केंद्र-राज्य विधायी संबंध पर चर्चा #UPSC

इस लेख में हम केंद्र-राज्य विधायी संबंध (Center-State Legislative Relations) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे एवं इसके विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं को समझेंगे,

तो अच्छी तरह से समझने के लिए इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें साथ ही इस टॉपिक से संबंधित अन्य लेखों को भी पढ़ें।

किसी देश के अंदर केंद्र और राज्य हैं, यानी कि एक संघीय व्यवस्था है। तो कुछ न कुछ तो संबंध होगा ही, विधायी संबंध उन्ही में से एक है।

केंद्र-राज्य विधायी संबंध

केंद्र-राज्य संबंध (Center-state relationship)

🔷 जैसा कि हम जानते है कि भारत का संविधान अपने आप में संघीय व्यवस्था वाला है। और संघीय व्यवस्था शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत पर आधारित होता है। जिसका मतलब है कि संविधान द्वारा प्रदत सारी की सारी शक्तियाँ जैसे कि विधायी, कार्यपालक और वित्तीय शक्तियाँ केंद्र और राज्यों के मध्य विभाजित है।

हालांकि यहाँ पर एक बात याद रखने योग्य है कि हमारे संविधान में न्यायिक शक्तियों के विभाजन की कोई व्यवस्था नहीं है क्योंकि यहाँ पर एकल न्यायिक व्यवस्था है, ये ऐसा क्यों है इसे न्यायालय वाले लेख से समझ सकते हैं।

केंद्र और राज्य के अपने-अपने अधिकार क्षेत्र है और दोनों ही उसमें स्वतंत्र है। पर फिर भी एक देश के रूप में देखा जाये तो केंद्र एक अभिभावक की भूमिका में नजर आता है। जिसका काम है सबको साथ लेकर चलना। 

केंद्र और राज्य संबंध इसलिए भी जानना जरूरी है क्योंकि केंद्र आखिरकार जो भी करता है वो राज्य के लिए ही तो करता है।

दूसरी बात ये है कि इनके बीच के सम्बन्धों का अध्ययन करने से इन दोनों के अधिकार क्षेत्र को आसानी से पृथक किया जा सकता है। हमने संघीय व्यवस्था में और संसदीय व्यवस्था में देखा की किस तरह केंद्र और राज्य के मध्य चीजों का बंटवारा कर दिया गया है।

केंद्र-राज्य संबंध का वर्गीकरण

अध्ययन की दृष्टि से देखें तो केंद्र और राज्य के सम्बन्धों को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता हैं;

1. विधायी संबंध (Legislative relationship) 
2. प्रशासनिक संबंध (Administrative relations)
3. वित्तीय संबंध(Financial relations)

इस लेख में हम केंद्र और राज्य के विधायी संबंधों (Center-State Legislative Relations) की चर्चा करेंगे। 

केंद्र-राज्य विधायी संबंध (Center-State Legislative Relations)

विधायी संबंध का सीधा सा मतलब है केंद्र और राज्य के मध्य विधि बनाने के स्तर पर संबंध। संविधान के भाग 11 में अनुच्छेद 245 से 255 तक केंद्र-राज्य विधायी सम्बन्धों (Center-state legislative relations) की चर्चा की गयी है।

जैसा कि हमने ऊपर भी चर्चा की है, संघीय व्यवस्था होने के कारण केंद्र और राज्य के मध्य शक्तियों का बंटवारा कर दिया गया है। जिसमें केंद्र के पास अपेक्षाकृत ज्यादा शक्तियाँ हैं। पर कितनी विधायी शक्तियाँ केंद्र के पास है और कितनी विधायी शक्तियाँ राज्य के पास है इसे चार भागों में बाँट कर देखा जा सकता है।

1. केंद्र और राज्य विधान के सीमांत क्षेत्र
2. केंद्र-राज्य विधायी विषयों का बंटवारा
3. राज्य क्षेत्र में संसदीय विधान
4. राज्य विधानमंडल पर केंद्र का नियंत्रण

1. केंद्र और राज्य विधान के सीमांत क्षेत्र

इसका मतलब ये है कि केंद्र और राज्य के विधान बनाने की सीमाएं क्या-क्या है। संविधान, केंद्र और राज्यों के विधायी शक्तियों के संबंध में सीमाओं को लेकर, अनुच्छेद 245 के तहत निम्न प्रावधान की व्यवस्था करता है,

🔷 संसद के पास पूरे भारत या इसके किसी भी क्षेत्र के लिए कानून बनाने अधिकार है। यहीं नहीं संसद द्वारा बनाया गया कानून भारतीय नागरिक एवं उनकी विश्व में कहीं भी संपत्ति पर भी लागू होता है। 

🔷 राज्य विधानमंडल की बात करें तो राज्य विधानमंडल सिर्फ उस राज्य के लिए कानून बना सकती है।

कुछ विशेष स्थितियों को छोड़ दे तो उसके अलावा राज्य विधानमंडल द्वारा निर्मित कानून राज्य के बाहर के क्षेत्रों में लागू नहीं होता है।

संसद के कानून पर प्रतिबंध

🔷 कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं जहां पर संसद का कानून लागू नहीं होता। या फिर दूसरे शब्दों में कहें तो राष्ट्रपति और राज्यपाल के पास कुछ विशेषाधिकार होता है, जिसका इस्तेमाल करके वे खुद नियम, परिनियम आदि बना सकते हैं।

🔷 अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह, लक्षद्वीप, दादरा एवं नागर हवेली और दमन व दीव में राष्ट्रपति केन्द्रीय क़ानूनों को लागू करने के लिए बाध्य नहीं होता है। इन क्षेत्रों की शांति, सुरक्षा एवं अच्छी सरकार के लिए राष्ट्रपति खुद का नियम, परिनियम या कानून लागू कर सकता है। राष्ट्रपति चाहे तो संसद के कानून को भी लागू कर सकता है (संशोधन करके या बगैर संशोधन के)।

🔷 राज्यपाल और राष्ट्रपति को ये शक्ति है कि अनुसूची 6 के राज्यों यथा मिज़ोरम, असम, मणिपुर और त्रिपुरा के विशेष स्टेट्स प्राप्त जनजातीय जिलों में, संसद के किसी कानून को परिवर्तनों के साथ लागू कर सकता है। 

ऐसा करने का मकसद दरअसल वहाँ के जनजातीय संस्कृति को बचाना है। क्योंकि जाहिर है एक ही कानून इतने बड़े देश में सबके लिए उसी रूप में उपयुक्त हो; ये जरूरी तो नहीं और ऐसा किया भी नहीं जाना चाहिए।

2. केंद्र-राज्य विधायी विषयों का बंटवारा

अनुच्छेद 246 के तहत, संविधान में केंद्र एवं राज्य के बीच विधायी विषयों के बंटवारे के संबंध में त्रिस्तरीय व्यवस्था की है गयी है। जिसे सातवीं अनुसूची (Seventh schedule) में रखा गया है। ये तीन प्रकार की सूचियाँ हैं –
संघ सूची (Union list),
राज्य सूची (State list), और
समवर्ती सूची (Concurrent list)

1. संघ सूची से संबन्धित किसी भी मसले पर कानून बनाने की संसद को विशिष्ट शक्ति प्राप्त है। इसमें कोई राज्य हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

जिस समय संविधान बनाया गया था उस समय तो इसमें 97 विषय था पर अभी इस सूची में 100 विषय है, जैसे – रक्षा, बैंकिंग, विदेश मामले, मुद्रा, आण्विक ऊर्जा, बीमा, संचार, केंद्र-राज्य व्यापार एवं वाणिज्य, जनगणना, लेखा परीक्षा आदि। 

2. इसी प्रकार राज्य सूची के विषयों पर राज्य विधानमण्डल को कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है, पर सामान्य परिस्थितियों में, क्योंकि कभी-कभी कुछ ऐसी विशिष्ट परिस्थिति आ जाती है जहां राज्य के विषयों पर भी कानून केंद्र ही बनाती है – जैसे कि आपातकाल ।

जिस समय संविधान बनाया गया था उस समय तो इसमें 66 विषय था पर अब इसमें 61 विषय है। जैसे- सार्वजनिक व्यवस्था, पुलिस, जन-स्वास्थ्य एवं सफाई, कृषि, जेल, स्थानीय शासन, मतस्य पालन, बाजार आदि। 

3. समवर्ती सूची के संबंध में संसद एवं राज्य विधानमंडल दोनों कानून बना सकते है। इस सूची में इस समय 52 विषय मूल रूप से इसमें मात्र 47 विषय था।

जैसे- आपराधिक कानून प्रक्रिया, सिविल प्रक्रिया, विवाह एवं तलाक, जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन, बिजली, श्रम कल्याण, आर्थिक एवं सामाजिक योजना, दवा, अखबार, पुस्तक एवं छापा प्रेस, उच्चतम एवं उच्च न्यायालय के अतिरिक्त सभी न्यायालयों का गठन एवं अन्य।

42वें संशोधन अधिनियम 1976 के तहत 5 विषयों को राज्य सूची से समवर्ती सूची में शामिल किया गया। वे है – शिक्षा, वन, नाप एवं तौल, वन्य जीवों एवं पक्षियों का संरक्षण, न्याय का प्रशासन।

  • जो भाग किसी राज्य के अंतर्गत नहीं आता है, संसद उस भाग के लिए तीनों सूचियों या उसके अतिरिक्त भी किसी विषय पर कानून बना सकता है। जैसे कि केंद्रशासित प्रदेश।

तीनों सूचियों का पीडीएफ़ यहाँ से डाउनलोड करेंIn Hindi↗️In English↗️

कुछ तथ्य:

अनुच्छेद 247, संसद को कुछ अतिरिक्त न्यायालय की स्थापना की शक्ति देता है। दूसरे शब्दों में कहें तो संसद, अच्छे प्रशासन के लिए; संघ सूची के विषयों पर बनाए गए किसी कानून के संबंध में अतिरिक्त न्यायालयों की स्थापना कर सकेगी।

अनुच्छेद 248 के अनुसार, जो विषय तीनों सूचियों (संघ सूची, राज्य सूची एवं समवर्ती सूची) में लिखित नहीं है, उस पर विधान बनाने का अधिकार संसद को है। यानी कि जिस विषय का उल्लेख इन तीनों सूचियों में नहीं किया गया है, उस पर सिर्फ संसद ही कानून बना सकता है। उदाहरण के लिए, 1994 में जब पहली बार देश में सेवा कर (service tax) लागू किया गया था तो केंद्र सरकार ने इसी प्रावधान का हवाला देते हुए उसपर कानून बनाने का अधिकार अपने पास रखा था।

जबकि अमेरिका में इसका उल्टा है, वहां जो अवशिष्ट शक्तियां हैं, उस पे कानून बनाने का अधिकार राज्य के पास होता है। केंद्र तय किए गए विषयों के अलावा अन्य किसी विषय पर कानून नहीं बना सकता है।

🔷 संविधान में संघ सूची को राज्य सूची एवं समवर्ती सूची के ऊपर रखा गया है और समवर्ती सूची को राज्य सूची के ऊपर रखा गया है। इसका मतलब ये है कि संघ और राज्य में किसी भी प्रकार का कोई टकराव होगा तो संघ सूची ही मान्य होगा। 

इस तरह स्पष्ट है कि विधायी एकता के लिए आवश्यक राष्ट्रीय महत्व के मामलों को संघ सूची में शामिल किया गया। क्षेत्रीय एवं स्थानीय महत्व एवं विविधता वाले विषयों को राज्य सूची में रखा गया है। और दोनों के महत्व वाले विधायी विषयों को समवर्ती सूची में रखा गया। इस तरह संविधान अनेकता में एकता (unity in diversity) की अनुमति देता है। 

3. राज्य क्षेत्र में संसदीय विधान

ऊपर हमने अभी जो भी विधायी शक्तियों के बँटवारे के बारे में पढ़ा है वो दरअसल तब लागू होता है जब स्थिति सामान्य हो। लेकिन कभी-कभी कुछ ऐसी परिस्थितियाँ आती है जिसमें संसद ही राज्य के लिए विधान बनाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो, ये उस प्रश्न का उत्तर है कि केंद्र किन परिस्थितियों में राज्य सूची पर भी कानून बना सकती है

आइये जानते हैं ऐसी कौन-कौन सी स्थितियाँ है जिसमें संसद राज्यों के लिए कानून बनाती है। 

1. जब राज्य सभा एक प्रस्ताव पारित कर दें

अनुच्छेद 249 के तहत, जब राज्यसभा उस दिन सदन में उपस्थित सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से एक प्रस्ताव करेगा कि संसद को राज्य सूची के मामलों पर कानून बनाना चाहिए तो संसद उस मामले पर कानून बनाने में सक्षम हो जाएंगी।

हालांकि ऐसे कानून 1 वर्ष के लिए ही बनाया जा सकता है लेकिन इसे संसद जितनी बार चाहे बढ़ा सकता है, पर एक बार में 1 वर्ष से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता।

संसद द्वारा राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने का ये मतलब नहीं है कि राज्य उस सूची पर कानून नहीं बना सकता है; राज्य भी उस सूची के विषयों पर कानून बना सकता है लेकिन अगर राज्य और केंद्र के कानून में कोई टकराव होता है तो केंद्र का कानून ही मान्य माना जाएगा। (ऐसा अनुच्छेद 251 में लिखा हुआ है)

2. राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान (During a national emergency) 

अनुच्छेद 250 के अनुसार, देश में आपातकाल लागू हो जाने की स्थिति में संसद, राज्य सूची के विषय पर कानून बना सकता है; जो कि सम्पूर्ण राज्य क्षेत्र या उसके किसी भाग पर लागू होगा। (हालांकि आपातकाल समाप्त होने के छह माह तक ही यह व्यवस्था प्रभावी रहेगी।)

ऐसा नहीं है कि इस दौरान राज्य विधानमंडल कानून नहीं बना सकती है लेकिन टकराव की  स्थिति में संसदीय कानून ही मान्य होगा। (ऐसा अनुच्छेद 251 में लिखा हुआ है)

3. राज्यों के अनुरोध पर

अनुच्छेद 252 के अनुसार, जब दो या दो से अधिक राज्य अपने-अपने विधानमंडल में ये प्रस्ताव पारित कर दे कि संसद राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बना सकती है। तो संसद को राज्य के लिए, राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार मिल जाता है ।

हालांकि यहाँ ये बात याद रखने योग्य है कि जो-जो राज्य ये प्रस्ताव पारित करेगा संसद उसी राज्य के लिए कानून बना सकेगा और उसी राज्य पर लागू होगा। लेकिन कोई राज्य अगर संसद द्वारा कानून बनाए जाने के बाद भी अपने विधानमंडल में ऐसा प्रस्ताव पारित कर दे तो उस राज्य में भी ये कानून लागू हो जाएगा।

इस तरह से कुछ कानून पहले पारित भी हो चुके हैं। जैसे कि – जल प्रदूषण (नियंत्रण एवं निवारण) अधिनियम 1974 , वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972, मानव अंग प्रतिरोपन अधिनियम आदि। 

4. अंतर्राष्ट्रीय समझौते लागू करने के उद्देश्य से

अनुच्छेद 253 के अनुसार, संसद अंतर्राष्ट्रीय संधि या समझौते को लागू करने के उद्देश्य से राज्य सूची के विषयों पर कानून बना सकता है।

इस व्यवस्था के तहत बनाए गए कुछ कानून इस प्रकार है- संयुक्त राष्ट्र (सुविधा एवं प्रतिरक्षा) अधिनियम 1947, जेनवा समझौता अधिनियम 1960, अपहरण के खिलाफ अधिनियम 1982 आदि।

4. राज्य विधानमंडल पर केंद्र का नियंत्रण

राष्ट्रपति शासन के दौरान

अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन किसी राज्य में लगाया जाता है। ऐसा होने पर विधानमंडल की सारी शक्तियाँ संसद के पास आ जाती है। दूसरे शब्द में संसद के पास राज्य सूची के विषय पर भी कानून बनाने का अधिकार आ जाता है।

राष्ट्रपति शासन के उपरांत भी संसद द्वारा बनाया गया कानून प्रभावी रहता है। हालांकि राज्य विधानमंडल चाहे तो उस कानून को समाप्त या उसमें संशोधन कर सकती है।

इसके अलावे कुछ ऐसी अपवादजनक परिस्थितियाँ भी है जिसमें केंद्र का राज्य सूची पर नियंत्रण होता है; जैसे कि ▶

1. राज्यपाल कुछ प्रकार के राज्य विधेयकों (State bills) को राष्ट्रपति के संस्तुति (Recommendation) के लिए सुरक्षित कर सकती है।

ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति के पास वीटो पावर होता है यानी कि राष्ट्रपति चाहे तो उस विधेयक को खारिज भी कर सकती है। (इसे विस्तार से समझने के लिए राज्यपाल एवं राष्ट्रपति पढ़ें।)

2. राज्य सूची के कुछ विषयों पर विधेयक (Bill) राष्ट्रपति से सहमति मिलने के बाद की लाया जा सकता है। जैसे कि व्यापार और वाणिज्य के स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाने वाले विधेयक आदि।

3. वित्तीय आपातकाल की स्थिति में विधानमंडल द्वारा पारित धन या वित्त विधेयक को राष्ट्रपति सुरक्षित रखने का आदेश दे सकती है। 

केंद्र-राज्य विधायी संबंध पर सरकारिया आयोग

* कुल मिलाकर देखें तो पाएंगे की केंद्र के पास ज्यादा शक्ति है और राज्य के पास उसकी अपेक्षा बहुत कम। पर ये जरूरी था क्योंकि अगर ऐसा नहीं होता और राज्य को ज्यादा शक्ति दे दी गयी होती तो ये राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए ये खतरा बन जाता।

ये बात सरकारिया आयोग ने भी स्वीकारी, जिसे कि केंद्र-राज्य संबंध की बेहतरी के लिए अच्छे सुझावों की सिफ़ारिश के लिए गठित किया गया था (1983-87)। इन्होने कमेंट में निम्न बातें कही थी –

संघीय सर्वोच्चता, केंद्र एवं राज्यों के क़ानूनों के मध्य तनाव एवं टकरावों को समाप्त करने एवं सौहार्दपूर्ण संबंध विकसित करने की एक शक्ति है। यदि केन्द्रीय सर्वोच्चता की इस स्थिति को समाप्त किया गया तो इसके नकारात्मक प्रभावों का अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता।

सरकरिया आयोग
केंद्र-राज्य विधायी संबंध [Pinterest डाउनलोड करें – Drive से डाउनलोड करें]

कुल मिलाकर यही है केंद्र-राज्य विधायी संबंध (Center-State Legislative Relations), उम्मीद है समझ में आया होगा। इसके आगे केंद्र-राज्य प्रशासनिक संबंध को जरूर पढ़ें। लिंक नीचे दिया जा रहा है।

केंद्र-राज्य प्रशासनिक संबंध
Center-State Administrative Relations

◼◼◼

Article Based On,
एम लक्ष्मीकान्त – भारत की राजव्यवस्था↗️
मूल संविधान भाग 11↗️
When Parliament can make Law on state subject↗️ इत्यादि।

डाउनलोड- केंद्र-राज्य विधायी संबंध

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