संसद में कानून बनाने की प्रक्रिया

इस लेख में संसद में कानून बनाने की प्रक्रिया (Law making process in parliament) पर स्टेप बाइ स्टेप सरल एवं सहज चर्चा की गई है,

तो कानून के शासन वाले देश में, कोई कानून कैसे बनता है; उसे अच्छी तरह से समझने के लिए इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें, साथ ही संबंधित अन्य लेख भी पढ़ें।

संसद में कानून बनाने की प्रक्रिया

संसद में कानून बनने की प्रक्रिया में लोकसभा और राज्यसभा की भूमिका

भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था संसदीय प्रकार की व्यवस्था है। इसीलिए यहाँ नीति निर्माण करने वाली सबसे बड़ी संस्था संसद है। लोकसभा, राज्यसभा और राष्ट्रपति संसद का आधार स्तम्भ है। अगर राष्ट्रपति की बात करें तो ये किसी भी विधेयक (bill) को अंतिम रूप से स्वीकृति प्रदान करते हैं, जिससे कि वो विधेयक, अधिनियम (Act) बन जाता है। राष्ट्रपति के पास विधेयक पहुँचने से पहले उस विधेयक के साथ जो कुछ भी होता है वो संसद के दोनों सदनों यानी कि लोकसभा और राज्यसभा में होता है। यहीं कानून अपना रूप ग्रहण करता है-

लोकसभा (Lok Sabha) –

लोकसभा आम जनों की एक सभा है जहां आम लोग प्रत्यक्ष मतदान के माध्यम से अपने प्रतिनिधि चुनकर यहाँ भेजते है। गौरतलब है कि प्रत्येक राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को वहाँ के जनसंख्या के आधार पर एक खास भौगोलिक क्षेत्र को निर्वाचन क्षेत्र का दर्जा दिया गया है। जीते हुए उम्मीदवार उस निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं और संसद में बैठकर विधायी प्रक्रिया में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

आम चुनाव होने के बाद बहुमत प्राप्त दल वाले राजनैतिक पार्टी के नेता को राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री नियुक्त किया जाता है। प्रधानमंत्री अपनी पार्टी से कुछ सांसदों का चुनाव करके उसे विभिन्न मंत्रालयों के कार्य-भार सौंप देते है। इन्ही सारे मंत्रियों के समूह को मंत्रिपरिषद (council of ministers) कहा जाता है और यही होते है वास्तविक कार्यपालिका (Real executive) या सरकार।

ये सारे मंत्री एक सांसद भी होते है, इसीलिए सारे सांसदों के समूह को विधायिका (legislature) कहा जाता है, जिसकी संख्या वर्तमान में 543 है। इन्ही सांसदों में से किसी एक व्यक्ति का चुनाव करके लोकसभा अध्यक्ष (speaker) बना दिया जाता है, जो कि लोकसभा व उसके प्रतिनिधियों का मुखिया होता है और लोकसभा के कार्य संचालन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 

लोकसभा में विधेयक पेश करने का काम मुख्य रूप से कार्यपालिका करता है, (इसीलिए उस विधेयक को सरकारी विधेयक भी कहते हैं) लेकिन उस विधेयक को पारित (Pass) विधायिका (legislature) करता है। हालांकि गैर-सरकारी सदस्य भी विधेयक पेश कर सकता है जिसे कि गैर-सरकारी विधेयक कहा जाता है।

राज्यसभा (Rajya Sabha) –

राज्यसभा गुणी जनों की एक सभा है जो राज्य क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करता है। राज्यसभा के सांसदों का चुनाव अप्रत्यक्ष विधि – एकल हस्तांतरणीय मत पद्धति द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व के माध्यम से होता है।

वर्तमान में राज्यसभा में 245 सदस्य है। जिसमें से 225 सदस्य राज्यों का और 8 सदस्य केंद्रशासित प्रदेशों का (दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी) का प्रतिनिधित्व करते है और बाकी के 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत है।

भारत के उप-राष्ट्रपति (Vice President), राज्यसभा के सभापति होते है और ये भी लोकसभा अध्यक्ष की तरह संवैधानिक दायरों में रहकर राज्यसभा के कार्य संचालन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। कार्यपालिका के सदस्य यहाँ भी विधेयक को प्रस्तुत करते हैं और लोकसभा की तरह यहाँ से भी विधेयक को पारित करवाना जरूरी होता है।

कुछ जरूरी तथ्य

यहाँ पर एक सवाल आपके दिमाग में आ सकता है कि माना कि राज्यसभा गुणी जनों की सभा है, बुद्धिजीवियों की सभा है पर लोकसभा में तो ज़्यादातर कम पढ़े-लिखे लोग ही आते है, कई लोग तो पहली बार ही चुनकर आते है जिन्हे न तो ज्यादा संविधान की बारीकियों का ज्ञान होता है और न ही किसी संस्थान को चलाने का तजुर्बा फिर भी कितनी पेशेवर तरीके से संसद चलता है। ऐसा कैसे होता है ?

ऐसा होता है सचिवालय की मदद से, संसद के दोनों सदनों का अपना पृथक सचिवालय स्टाफ होता है जो बहुत ही ज्यादा पढ़े-लिखे और अपने काम में निपुण होता है । इन दोनों सदनों के सचिवालय का मुखिया महासचिव (सेक्रेटरी जनरल) होता है। जो पर्दे के पीछे से संसद में कानून बनाने की प्रक्रिया में अपना योगदान देते हैं।

▪️ सरकार चाहे तो किसी विधेयक को पहले राज्य सभा या लोक सभा में से किसी में भी पेश कर सकता है। लेकिन किसी भी एक सदन में पारित होने के बाद उसे दूसरे सदन में भी पेश करना होगा।

▪️ समान्यतः संसद 3 सत्रों में काम करता है 1. बजट सत्र (फरवरी से मई) 2. मानसून सत्र (जुलाई से सितंबर) 3. शीतकालीन सत्र (नवम्बर से दिसम्बर)। इन्ही सत्रों के दौरान कानून बनाए जाते हैं। अगर सत्र न चल रहा हो और तब कानून की जरूरत पड़े तो फिर अध्यादेश (Ordinance) का सहारा लेना पड़ता है।

▪️ सदन तभी चलता है, जब लोकसभा में कम से कम 55 सदस्य उपस्थित हो और राज्यसभा में कम से कम 25 सदस्य उपस्थित हो, इसे कोरम कहा जाता है अगर कोरम पूरा नहीं है तो सदन को स्थगित कर दिया जाता है। 

▪️ सदन की कार्यवाही की भाषा हिन्दी और अंग्रेजी है हालाँकि पीठासीन अधिकारी अगर आज्ञा दे तो कोई सदस्य अपनी मातृभाषा में भी बोल सकता है। 

◼️ संसद में एक दिन में दो पालियों में काम होता है। सुबह की पहली बैठक 11 बजे से 1 बजे तक और दूसरी बैठक 2 बजे से 6 बजे तक । हालाँकि अगर पीठासीन अधिकारी अगर चाहे तो वे इस समय को कम या ज्यादा कर सकते है। 

संसद में कितने प्रकार के विधेयक पेश किए जाते हैं?

संसद में कानून बनाने की प्रक्रिया विधेयक (Bill) से शुरू होती है। विधेयक दरअसल कानून का एक ड्राफ्ट होता है जो बताता है कि कानून किस बारे में है और ये क्यों लाया जा रहा है। विधायिका द्वारा इस ड्राफ्ट में आवश्यकतानुसार कुछ जोड़ा और घटाया जा सकता है।

विधेयक का किसी सदन से पास होने का मतलब होता है कि वो सदन उस विधेयक से पूरी तरह से संतुष्ट है। लेकिन यहाँ जो जानने की जरूरत है वो ये है कि विधेयक समान्यतः चार श्रेणियों में पेश किए जाते हैं। जिसमें सभी की अपनी कुछ-कुछ ख़ासियतें हैं-

1. संविधान संशोधन विधेयक (Constitution Amendment Bill) :- यानी कि ऐसा विधेयक जिसके माध्यम से संविधान में संशोधन किया जाता है। ये कैसे होता है इसपर अलग से एक लेख है संविधान संशोधन प्रक्रिया↗️ , इसे जरूर पढ़ें।

2. धन विधेयक (Money Bill) :- कर(टैक्स), लोक व्यय इत्यादि से संबन्धित विधेयक को धन विधेयक कहा जाता है। 

3. वित्त विधेयक (Finance bill) :-  राजस्व या व्यय से संबन्धित विधेयक को वित्त विधेयक कहा जाता है। धन विधेयक और वित्त विधेयक↗️ पर अलग से लेख मौजूद है, आप उसे जरूर पढ़ें।

4. साधारण विधेयक (Ordinary bill) :- सामान्य कानून बनाने के लिए जो विधेयक पेश किया जाता है उसे साधारण विधेयक कहा जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो, वित्तीय विषयों के अलावे जितने भी विधेयक पेश किए जाते है, साधारण विधेयक होते है। यहाँ तक कि संविधान संशोधन विधेयक के प्रावधान भी कुछ इसी तरह है।

इस लेख में हम यहीं जानने कि कोशिश करेंगे कि एक साधारण विधेयक किस तरह एक अधिनियम या कानून का रूप लेता है।

संसद में कानून बनाने की प्रक्रिया का विवरण

किसी भी विधेयक को अधिनियम या कानून बनने से पहले उसे निम्नलिखित चरणों से होकर गुजरना पड़ता है।

1. प्रथम पाठन (First reading) :-

सदन से अनुमति मिल जाने के बाद मंत्री या सदन का कोई भी सदस्य विधेयक को संसद पटल पर रखता है और इस विधेयक के शीर्षक एवं इसका उद्देश्य स्पष्ट करता है। इस चरण में इस विधेयक पर कोई चर्चा नहीं होती बस इस विधेयक को भारत के राजपत्र में प्रकाशित किया जाता है। विधेयक के इसी प्रस्तुतीकरण को प्रथम पाठन कहा जाता है। 

यदि विधेयक प्रस्तुत करने से पहले ही राजपत्र में प्रकाशित हो जाये तो विधेयक के संबंध में सदन की अनुमति की आवश्यकता नहीं होती।

2. द्वितीय पाठन (Second reading) :-

इस चरण में विधेयक पर विस्तृत समीक्षा की जाती है तथा इसे अंतिम रूप प्रदान किया जाता है। इस चरण में साधारण बहस होती है, विशेषज्ञ समिति द्वारा जांच कराई जाती है। फिर इस पर विचार करने के लिए लाया जाता है। वास्तव में इस चरण के तीन उप-चरण होते हैं, जिनके नाम हैं 1. साधारण बहस की अवस्था, 2. समिति द्वारा जांच एवं 3. विचारणीय अवस्था।

1. साधारण बहस की अवस्था :- विधेयक की छपी हुई प्रतियाँ सभी सदस्यों के बीच वितरित कर दी जाती है। समान्यतः इस चरण में विधेयक के सिद्धान्त एवं उपबंधों पर चर्चा होती है, लेकिन विस्तार से विचार-विमर्श नहीं किया जाता।

इस चरण में, आमतौर पर संसद चार में से कोई कदम उठा सकता है :- (1) इस पर तुरंत चर्चा कर सकता है या इसके लिए कोई अन्य तिथि निर्धारित कर सकता है, (2) इसे सदन की प्रवर समिति को सौंपा जा सकता है, (3) इसे दोनों सदनों की संयुक्त समिति को सौंपा जा सकता है, या (4) इसे जनता के विचार जानने के लिय सार्वजनिक किया जा सकता है।

◼️ प्रवर समिति में उस सदन के सदस्य होते हैं जहां, विधेयक लाया गया था और संयुक्त समिति में दोनों सदनों के सदस्य होते हैं।

2. समिति द्वारा जांच की अवस्था :- समान्यतः विधेयक को सदन की एक प्रवर समिति को सौंप दिया जाता है। यह समिति मूल विषय में परिवर्तन लाये बिना विधेयक पर विस्तारपूर्वक और खंडवार विचार करती है। समीक्षा एवं परिचर्चा के उपरांत समिति विधेयक को वापस सदन को सौंप देती है।

3. विचार-विमर्श की अवस्था :- प्रवर समिति से विधेयक प्राप्त होने के उपरांत सदन भी उसकी समीक्षा करता है। विधेयक के प्रत्येक उपबंध पर खंडवार चर्चा एवं मतदान होता है। इस अवस्था में कोई सदस्य अगर उसमें कुछ संशोधन करवाना चाहे तो उसके लिए संशोधन भी प्रस्तुत कर सकते है, और यदि संशोधन स्वीकार हो जाते है तो वे विधेयक का हिस्सा बन जाते है।

3. तृतीय पाठन (Third reading) :-

इस चरण में विधेयक को स्वीकार या अस्वीकार करने के संबंध में चर्चा होती है यानी कि विधेयक पर मतदान होता है। (इस चरण में विधेयक में कोई संशोधन का काम नहीं होता है।) यदि सदन बहुमत से इसे पारित कर देता है तो विधेयक पारित हो जाता है। इसके बाद पीठासीन अधिकारी द्वारा विधेयक पर विचार एवं स्वीकृति के लिए उसे दूसरे सदन में भेज दिया जाता है।

दूसरे सदन में विधेयक :- दूसरे सदन में भी कोई विधेयक प्रथम पाठन, द्वितीय पाठन एवं तृतीय पाठन से होकर गुजरता है। लेकिन इस संबंध में दूसरे सदन के समक्ष चार विकल्प होते हैं :
(1) यह विधेयक को उसी रूप में पारित कर प्रथम सदन को भेज सकता है जैसा कि वो पहले था,
(2) यह विधेयक को संशोधन के साथ पारित करके प्रथन सदन को पुनः विचारार्थ भेज सकता है
(3) यह विधेयक को अस्वीकार कर सकता है, और
(4) यह विधेयक पर किसी भी प्रकार की कार्यवाही न करके उसे लंबित कर सकता है।

⬛ यदि दूसरा सदन किसी प्रकार के संशोधन के साथ विधेयक को पारित कर देता है और प्रथम सदन उन संशोधनों को स्वीकार कर लेता है तो विधेयक दोनों सदनों द्वारा पारित समझा जाता है तथा इसे राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेज दिया जाता है।

⬛ दूसरी ओर यदि दूसरे सदन द्वारा किए गए संशोधनों को प्रथम सदन अस्वीकार कर देता है या दूसरा सदन उस विधेयक को अस्वीकार कर देता है या फिर दूसरा सदन छह माह तक उस पर कोई कार्यवाही नहीं करता तो ऐसी स्थिति में गतिरोध को समाप्त करने हेतु राष्ट्रपति दोनों सदनों की संयुक्त बैठक (Joint sitting of both houses) बुला सकता है। यदि उपस्थित एवं मत देने वाले सदस्यों का बहुमत इस संयुक्त बैठक में विधेयक को पारित कर देता है तो उसे दोनों सदनों द्वारा पारित समझा जाता है।

इसके बाद आती है राष्ट्रपति की बारी – संसद द्वारा पारित विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जाता है।

राष्ट्रपति की स्वीकृति

इस संबंध में राष्ट्रपति के पास 3 विकल्प होते है –
1. या तो वह विधेयक को अपनी स्वीकृति दे दें
2. या तो वह विधेयक को अपनी स्वीकृति देने से रोक दें
3. या वह उस विधेयक को पुनर्विचार हेतु पुनः संसद को भेज दें  । 

⬛ अगर राष्ट्रपति विधेयक को स्वीकृति दे देता है तो यह अधिनियम (Act) या कानून बन जाता है। इस प्रकार देश को एक नया कानून मिलता है। 

⬛ यदि राष्ट्रपति (President) अपनी स्वीकृति नहीं देता है तो वह विधेयक वही निरस्त हो जाता है।

⬛ और यदि पुनर्विचार के लिए भेजता है और जरूरी संसोधन के बाद वह विधेयक फिर से राष्ट्रपति के पास आता है तो राष्ट्रपति इस पर स्वीकृति देने को बाध्य होता है । 

तो कुल मिलाकर यही है संसद में कानून बनाने की प्रक्रिया। इन्ही प्रक्रियाओं से गुजरकर कोई साधारण विधेयक अधिनियम बन जाता है।

कौन सा विधेयक समाप्त हो जाता है और कौन सा नहीं?

1. विचाराधीन विधेयक, जो लोकसभा में है समाप्त हो जाता है,
2. लोकसभा में पारित किन्तु राज्यसभा में विचाराधीन विधेयक समाप्त हो जाता है।

▪️ हालांकि जिन लंबित विधेयकों और लंबित आश्वासनों, जिनकी जांच सरकारी आश्वासनों संबंधी समिति द्वारा की जानी होती है, लोकसभा के विघटन पर समाप्त नहीं होते है,

▪️ ऐसा विधेयक जो दोनों सदनों में असहमति के कारण पारित न हुआ हो और राष्ट्रपति ने विघटन होने से पूर्व दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाई हो, समाप्त नहीं होता

▪️ ऐसा विधेयक जो राज्यसभा में विचाराधीन हो लेकिन लोकसभा द्वारा पारित न हो, समाप्त नहीं होता

▪️ ऐसा विधेयक जो दोनों सदनों द्वारा पारित हो लेकिन राष्ट्रपति द्वारा पुनर्विचार के लिए लौटा दिया गया हो, समाप्त नहीं होता।

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Article Based On,
एम लक्ष्मीकान्त – भारत की राजव्यवस्था↗️
मूल संविधान
हमारी संसद – सुभाष कश्यप आदि।

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