंधी कुछ शंकाओं को निवारण करने के उद्देश्य से उनकी सेवा में उपस्थित हुआ।

पर आनंद ने, जो कुटी के द्वार पर स्थित था उसे भीतर जाने से रोका और कहा–“’भगवान को इस समय कष्ट देना उचित न होगा।” पर सुभद्र बराबर आग्रह करता रहा कि उसे भगवान का दर्शन कर लेने दिया जाए।

बुद्ध जी ने भीतर पड़े हुए इस चर्चा को अस्पष्ट रूप से सुना और वहीं से कहा -”आनंद! सुभद्र को भीतर आने दो। वह ज्ञान- प्राप्ति की इच्छा से आया है, मुझे कष्ट देने नहीं आया।’! सुभद्र ने जैसे ही भीतर जाकर करुणा की उस शांत मूर्ति को देखा, वैसे ही बुद्ध जी के उपदेश उसके हृदय में प्रविष्ट हो गए और वह बौद्ध भिक्षु बन गया। बुद्ध भगवान ने शरीरांत होते हुए भी किसी ज्ञान के अभिलाषी को निराश नहीं किया।


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अप्प दीपो भव:

भगवान बुद्ध जब मरने लगे तब उन्होने अपने शिष्यों को बुलाकर अंतिम उपदेश दिया– तुम लोग अपने-अपने ऊपर निर्भर रहो। किसी दूसरे की सहायता की आशा न करो। अपने भीतर से ही अपने लिए प्रकाश उत्पन्न करो। सत्य की ही शरण में जाओ और उसे मजबूत हाथों से पकड़े रहो।”


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