राष्ट्रपति शासन : क्यों, क्या, कब और कैसे बोम्मई मामला सहित

इस लेख में हम राष्ट्रपति शासन और बोम्मई मामला (President’s Rule and Bommai Case) पर सरल एवं सहज चर्चा करेंगे, एवं इसके विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं को समझेंगे,

तो अच्छी तरह से समझने के लिए इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें साथ ही इससे संबंधित अन्य लेखों को भी पढ़ें।

दवा खा लो नहीं तो डॉक्टर आ के सुई लगा देंगे, और बच्चा समयानुसार अपना दवा खाने लगता है। राष्ट्रपति शासन उस डॉक्टर की तरह ही है जो अंत में आकर सुई लगाता है और फिर सबकुछ ठीक हो जाता है।

राष्ट्रपति शासन

भारत के आपातकालीन प्रावधान

आपातकाल (Emergency) का आशय ऐसी घटना से है जिसमें तुरंत कार्रवाई की जरूरत हो। ऐसी स्थिति कभी भी आ सकती है और ये व्यक्तिगत भी हो सकता है और राष्ट्रीय भी, इसीलिए भारत के संविधान में आपातकालीन प्रावधानों (Emergency provisions) की व्यवस्था की गई है। ये प्रावधान संविधान के भाग 18 में अनुच्छेद 352 से 360 तक उल्लिखित हैं।

आपातकाल लगाने के लिए जरूरी परिस्थितियाँ

संविधान के भाग 18 में ऐसी तीन परिस्थितियों का जिक्र किया गया है। जिसके रहने पर आपातकाल लगाया जा सकता है। ये तीनों अलग-अलग अनुच्छेदों में वर्णित है। जैसे कि –

1. अनुच्छेद 352 – इसके तहत युद्ध, बाह्य आक्रमण और सशस्त्र विद्रोह के दौरान आपातकाल लगाया जा सकता है। इस प्रकार के आपातकाल को राष्ट्रीय आपातकाल (National emergency) कहा जाता है।

2. अनुच्छेद 356 – जब राज्यों में संवैधानिक तंत्र विफल हो जाये, तब भी आपातकाल लगाया जा सकता है। इस प्रकार के आपातकाल को राष्ट्रपति शासन कहा जाता है। इसे राज्य आपातकाल और संवैधानिक आपातकाल भी कह दिया जाता है। हालांकि संविधान में सिर्फ ‘राष्ट्रपति शासन’ शब्द का जिक्र किया गया है।

3. अनुच्छेद 360 – जब भारत की वित्तीय स्थायित्व अथवा साख खतरे में हो तो उस समय भी आपातकाल लगाया जा सकता है। इस प्रकार के आपातकाल को वित्तीय आपातकाल कहा जाता है।

वित्तीय आपातकाल (Financial emergency) आजतक देश में लगा ही नहीं इसीलिए उसके व्यावहारिक पहलुओं पर बहुत ही कम जानकारी उपलब्ध होती है।

राष्ट्रीय आपातकाल (National emergency)↗️ और राष्ट्रपति शासन (President’s Rule) बहुत ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि इन दोनों के व्यावहारिकता का हमें अंदाजा भी है और इसके लगने की संभावना भी अपेक्षाकृत ज्यादा होती है। राष्ट्रीय आपातकाल पर पहले ही विस्तृत चर्चा की जा चुकी है। इस लेख में हम अनुच्छेद 356 के तहत लगने वाले राष्ट्रपति शासन को समझेंगे।

राष्ट्रीय आपातकाल की तरह राष्ट्रपति शासन (President’s Rule) भी दागों से मुक्त नहीं है। राष्ट्रीय आपातकाल तो चलो 3 बार ही लगा है लेकिन राष्ट्रपति शासन तो 100 से भी अधिक बार लग चुका है।

कई बार तो कोई पार्टी अपनी खुन्नस निकालने के लिए किसी विपक्षी पार्टी के राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया करते थे। इसी तरह के निजी हित या पार्टी हित में इसे इस्तेमाल किए जाने के कारण ये भी राष्ट्रीय आपातकाल की ही तरह काफी विवादास्पद प्रावधान बन गया था। हालांकि बोम्मई मामले ने काफी हद तक इस समस्या को खत्म कर दिया।

राष्ट्रपति शासन (President’s Rule)

हमारा देश संवैधानिक सर्वोच्चता (Constitutional supremacy) वाला देश है। ऐसे में संविधान ठीक से चलता रहे और संविधान के अनुसार सबकुछ ठीक से चलता रहें, इसकी जिम्मेवारी राष्ट्रपति पर होती है।

राष्ट्रपति बकायदे संविधान को बचाने की शपथ भी लेते हैं। इसलिए जब जरूरत पड़ती है तो वे बचाते भी है। राष्ट्रपति शासन भी उसी संवैधानिक व्यवस्था को बनाये रखने का एक तरीका है।

इसका उल्लेख अनुच्छेद 355 और अनुच्छेद 356 में किया गया है। अनुच्छेद 355 में कहा गया है कि केंद्र सरकार का ये कर्तव्य है कि प्रत्येक राज्य संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप कार्य करें।

अगर कोई राज्य संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप कार्य न करें या फिर किसी भी वजह से राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो जाये तो, अनुच्छेद 356 के तहत केंद्र उस राज्य को अपने नियंत्रण में ले सकता है। यानी कि राष्ट्रपति शासन (President’s Rule) लगाया जा सकता है।

चूंकि इसे संवैधानिक तंत्र विफल हो जाने पर लगाया जाता है, इसीलिए इसे संवैधानिक आपातकाल (Constitutional emergency) भी कहा जाता है। इसी तरह किसी राज्य में लगाये जाने के कारण इसे राज्य आपातकाल (State emergency) भी कह दिया जाता है।

राष्ट्रपति शासन क्यों लगाया जाता है?

जैसा कि अभी हमने ऊपर पढ़ा, अनुच्छेद 355 के तहत ये सुनिश्चित करना केंद्र का कर्तव्य है कि राज्य संवैधानिक उपबंधों के अनुसार काम करता रहे।

अनुच्छेद 356 (1) के अनुसार, राष्ट्रपति को उस राज्य के राज्यपाल द्वारा रिपोर्ट मिलने पर या फिर राष्ट्रपति अगर खुद ही आश्वस्त हो जाये कि उस राज्य का शासन संविधान के अनुसार नहीं चलाया जा रहा है तो ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति उद्घोषणा द्वारा राष्ट्रपति शासन (President’s Rule) लगा सकता है।

राष्ट्रपति शासन लगाने का दूसरा आधार अनुच्छेद 365 में मिलता है। जो कहता है कि यदि कोई राज्य केंद्र द्वारा दिये गये निर्देशों का पालन करने में या फिर उसे प्रभावी करने में असफल होता है, तो इस स्थिति में भी राष्ट्रपति शासन (President’s Rule) लगाया जा सकता है।

Q. राष्ट्रपति को ये कैसे पता चलता है कि किसी राज्य का संवैधानिक तंत्र विफल हो गया है या केंद्र द्वारा निर्धारित निर्देशों का पालन करने में कोई राज्य असफल रहा है?

राज्यों में राज्यपाल इसी के लिए तो होता है, जिस तरह राष्ट्रपति संविधान को बचाने की शपथ लेता है, राज्यपाल भी लेता है इसीलिए ऐसी स्थिति आने पर वे राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेजते हैं, उस आधार पर राष्ट्रपति चाहे तो राष्ट्रपति शासन लगा सकता है।

हालांकि राष्ट्रपति अपने विवेक से भी फैसला ले सकता है अगर उसे लगता है कि किसी राज्य में संवैधानिक स्थिति खतरे में हैं।

राष्ट्रपति शासन लगने से होता क्या है?

अनुच्छेद 356(1) के तहत राष्ट्रपति शासन लगने के साथ ही राष्ट्रपति को निम्नलिखित असाधारण शक्तियाँ प्राप्त हो जाती है, जो कि अनुच्छेद 356(1) क, ख, और ग में वर्णित है:

(क) वह राज्य सरकार के सारे काम अपने हाथ में ले लेती हैं यहाँ तक कि राज्यपाल और अन्य जितने भी कार्यकारी अधिकारी हैं, उनकी शक्तियाँ भी राष्ट्रपति को प्राप्त हो जाती हैं।

(ख) राष्ट्रपति यह घोषणा कर सकती है कि संसद, राज्य विधायिका की शक्तियों का प्रयोग करेंगी। दूसरे शब्दों में कहें तो राज्य के विषयों पर संसद कानून बना सकती है।

(ग) वह वे सभी कदम उठा सकता है, जिसमें राज्य के किसी भी निकाय या प्राधिकरण से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों को निलंबन करना शामिल है। दूसरे शब्दों में कहें तो राष्ट्रपति जो भी चाहे कार्यकारी आदेश जारी कर सकता है और साथ ही किसी संवैधानिक प्रावधानों को निलंबित भी कर सकता है।

राज्य का प्रशासन कैसे चलता है?

किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू होने की स्थिति में राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद को भंग (dissolution) कर देता है या फिर निलंबित (suspend)।

तब राज्य का राज्यपाल, राष्ट्रपति के नाम पर राज्य सचिव की सहायता से राज्य का प्रशासन चलाता है। हालांकि राष्ट्रपति चाहे तो राज्यपाल को सलाह देने के लिए एक सलाहकार की भी नियुक्ति कर सकता है।

चूंकि राज्य सूची पर कानून बनाने का अधिकार संसद को मिल जाता है इसीलिए राज्य के विधेयक और बजट संसद ही पारित करती है।

राष्ट्रपति शासन के कुछ तथ्य (Some facts of President’s rule)

अनुच्छेद 357 के तहत अनुच्छेद 356 के अधीन की गई उद्घोषणा के अधीन विधायी शक्तियों के प्रयोग से संबन्धित है। इसके तहत, जब कोई राज्य विधानसभा इस तरह से राष्ट्रपति शासन के कारण विघटित हो या निलंबित हो, तो;

(क) संसद राज्य विधान-मंडल के लिए विधि बनाने की शक्ति राष्ट्रपति अथवा उनके द्वारा उल्लिखित किसी अधिकारी को दे सकती है।

(ख) संसद या किसी प्रतिनिधि मंडल के मामले में, राष्ट्रपति या अन्य कोई प्राधिकारी, केंद्र अथवा इसके अधिकारियों व प्राधिकरण पर शक्तियों पर विचार करने और कर्तव्यों के निर्वहन के लिए विधि बना सकते हैं।

(ग) जब लोकसभा का सत्र नहीं चल रहा हो तो राष्ट्रपति, संसद की अनुमति के लिए लंबित पड़े राज्य की संचित निधि के प्रयोग की प्राधिकृत कर सकता है।

– जब संसद का सत्रावसान हो तो राष्ट्रपति, राज्य के लिए अध्यादेश (Ordinance) जारी कर सकता है।

राष्ट्रपति अथवा संसद अथवा अन्य किसी विशेष प्राधिकारी द्वारा बनाया गया कानून, उस राज्य में राष्ट्रपति शासन खत्म होने के पश्चात भी प्रभाव में रहेगा। परंतु इसे राज्य विधायिका द्वारा वापस अथवा परिवर्तित किया जा सकता है।

– यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि राष्ट्रपति को उस राज्य के उच्च न्यायालय की शक्तियाँ प्राप्त नहीं होती हैं। यानी कि राष्ट्रपति शासन लगने के बावजूद भी उच्च न्यायालय की स्थिति, शक्तियाँ एवं कार्य पहले की तरह की होता है, उसमें राष्ट्रपति कोई बदलाव नहीं कर सकता।

संसदीय अनुमोदन तथा समयावधि

संसदीय अनुमोदन और समयावधि से संबन्धित प्रावधान अनुच्छेद 356 का ही हिस्सा हैं। इसे इस अनुच्छेद के क्लॉज़ 3, 4 एवं 5 में वर्णित किया गया है।

दरअसल ये राष्ट्रपति शासन लगाने की बाद की प्रक्रिया है। हम ये तो समझ गये है कि घोषणा किस आधार पर किया जा सकता है। अब आइये देखते हैं उसके बाद क्या सब करना पड़ता है।

राष्ट्रीय आपातकाल की तरह राष्ट्रपति शासन को भी संसद से अनुमोदन की आवश्यकता पड़ती है। पर बस कुछ अंतर है, और वो इस कुछ इस प्रकार है;

राष्ट्रपति शासन के घोषणा होने के दो माह के भीतर संसद के दोनों सदनों से इसका अनुमोदन (Approval) करवाना पड़ता है।

अगर राष्ट्रपति शासन तब जारी होता है जब लोकसभा का विघटन हो गया हो, या फिर लोकसभा हो लेकिन दो महीने के अंदर अनुमोदन करने से पहले ही विघटित हो जाये तो, ऐसी स्थिति में जब फिर से लोकसभा का गठन होगा उसके पहली बैठक से तीस दिन तक वो घोषणा बना रहेगा। लेकिन उससे पहले राज्यसभा से वो अनुमोदित होना चाहिए, क्योंकि राज्य सभा कभी भंग नहीं होता है।

इस तरह यदि दोनों सदनों से ये अनुमोदित (Approved) हो जाये तो यह छह महीने तक जारी रह सकता है।

इसे अधिकतम 3 साल तक के लिए बढ़ाया जा सकता है लेकिन हर छह महीने में संसद की स्वीकृति जरूरी है।

यहाँ पर एक बात याद रखिए कि 3 साल तो बढ़ाया जा सकता है लेकिन 44वें संविधान संशोधन 1978 के द्वारा इस पर दो प्रतिबंध लगा दिया गया है।

यानी कि एक साल तक तो राष्ट्रपति शासन आराम से चल सकता है लेकिन अगर एक साल के बाद इसे फिर से छह महीने बढ़ाना हो तो, दो स्थितियों में ही बढ़ायी जा सकती है।

पहली कंडिशन ये है कि यदि पूरे भारत में अथवा पूरे राज्य या उसके किसी भाग में राष्ट्रीय आपात की घोषणा की गई हो, तथा,

दूसरा ये कि, चुनाव आयोग यह प्रमाणित करें कि संबन्धित राज्य में विधानसभा के चुनाव के लिए कठिनाइयाँ उपस्थित हैं।

लेकिन क्या हो अगर छह महीने इसे और बढ़ाना हो लेकिन उस अवधि में लोकसभा ही भंग हो जाये।

ऐसी स्थिति में फिर से जब लोकसभा का गठन होगा, उसकी पहली बैठक से 30 दिनों तक वो प्रस्ताव लागू रहेगा।

अगर उसे फिर से बढ़ाना है तो इसी अवधि में फिर से उसे अनुमोदित करना होगा। लेकिन याद रहे कि इससे पहले राज्यसभा से वो अनुमोदित हो चुका होना चाहिए। क्योंकि राज्यसभा कभी विघटित (dissolved) नहीं होता है।

जहां राष्ट्रीय आपातकाल को विशेष बहुमत की जरूरत पड़ती है। वहीं राष्ट्रपति शासन (President’s Rule) को संसद में सामान्य बहुमत से पारित किया जा सकता है। [यहाँ से पढ़ें – विभिन्न प्रकार के बहुमत↗️ ]

राष्ट्रपति शासन के घोषणा की समाप्ति

राष्ट्रपति शासन को समाप्त करना बहुत ही आसान है। इसमें कोई संसद के अनुमोदन की जरूरत नहीं पड़ती है। बस राष्ट्रपति को ये घोषणा करना पड़ता है कि अब राष्ट्रपति शासन समाप्त हो गया। और घोषणा के साथ ही वो समाप्त हो जाता है।

राष्ट्रपति शासन और अनुच्छेद 356 का प्रयोग

डॉ. बी आर अंबेडकर ने संविधान सभा में अनुच्छेद 356 के बारे में कहा था कि यह एक मृत-पत्र (Dead letter) की भांति ही रहेगी। हालांकि उनके उम्मीदों पर पानी फिर गया क्योंकि राष्ट्रपति शासन का इस्तेमाल इतनी बार और ऐसी-ऐसी स्थितियों में हुआ है कि धीरे-धीरे ये विवादास्पद और व्यक्तिगत या राजनैतिक हित साधने का एक टूल बन गया।

सबसे पहले 1951 में पंजाब में इसे लगाया गया था और तब से लेकर अब तक इसे 100 बार से अधिक लगाया जा चुका है। ज़्यादातर मामलों में इसे राजनैतिक स्वार्थ सिद्धि के लिए ही लगाया गया है और ऐसा कहने का कारण भी है। दरअसल इन्दिरा गांधी द्वारा लगाया गया राष्ट्रीय आपातकाल जब 1977 में खत्म हुआ और मोरार जी देशाई की सरकार बनी तो, इस सरकार ने काँग्रेस शासित 9 राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया और वो भी बिना किसी ठोस वजह के।

इसी तरह जब 1980 में जब काँग्रेस सत्ता में फिर से आयी तो उसने भी गैर-कॉंग्रेसी राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगा दी और अपना बदला ले लिया।

यही नहीं 1992 में फिर से काँग्रेस सरकार ने 3 बीजेपी शासित राज्यों में (मध्य-प्रदेश, हिमाचल व राजस्थान), में इस आधार पर राष्ट्रपति शासन लगा दिया कि, राज्य सरकार केंद्र द्वारा धार्मिक संगठनों पर लगाए गए प्रतिबंधों का अनुपालन करने में असमर्थ हो रहे हैं। दरअसल उस समय राम मंदिर वाला विवाद शुरू हो चुका था और RSS को प्रतिबंधित कर दिया गया था और केंद्र का मानना था कि इन बीजेपी शासित राज्यों ने RSS को अपने राज्य में शह दी है।

ऐसे में सवाल ये आता है कि क्या ये इसी तरह से मनमानी पूर्वक लगाया जा सकता था, क्या न्यायालय इसपर कुछ नहीं करता था?

ऐसी बात नहीं थी, हालांकि 38वें संविधान संशोधन 1975 के माध्यम से इन्दिरा गांधी ने राष्ट्रीय आपातकाल के साथ-साथ राष्ट्रपति शासन के मामले में भी न्यायालय में चुनौती देने के प्रावधान को खत्म कर दिया था।

लेकिन 1978 के 44वें संविधान संशोधन से मोरारजी देशाई की सरकार ने इस प्रावधान को हटा दिया गया था। यानी कि न्यायालय द्वारा राष्ट्रपति शासन न्यायिक समीक्षा तो की जा सकती थी। पर ऐसा होता नहीं था।

लगभग 14 वर्षों तक मनमाने तरीके से राष्ट्रपति शासन लगाने का काम चलता रहा। 1994 में जाकर बोम्मई मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इसपर सुनवाई की और राष्ट्रपति शासन को थोड़ा उत्तरदायी और तर्कपूर्ण बनाया।

बोम्मई बनाम भारत संघ 1994

राष्ट्रीय आपातकाल की तरह राष्ट्रपति शासन भी दागमुक्त नहीं है। इस पर भी कई सारे दाग लगे हैं, कुछ तो बड़े ही बेतुके थे।

वैसे तो ये तब से ही विवादास्पद रहा है जब पहली बार राष्ट्रपति शासन लगाया गया था। पर हद तो तब हो गयी जब 1978 में मोरारजी देशाई की सरकार ने नौ कॉंग्रेस शासित राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगा दी। इसी के जवाबी कारवाई में 1980 में कॉंग्रेस सरकार ने 9 गैर-कॉंग्रेसी राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगा दी। इतना भी रहता तो ठीक था।

1988 में कर्नाटक के विधानसभा के चुनाव के बाद जनता पार्टी और लोक दल ने मिलकर जनता दल बनाया और उसके नेता चुने गये एस आर बोम्मई। वे मुख्यमंत्री बन गये। सितंबर 1988 में 13 नये सदस्यों के साथ मंत्रिमंडल का विस्तार किया।

लेकिन कुछ दिन बाद ही एक विधायक ने राज्यपाल पी वैंकटसुबैया को 1 पत्र सौंपा साथ ही 19 अन्य विधायकों का भी उसके हस्ताक्षर वाला पत्र सौंपा, उस पत्र में समर्थन वापसी की घोषणा की गयी थी।

19 अप्रैल 1989 की बात है राज्यपाल ने राष्ट्रपति को पत्र लिखा कि हालिया घटी घटना के मद्देनजर चूंकि अब मुख्यमंत्री एस आर बोम्मई के पास बहुमत नहीं रह गया है इसीलिए वहाँ अब राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाना चाहिए।

हालांकि इसके तुरंत एक दिन बाद यानी कि 20 अप्रैल को ही उस 19 में से 7 विधायकों ने कहा कि मेरे नाम पर जो पत्र दिये गये है वो फर्जी है। हम सब अब भी सरकार के सपोर्ट में हैं।

ऐसा होते ही मुख्यमंत्री एस आर बोम्मई राज्यपाल के पास पहुंचे और उन्होने राज्यपाल से कहा कि मुझे बहुमत साबित करने का मौका दिया जाये। और यही बात उन्होने राष्ट्रपति को भी कहा कि यहाँ पर अभी राष्ट्रपति शासन न लगाया जाये बल्कि पहले मुझे बहुमत सिद्ध करने का मौका दिया जाये।

उसी दिन राज्यपाल ने भी राष्ट्रपति को फिर एक पत्र के माध्यम से कहा कि मुख्यमंत्री सदन में अपना विश्वास खो चुका है। इसलिए यहाँ अनुच्छेद 356 (1) के तहत राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाये।

केंद्र में कॉंग्रेस की सरकार थी राजीव गांधी उस समय प्रधानमंत्री थे, और राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह थे। उन्होने आव देखा न ताव बोम्मई की सरकार को बर्खास्त करके 21 अप्रैल 1989 को राष्ट्रपति शासन लगा दी। और कॉंग्रेस की बहुमत वाली सरकार थी इसलिए संसद के दोनों सदनों से अनुमोदित भी कर दिया गया।

चूंकि बहुमत साबित करने का मौका दिये बिना ही राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था। इसीलिए एस आर बोम्मई 26 अप्रैल 1989 को कर्नाटक हाइ कोर्ट गये। पर कर्नाटक हाइ कोर्ट ने उनके रिट पिटिशन को ही खारिज कर दिया। ये तो हुआ एक मामला, इसके अलावे भी उन कुछ सालों में बहुत कुछ घटा।

7 अगस्त 1988 को नागालैंड के सरकार को भी बर्खास्त करके वहाँ राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था।

जब वहाँ के विपक्षी दल ने गुवाहाटी हाइ कोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी तो केंद्र सरकार के आदेश पर वहाँ के हाइ कोर्ट के कार्यवाही पर रोक लगा दी गयी।

11 अप्रैल 1991 को मेघालय में भी राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। तब भी कॉंग्रेस की ही सरकार केंद्र में थी, गठबंधन के साथ। उस समय प्रधानमंत्री थे चन्द्रशेखर।

पर इससे भी बड़ा बवाल तो तब हुआ जब 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद ढाह दी गयी थी। चूंकि उस समय आरएसएस, विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल की संलिप्तता (Involvement) उसमें सामने आयी थी तो उस समय इन संगठनों को केंद्र सरकार द्वारा बैन कर दिया गया।

कॉंग्रेस शासित राज्यों में तो या आसानी से हो गया, लेकिन उस समय मध्य प्रदेश, राजस्थान हिमांचल प्रदेश में बीजेपी का शासन था। और वहाँ इन तीनों संगठनों पर प्रतिबंध नहीं था। वहाँ वे अपना काम मजे से कर रहे थे। इसीलिए 15 दिसम्बर 1992 को केंद्र सरकार ने इन तीनों राज्यों के सरकारों को बर्खास्त कर दिया और, राष्ट्रपति शासन लगा दिया, और कारण के रूप में कहा गया कि इन राज्यों ने केंद्र द्वारा इन संगठनों पर लगाए गये प्रतिबंधों की अवहेलना की है। (यानी कि यहाँ पर अनुच्छेद 365 का इस्तेमाल किया गया)

अब जब ये सारे मामले सुप्रीम कोर्ट के पास पहुंचा तो कोर्ट ने इन सभी मामलों को एक साथ मिला दिया और उसे ही एस आर बोम्मई बनाम भारत सरकार का मामला कहा गया।

ढेर सारे सवाल सुप्रीम कोर्ट के पटल पर रखे गए जैसे कि – राष्ट्रपति द्वारा लगाए गये राष्ट्रपति शासन कहा तक उचित है? क्या राष्ट्रपति के पास अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगाने की असीम शक्ति है? क्या राष्ट्रपति शासन को संसद द्वारा अनुमोदित करने के बाद सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज नहीं किया जा सकता है? इत्यादि-इत्यादि।

11 मार्च 1994 को सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों के बेंच ने अपना फैसला सुनाया। कोर्ट ने नागालैंड, मेघालय और कर्नाटक में लगाए गये राष्ट्रपति शासन को अवैध ठहराया, जबकि मध्यप्रदेश, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान में लगाए गए राष्ट्रपति शासन को सही ठहराया। (ऐसा क्यों?)

क्योंकि उन्होने धर्म निरपेक्षता (Secularism) को संविधान का मूल ढांचा माना और इस आधार पर लगाये गये राष्ट्रपति शासन को सही ठहराया।

मध्यप्रदेश, हिमांचल प्रदेश और राजस्थान पर राम मंदिर विवाद को लेकर चूंकि ये आरोप लगा था कि इन राज्यों ने धार्मिक मामलों में अपनी सहभागिता जतायी है इसीलिए उच्चतम न्यायालय ने इन राज्यों में लगाए गए राष्ट्रपति शासन को सही माना।

बोम्मई मामले की कुछ महत्वपूर्ण बातें

1. राष्ट्रपति शासन लागू करने की राष्ट्रपति की घोषणा न्यायिक समीक्षा (judicial review) योग्य है। भले ही उसे संसद के दोनों सदनों द्वारा अनुमोदित क्यों न किया गया हो।

2. यदि राष्ट्रपति शासन के दौरान किया गया काम अतार्किक या दुर्भावना से युक्त पाया जाता है तो न्यायालय द्वारा राष्ट्रपति के कार्य पर रोक लगाई जा सकती है। और केंद्र की यह जिम्मेवारी होगी कि वह राष्ट्रपति शासन को न्यायोचित सिद्ध करने के लिए तर्कसम्मत कारणों को प्रस्तुत करे।

3. अनुच्छेद 356 के अधीन शक्तियाँ विशिष्ट शक्तियाँ है। इनका प्रयोग विशेष परिस्थितियों में यदा-कदा ही कारण चाहिए।

4. यदि न्यायालय राष्ट्रपति की घोषणा को असंवैधानिक और अवैध पाता है तो उसे विघटित राज्य सरकार को पुनः स्थापित करने और निलंबित अथवा विघटित विधानसभा को पुनः बहाल करने का अधिकार है।

5. राज्य विधानसभा को केवल तभी विघटित किया जा सकता है, जब राष्ट्रपति की घोषणा को संसद की अनुमति मिल जाती है। जब तक ऐसी किसी घोषणा को मंजूरी नहीं प्राप्त होती है, राष्ट्रपति विधानसभा को केवल निलंबित कर सकता है। यदि संसद इसे मंजूरी देने में असमर्थ होती है तो विधानसभा पुनर्जीवित हो जाती है।

6. राज्य सरकार का विधानसभा में विश्वास मत खोने का प्रश्न संसद में निश्चित किया जाना चाहिए जब तक यह न हो तब तक मंत्रिपरिषद बनी रहेगी।

7. जब केंद्र में कोई नया राजनीतिक दल सत्ता में आता है तो उसे राज्यों में अन्य दलों की सरकार को बर्खास्त करने का अधिकार प्राप्त नहीं होगा। ये फैसला क्यों दिया होगा आप समझ ही गये होंगे।

राष्ट्रपति शासन की वर्तमान स्थिति

1994 में बोम्मई मामले के बाद ये बाद अब ये स्थिति है कि निम्नलिखित परिस्थितियों में लगाये गये राष्ट्रपति शासन उचित होगा।

◾ जब आम चुनावों के बाद विधानसभा में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त न हो अर्थात त्रिशंकु विधानसभा हो।

◾ जब बहुमत प्राप्त दल सरकार बनाने से इंकार कर दे और राज्यपाल के समक्ष विधानसभा में स्पष्ट बहुमत वाला कोई गठबंधन न हो।

◾ जब मंत्रिपरिषद त्यागपत्र दे दे और अन्य कोई दल सरकार बनाने की इच्छुक न हो अथवा स्पष्ट बहुमत के अभाव में सरकार बनाने की अवस्था में न हो।

◾ यदि राज्य सरकार केंद्र सरकार के किसी संवैधानिक निर्देश को मानने से इंकार कर दे।

◾ सरकार जब सोच विचारपूर्वक संविधान व कानून के विरुद्ध कार्य करे और इसका परिणाम एक उग्र विद्रोह के रूप में फूट पड़े।

◾ भौतिक विखंडन, जहां सरकार इच्छापूर्वक अपने संवैधानिक दायित्व निभाने से इंकार कर दे जो राज्य की सुरक्षा को खतरा उत्पन्न कर दें।

निम्नलिखित परिस्थितियों में राष्ट्रपति शासन लगाना अनुचित होगा।

◾ जब मंत्रिपरिषद त्यागपत्र दे दें अथवा सदन के बहुमत के अभाव के कारण बर्खास्त कर दी जाये और राज्यपाल एक वैकल्पिक सरकार की संभावनाओं की जांच किए बिना राष्ट्रपति शासन आरोपित करने की सिफ़ारिश करें।

◾ जब राज्यपाल मंत्रिपरिषद के समर्थन के संबंध में स्वयं निर्णय ले एवं मंत्रिपरिषद को सदन में बहुमत सिद्ध करने की अनुमति दिए बिना राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफ़ारिश कर दें।

◾ जब विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल, लोकसभा के आम चुनावों में भारी हार का सामना करें जैसा कि 1977 तथा 1980 में हुआ था।

◾ आंतरिक गड़बड़ी जिससे कोई आंतरिक उच्छेदन अथवा भौतिक विघटन या गड़बड़ी न हो।

◾ राज्य में कुशासन अथवा मंत्रिपरिषद के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोप अथवा राज्य में वित्तीय संकट ।

◾ जहां राज्य सरकार को अपनी गलती सुधारने के लिए पूर्व चेतावनी नहीं दी गयी हो। केवल उन मामलों को छोड़कर जहां स्थितियां, विपत्तिकारक घटनाओं में परिवर्तित होने वाली हों।

◾ जहां सत्ताधारी दल के अंदर की परेशानियों के सुलझाने के लिए अथवा किसी के बाह्य अथवा असंगत उदेश्य के लिए शक्ति का प्रयोग संविधान के विरुद्ध किया जाये।

तो कुल मिलाकर यही है राष्ट्रपति शासन, उम्मीद है समझ में आया होगा। आपातकाल का ही एक अगला भाग वित्तीय आपातकाल भी है उसे भी अवश्य पढ़ें।

🔴🔴🔴

Article Based On,
एम लक्ष्मीकान्त – भारत की राजव्यवस्था↗️
मूल संविधान भाग 18↗️
S. R. Bommai v. Union of India – wikipedia
President’s rule
youtube lectures आदि।

डाउनलोड राष्ट्रपति शासन पीडीएफ़

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