Indian Parliament in Hindi (संसद : संरचना, कार्य व भूमिका)

इस लेख में हम भारतीय संसद (Indian Parliament) से जुड़े सभी महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरल और सहज चर्चा करेंगे, तो लेख को अंत तक जरूर पढ़ें।
Indian Parliament in hindi

Indian Parliament in Hindi

संसद पर अच्छी समझ के लिए उसके सभी घटकों को समझना बहुत ही जरूरी है। भारतीय संविधान के अनुसार संसद के तीन भाग होते हैं – ↗️राष्ट्रपति, ↗️लोकसभा और ↗️राज्यसभा। संसद को पढ़ने से पहले आप इन तीनों टॉपिक को जरूर पढ़ें। इसके अलावा संसद के कुछ अन्य घटक भी हैं जिसको आप इस लेख को पढ़ने के दौरान समझिएगा। सभी महत्वपूर्ण घटकों का लिंक यथा स्थान पर दिया हुआ है, आप उसे भी जरूर पढ़ें।

संसद क्या है?
(What is Parliament?)

संसद, केंद्र सरकार का विधायी अंग है जहां से पूरे देश का भाग्य लिखा और मिटाया जाता है। दूसरे शब्दों में, हमारी समूहिक सोच और चिंतन का नाम संसद है। शायद इसीलिए इसे लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है।

संसदीय प्रणाली अपनाने के कारण भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद एक विशिष्ट व केंद्रीय स्थान रखती है। संविधान के 5वें भाग के अंतर्गत अनुच्छेद 79 से अनुच्छेद 122 में संसद के गठन, संरचना, अवधि, अधिकारियों, प्रक्रिया, विशेषाधिकार व शक्ति आदि का वर्णन किया गया है। हम सभी को आगे समझने वाले हैं।

संसद का गठन
(Constitution of indian parliament)

जैसा कि हमने ऊपर भी चर्चा किया है – संविधान के अनुसार भारतीय संसद (indian parliament) के तीन अंग हैं – राष्ट्रपति, लोकसभा व राज्यसभा। वैसे राष्ट्रपति संसद के किसी भी सदन का सदस्य नहीं होता है और न हो वह संसद में बैठता है लेकिन राष्ट्रपति, संसद का अभिन्न अंग इसीलिए है क्योंकि संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित कोई विधेयक तक तक विधि नहीं बनता, जब तक राष्ट्रपति उसे अपनी स्वीकृति नहीं दे देता।

इसके अलावा भी राष्ट्रपति अन्य ढेरों काम करते हैं जैसे – दोनों सदनों का सत्र आहूत करना या सत्रावसान करना, लोकसभा को विघटित कर करना, जब संसद का सत्र न चल रहा हो तो अध्यादेश जारी करना, आदि।

इसी प्रकार राज्यसभा, जिसे उच्च सदन भी कहा जाता है राज्य व संघ राज्य क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करता है। जबकि लोकसभा यानी कि निचला सदन सम्पूर्ण रूप में भारत के लोगो का प्रतिनिधित्व करता है। संसद के यही दो सदन होते हैं और यही पर देश के लिए कानून बनाने, खत्म करने या उसमें संशोधन करने का काम होता है।

संसद की सदस्यता
(Membership of Parliament)

अर्हताएं (Qualifications)

संविधान ने संसद में चुने जाने के लिए निम्नलिखित अर्हताएं निर्धारित की है।

1. उसे भारत का नागरिक होना चाहिए 2. उसे इस उद्देश्य के लिए चुनाव आयोग द्वारा अधिकृत किसी व्यक्ति के समक्ष शपथ लेनी होगी। अपने शपथ में वह सौगंध लेता है कि (1) वह भारत के संविधान के प्रति सच्ची आस्था और निष्ठा रखेगा (2) वह भारत की संप्रभुता एवं अखंडता को अक्षुण्ण रखेगा।

3. उसे राज्यसभा में स्थान पाने के लिए कम से 30 वर्ष की आयु और लोकसभा में स्थान पाने के लिए कम से कम 25 वर्ष की आयु का होना चाहिए 4. इसके अलावा भी उसके पास अन्य अर्हताएँ होनी चाहिए जो संसद द्वारा मांगी गई हो।

निरर्हताएं (Disqualification)

संविधान के अनुसार कोई व्यक्ति संसद सदस्य नहीं बन सकता यदि, 1. वह भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन लाभ के पद पर हो 2. यदि वह विकृत चित है और न्यायालय ने ऐसी घोषणा की है 3. यदि वह घोषित दिवालिया है 4. यदि वह भारत का नागरिक नहीं है 5. यदि वह संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि द्वारा निरर्हित (Disqualified) कर दिया जाता है।

⚫ इसके साथ ही जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के तहत निम्नलिखित प्रावधानों को भी निरर्हता माना जाता है। जैसे कि –

1. वह चुनावी अपराध या चुनाव में भ्रष्ट आचरण के तहत दोषी करार दिया गया हो 2. उसे किसी अपराध में दो वर्ष या उससे अधिक की सजा हुई हो 3. वह निर्धारित समय के अंदर चुनावी खर्च का ब्योरा देने में असफल रहा हो 4. उसे सरकारी ठेका काम या सेवाओं में को दिलचस्पी हो 5. वह निगम में लाभ के पद पर हो, जिसमें सरकार का 25 प्रतिशत हिस्सेदारी हो

6. उसे भ्रष्टाचार या निष्ठाहीन होने के कारण सरकारी सेवाओं से बर्खास्त किया गया हो 7. उसे विभिन्न समूहों में शत्रुता बढ़ाने या रिश्वतखोरी के लिए दंडित किया गया हो 8. उसे छुआछूत, दहेज जैसे सामाजिक अपराधों के प्रसार में संलिप्त पाया गया हो।

किसी सदस्य में उपरोक्त निरर्हताओं संबंधी प्रश्न पर राष्ट्रपति का फैसला अंतिम होता है, हालांकि ये फैसला वो निर्वाचन आयोग से राय लेकर करता है।

दल-बदल के आधार पर निरर्हता
Disqualification on the basis of defection

संविधान के अनुसार किसी व्यक्ति को संसद की सदस्यता से निरर्ह ठहराया जा सकता है, अगर वो 10वीं अनुसूची के उपबंधों के अनुसार, दल-बदल का दोषी पाया गया हो। जैसे की –

1. अगर वह स्वेच्छा से उस राजनीतिक दल का त्याग करता है, जिस दल के टिकट पर वह चुनाव जीत के आया है, 2. अगर वह अपने पार्टी द्वारा दिये गए निर्देशों के विरुद्ध सदन में मतदान करता है, 3. अगर निर्दलीय चुना गया सदस्य किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है 4. अगर कोई नामित सदस्य (Nominated member) छह महीने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है। 

दल-बदल से संबन्धित जितने भी मामले होते हैं राज्यसभा में उसे सभापति द्वारा और लोकसभा में उसे अध्यक्ष द्वारा निपटारा किया जाता है। लेकिन याद रखिए कि उच्चतम न्यायालय अध्यक्ष और सभापति द्वारा लिए गए इस निर्णय की न्यायिक समीक्षा कर सकता है।

संसद में स्थानों का रिक्त होना
(Vacancy of seats in indian parliament)

निम्नलिखित स्थितियों में संसद सदस्य को अपना स्थान रिक्त करना पड़ता है :-
दोहरी सदस्यता – कोई भी व्यक्ति एक समय में संसद के दोनों सदनों का सदस्य नहीं हो सकता। इससे संबंधित प्रावधान, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में वर्णित है। जैसे कि

(1) यदि कोई व्यक्ति संसद के दोनों सदनों में चुन लिया जाता है तो उसे 10 दिनों के भीतर यह बताना होगा कि उस किस सदन में रहना है। सूचना न देने पर, राज्यसभा में उसकी सीट खाली हो जाएगी।

(2) अगर किसी सदन के सदस्य को दूसरे सदन का भी सदस्य चुन लिया जाता है तो पहले वाले सदन में उसका पद रिक्त हो जाता है।

(3) अगर कोई व्यक्ति एक ही सदन में दो सीटों पर चुना जाता है, तो उसे स्वेच्छा से किसी एक सीट को खाली करना पड़ेगा अन्यथा, दोनों सीटें रिक्त हो जाती है। ऐसा इसीलिए होता है क्योंकि कई बार कोई प्रत्याशी दो जगह से चुनाव लड़ लेता है।

(4) कोई व्यक्ति एक ही समय में संसद का भी और राज्य विधानमंडल का भी सदस्य नहीं हो सकता है। अगर कोई व्यक्ति दोनों जगह निर्वाचित हो जाता है तो उसे 14 दिनों के अंदर राज्य के विधानमंडल की सीट को खाली करना होता है अगर नहीं करता है तो संसद में उसकी सदस्यता समाप्त हो जाती है।

पदत्याग (resignation) :- कोई सदस्य चाहे तो राज्यसभा के सभापति या लोकसभा के अध्यक्ष को संबोधित त्यागपत्र द्वारा अपना पद त्याग सकता है। सभापति या अध्यक्ष त्यागपत्र को स्वीकार नहीं भी कर सकता है और नहीं भी। अगर त्यागपत्र को स्वीकार कर लिया जाता है तब तो उसका स्थान रिक्त हो जाता है और अगर नहीं किया जाता है तो उसका स्थान रिक्त नहीं होता है।

अनुपस्थिति (Absence) :- यदि कोई सदस्य सदन की अनुमति के बिना 60 दिन की अवधि से अधिक समय के लिए सदन की सभी बैठकों में अनुपस्थित रहता है तो सदन उसका पद रिक्त घोषित कर सकता है। (यहाँ पर एक बात याद रखिए कि इन 60 दिनों की अवधि की गणना में, सदन के स्थगन या सत्रावसान की लगातार चार दिनों से अधिक अवधि, को शामिल नहीं किया जाता है।)

इसके अलावा भी कई अन्य तरीकों से किसी सदस्य का स्थान रिक्त हो सकता है जैसे कि – यदि न्यायालय उस चुनाव को अमान्य करार देता है जिस चुनाव से वह जीत के आया है, यदि उसे सदन द्वारा निष्कासित कर दिया जाता है , यदि वह राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति चुन लिया जाता है या फिर यदि उसे किसी राज्य का राज्यपाल बना दिया जाता है। इस तरह के मुद्दों का निपटारा लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 द्वारा किया जाता है।

शपथ (Oath)

संसद के दोनों सदनों के प्रत्येक सदस्य को अपना स्थान ग्रहण करने से पूर्व राष्ट्रपति या उसके द्वारा इस कार्य के लिए नियुक्त व्यक्ति के समक्ष शपथ लेता है और उस पर हस्ताक्षर करता है। शपथ में संसद सदस्य प्रतिज्ञा करता है कि मैं :- 1. भारत के संविधान में सच्ची श्रद्धा व निष्ठा रखूँगा 2. भारत की प्रभुता व अखंडता अक्षुण्ण रखूँगा 3. कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक निर्वहन करूंगा

जब तक सदस्य शपथ नहीं ले लेता, तब तक वह सदन की किसी बैठक में हिस्सा नहीं ले सकता है और न ही मत दे सकता है। उसे संसद के विशेषाधिकार और उन्मुक्तियों का लाभ भी नहीं मिलता है और बिना शपथ लिए बैठने के लिए जुर्माना भी भरना पड़ता है।

⚫ इसके अलावे भी किसी सदस्य को जुर्माना भरना पड़ सकता है यदि वह जानता है कि वह सदस्यता के लिए अर्हता नहीं रखता, या फिर जब उसे मालूम हो कि किसी संसदीय विधि के तहत उसे संसद में बैठने या मत देने का अधिकार नहीं है।

संसद के पीठासीन अधिकारी
Presiding Officer of Indian Parliament

संसद के दोनों सदनों के अपने पीठासीन अधिकारी होते हैं। लोकसभा के लिए अध्यक्ष व उपाध्यक्ष और राज्यसभा के लिए सभापति व उपसभापति होते हैं। इसके अलावा लोकसभा में सभापति का पैनल होता है और राज्यसभा में उप-सभापति का पैनल होता है। ↗️लोकसभा अध्यक्ष (Lok Sabha Speaker) और ↗️राज्यसभा सभापति (Chairman of Rajya Sabha) पर अलग से लेख उपलब्ध है आप उसे जरूर पढ़ें।

संसद में भाषा (Language in indian Parliament)

संविधान लागू होने से पहले भाषा पर संविधान सभा के सदस्यों में काफी मतभेद था कुछ सदस्य हिन्दी के पक्ष में थे तो कुछ अंग्रेजी के पक्ष में। इसी मतभेद के कारण जब संविधान लागू हुआ तब किसी भी भाषा को राष्ट्रभाषा नहीं बनाया गया बल्कि हिन्दी और अंग्रेजी दोनों को सदन की कार्यवाही की भाषा घोषित की गई। ये व्यवस्था की गई थी कि 15 वर्ष तक अंग्रेजी चलने देते हैं इसके बाद वो खुद ही खत्म हो जाएगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं 1963 में राजभाषा अधिनियम बना जिसमें हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी की निरंतरता की भी अनुमति दी गयी।

हालांकि इसका ये मतलब नहीं है कि सदन में इन दोनों भाषाओं को छोड़कर कोई और भाषा का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है, अगर पीठासीन अधिकारी चाहे तो सदस्य को अपनी मातृभाषा में भी बोलने का अधिकार दे सकता है क्योंकि दोनों ही सदनों में अनुवाद की व्यवस्था होती है।

संसद में नेता
(Leader in Indian Parliament)

लोकसभा के नियमों के अनुसार प्रधानमंत्री या प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त कोई मंत्री सदन का नेता होता है लेकिन उसे लोकसभा का सदस्य होना जरूरी होता है। राज्यसभा में भी एक सदन का नेता होता है। जिसे प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त किया जाता है लेकिन उसे राज्यसभा का सदस्य होना जरूरी होता है।

विपक्ष का नेता
Leader of the Opposition

संसद के दोनों सदनों में एक-एक विपक्ष का नेता होता है। विपक्ष का नेता बनने के लिए जरूरी होता है कि कम से कम कुल सदस्यों का दसवें भाग जितना सदस्य उसके पास हो। यानी कि लोकसभा की बात करें तो जिस पार्टी के पास कम से कम 55 सीटें होंगी वही पार्टी अपना एक नेता चुनेगा जिसे विपक्ष का नेता कहा जाएगा।

विपक्ष का मुख्य कार्य सरकार के कार्यों की उचित आलोचना एवं वैकल्पिक सरकार की व्यवस्था करना होता है इसीलिए लोकसभा एवं राज्यसभा में विपक्ष के नेता को 1977 में महता मिली। उसे वेतन, भत्ते तथा सुविधाएं कैबिनेट मंत्री की तरह मिलती हैं।

⚫यहाँ पर एक बात याद रखिए कि सदन का नेता और विपक्ष का नेता जैसा कोई प्रावधान संविधान में उल्लिखित नहीं है ये एक तरह से परंपरा पर आधारित है।

व्हिप या सचेतक

व्हिप का भी उल्लेख न तो भारत के संविधान में है और न ही सदन के नियमों में। ये भी संसदीय सरकार की परंपरों पर आधारित है।

प्रत्येक राजनीतिक दल का, चाहे वह सत्ता में हो या विपक्ष में, संसद में अपना व्हिप होता है। इसका सीधा सा मतलब होता है कि जब भी कोई पार्टी अपने सदस्यों से अपने पार्टी के अनुरूप व्यवहार कराना चाहती है तो व्हिप जारी किया जाता है। जैसे कि अगर पार्टी चाहती है कि उसके सारे सदस्य सदन में उपस्थित रहे तो वे व्हिप जारी कर सकता है। यदि कोई पार्टी चाहती है कि उसके सारे सदस्य किसी विधेयक पर पक्ष या विपक्ष में वोट दे तो वे व्हिप जारी कर सकता है। व्हिप जारी करने के बाद उस पार्टी के सदस्यों को वहीं करना पड़ता है जो उसे कहा जाये। अगर कोई सदस्य ऐसा नहीं करती है तो उस पर अनुशासनात्मक कारवाई की जा सकती है।

मंत्रियों एवं महान्यायवादियों के अधिकार

सदन का सदस्य होने के अतिरिक्त प्रत्येक मंत्री एवं भारत के महान्यावादी को इस बात का अधिकार होता है कि वह सदन में अपने विचार व्यक्त कर सकता है, सदन की कार्यवाही में भाग ले सकता है, दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में भाग ले सकता है, लेकिन मतदान के अधिकार बिना।

एक मंत्री जो लोकसभा का सदस्य है राज्यसभा की कार्यवाही में भाग ले सकता है उसी तरह एक मंत्री , जो राज्यसभा का सदस्य है, लोकसभा की कार्यवाही में भाग ले सकता है। यहाँ तक कि एक मंत्री जो किसी भी सदन का सदस्य नहीं है वो भी दोनों सदनों की कार्यवाही में भाग ले सकता है लेकिन सिर्फ 6 महीने तक।

भारतीय संसद पर अन्य लेख नीचे दी हुई है उसे भी विजिट करें।

⚫⚫⚫⚫⚫

Indian Parliament
⏬Download pdf

Related Articles⬇️

powers and functions of parliament
Parliamentary motions

Follow me on….

अन्य बेहतरीन लेख⬇️

संसदीय व्यवस्था
समालोचना और समीक्षा

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *