बजट : क्या, कब, क्यों और कैसे? । Budget in India in Hindi

बजट यानी कि आने वाले समय को ध्यान में रखकर, अपने उपलब्ध संसाधनों का इस तरह से प्रबंधित करने का अनुमान लगाना ताकि एक अच्छी ज़िंदगी जी जा सके।

इस लेख में हम भारत के केन्द्रीय बजट (Budget) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे, एवं इसके विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं को समझने का प्रयास करेंगे; तो लेख को अंत तक जरूर पढ़ें।

बजट

बजट क्या है?

सबसे सरल भाषा में कहें तो बजट अपने खर्चों को व्यवस्थित करने का तरीका है। दूसरे शब्दों में कहें तो बजट एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें हम अपने पिछले वित्तीय अनुभवों से सीखकर आगे आने वाले दिनों के लिए वित्तीय योजना तैयार करते हैं। ये व्यक्तिगत स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक हो सकता है और दिन-महीनों से लेकर वर्षों तक का हो सकता है।

भारत के संदर्भ में बात करें तो बजट का आधार वार्षिक होता है, इसीलिए इसे वार्षिक वित्तीय लेखा-जोखा कहा जाता है। संविधान की बात करें तो अनुच्छेद 112 में इसे ‘वार्षिक वित्तीय विवरण’ कहा गया है। कुल मिलाकर कहें तो बजट एक वित्त वर्ष के दौरान भारत सरकार के अनुमानित प्राप्तियों और खर्च का विवरण है। यहाँ एक वित्त वर्ष का मतलब है 1 अप्रैल से लेकर 31 मार्च तक।

बजट क्यों बनाया जाता है?

उपलब्ध वित्तीय संसाधनों के सर्वोत्तम उपयोग के लिए हमारे पास पहले से एक बेहतर प्लान होनी चाहिए कि आगामी वर्ष के दौरान किस मद पर कितना धन खर्च किया जाना है और उसमें से कितना धन किस स्रोत से आएगा। इसके अलावा आने वाले वित्तीय वर्ष में राजस्व को किस तरह से बढ़ाया जा सकता है तथा आने वाले सालों के लिए आर्थिक एवं वित्तीय विधि, कर व्यवस्था और नई योजनाएं क्या-क्या होंगी, आदि। यही प्लानिंग बजट है। ये अनुभव और अनुमान पर आधारित होता है, इसीलिए ये जरूरी नहीं है चीज़ें प्लान के अनुसार ही चले। जैसे कि 2020-21 के बजट में कोविड 19 इतना बदतर हो जाएगा, इसका कोई प्रावधान नहीं था इसीलिए उस वित्तीय वर्ष का पूरा बजट बिगड़ गया।

बजट संसद में कैसे पास होता है?

संसद में बजट निम्नलिखित 6 स्तरों से गुजरता है तब जाकर बजट की पूरी प्रक्रिया खत्म होती है।
1. बजट का प्रस्तुतीकरण (Presentation of budget)
2. आम बहस (General debate)
3. विभागीय समितियों द्वारा जांच (Investigation by departmental committees)
4. अनुदान की मांग पर मतदान (Voting on demand for grant)
5. विनियोग विधेयक का पारित होना (Passing of Appropriation Bill)
6. वित्त विधेयक का पारित होना (Passing of Finance Bill)।

1. बजट का प्रस्तुतीकरण – बजट को प्रस्तुत करने का काम वित्त मंत्री सदन में करते हैं उस दौरान जो वे भाषण देते हैं, उसे बजट भाषण कहा जाता हैं। जब भाषण खत्म हो जाता है तब बजट को सदन के समक्ष रखा जाता है। इसके बाद राज्यसभा मे इसे पेश किया जाता है। उस बजट में सरकार द्वारा जितनी अनुदान (Grant) की मांग की गई है राज्यसभा को उन अनुदान मांगों पर कटौती का कोई अधिकार नहीं होता है।

2. आम बहस – बजट को प्रस्तुत करने के कुछ दिन बाद तक उस बजट पर आम बहस चलती रहती है। दोनों सदन इस पर तीन से चार दिन बहस करते हैं। इस पर बहस के दौरान कई प्रश्न भी उठाये जाते हैं बहस के अंत में वित्त मंत्री को अधिकार होता है कि वह इसका जवाब दे।

3. विभागीय समितियों द्वारा जांच – बजट पर आम बहस पूरी होने के बाद सदन तीन या चार हफ्तों के लिए स्थगित हो जाता है। इस अंतराल के दौरान संसद कि स्थायी समितियां (Standing committees) अनुदान की मांग आदि की विस्तार से जांच-पड़ताल करती है और एक रिपोर्ट तैयार करती है। बाद में इस रिपोर्ट को दोनों सदनों में विचारार्थ रखा जाता है। संसद का वित्तीय नियंत्रण मंत्रालयों पर स्थापित हो सके इसीलिए स्थायी समिति की व्यवस्था को 1993 में शुरू किया गया था।

4. अनुदान की मांगों पर मतदान – विभागीय स्थायी समितियों के रिपोर्ट पर विचार किए जाने के बाद लोकसभा में अनुदान की मांगों के लिए मतदान होता है। मांगे मंत्रालयवार प्रस्तुत की जाती है और उस पर पूर्ण मतदान होता है ऐसा होने के बाद वो मांगे अनुदान बन जाती है।

यहाँ पर ये याद रखिए की – अनुदान के लिए मतदान लोकसभा की विशेष शक्ति है, जो कि राज्यसभा के पास नहीं है। राज्यसभा को मतदान का अधिकार बजट के मताधिकार वाले हिस्से पर ही होता है तथा इसमें भारत की संचित निधि पर भारित व्यय शामिल नहीं होते हैं।

आमतौर पर 140 के आस-पास मांगे होती है, प्रत्येक मांग पर लोकसभा में अलग से मतदान होता है। इस दौरान संसद इस पर बहस करते है और अगर सदस्य चाहे तो अनुदान मांगों पर कटौती के लिए प्रस्ताव भी ला सकते हैं। इस प्रकर के प्रस्ताव को कटौती प्रस्ताव कहा जाता है, जिनके तीन प्रकार होते हैं :-

(1). नीति कटौती प्रस्ताव (Policy deduction proposal) :- यह मांग नीति (Policy) के प्रति असहमति को व्यक्त करता है। इस प्रस्ताव में मांग की राशि 1 रुपए कर देने के लिए कहा जाता है। इसका सीधा सा मतलब होता है कि हम आपके मांग नीति का अनुमोदन (Approval) नहीं करते है। अगर सदस्य चाहे तो कोई वैकल्पिक नीति भी पेश कर सकता है।

(2). आर्थिक कटौती प्रस्ताव (Economic deduction proposal) :- इसे मितव्ययता कटौती प्रस्ताव भी कहा जाता है। जहां ऊपर वाला प्रस्ताव नीति से संबन्धित था वहीं ये प्रस्ताव मांग की राशि को कम करने से संबन्धित है। इसमें इस बात का उल्लेख होता है कि प्रस्तावित व्यय से अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ सकता है इसीलिए मांग की राशि को एक निश्चित सीमा तक कम किया जाये। ये निश्चित सीमा कितना होगा ये प्रस्ताव लाने वाले डिसाइड करते हैं।

(3). सांकेतिक कटौती प्रस्ताव (Token reduction proposal) :- यह प्रस्ताव भारत सरकार के किसी दायित्व से संबन्धित होता है। इसमें कहा जाता है कि मांग में 100 रुपए की कमी की जाय। प्रस्ताव लाने वाले इसकी मदद से सरकार के प्रति अपनी विशिष्ट शिकायत को व्यक्त करता है।

कटौती प्रस्ताव को स्वीकृति कब मिल सकती है?

एक कटौती प्रस्ताव की स्वीकृति के लिए जरूरी है कि उसमें निम्नलिखित विशेषताएँ हो –
(1) यह केवल एक प्रकार की मांग से संबन्धित होना चाहिए वो भी केवल एक मामले से ही संबन्धित होनी चाहिए
(2) इसका स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए तथा इसमें किसी प्रकार की अनावश्यक बातें नहीं होनी चाहिए जैसे कि इसमें संघ सरकार के कार्य क्षेत्र के बाहर के किसी विषय का उल्लेख नहीं होना चाहिए
(3) इसमें संशोधन संबंधी या वर्तमान नियम को परिवर्तित करने संबन्धित कोई सुझाव नहीं होना चाहिए
(4) इसमें भारत की संचित निधि पर भारित व्यय से संबन्धित कोई विषय नहीं होना चाहिए
(5) इसमें किसी न्यायालयीन प्रकरण का उल्लेख नहीं होना चाहिए
(6) इसके द्वारा विशेषाधिकार का कोई प्रश्न नहीं उठाया जा सकता है
(7) जिसके बारे में इसी सत्र में पहले से ही कोई निर्णय लिया जा चुका हो उस पर पुनर्परिचर्चा का कोई विषय नहीं होना चाहिए।

कटौती प्रस्ताव का महत्व इस मायने में है कि इससे अनुदान मांगों पर चर्चा का अवसर मिल जाता है और एक प्रकार के सरकार की कार्यकलापों की जांच हो जाती है। लेकिन चूंकि सरकार बहुमत में होता है तो अक्सर इस प्रकार का प्रस्ताव पास ही नहीं हो पाता है इसीलिए सरकार का इससे कुछ भी बिगड़ता नहीं है।

◼ अनुदान मांगों पर मतदान के लिए कुल 26 दिन निर्धारित किए गए हैं। अंतिम दिन अध्यक्ष सभी शेष मांगों को मतदान के लिए पेश करता है तथा उनका निपटान करता है, भले ही सदस्यों द्वारा उस पर पूरी चर्चा की गई हो या नहीं। इसे गिलोटिन (Guillotine) के नाम से जाता जाता है।

5. विनियोग विधेयक का पारित होना :- संविधान में व्यवस्था की गई है कि भारत की संचित निधि से विधि सम्मत विनियोग (appropriation) के सिवाय धन की निकासी नहीं होगी, तदनुसार भारत की निधि से विनियोग के लिए एक विनियोग विधेयक पुर:स्थापित किया जाता है, ताकि धन को लोकसभा में मत द्वारा दिये गए अनुदान तथा भारत की संचित निधि पर भारित व्यय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्रयुक्त किया जाये।

विनियोग विधेयक की रकम में परिवर्तन करने या अनुदान के लक्ष्य को बदलने अथवा भारत की संचित निधि पर भारित व्यय की रकम में परिवर्तन करने का प्रभाव रखने वाला कोई संशोधन, संसद के किसी सदन में पेश और पारित नहीं किया जा सकता है।

अगर संचित निधि से किसी प्रकार के धन की निकासी की कोई जरूरत आती भी है तो राष्ट्रपति की सहमति के उपरांत ही इस प्रकार कोई अधिनियम बनाया जा सकता है जिससे कि धन निकासी की जा सके।

इसका मतलब आप इस तरह से भी समझ सकते हैं कि, विनियोग विधेयक जब तक लागू नहीं हो जाता तब तक सरकार भारत की संचित निधि से कोई धन निकासी नहीं कर सकती है। इसमें काफी समय लगता है तथा यह प्रक्रिया अप्रैल तक खींच जाता है। लेकिन अगर सरकार को कुछ काम करने के लिए तब तक धन की आवश्यकता हो तो वो क्या करे?

इस स्थिति से निपटने के लिए संविधान द्वारा लोकसभा को यह शक्ति दी गई है कि वह इस प्रकार के आवश्यक कार्यों के लिए विशेष प्रयासों के माध्यम से धन निकासी कर सकती है इसे लेखानुदान (Vote on account) के नाम से जाना जाता है। इसे बजट पर आम बहस के उपरांत पारित किया जाता है। इसमें वित्तीय वर्ष में जितना धन खर्च होने का अनुमान लगाया गया है समान्यतः उसके 1/6 भाग रकम सरकार को 2 महीने तक खर्च करने की स्वीकृति दी जाती है।

6. वित्त विधेयक का पारित होना :- आने वाले वर्ष के लिए सरकार के जितने भी वित्तीय प्रस्ताव होते है उसे एक विधेयक में सम्मिलित किया जाता है। यह विधेयक साधारणतया प्रत्येक वर्ष बजट पेश किए जाने के तुरंत पश्चात लोकसभा में पेश किया जाता है। इस पर धन विधेयक की सभी शर्तें लागू होती है तथा वित्त विधेयक में विनियोग विधेयक के विपरीत संशोधन प्रस्तावित किए जा सकते है।

वित्त विधेयक को 75 दिनों के भीतर प्रभावी हो जाना चाहिए। वित्त अधिनियम बजट के आय पक्ष को विधिक मान्यता प्रदान करता है और बजट को प्रभावी स्वरूप देता है।

कुल मिलाकर यही केन्द्रीय बजट की प्रक्रिया है। आइये अब बजट के कुछ अन्य पहलुओं पर गौर करते हैं……

👉 यहाँ से पढ़ेंवित्त विधेयक और धन विधेयक क्या होता है?

बजट के क्रियान्वयन से संबंधित अन्य संवैधानिक उपबंध

बजट के क्रियान्वयन से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों की व्यवस्था अनुच्छेद 112 से लेकर अनुच्छेद 116 तक मिलती है- जिसकी मुख्य बातें कुछ इस प्रकार है;

1. राष्ट्रपति बजट को हर वित्त वर्ष में संसद के दोनों सदनों में पेश करवाएगा
2. बिना राष्ट्रपति की सिफ़ारिश के कोई अनुदान की मांग नहीं की जाएगी
3. विधि द्वारा पारित विनियोग के अलावा भारत की संचित निधि से कोई धन नहीं निकाला जाएगा
4. बिना राष्ट्रपति के संस्तुति के कर निर्धारण वाला कोई विधेयक संसद में पुर:स्थापित (Introduced) नहीं किया जाएगा,
5. संविधान में संसद के दोनों सदनों की बजट के संबंध में निम्नलिखित प्रावधान किया गया है:- (1) धन विधेयक या वित्त विधेयक को राज्यसभा में पुर:स्थापित नहीं किया जा सकता इसे केवल लोकसभा में पुर:स्थापित किया जा सकता है (2) राज्यसभा को अनुदान मांग पर मतदान की कोई शक्ति प्राप्त नहीं है यह लोकसभा को प्राप्त विशेष सुविधा है (3) राज्यसभा को 14 दिन में धन विधेयक लोकसभा को लौटा देना चाहिए। लोकसभा इस संबंध में राज्यसभा द्वारा की गई सिफ़ारिशों को स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है
6. बजट में व्यय अनुमान को भारत की संचित निधि पर भारित व्यय और भारत की संचित निधि से किए गए व्यय को पृथक-पृथक दिखाना चाहिए,

बजट से संबंधित अन्य अनुदान

बजट जिसमें एक वित्तीय वर्ष हेतु आय और व्यय का सामान्य अनुमान होता है, के अतिरिक्त संसद द्वारा असाधारण या विशेष परिस्थितियों में अनेक अन्य अनुदाने भी दी जाती है। जिसकी चर्चा अनुच्छेद 115 और 116 में की गई है-

अनुपूरक अनुदान (Supplementary grant) :- इसे संसद तब स्वीकृत करता है जब किसी विशिष्ट सेवा के लिए मंजूर की गई राशि उस वर्ष के प्रयोजनों के लिए अपर्याप्त पाई जाए।

अतिरिक्त अनुदान (Additional grant) :- यह तब प्रदान की जाती है, जब उस वर्ष हेतु बजट में किसी नई सेवा के संबंध में व्यय परिकल्पित न किया गया हो और चालू वित्तीय वर्ष के दौरान उसके लिए अतिरिक्त व्यय की आवश्यकता उत्पन्न हो जाए।

अधिक अनुदान (Excess grant) : इस प्रकार की मांग तब रखी जाती है, जब उस वर्ष के बजट में उस सेवा के लिए निर्धारित रकम स ज्यादा रकम खर्च हो जाती है। वित्त वर्ष के उपरांत लोक लेखा समिति से मंजूरी लेने के पश्चात इस पर लोकसभा में मतदान होता है।

प्रत्ययानुदान (vote of credit) :- जब किसी सेवा या मद के लिए आकस्मिक रूप से धन की अत्यधिक एवं तुरंत सहायता आवश्यक हो तो ऐसी स्थिति में इस प्रकार की अनुदान मांग रखी जाती है। यह कहा जा सकता है कि यह लोकसभा द्वारा कार्यपालिका को दिया गया ब्लैंक चेक होता है।

अपवादानुदान (Exception grant) :- इसे विशेष प्रयोजन के लिए मंजूर किया जाता है तथा यह वर्तमान वित्तीय वर्ष या सेवा से संबन्धित नहीं होती है।

बजट में कितने प्रकार के व्यय शामिल होते हैं?

अनुच्छेद 112 के अनुसार, बजट में दो प्रकार के व्यय शामिल होते हैं – (1) भारत की संचित निधि पर भारित व्यय एवं (2) भारत की संचित निधि से किए गए व्यय।

(1) भारत की संचित निधि पर भारित व्यय से आशय ऐसे व्यय से है जिसे अनिवार्य रूप से करना ही होता है, इसीलिए भारित व्ययों पर सदन में चर्चा तो की जा सकती है लेकिन मतदान नहीं(अनुच्छेद 113) । अनुच्छेद 112(3) में बताया गया है कि क्या-क्या संचित निधि पर भारित माना जाएगा, जिसे कि आम नीचे देख सकते हैं- –

(I) राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, राज्यसभा के उपसभापति, की वेतन एवं भत्ते तथा उसके कार्यालय के अन्य व्यय, (II) यूपीएससी के अध्यक्ष, CAG, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन, भत्ते एवं पेंशन (जिसमें इनके कार्यालयों के प्रशासनिक व्यय भी शामिल हैं) (III) उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की पेंशन (वेतन नहीं) (IV) ऐसे ऋण भार, जिनका दायित्व भारत सरकार पर है, जैसे कि ब्याज (Interest), निक्षेप (Deposit), उधार और ऋण सेवा से संबन्धित अन्य व्यय, (V) संसद द्वारा घोषित कोई अन्य व्यय, जिसे भारित माना गया हो

(2) भारत की संचित निधि से किए गए व्यय का आशय ऐसे व्यय से है जो कि बदलता रहता है और जरूरी नहीं होता है कि हर साल उतना ही खर्च हो जितना की पहले हुआ था, जैसे कि किसी योजना से संबन्धित व्यय आदि। इसीलिए सदन में इसपर मतदान होता है । ये लोक सभा पर निर्भर करता है कि उस मांग को अनुमति दे या न दें। अनुच्छेद 114 के तहत, इसे विनियोग विधेयक के रूप में प्रस्तुत किया किया जाता है, जिसके बारे में हमने ऊपर बजट प्रक्रिया में चर्चा की है।

नोट – यहाँ ये जानना आवश्यक है कि संविधान में तीन प्रकार के निधियों की व्यवस्था की गई है (1) संचित निधि (2) लोकलेखा और, (3) आकस्मिकता निधि। यहाँ संचित निधि (Consolidated funds) का मतलब उस निधि से है जिसे कि आमतौर पर राजकोष या खजाना कहा जाता है। [विस्तार से तीनों निधियों को समझने के लिए यहाँ क्लिक करें]

कुछ महत्वपूर्ण तथ्य

बजट कब घोषित की जाती है?

वर्ष 1999 तक, केंद्रीय बजट फरवरी माह के अंतिम कार्य दिवस को शाम 5 बजे घोषित किया जाता था। यह प्रथा अंग्रेजों के जमाने से ही चली आ रही थी। एक और कारण यह था कि 1990 के दशक तक, बजट को बढ़ाने के लिए सभी बजट लगते हैं, शाम को एक प्रस्तुति ने उत्पादकों और कर एकत्र करने वाली एजेंसियों को कीमतों में बदलाव का पता लगाने के लिए रात दी। यह प्रथा प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व कार्यकाल में बदल दी गई। 2001 से इसे सुबह 11 बजे पेश किया जाने लगा। 2016 में फिर से, नरेंद्र मोदी की NDA सरकार ने इस प्रथा को बदल दिया और अब 1 फरवरी को बजट पेश करने की प्रथा की शुरुआत हुई। इसके साथ ही पिछले 92 वर्षों से अलग से पेश होने वाली रेल बजट को भी मुख्य बजट के साथ विलय कर दिया। अब एक ही बजट पेश होता है और वो भी 1 फ़रवरी को।

हलवा समारोह क्या है?

बजट दस्तावेजों की छपाई मोटे तौर पर संसद में पेश करने से एक सप्ताह पहले शुरू होती है, इसी की खुशी में ‘हलवा समारोह’ होता है। ये समारोह इस विश्वास पर आधारित है की महत्वपूर्ण काम करने से पहले कुछ मीठा हो जाये। इस समारोह में बड़ी मात्रा में हलवा तैयार किया जाता है और इसमें शामिल अधिकारियों और सहायक कर्मचारियों को परोसा जाता है। बजट पेश हो जाने तक इन अधिकारियों एवं कर्मचारियों को अलग-थलग रहना पड़ता है ऐसा इसीलिए ताकि बजट की गोपनियता को बनाए रखा जा सके। हलवा वित्त मंत्री द्वारा परोसा जाता है।

हालांकि 2021 का बजट पूरी तरह से पेपरलेस था यानी कि पहले की छपाई की परंपरा को अब ख़त्म करके नई प्रथा की शुरुआत की गई है।

Important Links

भारतीय संसद :संक्षिप्त परिचर्चा
लोकसभा: भूमिका, संरचना, कार्य आदि
राज्यसभा: गठन, संरचना, शक्तियाँ
भारतीय संसद में कानून कैसे बनता है?
संसदीय प्रस्ताव : प्रकार, विशेषताएँ
संसदीय संकल्प
भारतीय संसद में मतदान की प्रक्रिया
संसदीय समूह
Parliamentary committees
संचित निधि, लोक लेखा एवं आकस्मिक निधि ; संक्षिप्त चर्चा
https://www.indiabudget.gov.in/indexhindi.php

⚫⚫⚫⚫

Article Based On,
एम लक्ष्मीकान्त – भारत की राजव्यवस्था↗️
मूल संविधान
हमारी संसद – सुभाष कश्यप
Union budget of India आदि।

डाउनलोड‌‌‌‌ पीडीएफ़‌

पसंद आया तो शेयर कीजिये

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *