Law making process in parliament of India in Hindi

इस लेख में हम संसद में कानून बनने की प्रक्रिया (Law making process in parliament) को अच्छे से समझेंगे, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें।
Law making process in parliament

संसद में कानून बनने की प्रक्रिया

भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था संसदीय प्रकार की व्यवस्था है। इसीलिए यहाँ संसद जैसी संवैधानिक संस्था का निर्माण किया गया है। आसान शब्दों में कहें तो नीति निर्माण करने वाली भारत की सबसे बड़ी संस्था संसद है।

लोकसभा, राज्यसभा और राष्ट्रपति संसद का आधार स्तम्भ है। ये कहना बिलकुल भी गलत नहीं होगा कि लोकसभा, राज्यसभा और राष्ट्रपति ही संसद है। आपके मन में एक सवाल आ सकता है कि राष्ट्रपति न तो लोकसभा और न ही राज्यसभा में बैठते है तो फिर ये संसद का एक हिस्सा क्यूँ है ?

ऐसा इसीलिए है क्यूंकी कोई भी विधेयक (Bill) भले ही लोकसभा और राज्यसभा से पारित हो जाये पर वो तब तक कानून या अधिनियम का रूप नहीं लेगा जब तक राष्ट्रपति की मुहर और हस्ताक्षर उस विधेयक पर न लग जाये। तो आइये संसद में कानून बनने की प्रक्रिया (Law making process in parliament)) समझने से पहले कुछ जरूरी बातों को समझ लेते हैं।

लोकसभा (Lok Sabha) –

लोकसभा आम जनों की एक सभा है जहां आम लोग प्रत्यक्ष मतदान के माध्यम से अपने प्रतिनिधि चुनकर यहाँ भेजते है। गौरतलब है कि प्रत्येक राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को वहाँ के जनसंख्या के आधार पर एक खास भौगोलिक क्षेत्र को निर्वाचन क्षेत्र का दर्जा दिया गया है। जीते हुए उम्मीदवार उस निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं और संसद में बैठकर विधायी प्रक्रिया में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

आम चुनाव होने के बाद बहुमत प्राप्त दल वाले राजनैतिक पार्टी के नेता को राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री नियुक्त किया जाता है। प्रधानमंत्री अपनी पार्टी से कुछ सांसदों का चुनाव करके उसे विभिन्न मंत्रालयों के कार्य-भार सौंप देते है।

इन्ही सारे मंत्रियों के समूह को मंत्रिपरिषद (council of ministers) कहा जाता है और यही होते है वास्तविक कार्यपालिका।

ये सारे मंत्री एक सांसद भी तो है, तो सारे सांसदों के समूह को जो की वर्तमान में 545 है, विधायिका (legislature) कहा जाता है। इन्ही सांसदों में से किसी एक व्यक्ति का चुनाव करके लोकसभा अध्यक्ष (speaker) बना दिया जाता है, जो कि लोकसभा व उसके प्रतिनिधियों का मुखिया होता है और लोकसभा के कार्य संचालन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 

राज्यसभा (Rajya Sabha)

राज्यसभा गुणी जनों की एक सभा है जो राज्य क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करता है। राज्यसभा के सांसदों का चुनाव अप्रत्यक्ष विधि – एकल हस्तांतरणीय मत पद्धति द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व के माध्यम से होता है।

राज्यसभा की सीटों की अधिकतम संख्या 250 निर्धारित है । इनमें से 238 सदस्य राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों के लिए जबकि 12 सीटें राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत करने के लिए है।

लेकिन वर्तमान में राज्यसभा में 245 सदस्य ही है। इनमें से 225 सदस्य राज्यों का और 8 सदस्य केंद्रशासित प्रदेशों का (दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी) का प्रतिनिधित्व करते है । बाकी के 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत है।

लोकसभा के पीठासीन अधिकारी को अध्यक्ष कहा जाता है जबकि राज्यसभा के पीठासीन अधिकारी को सभापति कहा जाता है। भारत के उप-राष्ट्रपति राज्यसभा के सभापति होते है और ये भी लोकसभा अध्यक्ष की तरह संवैधानिक दायरों में रहकर राज्यसभा के कार्य संचालन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है।

अब हम ये तो जान गए है कि संसद का काम देश के लिए नीति निर्माण करना है। पर यहाँ पर एक सवाल आपके दिमाग में आ सकता है कि माना कि राज्यसभा गुणी जनों की सभा है, बुद्धिजीवियों की सभा है पर लोकसभा में तो ज़्यादातर कम पढ़े-लिखे लोग ही आते है, कई लोग तो पहली बार ही चुनकर आते है जिन्हे न तो ज्यादा संविधान की बारीकियों का ज्ञान होता है और न ही किसी संस्थान को चलाने का तजुर्बा फिर भी कितनी पेशेवर तरीके से संसद चलता है। ऐसा कैसे होता है ?

ऐसा होता है सचिवालय की मदद से, संसद के दोनों सदनों का अपना पृथक सचिवालय स्टाफ होता है जो बहुत ही ज्यादा पढ़े-लिखे और अपने काम में निपुण होता है । इन दोनों सदनों के सचिवालय का मुखिया महासचिव (सेक्रेटरी जनरल) होता है। जो पर्दे के पीछे से संसद में कानून बनाने की प्रक्रिया (Law making process in parliament) में अपना योगदान देते हैं।

समान्यतः संसद 3 सत्रों में काम करता है :-

1. बजट सत्र (फरवरी से मई)
2. मानसून सत्र (जुलाई से सितंबर)
3. शीतकालीन सत्र (नवम्बर से दिसम्बर)

राष्ट्रपति की अधिसूचना से सदनों का सत्रारंभ होता है। यहाँ एक बात याद रखने वाली है कि सदन तभी चलता है, जब लोकसभा में कम से कम 55 सदस्य उपस्थित हो और राज्यसभा में कम से कम 25 सदस्य उपस्थित हो, इसे कोरम कहा जाता है अगर कोरम पूरा नहीं है तो सदन को स्थगित कर दिया जाता है। 

सदन की कार्यवाही की भाषा हिन्दी और अंग्रेजी है हालाँकि पीठासीन अधिकारी अगर आज्ञा दे तो कोई सदस्य अपनी मातृभाषा में भी बोल सकता है। 

◼️ संसद में एक दिन में दो पालियों में काम होता है। सुबह की पहली बैठक 11 बजे से 1 बजे तक और दूसरी बैठक 2 बजे से 6 बजे तक । हालाँकि अगर पीठासीन अधिकारी अगर चाहे तो वे इस समय को कम या ज्यादा कर सकते है। 

प्रश्नकाल (Question Hour) :- 

संसद का पहला घंटा यानी कि 11 बजे से लेकर 12 बजे तक प्रश्नकाल का समय होता है। इस दौरान सदस्य प्रश्न पुछते है और और प्रश्न के विभाग से संबन्धित मंत्री उसका उत्तर देते है।

▪️ कुछ ऐसे प्रश्न होते है जिसका जवाब मौखिक रूप से दिया जा सकता है ऐसे प्रश्न को तारांकित प्रश्न (Starred question) कहते है।

▪️ ऐसे प्रश्न, जिसका जवाब लिखित रूप से दिया जाता है ऐसे प्रश्न को अतारांकित प्रश्न (Unstarred question) कहा जाता है।

▪️ वे प्रश्न जो कम से कम 10 दिन का नोटिस देकर पूछा जाता है ऐसे प्रश्नों को अल्प सूचना का प्रश्न (Short notice question) कहा जाता है। 

शून्यकाल (Zero hour) :- 

प्रश्नकाल के तुरंत बाद शून्यकाल शुरू होता है इस काल में कोई भी सदस्य बिना किसी पूर्व सूचना के कोई भी मामला संसद के पटल पर विमर्श के लिए रख सकता है। ये भी समान्यतः 1 घंटा चलता है। इसके बाद जो भी समय बचता है उसमें मुख्य कार्यक्रम तय किए जाते है जो दूसरी पाली में किया जाना होता है।

दूसरी पाली में प्रस्तावों पर चर्चा होना शुरू होता है। जो कि ज़्यादातर सताधारी पार्टी के मंत्री लेकर आते है। पर कोई अन्य सदस्य भी चाहे तो किसी विषय पर प्रस्ताव लेकर आ सकता है।

Law making process in parliament and motions

✔️ चर्चा के लिए लाये गए ↗️प्रस्तावों (motion) की तीन प्रमुख श्रेणियाँ हैं, जो निम्नलिखित है-

1. महत्वपूर्ण प्रस्ताव :- ये कुछ ऐसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव होते हैं जो राष्ट्रीय राजनैतिक स्थिति को पूरी तरह से बदल सकता है और ये पूरी तरह से एक नया प्रस्ताव होता है जैसे कि राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग । 

2. स्थानापन्न प्रस्ताव :- किसी कारणवश अगर प्रस्तावकर्ता को लगता है कि उसके द्वारा पहले लाये गए प्रस्ताव में कुछ त्रुटि रह गयी है या फिर ये जन आकांक्षा के विरुद्ध है। तो वे उसकी जगह पर एक नया प्रस्ताव ला सकती है। जो कि पहले लाये गए प्रस्ताव का स्थान ले लेती है। 

3. पूरक प्रस्ताव :- यदि मूल प्रस्ताव के किसी एक भाग को बदलना हो तो उस स्थिति में इस प्रकार का प्रस्ताव लाया जाता है।

⬛ इसके अलावे भी अन्य कई तरह के प्रस्ताव होते है जो परिस्थिति अनुसार संसद सदस्यों द्वारा इस्तेमाल में लाया जाता है। जैसे कि – 

निंदा प्रस्ताव :- यह मंत्रिपरिषद की कुछ नीतियों या कार्य के खिलाफ निंदा के लिए लाया जाता है।

अविश्वास प्रस्ताव :- यह दरअसल यह सत्यापित करने के लिए लाया जाता है कि सरकार अभी भी बहुमत में है कि नहीं, यदि सरकार के खिलाफ ये अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाता है तो पूरी की पूरी मंत्रिपरिषद को इस्तीफा देना पड़ता है और सरकार गिर जाती है। 

ध्यानाकर्षण प्रस्ताव :- सदन का कोई भी सदस्य, बहुत ही जरूरी लोक महत्व के किसी विषय को अगर किसी मंत्री के संज्ञान में लाना चाहता है तो इस प्रस्ताव को लाता है।   

विशेषाधिकार प्रस्ताव :- यह किसी सदस्य द्वारा तब पेश किया जाता है, जब सदस्य यह महसूस करता है कि किसी मंत्री द्वारा गलत तथ्यों को पेश कर सदन को गुमराह करने की कोशिश की गयी है। 

कटौती प्रस्ताव :- यह प्रस्ताव तब लाया जाता है जब किसी मुद्दे पर वाद-विवाद ज्यादा लंबा खींच जाता है और किसी विधेयक पर मतदान के लिए समय की कमी को महसूस किया जाता है। तो यदि ये प्रस्ताव पारित हो जाता है तो वाद-विवाद को रोककर मतदान की प्रक्रिया को शुरू किया जाता है। 

धन्यवाद प्रस्ताव :- प्रत्येक आम चुनाव के पहले सत्र को राष्ट्रपति द्वारा संबोधित किया जाता है और संसद उस वित्तीय वर्ष के लिए काम करना शुरू कर देते है।

राष्ट्रपति के भाषण पर दोनों सदनों में चर्चा की जाती है और इस पर आभार व्यक्त किया जाता है इसी को धन्यवाद प्रस्ताव कहा जाता है। इसके बाद संसद अपना काम करना शुरू करती है जो कि है नीति निर्माण करना।

अब विधेयकों को पेश करने का काम शुरू होता है जो कि दो तरह के होते हैं। सरकारी विधेयक एवं गैर-सरकारी विधेयक और ये 4 श्रेणियों में पेश किए जाते है। 

1. संविधान संशोधन विधेयक (Constitution Amendment Bill) :- यानी कि ऐसा विधेयक जो कि पहले से ही अस्तित्व में है और उसमें संशोधन किया जाना है। ↗️संविधान संशोधन विधेयक पर एक बेहतरीन लेख उपलब्ध है, आप उसे जरूर पढ़ें।

2. धन विधेयक (Money Bill) :- कर(टैक्स), लोक  व्यय इत्यादि से संबन्धित विधेयक को धन विधेयक कहा जाता है। 

3. वित्त विधेयक (Finance bill) :-  राजस्व या व्यय से संबन्धित विधेयक को वित्त विधेयक कहा जाता है। ↗️धन विधेयक और वित्त विधेयक पर पहले से ही लेख मौजूद है, आप उसे जरूर पढ़ें।

4. साधारण विधेयक (Ordinary bill) :- वित्तीय विषयों के अलावे जितने भी विधेयक पेश किए जाते है, साधारण विधेयक होते है। 

इस लेख में हम यहीं जानने कि कोशिश करेंगे कि एक साधारण विधेयक किस तरह एक अधिनियम या कानून का रूप लेता है। तो हमारा मेन टॉपिक यहाँ से शुरू होता है।

Commencement of Law making process in parliament

किसी भी विधेयक को अधिनियम या कानून बनने से पहले उसे निम्नलिखित चरणों से होकर गुजरना पड़ता है।

1. प्रथम पाठन (First reading) :-

सदन से अनुमति मिल जाने के बाद कोई भी सदस्य विधेयक को संसद पटल पर रखता है और इस विधेयक के शीर्षक एवं इसका उद्देश्य स्पष्ट करता है । यहाँ पर याद रखने वाली बात ये है कि इस चरण में इस विधेयक पर कोई चर्चा नहीं होती । फिर इस विधेयक को भारत के राजपत्र में प्रकाशित किया जाता है। विधेयक के इसी प्रस्तुतीकरण को प्रथम पाठन कहा जाता है। 

यदि विधेयक प्रस्तुत करने से पहले ही राजपत्र में प्रकाशित हो जाये तो विधेयक के संबंध में सदन की अनुमति की आवश्यकता नहीं होती।

2. द्वितीय पाठन (Second reading) :-

इस चरण में विधेयक पर विस्तृत समीक्षा की जाती है तथा इसे अंतिम रूप प्रदान किया जाता है। इस चरण में साधारण बहस होती है, विशेषज्ञ समिति द्वारा जांच कराई जाती है। फिर इस पर विचार करने के लिए लाया जाता है। वास्तव में इस चरण के तीन उप-चरण होते हैं, जिनके नाम हैं 1. साधारण बहस की अवस्था, 2. समिति द्वारा जांच एवं 3. विचारणीय अवस्था।

1. साधारण बहस की अवस्था :- विधेयक की छपी हुई प्रतियाँ सभी सदस्यों के बीच वितरित कर दी जाती है। समान्यतः इस चरण में विधेयक के सिद्धान्त एवं उपबंधों पर चर्चा होती है, लेकिन विस्तार से विचार-विमर्श नहीं किया जाता।

इस चरण में, आमतौर पर संसद चार में से कोई कदम उठा सकता है :- (1) इस पर तुरंत चर्चा कर सकता है या इसके लिए कोई अन्य तिथि निर्धारित कर सकता है, (2) इसे सदन की प्रवर समिति को सौंपा जा सकता है, (3) इसे दोनों सदनों की संयुक्त समिति को सौंपा जा सकता है, या (4) इसे जनता के विचार जानने के लिय सार्वजनिक किया जा सकता है।

◼️ प्रवर समिति में उस सदन के सदस्य होते हैं जहां, विधेयक लाया गया था और संयुक्त समिति में दोनों सदनों के सदस्य होते हैं।

2. समिति द्वारा जांच की अवस्था :- समान्यतः विधेयक को सदन की एक प्रवर समिति को सौंप दिया जाता है। यह समिति मूल विषय में परिवर्तन लाये बिना विधेयक पर विस्तारपूर्वक और खंडवार विचार करती है। समीक्षा एवं परिचर्चा के उपरांत समिति विधेयक को वापस सदन को सौंप देती है।

3. विचार-विमर्श की अवस्था :- प्रवर समिति से विधेयक प्राप्त होने के उपरांत सदन भी उसकी समीक्षा करता है। विधेयक के प्रत्येक उपबंध पर खंडवार चर्चा एवं मतदान होता है। इस अवस्था में कोई सदस्य अगर चाहे तो संशोधन भी प्रस्तुत कर सकते है, और यदि संशोधन स्वीकार हो जाते है तो वे विधेयक का हिस्सा बन जाते है।

3. तृतीय पाठन (Third reading) :-

इस चरण में विधेयक को स्वीकार या अस्वीकार करने के संबंध में चर्चा होती है यानी कि विधेयक पर मतदान होता है। (इस चरण में विधेयक में कोई संशोधन का काम नहीं होता है।) यदि सदन बहुमत से इसे पारित कर देता है तो विधेयक पारित हो जाता है। इसके बाद पीठासीन अधिकारी द्वारा विधेयक पर विचार एवं स्वीकृति के लिए उसे दूसरे सदन में भेज दिया जाता है।

दूसरे सदन में विधेयक :- दूसरे सदन में भी कोई विधेयक प्रथम पाठन, द्वितीय पाठन एवं तृतीय पाठन से होकर गुजरता है। इस संबंध में दूसरे सदन के समक्ष चार विकल्प होते हैं : (1) यह विधेयक को उसी रूप में पारित कर प्रथम सदन को भेज सकता है जैसा कि वो पहले था, (2) यह विधेयक को संशोधन के साथ पारित करके प्रथन सदन को पुनःविचारार्थ भेज सकता है (3) यह विधेयक को अस्वीकार कर सकता है, और (4) यह विधेयक पर किसी भी प्रकार की कार्यवाही न करके उसे लंबित कर सकता है।

⬛ यदि दूसरा सदन किसी प्रकार के संशोधन के साथ विधेयक को पारित कर देता है और प्रथम सदन उन संशोधनों को स्वीकार कर लेता है तो विधेयक दोनों सदनों द्वारा पारित समझा जाता है तथा इसे राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेज दिया जाता है।

⬛ दूसरी ओर यदि दूसरे सदन द्वारा किए गए संशोधनों को प्रथम सदन अस्वीकार कर देता है या फिर दूसरा सदन छह माह तक उस पर कोई कार्यवाही नहीं करता तो गतिरोध की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इस तरह के गतिरोध को समाप्त करने हेतु राष्ट्रपति दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुला सकता है। यदि उपस्थित एवं मत देने वाले सदस्यों का बहुमत इस संयुक्त बैठक में विधेयक को पारित कर देता है तो उसे दोनों सदनों द्वारा पारित समझा जाता है।

इसके बाद आती है राष्ट्रपति की बारी – संसद द्वारा पारित विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जाता है।

राष्ट्रपति की स्वीकृति
(Law making process in Parliament and acceptance of President)

राष्ट्रपति के पास 3 विकल्प होते है –
1. या तो वह विधेयक को अपनी स्वीकृति दे दें
2. या तो वह विधेयक को अपनी स्वीकृति देने से रोक दें
3. या वह उस विधेयक को पुनर्विचार हेतु पुनः संसद को भेज दें  । 

⬛ अगर राष्ट्रपति विधेयक को स्वीकृति दे देता है तो यह अधिनियम (Act) या कानून बन जाता है। इस प्रकार देश को एक नया कानून मिलता है। 

⬛ यदि राष्ट्रपति अपनी स्वीकृति नहीं देता है तो वह विधेयक वही निरस्त हो जाता है।

⬛ और यदि पुनर्विचार के लिए भेजता है और जरूरी संसोधन के बाद वह विधेयक फिर से राष्ट्रपति के पास आता है तो राष्ट्रपति इस पर स्वीकृति देने को बाध्य होता है । 

तो ये थी पूरी प्रक्रिया संसद में कानून बनने (Law making process in parliament) की। इन्ही प्रक्रियाओं से गुजरकर कोई साधारण विधेयक अधिनियम बन जाता है।

Law making process in Parliament and other provisions

🔹 स्थगन – इसके द्वारा बैठक के कार्यों को कुछ निश्चित समय, जो कुछ घंटे, दिन या सप्ताह हो सकता है, के लिए निलंबित किया जाता है।

🔹 अनिश्चित काल के लिए स्थगन – जब सदन को बिना यह बताए स्थगित कर दिया जाता है कि अब उसे किस दिन आहूत किया जाएगा तो उसे अनिश्चितकाल के लिए स्थगन कहते हैं। अनिश्चित काल के लिए स्थगन करने की शक्ति अध्यक्ष या सभापति को होती है।

🔹 सत्रावसान – सत्रावसान का मतलब होता है सत्र पूरा हो जाने के बाद अनिश्चित काल के लिए स्थगन। इसके लिए राष्ट्रपति अधिसूचना जारी करता है, हालांकि यदि राष्ट्रपति चाहे तो सत्र के दौरान भी सत्रावसान कर सकता है।

🔹 एक सत्र के सत्रावसान एवं दूसरे सत्र के प्रारम्भ होने के मध्य की समायावधि को अवकाश कहते हैं।

🔹 विघटन – एक स्थायी सदन होने के कारण राज्यसभा तो विघटित नहीं होती है लेकिन लोकसभा का विघटन जरूर होता है। सत्रावसान का तो मतलब सिर्फ सत्र की समाप्ति होता है यानी कि कुछ समय बाद फिर से सत्र शुरू हो जाएगा लेकिन विघटन से विद्यमान सभा का ही अंत हो जाता है। यानी कि अब नए चुनाव के बाद ही सत्र का आयोजन होगा। आमतौर पर लोकसभा को दो कारणों से विघटित किया जा सकता है।

1. स्वयं विघटित – यानी कि जब इसके पाँच वर्ष का कार्यकाल पूरा हो जाये या वह काल पूरा हो जाये जब राष्ट्रीय आपातकाल के लिए समय बढ़ाया गया हो, या 2. जब राष्ट्रपति सदन को विघटित करने का निर्णय ले।

जब लोकसभा विघटित की जाती है तो इसके सारे कार्य,जैसे – विधेयक, प्रस्ताव, संकल्प नोटिस, याचिका आदि समाप्त हो जाते है। लोकसभा के पुनः गठन के बाद इसे सदन में दोबारा लाना जरूरी है।

❌ जो विधेयक समाप्त हो जाते हैं वे निम्नलिखित है –

1. विचाराधीन विधेयक, जो लोकसभा में है समाप्त हो जाता है,
2. लोकसभा में पारित किन्तु राज्यसभा में विचाराधीन विधेयक समाप्त हो जाता है।

✔️ हालांकि जिन लंबित विधेयकों और लंबित आश्वासनों, जिनकी जांच सरकारी आश्वासनों संबंधी समिति द्वारा की जानी होती है, लोकसभा के विघटन पर समाप्त नहीं होते है,

✔️ ऐसा विधेयक जो दोनों सदनों में असहमति के कारण पारित न हुआ हो और राष्ट्रपति ने विघटन होने से पूर्व दोनों सदनों की संयुत बैठक बुलाई हो, समाप्त नहीं होता

✔️ ऐसा विधेयक जो राज्यसभा में विचाराधीन हो लेकिन लोकसभा द्वारा पारित न हो, समाप्त नहीं होता

✔️ ऐसा विधेयक जो दोनों सदोनों द्वारा पारित हो लेकिन राष्ट्रपति द्वारा पुनर्विचार के लिए लौटा दिया गया हो, समाप्त नहीं होता।

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