Veto Power of President in India (राष्ट्रपति की वीटो शक्ति)

इस लेख में हम राष्ट्रपति की वीटो शक्ति (President’s veto power) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे, एवं इसके विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं को समझने की कोशिश करेंगे।
Veto Power

वीटो शक्ति : पृष्ठभूमि

अगर आप करेंट अफेयर्स से जुड़े रहते होंगे तो कई बार आपने सुना होगा कि चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UN Security Council) में वीटो कर दिया।

आमतौर पर हमें इसके बारे में इतना जरूर पता होता है कि वीटो करने से कोई काम रुक जाता है। या किसी काम को रोकने के लिए वीटो कर दिया जाता है। ये सही भी है पर पूरी जानकारी नहीं है। तो आइये वीटो को समझते हुए राष्ट्रपति की वीटो शक्ति के बारे में जानते है।

वीटो शक्ति क्या है? (What is veto power?)

सरकार की एक शाखा में या फिर किसी व्यक्ति में निहित वो शक्ति या अधिकार, जिसकी मदद से किसी अन्य शाखा के निर्णयों, अधिनियमों, आदि को रद्द या स्थगित किया जा सकता है। इसी को वीटो शक्ति या Veto Power कहते हैं।

दूसरे शब्दों में कहें तो वीटो एक आधिकारिक कार्रवाई को रोकने की शक्ति है, विशेष रूप से किसी अधिनियमन को रोकने की शक्ति।

भारत के संदर्भ में कहें तो वीटो विशेष रूप से विधायिका द्वारा पारित बिलों को अस्वीकार करने के लिए राष्ट्रपति, राज्यपाल या अन्य मुख्य कार्यकारी अधिकारी का अधिकार है।

वीटो के प्रकार (Types of Veto)

भारत के संदर्भ में देखें तो चार प्रकार का वीटो होता है। याद रखिए वीटो का मूल मतलब तो वहीं होता है पर अलग-अलग देश अपनी सुविधा के हिसाब से वीटो को अलग-अलग प्रकार में बांटते हैं।

जैसे कि मैंने अमेरिका के बारे में पढ़ा तो वहाँ का राष्ट्रपति समान्यतः दो ही प्रकार का वीटो इस्तेमाल करता है। वहीं भारत की बात करें तो कुल चार प्रकार का वीटो इस्तेमाल किया जाता है जैसे कि –

1. अत्यांतिक वीटो (Extreme veto) ➡ इसका मतलब होता है, विधायिका (Legislature) द्वारा पारित विधेयक पर अपनी राय सुरक्षित रखना।

2. विशेषित वीटो (Featured veto) ➡ जब विधायिका द्वारा उच्च बहुमत से किसी प्रस्ताव, बिल आदि को निरस्त की जाये।

3. निलंबनकारी वीटो (Suspending veto) ➡ जब विधायिका द्वारा साधारण बहुमत से किसी प्रस्ताव, बिल आदि को निरस्त किया जाये।

4. पॉकेट वीटो (Pocket veto) ➡ इसका मतलब होता है, विधायिका द्वारा पारित किसी विधेयक (Bill) पर कोई निर्णय नहीं करना।

इसमें से भारत का राष्ट्रपति तीन प्रकार का वीटो इस्तेमाल करता है। अत्यांतिक वीटो, निलंबनकारी वीटो और पॉकेट वीटो। आइये इसे समझते हैं।

भारतीय राष्ट्रपति की वीटो शक्ति (Veto power of Indian President)

🔲 संविधान के अनुच्छेद 111 के अनुसार, संसद द्वारा पारित कोई विधेयक (Bill) तभी अधिनियम (Act) बनता है जब राष्ट्रपति उसे अपनी सहमति देता है।

जब ऐसा कोई विधेयक राष्ट्रपति की सहमति के लिए प्रस्तुत होता है तो उसके पास तीन विकल्प होते हैं।

1. वह विधेयक पर अपनी स्वीकृति दे सकता है; 2. विधेयक पर अपनी स्वीकृति को सुरक्षित रख सकता है; अथवा 3. वह विधेयक (यदि विधेयक धन विधेयक नहीं है तो) को संसद के पुनर्विचार हेतु लौटा सकता है।

हालांकि यदि संसद इस विधेयक को पुनः बिना किसी संशोधन के अथवा संशोधन करके, राष्ट्रपति के सामने प्रस्तुत करे तो राष्ट्रपति को अपनी स्वीकृति देनी ही पड़ती है।

इस प्रकार राष्ट्रपति के पास संसद द्वारा पारित विधेयकों के संबंध में वीटो शक्ति होती है,अर्थात वह विधेयक को अपनी स्वीकृति के लिए सुरक्षित रख सकता है।

🔲 राष्ट्रपति को ये शक्ति देने के दो कारण है ➡ 1. संसद को जल्दबाज़ी और सही ढंग से विचारित न किए गए विधान बनाने से रोकना और; 2. किसी असंवैधानिक विधान को रोकने के लिए।

अत्यांतिक वीटो (Extreme veto)

इसका संबंध राष्ट्रपति की उस शक्ति से है, जिसमें वह संसद द्वारा पारित किसी विधेयक को अपने पास सुरक्षित रखता है। यह विधेयक इस प्रकार समाप्त हो जाता है और अधिनियम नहीं बन पाता।

समान्यतः यह वीटो दो मामलों में प्रयोग किया जाता है: 1. गैर-सरकारी सदस्यों के विधेयक संबंध में अर्थात संसद का वह सदस्य जो मंत्री न हो, फिर भी वह कोई विधेयक संसद में प्रस्तुत करे।

2. सरकारी विधेयक के संबंध में, जब मंत्रिमंडल त्यागपत्र दें। ऐसी स्थिति में मान लीजिये विधेयक संसद से पारित हो गया हो तथा राष्ट्रपति की अनुमति मिलना शेष हो, लेकिन जो नया मंत्रिमंडल फिर से बन कर आता है वो राष्ट्रपति को ऐसे विधेयक पर अपनी सहमति न देने की सलाह दें। तब राष्ट्रपति इसी वीटो का प्रयोग करता है।

इस वीटो का उपयोग 1954 में, राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने ‘PEPSU विनियोग’ नामक विधेयक पर अपना निर्णय रोककर रखने में किया।

दरअसल यह विधेयक संसद द्वारा उस समय पारित किया गया जब *PEPSU राज्य मे राष्ट्रपति शासन लागू था परंतु जब यह विधेयक स्वीकृति के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा गया तो राष्ट्रपति शासन हटा लिया गया था।

** PEPSU यानी कि Patiala and East Punjab States Union । दरअसल आज के पूर्वी-पंजाब, हिमाचल प्रदेश और हरियाणा छोटे-छोटे प्रांत में बंटे थे। जैसे कि PatialaShimlaKasauliKandaghatChail, Jind आदि। इसी को संयुक्त रूप से PEPSU कहा जाता था। 1956 और इसके बाद धीरे-धीरे इस सब को मिलाकर बड़ा राज्य बनाया गया।

निलंबनकारी वीटो (Suspending veto)

राष्ट्रपति इस वीटो का प्रयोग तब करता है, जब वह किसी विधेयक को संसद के पुनर्विचार हेतु लौटाता है। हालांकि यदि संसद उस विधेयक को पुनः किसी संशोधन के बिना अथवा संशोधन के साथ पारित कर राष्ट्रपति के पास भेजती है तो उस पर राष्ट्रपति को अपनी स्वीकृति देना बाध्यकारी है।

इसका अर्थ है कि राष्ट्रपति के इस वीटो को, संसद से उस विधेयक को साधारण बहुमत से पुनः पारित कराकर निरस्त किया जा सकता है।

राष्ट्रपति धन विधेयकों (Money bills) के मामले में इस वीटो का प्रयोग नहीं कर सकता है। राष्ट्रपति किसी धन विधेयक को अपनी स्वीकृति या तो दे सकता है या उसे रोककर रख सकता है परंतु उसे संसद को पुनर्विचार के लिए नहीं भेज सकता है।

साधारणतः राष्ट्रपति, धन विधेयक पर अपनी स्वीकृति उस समय दे देता है, जब यह संसद में उसकी पूर्वानुमती से प्रस्तुत किया जाता है।

पॉकेट वीटो (Pocket veto)

🔲 इस मामले में राष्ट्रपति विधेयक पर न तो कोई सहमति देता है, न अस्वीकृत करता है, और न ही लौटाता है परंतु एक अनिश्चित काल के लिए विधेयक को लंबित कर देता है।

राष्ट्रपति की विधेयक पर किसी भी प्रकार का निर्णय न देने की (सकारात्मक अथवा नकारात्मक) शक्ति, पॉकेट वीटो के नाम से जानी जाती है।

🔲 राष्ट्रपति इस वीटो शक्ति का प्रयोग इस आधार पर करता है कि संविधान में उसके समक्ष आए किसी विधेयक पर निर्णय देने के लिए कोई समय सीमा तय नहीं है।

दूसरी ओर, अमेरिका में यह व्यवस्था है कि राष्ट्रपति को 10 दिनों के भीतर वह विधेयक पुनर्विचार के लिए लौटाना होता है। इस प्रकर यह कहा जा सकता है कि भारत के राष्ट्रपति की शक्ति इस संबंध में अमेरिका के राष्ट्रपति से ज्यादा है।

🔲 सन 1986 में राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह द्वारा ‘भारतीय डाक संशोधन अधिनियम’ के संदर्भ में इस वीटो का प्रयोग किया गया था।

🔷 यह बात ध्यान देने योग्य है कि संविधान संशोधन (Constitutional amendment) से संबन्धित अधिनियमों में राष्ट्रपति के पास कोई वीटो शक्ति नहीं हैं।

दरअसल 24वें संविधान संशोधन अधिनियम 1971 के द्वारा संविधान संशोधन विधेयकों पर राष्ट्रपति को अपनी स्वीकृति देना बाध्यकारी बना दिया गया है।

राज्य विधायिका पर राष्ट्रपति का वीटो (President’s veto on state legislature)

🔲 राज्य विधायिका के संबंध में भी राष्ट्रपति के पास वीटो शक्तियाँ हैं। राज्य विधायिका द्वारा पारित कोई भी विधेयक तभी अधिनियम बनता है, जब राज्यपाल अथवा राष्ट्रपति (यदि विधेयक राष्ट्रपति के विचारार्थ लाया गया हो) उस पर अपनी स्वीकृति दे देता है।

राज्यपाल की वीटो शक्ति (Veto power of the governor)

जब कोई विधेयक राज्य विधायिका द्वारा पारित कर राज्यपाल के विचारार्थ उसकी स्वीकृति के लिए लाया जाता है तो अनुच्छेद 200 के अंतर्गत उसके पास चार विकल्प होते हैं:-

1. वह विधेयक पर अपनी स्वीकृति दे सकता है, 2. वह विधेयक पर अपनी स्वीकृति सुरक्षित रख सकता है, 3. वह विधेयक (यदि धन विधेयक न हो) को राज्य विधायिका के पुनर्विचार के लिए लौटा सकता है और 4. वह विधेयक को राष्ट्रपति के विचाराधीन आरक्षित कर सकता है।

राज्यपाल के द्वारा राष्ट्रपति के विचाराधीन आरक्षित विधेयक

🔲 जब कोई विधेयक राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित किया जाता है तो राष्ट्रपति के पास अनुच्छेद 201 के तहत तीन विकल्प होते हैं: 1. वह विधेयक पर अपनी स्वीकृति दे सकता है, 2. वह विधेयक पर अपनी स्वीकृति सुरक्षित रख रखता है, अथवा 3. वह राज्यपाल को निर्देश दे सकता है कि वह विधेयक (यदि धन विधेयक नहीं है) को राज्य विधायिका के पास पुनर्विचार हेतु लौटा दे।

🔲 यदि राज्य विधायिका किसी संशोधन के बिना अथवा संशोधन करके पुनः विधेयक को पारित कर राष्ट्रपति के भेजती है तो तब भी राष्ट्रपति इस पर अपनी सहमति देने के लिए बाध्य नहीं है।

वही जब संसद ऐसा करता है तो राष्ट्रपति अपनी स्वीकृति देने को बाध्य होता है। इसे अभी हमने ऊपर पढ़ा है।

🔲 इसका अर्थ है कि राज्य विधायिका राष्ट्रपति के वीटो को निरस्त नहीं कर सकती है। इसके अतिरिक्त संविधान में यह समय सीमा भी तय नहीं है कि राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के विचारार्थ रखे विधेयक पर राष्ट्रपति कब तक अपना निर्णय दे।

🔲 इस प्रकार राष्ट्रपति राज्य विधायकों के संदर्भ में भी पॉकेट वीटो का उपयोग कर सकता है।

राष्ट्रपति और राज्यपाल की वीटो शक्ति की तुलना

राष्ट्रपति
सामान्य विधेयकों से संबन्धित
राज्यपाल
सामान्य विधेयकों से संबन्धित
प्रत्येक साधारण विधेयक जब वह संसद के दोनों सदनों (चाहे अलग-अलग या संयुक्त बैठक) से पारित होकर आता है तो उसे राष्ट्रपति के पास मंजूरी के लिए भेजा जाता है। इस मामले में उसके पास तीन विकल्प होते हैं-
1. वह विधेयक को स्वीकृति दे सकता है, फिर विधेयक अधिनियम बन जाता है। (कोई वीटो नहीं)
2. वह विधेयक को अपनी स्वीकृति रोक सकता है ऐसी स्थिति में विधेयक समाप्त हो जाएगा और अधिनियम नहीं बन पाएगा। (अत्यांतिक वीटो)
3. वह विधेयक (यदि विधेयक धन विधेयक नहीं है तो) को संसद के पुनर्विचार हेतु लौटा सकता है। यदि विधेयक को बिना किसी परिवर्तन के फिर से दोनों सदनों द्वारा पारित कराकर राष्ट्रपति की स्वीकृत के लिए भेजा जाये तो राष्ट्रपति को उसे स्वीकृति अवश्य देनी होती है।
ऐसे मामलों में राष्ट्रपति के पास केस स्थगन वीटो (निलंबनकारी वीटो) का अधिकार होता है। यानी कि वह उसे रोक कर रख सकता है।
प्रत्येक साधारण विधेयक जब वह विधानमंडल के सदन या सदनों (अगर विधानपरिषद भी हो तो) से पारित होकर आता है तो इसे राज्यपाल के पास मंजूरी के लिए भेजा जाता है। इस मामले में राज्यपाल के पास चार विकल्प होते है-
1. वह विधेयक को स्वीकृति प्रदान कर सकता है, विधेयक फिर अधिनियम बन जाता है। कोई वीटो नहीं)
2. वह विधायक को अपनी स्वीकृति रोक सकता है तब विधेयक समाप्त हो जाएगा और अधिनियम नहीं बन पाएगा। (अत्यांतिक वीटो)
3. यदि विधेयक को बिना किसी परिवर्तन के फिर से विधानमंडल द्वारा पारित करकर राज्यपाल की स्वीकृति के लिए भेजा जाये तो राज्यपाल के पास केवल स्थगन वीटो (निलंबनकारी वीटो) का अधिकार है।
4. वह विधेयक को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए सुरक्षित रख सकता है।*
*जब भी कोई विधेयक राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखा जाता है तो राष्ट्रपति के पास तीन विकल्प होते हैं –
1. वह विधेयक को स्वीकृत दे सकता है जिसके बाद वह अधिनियम बन जाएगा
2. वह विधेयक को अपनी स्वीकृत रोक सकता है, फिर विधेयक खत्म हो जाएगा और अधिनियम नहीं बन पाएगा।
3. वह विधेयक को राज्य विधानमंडल के सदन या सदनों के पास पुनर्विचार के लिए भेज सकता है। सदन द्वारा छह महीने के भीतर इस पर पुनर्विचार करना आवश्यक है। यदि विधेयक को कुछ सुधार या बिना सुधार के राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए दोबारा भेजा जाये तो राष्ट्रपति इसे देने के लिए बाध्य नहीं है; वह स्वीकृत कर भी सकता है और नहीं भी।
जब राज्यपाल राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए किसी विधेयक को सुरक्षित रखता है तो उसके बाद विधेयक को अधिनियम बनाने में उसकी कोई भूमिका नहीं रहती । यदि राष्ट्रपति द्वारा उस विधेयक को पुनर्विचार के लिए सदन या सदनों के पास भेजा जाता है और उसे दोबारा पारित कर फिर राष्ट्रपति के पास स्वीकृत के लिए भेजा जाता है।
इसका मतलब ये है कि अब राज्यपाल की स्वीकृति कि आवश्यकता नहीं रह गई है।
धन विधेयकों से संबन्धित धन विधेयकों से संबन्धित
संसद द्वारा पारित प्रत्येक वित विधेयक को जब राष्ट्रपति के पास स्वीकृति के लिए भेजा जाता है तो उसके पास दो विकल्प होते है –
1. वह विधेयक को स्वीकृति दे सकता है ताकि वह अधिनियम बन जाये
2. वह स्वीकृति न दे तब विधेयक समाप्त हो जाएगा और अधिनियम नहीं बन पायगा। इस प्रकार राष्ट्रपति धन विधेयक को संसद को पुनर्विचार के लिए नहीं लौटा सकता।
वित्त विधेयक जब राज्य विधानमंडल द्वारा पारित कर राज्यपाल के पास स्वीकृति के लिए भेजा जाता है तो उसके पास तीन विकल्प होते है –
1. वह विधेयक को अपनी स्वीकृति दे सकता है, तब विधेयक अधिनियम बन जाएगा।
2. वह विधेयक को अपनी स्वीकृति रोक सकता है जिससे विधेयक समाप्त हो जाएगा और अधिनियम नहीं बन पाएगा।
3. वह विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रख सकता है। इस तरह राज्यपाल भी वित्त विधेयक को पुनर्विचार के लिय राज्य विधानसभा को वापस नहीं कर सकता।
जब वित्त विधेयक किसी राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति को विचारार्थ भेजा जाता है तो राष्ट्रपति के पास दो विकल्प होते हैं –
1. वह विधेयक को अपनी स्वीकृत दे सकता है, ताकि विधेयक अधिनियम बन सके,
2. वह उसे अपनी स्वीकृति रोक सकता है। तब विधेयक खत्म हो जाएगा और अधिनियम नहीं बन पायगा। इस प्रकार राष्ट्रपति वित्त विधेयक को राज्य विधानसभा के पास पुनर्विचार के लिए नहीं भेज सकता (बिल्कुल संसद जैसे ही)
जब राज्यपाल राष्ट्रपति के विचारार्थ वित्त विधेयक को सुरक्षित रखता है तो इस विधेयक के क्रियाकलाप पर फिर उसकी कोई भूमिका नहीं रह जाती है। यदि राष्ट्रपति विधेयक को स्वीकृति दे दे तो वह अधिनियम बन जाएगा। इसका मतलब ये है कि राज्यपाल की स्वीकृति अब आवश्यक नहीं है।
President vs Governor

ये था वीटो पावर उम्मीद है आपको समझ में आया होगा। राष्ट्रपति पर लिखे अन्य लेखों को अवश्य पढ़ें। लिंक नीचे दिया हुआ है।

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