भारतीय संघ एवं उसका क्षेत्र (Union of India and its Territory)

इस लेख में हम भारतीय संघ एवं इसके क्षेत्र (Union of India and its Territory) यानी कि संविधान के भाग 1 पर सरल और सहज चर्चा करेंगे एवं इसके विभिन्न महत्वपूर्ण प्रावधानों को समझने का प्रयास करेंगे।

भारतीय संघ एवं उसका क्षेत्र

भारतीय संघ (Union of India)

इस लेख में संविधान के भाग 1 की चर्चा है। जिसमें कुल 4 अनुच्छेद है। इसे याद रखना भी बेहद आसान है क्योंकि ये भाग पूरी तरह से भारत के बारे में है। जैसे कि – भारत क्या है?, भारत यूनाइटेड स्टेट ऑफ अमेरिका की तरह United States of India क्यों नहीं है? संवैधानिक रूप से देश का दो नाम इंडिया और भारत क्यों है? नए राज्यों का गठन और अधिग्रहण की शक्ति किसके पास है? आदि। तो आइये बारी-बारी से देखते हैं चारों अनुच्छेदों में क्या-क्या प्रावधान है?

संघ का नाम और राज्यक्षेत्र

अनुच्छेद 1 (Article 1) इंडिया यानी भारत ‘राज्यों का संघ’ होगा (India that is Bharat shall be Union of states)

यहाँ पर दो महत्वपूर्ण शब्द है इंडिया यानी कि भारत और राज्यों का संघ इसका क्या मतलब है आइये इसे समझते हैं।

जब संविधान का निर्माण हो रहा था तो संविधान सभा के कुछ लोग जो परंपरावादी विचारधारा को ज्यादा तवज्जो देते थे; देश का नाम भारत रखना चाहते थे क्योंकि ये नाम हमारे समृद्ध परंपरा को रिप्रेजेंट करता था ।

वहीं कुछ प्रोग्रेसिव विचारधारा के लोग देश का नाम इंडिया रखना चाहते थे क्योंकि उन लोगों के हिसाब से ये नाम एक नए और आधुनिक भारत प्रतीक था।

लंबी उठा-पटक के बाद संविधान सभा दोनों नामों की स्वीकृति दे दी। और इसीलिए अनुच्छेद 1 में ‘इंडिया यानी भारत‘ लिखा हुआ है। 

राज्यों का संघ‘ का मतलब

दूसरी बात कि यहाँ राज्यों के संघ का इस्तेमाल किया गया है। इतना तो हम जानते ही है कि भारत एक संघीय व्यवस्था (Federal system) वाला देश है। पर यहाँ जो सबसे प्रमुख बात है वो ये है कि भारत की संघीय व्यवस्था अमेरिका संघीय व्यवस्था के थोड़ा अलग है। कितना अलग है इसे समझाते हुए डॉ. भीमराव अंबेडकर ने निम्नलिखित दो बातें कही,

पहलाभारतीय संघ अमेरिकी संघ की भांति राज्यों के बीच हुए किसी समझौते का परिणाम नहीं है। मतलब ये कि राज्यों ने मिलकर भारत नहीं बनाया है बल्कि भारत पहले से था और राज्य उसमें शामिल हुए है। इसीलिए भारत United States of India नहीं है।

दूसरा – भारतीय राज्यों को भारतीय संघ से अलग होने का कोई अधिकार नहीं है। मतलब ये कि कोई राज्य कितना भी अलग होने की कोशिश करें -संविधान उन्हे अलग होने की अनुमति नहीं देता। जबकि अमेरिकी संघ के राज्य चाहे तो ऐसा कर सकता है।

कुल मिलाकर, अनुच्छेद 1 के अनुसार 3 ऐसे क्षेत्र है जिसे हम भारत कहते हैं। (1) राज्यों के क्षेत्र, (2) केंद्रशासित प्रदेश और (3) वे क्षेत्र, जिसे किसी भी समय भारत सरकार द्वारा अधिग्रहित किया जा सकता है।

इन तीनों प्रावधानों के तीसरे प्रावधान में ये तो लिखा हुआ है कि भारत नए क्षेत्र का अधिग्रहण कर सकता है और जब ऐसा हो जाएगा तब वो भी भारत का हिस्सा होगा (जैसे कि दादर और नागर हवेली, गोवा, दमन एवं दीव, पुडुचेरी एवं सिक्किम इसी तरह से भारत का हिस्सा हुआ है) लेकिन ये कहीं नहीं लिखा हुआ है कि भारत अपने क्षेत्र को किसी दूसरे देश को दे सकता है कि नहीं।

जितने भी राज्य है और केंद्रशासित प्रदेश है और उसका जो क्षेत्र विस्तार है उस सब को अनुसूची 1 में वर्णित किया गया है। दूसरे शब्दों में कहें तो ये जो अनुच्छेद 1 है ये वहीं काम करेगा जिसका वर्णन अनुसूची 1 में किया गया है।

नए राज्यों का प्रवेश या स्थापना

अनुच्छेद 2 – संसद, विधि द्वारा, ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, जो वह ठीक समझे, संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना कर सकेगी।

मुख्य रूप से इसके दो निहितार्थ हैं –

पहला कि संसद को ये शक्ति दी गई है कि वे नये राज्यों का भारतीय संघ में प्रवेश करा सकती है। लेकिन इस शक्ति के तहत उसी राज्य को भारत में प्रवेश कराया जा सकता है जो पहले से अस्तित्व में है।

और दूसरा – संसद नये राज्यों का गठन कर सकती है। लेकिन इस शक्ति के तहत उस राज्य को भारत में प्रवेश कराया जा सकता है जो पहले से अस्तित्व में नहीं है।

कुल मिलाकर अनुच्छेद 2 उन राज्यों के भारत में प्रवेश एवं गठन से संबन्धित है जो भारतीय संघ का हिस्सा नहीं है।

उदाहरण के लिए आप गोवा को ले सकते हैं जो पहले पुर्तगाल के अधिकार क्षेत्र में था पर 1961 में उसे भारत में शामिल करा लिया गया।

यहाँ पर ध्यान देने वाली बात बस इतना है कि ये अधिकार संसद के पास है। मतलब ये कि बिना संसद की स्वीकृति के न तो किसी राज्य का गठन और अधिग्रहण किया जा सकता है और न ही उसे भारतीय संघ में शामिल ।

आप इस अनुच्छेद में भी गौर करेंगे कि यहाँ भी कहीं नहीं लिखा हुआ है कि भारत अपने हिस्से के क्षेत्र को किसी अन्य देश को दे सकता है कि नहीं।

नए राज्यों का निर्माण और वर्तमान राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन

अनुच्छेद 3 (Article 3) अनुच्छेद 3 मुख्यतः पाँच बातें कहती है। 

पहला – संसद, विधि द्वारा राज्य में से उसके कुछ भाग को अलग करके, या फिर दो या दो से अधिक राज्यों को मिलाकर या फिर उसके कुछ भाग को मिलाकर नए राज्य का निर्माण कर सकता है।

दूसरा – संसद किसी राज्य के क्षेत्र को बढ़ा सकती है।
तीसरा – संसद किसी राज्य के क्षेत्र को घटा सकती है।
चौथा – संसद किसी राज्य की सीमाओं में परिवर्तन कर सकता है।
पांचवा – संसद किसी राज्य के नाम में परिवर्तन कर सकती है।

यहाँ पर ये याद रखिए कि यह अनुच्छेद भारत के आंतरिक भाग पर काम करता है। यानी कि अनुसूची 1 में जितने भी राज्य और केंद्रशासित प्रदेश का वर्णन है ये उसपर काम करता है। जबकि अनुच्छेद 2 भारत के बाहर के राज्यों के लिए था।

💦 कुल मिलाकर अगर अनुच्छेद 3 को एक लाइन में कहें तो संसद अपने अनुसार भारत के राजनैतिक मानचित्र का पुनर्निर्धारण कर सकती है। जैसे कि 2014 में तेलंगाना को आंध्रप्रदेश से काटकर एक नया राज्य बनाया गया। 

लेकिन ये काम संसद अपने मन से नहीं कर सकती बल्कि इस तरह से परिवर्तन से संबन्धित अध्यादेश को संसद में पेश करने से पहले राष्ट्रपति से मंजूरी लेनी पड़ती है। और राष्ट्रपति उस अध्यादेश को संबन्धित राज्य के विधानमंडल में भेजता है ताकि उनलोगों का इस बारे में क्या कहना है ये जाना जा सकें।

पर अगर मान लीजिये कि जिस राज्य में ये परिवर्तन होना है उस राज्य के विधानमंडल ने इसको स्वीकृति नहीं दे तो क्या होगा? कुछ भी नहीं होगा क्योंकि प्रावधान ये साफ-साफ कहता है कि संसद उस राज्य के मत को मानने के लिए बाध्य नहीं है। इसका मतलब ये हुआ कि अगर संसद ने सोच लिया कि किसी राज्य का नक्शा बदल देना है तो वे ऐसा आसानी से कर सकता है।

आसानी से कर सकता है इसका क्या मतलब है? इसका मतलब अनुच्छेद 4 से स्पष्ट हो जाता है। लेकिन यहाँ अनुच्छेद 3 पढ़कर आप इतना जान गए होंगे कि यहाँ भी ये कहीं नहीं लिखा हुआ है कि भारत अपने हिस्से के क्षेत्र को किसी अन्य देश को दे सकता है कि नहीं।

लेकिन इसके तीसरे प्रावधान को देखें तो ” ये कहता है कि संसद किसी राज्य क्षेत्र को घटा सकती है।” इसीलिए इसको लेकर काफी विवाद हुआ।

अनुच्छेद 4 (Article 4) 

ये बस इतना कहता है कि अनुच्छेद 2 और 3 के तहत जो भी परिवर्तन किए जाएँगे वे सभी संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत संसोधन नहीं माना जाएगा। 

यहाँ पर दो चीज़ें है पहला तो अनुच्छेद 2 और 3 के तहत परिवर्तन की बात कही गई है और दूसरी बात है अनुच्छेद 368।

तो अनुच्छेद 1 जो है वो सिर्फ भारत के विवरण के बारे में है उसकी मदद से किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया जा सकता। इसीलिए सिर्फ अनुच्छेद 2 और 3 ही है जिसकी मदद से भारत के नक्शे में परिवर्तन लाया जा सकता है।

दूसरी बात अनुच्छेद 368 संविधान में संशोधन के लिए है, अगर अनुच्छेद 368 के तहत किसी प्रकार का संशोधन किया जाता है तो उसमें विशेष बहुमत की जरूरत पड़ती है।

अनुच्छेद 4 में साफ-साफ लिखा है कि अनुच्छेद 2 और 3 के माध्यम से किया गया परिवर्तन अनुच्छेद 368 के तहत नहीं माना जाएगा। इसका मतलब ये हुआ कि इस तरह का कानून सामान्य बहुमत और साधारण विधायी प्रक्रिया से पारित किया जा सकता है। इसीलिए तो ये इतना आसान है। अनुच्छेद 368 के बारे में विस्तार से जानने के लिए ↗️यहाँ क्लिक करें।

समापन टिप्पणी (Closing Remarks)

हमने अनुच्छेद 1, अनुच्छेद 2 और अनुच्छेद 3 तीनों को देखा पर उसमें कहीं भी ये नहीं लिखा हुआ पाया कि भारत अपने हिस्से के क्षेत्र को किसी अन्य देश को दे सकता है कि नहीं। ये बात इसीलिए याद दिला रहा हूँ क्योंकि नेहरू-नून समझौते में बेरुबाड़ी नामक जगह को भारत पाकिस्तान को देने की बात कही जिससे एक विवाद खड़ा हुआ कि क्या भारत सरकार के पास ये शक्ति है जिसके तहत वे अपनी जमीन को किसी और देश को दे सकें। ये विवाद बेरुबारी मामला के नाम से प्रसिद्ध है। ये क्या है इसे इत्मीनान से इस लेख में समझेंगे।
Berubari Case

Article Based on,
मूल संविधान का भाग 1↗️
राजव्यवस्था – एम लक्ष्मीकांत↗️
Wikipedia – Part I of the Constitution of India↗️

🔴🔴🔴

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