Budget in India in Hindi : बजट – प्रक्रिया, क्रियान्वयन

इस लेख में हम भारत में बजट (Budget in India) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे, तो लेख को अंत तक जरूर पढ़ें।

ये लेख संसद (Parliament) वाले सिरीज़ का एक हिस्सा है संसद से जुड़े सारे महत्वपूर्ण लेख आपको यहाँ मिल जाएँगे – ↗️Parliament

भारत में संसदीय बजट
(Parliamentary budget in India
)

बजट यानी कि वित्तीय लेखा-जोखा। आम जीवन में हम इस प्रकार के लेखा-जोखा लगभग रोज ही करते है पर देश की बात करें तो ये सालाना आधार पर होता है, इसीलिए इसे वार्षिक वित्तीय लेखा-जोखा कहा जाता है। संविधान की बात करें तो उसमें बजट को वार्षिक वित्तीय विवरण कहा गया है।

संविधान में बजट शब्द का कहीं उल्लेख नहीं मिलता है, बोलचाल में यहीं इस्तेमाल होने के कारण इसे बजट कहने की परंपरा बन गई है। संविधान में इसका उल्लेख अनुच्छेद 112 में किया जाता है।

बजट में एक वित्तीय वर्ष के दौरान भारत सरकार के अनुमानित प्राप्तियों और खर्च का विवरण होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो बजट में इस आशय का प्रस्ताव होता है कि आगामी वर्ष के दौरान किस मद पर कितना धन खर्च किया जाना है और उसमें से कितना धन किस स्रोत से आएगा।

इसके अलावा राजस्व को आने वाले वित्तीय वर्ष में किस तरह से बढ़ाया जा सकता है तथा आने वाले सालों के लिए आर्थिक एवं वित्तीय विधि, कर व्यवस्था और नई योजनाएं क्या-क्या होंगी; इसके बारे में भी चर्चा होता है। हमारे यहाँ वित्तीय वर्ष 1 अप्रैल से प्रारम्भ होकर 31 मार्च तक होता है।

बजट के क्रियान्वयन के लिए संवैधानिक उपबंध
(Constitutional provisions for implementation of budget in india)

संविधान में बजट के क्रियान्वयन के लिए स्पष्ट व्यवस्था का वर्णन है जैसे कि –
1. राष्ट्रपति बजट को हर वित्त वर्ष में संसद के दोनों सदनों में पेश करवाएगा
2. बिना राष्ट्रपति की सिफ़ारिश के कोई अनुदान की मांग नहीं की जाएगी
3. समेकित विधि निर्मित विनियोग (Consolidated Law of Appropriation) के भारत की संचित निधि से कोई धन नहीं निकाला जाएगा, इसका क्या मतलब होता है ये आगे समझाया गया है,
4. बिना राष्ट्रपति के संस्तुति के कर निर्धारण वाला कोई विधेयक संसद में पुर:स्थापित (Introduced) नहीं किया जाएगा,
5. विधि द्वारा प्राधिकृत कर (Tax) के सिवाय अन्य किसी कर की उगाही (Collection) नहीं किया जाएगा
6. संविधान में संसद के दोनों सदनों की बजट के संबंध में निम्नलिखित प्रावधान किया गया है:- (1) धन विधेयक या वित्त विधेयक को राज्यसभा में पुर:स्थापित नहीं किया जा सकता इसे केवल लोकसभा में पुर:स्थापित किया जा सकता है (2) राज्यसभा को अनुदान मांग पर मतदान की कोई शक्ति प्राप्त नहीं है यह लोकसभा को प्राप्त विशेष सुविधा है (3) राज्यसभा को 14 दिन में धन विधेयक लोकसभा को लौटा देना चाहिए। लोकसभा इस संबंध में राज्यसभा द्वारा की गई सिफ़ारिशों को स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है
7. बजट में व्यय अनुमान को भारत की संचित निधि पर भारित व्यय और भारत की संचित निधि से किए गए व्यय को पृथक-पृथक दिखाना चाहिए,
8. भारत की संचित निधि पर चार्ज किया गया खर्च संसद में मत के लिए प्रस्तुत नहीं किया जाएगा, हालांकि इस पर संसद में चर्चा हो सकती है।

निधियाँ (Funds)

संविधान में तीन प्रकार के निधियों का उल्लेख किया गया है :- 1. भारत की संचित निधि 2. भारत का लोकलेखा 3. भारत की आकस्मिकता निधि

भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) – इसकी चर्चा अनुच्छेद 266 में की गई है। भारत सरकार का ये एक ऐसा खजाना है जिसमें से भारत सरकार जो भी पैसा निकालता है उसे एक उधारी की तरह समझा जाता है जिसे भारत सरकार को वापस उसमें जमा करवाना पड़ता है। इस निधि में से किसी भी धन को संसदीय विधि के सिवाय विनियोजित (जारी या निकाली) नहीं किया जा सकता।

भारत का लोक लेखा (Public account of india) – इसकी भी चर्चा अनुच्छेद 266 में ही की गई है। संचित निधि से कुछ खास मदों में ही पैसे प्राप्त किए जा सकते हैं, तो उसके अलावा अन्य खर्चों के लिए भारत सरकार लोक लेखा से पैसे लेती है। इसे कार्यकारी प्रक्रिया से संचालित किया जाता है यानी कि इस खाते से भुगतान संसदीय विनियोजन के बिना किया जा सकता है।

भारत की आकस्मिकता निधि (Contingency fund of india) – इसकी चर्चा अनुच्छेद 267 में की गई है। ये निधि राष्ट्रपति के अधिकार में रहती है और वह किसी अप्रत्याशित व्यय के लिए इसमें से खर्च कर सकता है। लोकलेखा की तरह इसे भी कार्यकारी प्रक्रिया से संचालित किया जाता है।

भारित व्यय (Weighted expenditure)

बजट में दो प्रकार के व्यय शामिल होते हैं – भारत की संचित निधि पर भारित व्यय एवं भारत की संचित निधि से किए गए व्यय। भारित व्ययों के संबंध में सदन में मतदान नहीं होता है, अर्थात इस पर केवल चर्चा होती है जबकि अन्य प्रकार पर मतदान कराया जाता है। भारित व्ययों की सूची निम्नानुसार है:

1. राष्ट्रपति की परिलब्धियाँ एवं भत्ते तथा उसके कार्यालय के अन्य व्यय
2. उपराष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, राज्यसभा के उपसभापति लोकसभा के उपाध्यक्ष के वेतन एवं भत्ते
3. उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन, भत्ते एवं पेंशन
4. उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की पेंशन
5. भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के वेतन, भत्ते एवं पेंशन
6. संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों के वेतन, भत्ते एवं पेंशन
7. उच्चतम न्यायालय, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के कार्यालय एवं स्नाघ लोक सेवा आयोग के कार्यालय के प्रशासनिक व्यय, जिनमें इन कार्यालयों में कार्यरत कर्मियों के वेतन, भत्ते एवं पेंशन भी शामिल होते हैं
8. ऐसे ऋण भार, जिनका दायित्व भारत सरकार पर है, जिनके अंतर्गत ब्याज, निक्षेप, निधि भार और मोचन भार तथा उधार लेने और ऋण सेवा और ऋण मोचन से संबन्धित अन्य व्यय हैं,
9. किसी न्यायालय या माध्यस्थम अधिकरण के निर्णय, डिक्री या पंगर की तुष्टि के लिए अपेक्षित राशियाँ 10. संसद द्वारा विहित कोई अन्य व्यय

बजट की पूरी प्रक्रिया
(Whole Process of Budget in India)

संसद में बजट निम्नलिखित 6 स्तरों से गुजरता है तब जाकर बजट की पूरी प्रक्रिया खत्म होती है।
1. बजट का प्रस्तुतीकरण (Presentation of budget in india)
2. आम बहस (General debate)
3. विभागीय समितियों द्वारा जांच (Investigation by departmental committees)
4. अनुदान की मांग पर मतदान (Voting on demand for grant)
5. विनियोग विधेयक का पारित होना (Passing of Appropriation Bill)
6. वित्त विधेयक का पारित होना (Passing of Finance Bill)।

1. बजट का प्रस्तुतीकरण – बजट को प्रस्तुत करने का काम वित्त मंत्री सदन में करते हैं उस दौरान जो वे भाषण देते हैं, उसे बजट भाषण कहा जाता हैं। जब भाषण खत्म हो जाता है तब बजट को सदन के समक्ष रखा जाता है। इसके बाद राज्यसभा मे इसे पेश किया जाता है। उस बजट में सरकार द्वारा जितनी अनुदान की मांग की गई है राज्यसभा को उन अनुदान मांगों पर कटौती का कोई अधिकार नहीं होता है।

2. आम बहस – बजट को प्रस्तुत करने के कुछ दिन बाद तक उस बजट पर आम बहस चलती रहती है। दोनों सदन इस पर तीन से चार दिन बहस करते हैं। इस पर बहस के दौरान कई प्रश्न भी उठाये जाते हैं बहस के अंत में वित्त मंत्री को अधिकार होता है कि वह इसका जवाब दे।

3. विभागीय समितियों द्वारा जांच – बजट पर आम बहस पूरी होने के बाद सदन तीन या चार हफ्तों के लिए स्थगित हो जाता है। इस अंतराल के दौरान संसद कि स्थायी समितियां (Standing committees) अनुदान की मांग आदि की विस्तार से जांच-पड़ताल करती है और एक रिपोर्ट तैयार करती है। बाद में इस रिपोर्ट को दोनों सदनों में विचारार्थ रखा जाता है। संसद का वित्तीय नियंत्रण मंत्रालयों पर स्थापित हो सके इसीलिए स्थायी समिति की व्यवस्था को 1993 में शुरू किया गया था।

4. अनुदान की मांगों पर मतदान – विभागीय स्थायी समितियों के रिपोर्ट पर विचार किए जाने के बाद लोकसभा में अनुदान की मांगों के लिए मतदान होता है। मांगे मंत्रालयवार प्रस्तुत की जाती है और उस पर पूर्ण मतदान होता है ऐसा होने के बाद वो मांगे अनुदान बन जाती है।

यहाँ पर ये याद रखिए की – अनुदान के लिए मतदान लोकसभा की विशेष शक्ति है, जो कि राज्यसभा के पास नहीं है। राज्यसभा को मतदान का अधिकार बजट के मताधिकार वाले हिस्से पर ही होता है तथा इसमें भारत की संचित निधि पर भारित व्यय शामिल नहीं होते हैं।

आमतौर पर 140 के आस-पास मांगे होती है, प्रत्येक मांग पर लोकसभा में अलग से मतदान होता है। इस दौरान संसद इस पर बहस करते है और अगर सदस्य चाहे तो अनुदान मांगों पर कटौती के लिए प्रस्ताव भी ला सकते हैं। इस प्रकर के प्रस्ताव को कटौती प्रस्ताव कहा जाता है, जिनके तीन प्रकार होते हैं :-

(1). नीति कटौती प्रस्ताव (Policy deduction proposal) :- यह मांग की नीति (Policy) के प्रति असहमति को व्यक्त करता है। इस प्रस्ताव में मांग कि राशि 1 रुपए कर देने के लिए कहा जाता है। इसका सीधा सा मतलब होता है कि हम आपके मांग नीति का अनुमोदन (Approval) नहीं करते है। अगर सदस्य चाहे तो कोई वैकल्पिक नीति भी पेश कर सकता है।

(2). आर्थिक कटौती प्रस्ताव (Economic deduction proposal) :- इसे मितव्ययता कटौती प्रस्ताव भी कहा जाता है। जहां ऊपर वाला प्रस्ताव नीति से संबन्धित था वहीं ये प्रस्ताव मांग की राशि को कम करने से संबन्धित है। इसमें इस बात का उल्लेख होता ही कि प्रस्तावित व्यय से अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ सकता है इसीलिए मांग की राशि को एक निश्चित सीमा तक कम किया जाये। ये निश्चित सीमा कितना होगा ये प्रस्ताव लाने वाले डिसाइड करते हैं।

(3). सांकेतिक कटौती प्रस्ताव (Token reduction proposal) :- यह प्रस्ताव भारत सरकार के किसी दायित्व से संबन्धित होता है। इसमें कहा जाता है कि मांग में 100 रुपए की कमी की जाय। प्रस्ताव लाने वाले इसकी मदद से सरकार के प्रति अपनी विशिष्ट शिकायत को व्यक्त करता है।

एक कटौती प्रस्ताव की स्वीकृति के लिए जरूरी है कि उसमें निम्नलिखित विशेषताएँ हो – (1) यह केवल एक प्रकार की मांग से संबन्धित होना चाहिए वो भी केवल एक मामले से ही संबन्धित होनी चाहिए (2) इसका स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए तथा इसमें किसी प्रकार की अनावश्यक बातें नहीं होनी चाहिए जैसे कि इसमें संघ सरकार के कार्य क्षेत्र के बाहर के किसी विषय का उल्लेख नहीं होना चाहिए (3) इसमें संशोधन संबंधी या वर्तमान नियम को परिवर्तित करने संबन्धित कोई सुझाव नहीं होना चाहिए (4) इसमें भारत की संचित निधि पर भारित व्यय से संबन्धित कोई विषय नहीं होना चाहिए (5) इसमें किसी न्यायालयीन प्रकरण का उल्लेख नहीं होना चाहिए (6) इसके द्वारा विशेषाधिकार का कोई प्रश्न नहीं उठाया जा सकता है (7) जिसके बारे में इसी सत्र में पहले से ही कोई निर्णय लिया जा चुका हो उस पर पुनर्परिचर्चा का कोई विषय नहीं होना चाहिए।

कटौती प्रस्ताव का महत्व इस मायने में है कि इससे अनुदान मांगों पर चर्चा का अवसर मिल जाता है और एक प्रकार के सरकार की कार्यकलापों की जांच हो जाती है। लेकिन चूंकि सरकार बहुमत में होता है तो अक्सर इस प्रकार का प्रस्ताव पास ही नहीं हो पाता है इसीलिए सरकार का इससे कुछ भी बिगड़ता नहीं है।

◼ अनुदान मांगों पर मतदान के लिए कुल 26 दिन निर्धारित किए गए हैं। अंतिम दिन अध्यक्ष सभी शेष मांगों को मतदान के लिए पेश करता है तथा उनका निपटान करता है, भले ही सदस्यों द्वारा उस पर पूरी चर्चा की गई हो या नहीं। इसे गिलोटिन (Guillotine) के नाम से जाता जाता है।

5. विनियोग विधेयक का पारित होना :- संविधान में व्यवस्था की गई है कि भारत की संचित निधि से विधि सम्मत विनियोग (appropriation) के सिवाय धन की निकासी नहीं होगी, तदनुसार भारत की निधि से विनियोग के लिए एक विनियोग विधेयक पुर:स्थापित किया जाता है, ताकि धन को लोकसभा में मत द्वारा दिये गए अनुदान तथा भारत की संचित निधि पर भारित व्यय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्रयुक्त किया जाये।

विनियोग विधेयक की रकम में परिवर्तन करने या अनुदान के लक्ष्य को बदलने अथवा भारत की संचित निधि पर भारित व्यय की रकम में परिवर्तन करने का प्रभाव रखने वाला कोई संशोधन, संसद के किसी सदन में पेश और पारित नहीं किया जा सकता है।

अगर संचित निधि से किसी प्रकार के धन की निकासी की कोई जरूरत आती भी है तो राष्ट्रपति की सहमति के उपरांत ही इस प्रकार कोई अधिनियम बनाया जा सकता है जिससे कि धन निकासी की जा सके।

इसका मतलब आप इस तरह से भी समझ सकते हैं कि, विनियोग विधेयक जब तक लागू नहीं हो जाता तब तक सरकार भारत की संचित निधि से कोई धन निकासी नहीं कर सकती है। इसमें काफी समय लगता है तथा यह प्रक्रिया अप्रैल तक खींच जाता है। लेकिन अगर सरकार को कुछ काम करने के लिए तब तक धन की आवश्यकता हो तो वो क्या करे?

इस स्थिति से निपटने के लिए संविधान द्वारा लोकसभा को यह शक्ति दी गई है कि वह इस प्रकार के आवश्यक कार्यों के लिए विशेष प्रयासों के माध्यम से धन निकासी कर सकती है इसे लेखानुदान (Vote on account) के नाम से जाना जाता है। इसे बजट पर आम बहस के उपरांत पारित किया जाता है। इसमें वित्तीय वर्ष में जितना धन खर्च होने का अनुमान लगाया गया है समान्यतः उसके 1/6 भाग रकम सरकार को 2 महीने तक खर्च करने की स्वीकृति दी जाती है।

6. वित्त विधेयक का पारित होना :- आने वाले वर्ष के लिए सरकार के जितने भी वित्तीय प्रस्ताव होते है उसे एक विधेयक में सम्मिलित किया जाता है। यह विधेयक साधारणतया प्रत्येक वर्ष बजट पेश किए जाने के तुरंत पश्चात लोकसभा में पेश किया जाता है। इस पर धन विधेयक की सभी शर्तें लागू होती है तथा वित्त विधेयक में विनियोग विधेयक के विपरीत संशोधन प्रस्तावित किए जा सकते है।

वित्त विधेयक को 75 दिनों के भीतर प्रभावी हो जाना चाहिए। वित्त अधिनियम बजट के आय पक्ष को विधिक मान्यता प्रदान करता है और बजट को प्रभावी स्वरूप देता है।

👉 यहाँ से पढ़ें↗️वित्त विधेयक और धन विधेयक क्या होता है?

बजट से संबंधित अन्य अनुदान
(Other grants, related to budget in india)

बजट जिसमें एक वित्तीय वर्ष हेतु आय और व्यय का सामान्य अनुमान होता है, के अतिरिक्त संसद द्वारा असाधारण या विशेष परिस्थितियों में अनेक अन्य अनुदाने भी दी जाती है।

अनुपूरक अनुदान (Supplementary grant) :- इसे संसद तब स्वीकृत करता है जब किसी विशिष्ट सेवा के लिए मंजूर की गई राशि उस वर्ष के प्रयोजनों के लिए अपर्याप्त पाई जाए।

अतिरिक्त अनुदान (Additional grant) :- यह तब प्रदान की जाती है, जब उस वर्ष हेतु बजट में किसी नई सेवा के संबंध में व्यय परिकल्पित न किया गया हो और चालू वित्तीय वर्ष के दौरान उसके लिए अतिरिक्त व्यय की आवश्यकता उत्पन्न हो जाए।

अधिक अनुदान (Excess grant) : इस प्रकार की मांग तब रखी जाती है, जब उस वर्ष के बजट में उस सेवा के लिए निर्धारित रकम स ज्यादा रकम खर्च हो जाती है। वित्त वर्ष के उपरांत लोक लेखा समिति से मंजूरी लेने के पश्चात इस पर लोकसभा में मतदान होता है।

प्रत्ययानुदान (vote of credit) :- जब किसी सेवा या मद के लिए आकस्मिक रूप से धन की अत्यधिक एवं तुरंत सहायता आवश्यक हो तो ऐसी स्थिति में इस प्रकर की अनुदान मांग रखी जाती है। यह कहा जा सकता है कि यह लोकसभा द्वारा कार्यपालिका को दिया गया ब्लैंक चेक होता है।

अपवादानुदान (Exception grant) :- इसे विशेष प्रयोजन के लिए मंजूर किया जाता है तथा यह वर्तमान वित्तीय वर्ष या सेवा से संबन्धित नहीं होती है।

तो इस प्रकार होता है भारत में बजट (Budget in india) का पूरा क्रियान्वयन, उम्मीद है आपको समझ में आया होगा।

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