President’s Rule and Bommai Case (राष्ट्रपति शासन और बोम्मई मामला)

इस लेख में हम राष्ट्रपति शासन और बोम्मई मामला (President’s Rule and Bommai Case) के बारे में बात करेंगे। इसे समझना क्यों जरूरी है, लेख खत्म होते ही आपको समझ आ जाएगी।

पिछले लेख में हमने राष्ट्रीय आपातकाल (National emergency) पर बहुत ही विस्तार से चर्चा किया है। वो काफी महत्वपूर्ण लेख है, अगर आपने नहीं पढ़ा तो ↗️यहाँ क्लिक करके उसे पढ़ लें।

President's Rule and Bommai Case in hindi

राष्ट्रपति शासन और एस आर बोम्मई बनाम भारत सरकार मामला
(President’s Rule and SR Bommai v. Government of India case)

राष्ट्रीय आपातकाल की तरह राष्ट्रपति शासन (President’s Rule) भी दागों से मुक्त नहीं है। राष्ट्रीय आपातकाल तो चलो 3 बार ही लगा है लेकिन राष्ट्रपति शासन तो 100 से भी अधिक बार लग चुका है।

कई बार तो कोई पार्टी अपनी खुन्नस निकालने के लिए किसी विपक्षी पार्टी के राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया करते थे।

इसी तरह के निजी हित या पार्टी हित में इसे इस्तेमाल किए जाने के कारण ये भी राष्ट्रीय आपातकाल की ही तरह काफी विवादास्पद प्रावधान बन गया था।

पर बोम्मई मामले ने काफी हद तक इस समस्या को खत्म कर दिया। राष्ट्रपति शासन क्या है? बोम्मई मामला क्या है?,

उस समय क्या समस्या थी?, अभी की स्थिति क्या है? और इससे संबन्धित सारे सवालों के जवाब आपको मिल जाएगा। तो आइये इसे एक क्रमबद्ध रूप में समझते हैं।

राष्ट्रपति शासन
(President’s Rule)

हमारा देश संवैधानिक सर्वोच्चता वाला देश है। यानी कि संविधान के अनुसार ही हमारा देश चलेगा। आप इसे विधि का शासन (Rule of law) भी कह सकते हैं।

संविधान ठीक से चलता रहे और संविधान के अनुसार सबकुछ ठीक से चलता रहें, इसकी जिम्मेवारी राष्ट्रपति पर होती है। बकायदे संविधान को बचाने की वो शपथ भी लेते हैं।

इसलिए जब जरूरत पड़ती है तो वे बचाते भी है। राष्ट्रपति शासन भी उसी संवैधानिक व्यवस्था को बनाये रखने का एक तरीका है।

इसका उल्लेख अनुच्छेद 355 और अनुच्छेद 356 में किया गया है। अनुच्छेद 355 में कहा गया है कि केंद्र सरकार का ये कर्तव्य है कि प्रत्येक राज्य संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप कार्य करें।

अगर कोई राज्य संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप कार्य न करें या फिर किसी भी वजह से राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो जाये तो,

अनुच्छेद 356 के तहत केंद्र उस राज्य को अपने नियंत्रण में ले सकता है। यानी कि राष्ट्रपति शासन (President’s Rule) लगाया जा सकता है।

चूंकि इसे संवैधानिक तंत्र विफल हो जाने पर लगाया जाता है, इसीलिए इसे संवैधानिक आपातकाल (Constitutional emergency) कह दिया जाता है।

और इसे किसी राज्य में लगाये जाने के कारण राज्य आपातकाल (State emergency) भी कह दिया जाता है।

राष्ट्रपति शासन लगाने का आधार
(Basis for imposing President’s rule)

अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन (President’s Rule) लगाने के दो आधारों का उल्लेख किया गया है।

एक आधार तो अभी हमने ऊपर पढ़ा; जो कि अनुच्छेद 356 में ही उल्लिखित है। यानी कि संवैधानिक तंत्र विफल हो जाने पर।

दूसरे आधार का उल्लेख अनुच्छेद 365 में मिलता है। जो कहता है कि यदि कोई राज्य केंद्र द्वारा दिये गये निर्देशों का पालन करने में या फिर उसे प्रभावी करने में असफल होता है, तो इस स्थिति में भी राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है।

अतीत में इस आधार पर भी बहुत से राज्यों में राष्ट्रपति शासन (President’s Rule) लगाया गया है। जिसकी चर्चा आगे की गयी है।

अब आपके मन में ये सवाल आ सकता है कि राष्ट्रपति को ये कैसे पता चलता है कि किसी राज्य का संवैधानिक तंत्र विफल हो गया है? या केंद्र द्वारा निर्धारित निर्देशों का पालन करने में वो असफल रहा है?

ये या तो उन्हे स्वयं अपने विवेक से लग सकता है, या फिर संबन्धित राज्य के राज्यपाल के द्वारा, या फिर प्रधानमंत्री एवं मंत्रिमंडल से।

संसदीय अनुमोदन तथा समायावधि
(Parliamentary approval and time period)

अब हम ये तो समझ गये है कि घोषणा किस आधार पर किया जा सकता है। अब आइये देखते हैं उसके बाद क्या सब करना पड़ता है।

दरअसल राष्ट्रीय आपातकाल की तरह राष्ट्रपति शासन को भी संसद से अनुमोदन की आवश्यकता पड़ती है। पर बस कुछ अंतर है, और वो इस कुछ इस प्रकार है।

राष्ट्रपति शासन के घोषणा होने के दो माह के भीतर संसद के दोनों सदनों से इसका अनुमोदन (Approval) करवाना पड़ता है।

अगर राष्ट्रपति शासन तब जारी होता है जब लोकसभा का विघटन हो गया हो, या फिर लोकसभा हो लेकिन दो महीने के अंदर अनुमोदन करने से पहले ही विघटित हो जाये तो,

ऐसी स्थिति में जब फिर से लोकसभा का गठन होगा उसके पहली बैठक से तीस दिन तक वो घोषणा बना रहेगा। लेकिन उससे पहले राज्य सभा से वो अनुमोदित होना चाहिए, क्योंकि राज्य सभा कभी भंग नहीं होता है।

इस तरह यदि दोनों सदनों से ये अनुमोदित (Approved) हो जाये तो यह छह महीने तक जारी रह सकता है।

इसे अधिकतम 3 साल तक के लिए बढ़ाया जा सकता है लेकिन हर छह महीने में संसद की स्वीकृति जरूरी है।

यहाँ पर एक बात याद रखिए कि 3 साल तो बढ़ाया जा सकता है लेकिन 44वें संविधान संशोधन 1978 के द्वारा इस पर दो प्रतिबंध लगा दिया गया है।

यानी कि एक साल तक तो राष्ट्रपति शासन आराम से चल सकता है लेकिन अगर एक साल के बाद इसे फिर से छह महीने बढ़ाना हो तो, दो स्थितियों में ही बढ़ायी जा सकती है।

पहली कंडिशन ये है कि यदि पूरे भारत में अथवा पूरे राज्य या उसके किसी भाग में राष्ट्रीय आपात की घोषणा की गई हो, तथा,

दूसरा ये कि, चुनाव आयोग यह प्रमाणित करें कि संबन्धित राज्य में विधानसभा के चुनाव के लिए कठिनाइयाँ उपस्थित हैं।

लेकिन क्या हो अगर छह महीने इसे और बढ़ाना हो लेकिन उस अवधि में लोकसभा ही भंग हो जाये।

तो ऐसी स्थिति में फिर से जब लोकसभा का गठन होगा, उसकी पहली बैठक से 30 दिनों तक वो प्रस्ताव लागू रहेगी।

अगर उसे फिर से बढ़ाना है तो इसी अवधि में फिर से उसे अनुमोदित करना होगा। लेकिन याद रहे कि इससे पहले राज्यसभा से वो अनुमोदित हो चुका होना चाहिए। क्योंकि राज्यसभा कभी विघटित (dissolved) नहीं होता है।

जहां राष्ट्रीय आपातकाल को विशेष बहुमत की जरूरत पड़ती है। वहीं राष्ट्रपति शासन (President’s Rule) को संसद में सामान्य बहुमत से पारित किया जा सकता है। अगर आप ↗️विभिन्न प्रकार के बहुमत के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं तो क्लिक करें

राष्ट्रपति शासन के घोषणा की समाप्ति
(End of President’s rule declaration)

राष्ट्रपति शासन को समाप्त करना बहुत ही आसान है। इसमें कोई संसद के अनुमोदन की जरूरत नहीं पड़ती है।

बस राष्ट्रपति को ये घोषणा करना पड़ता है कि अब राष्ट्रपति शासन समाप्त हो गया। और घोषणा के साथ ही वो समाप्त हो जाता है।

राष्ट्रपति शासन के परिणाम
(Consequences of President’s rule)

राष्ट्रपति शासन लागू होते ही राष्ट्रपति मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद को भंग कर देता है। वैसे अगर राष्ट्रपति अगर चाहे तो विधानसभा को विघटित भी कर सकता है। यानी कि सरकार गिरा सकता है।

🔳 1. वह राज्य सरकार के सारे काम अपने हाथ में ले लेती हैं यहाँ तक कि राज्यपाल और अन्य जितने भी कार्यकारी अधिकारी हैं, उनकी शक्तियाँ भी राष्ट्रपति को प्राप्त हो जाती हैं।

🔳 2. संसद को राज्य विधायिका की शक्तियाँ प्राप्त हो जाती है। यानी कि राज्य के विषयों पर संसद कानून बना सकती है।

🔳 3. राष्ट्रपति जो भी चाहे कार्यकारी आदेश जारी कर सकता है। और साथ ही साथ किसी संवैधानिक प्रावधानों को निलंबित भी कर सकती है।

जब किसी राज्य के विधानसभा को राष्ट्रपति निलंबित अथवा विघटित कर देती है। तो ऐसी स्थिति में,

संसद चाहे तो राज्य के लिए विधि बनाने की शक्ति राष्ट्रपति अथवा उनके द्वारा उल्लिखित किसी अधिकारी को दे सकती है। इसका क्या मतलब हुआ?

आप खुद ही सोचिए कि राष्ट्रपति तो राष्ट्रपति तो राष्ट्रपति भवन छोड़कर जाता नहीं है शासन चलाने को, तो फिर शासन कौन चलाता है?

आमतौर पर वहाँ के राज्यपाल उस राज्य के सचिव की मदद से राष्ट्रपति के नाम पर शासन चलाते हैं।

पर राष्ट्रपति किसी अन्य अधिकारी को भी इस काम के लिए नियुक्त कर सकती है। और संसद चाहे तो उसे विधि बनाने का अधिकार दे सकती है।

राष्ट्रपति शासन के कुछ तथ्य
(Some facts of President’s rule)

जब लोकसभा का सत्र नहीं चल रहा हो तो राष्ट्रपति, संसद की अनुमति के लिए लंबित पड़े राज्य की संचित निधि के प्रयोग को प्राधिकृत कर सकता है।

दूसरे शब्दों में कहें तो जब संसद सत्र नहीं चल रहा हो तो राष्ट्रपति अपने प्राधिकार से राज्य के संचित निधि (Consolidated funds) का प्रयोग कर सकती है।

एवं जब संसद का सत्रावसान हो तो राष्ट्रपति, राज्य के लिए अध्यादेश जारी कर सकता है।

राष्ट्रपति अथवा संसद अथवा किसी विशेष प्राधिकारी द्वारा बनाया गया कानून, राष्ट्रपति शासन के पश्चात भी प्रभाव में रहेगा।

अर्थात एस कोई कानून जो इस अवधि में प्रभावी है, राष्ट्रपति शासन की घोषणा की समाप्ति पर अप्रभावी नहीं होगा। परंतु इसे राज्य विधायिका द्वारा वापस अथवा परिवर्तित अथवा पुनः लागू किया जा सकता है।

यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि राष्ट्रपति को लगभग राज्य की सारी शक्तियाँ तो प्राप्त हो जाती है लेकिन उस राज्य से संबन्धित उच्च न्यायालय की शक्तियाँ प्राप्त नहीं होती है,

और वह उनसे संबन्धित संवैधानिक प्रावधानों को निलंबित नहीं कर सकता। इसका मतलब ये नहीं है कि कुछ जरूरी निर्देश भी नहीं दे सकते हैं।

उतना तो चलता ही है, पर बस उसकी स्वायतत्ता को कुछ नहीं होनी चाहिए। तो ये रही इससे जुड़ी कुछ जरूरी बातें।

राष्ट्रपति शासन और अनुच्छेद 356 का प्रयोग
(President’s rule and use of Article 356)

राष्ट्रपति शासन का इस्तेमाल इतनी बार और ऐसी-ऐसी स्थितियों में हुआ है कि धीरे-धीरे ये विवादास्पद बन गया।

अक्सर राष्ट्रपति शासन के मामले में ये आरोप लगता रहा है कि यव्यक्तिगत या राजनीतिक हित साधने के लिए इसका प्रयोग होता रहा है।

और ऐसा कहने का कारण भी है। दरअसल इन्दिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल जब 1977 में खत्म हुआ और मोरार जी देशाई की सरकार बनी तो,

इस सरकार ने काँग्रेस शासित 9 राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। और वो भी बिना किसी ठोस वजह के।

इसी तरह जब 1980 में जब काँग्रेस सत्ता में थी तो उसने भी गैर-कॉंग्रेसी राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगा दी। अपना बदला ले लिया।

यही नहीं 1992 में फिर से काँग्रेस सरकार ने 3 बीजेपी शासित राज्यों में (मध्य-प्रदेश, हिमाचल व राजस्थान), में इस आधार पर राष्ट्रपति शासन लगा दिया कि,

राज्य सरकार केंद्र द्वारा धार्मिक संगठनों पर लगाए गए प्रतिबंधों का अनुपालन करने में असमर्थ हो रहे हैं। दरअसल उस समय राम मंदिर वाला विवाद शुरू हो चुका था।

तो अब सवाल ये आता है कि क्या ये इसी तरह से मनमानी पूर्वक लगाया जा सकता था। क्या न्यायालय इसपर कुछ नहीं करता था? तो ऐसी बात नहीं थी,

हालांकि 38वें संविधान संशोधन 1975 के माध्यम से इन्दिरा गांधी ने राष्ट्रीय आपातकाल के साथ-साथ राष्ट्रपति शासन के मामले में भी न्यायालय में चुनौती देने के प्रावधान को खत्म कर दिया था।

लेकिन 1978 के 44वें संविधान संशोधन से इस प्रावधान को हटा दिया गया था। यानी कि न्यायालय द्वारा न्यायिक समीक्षा तो की जा सकती थी। पर ऐसा होता नहीं था।

लगभग 14 वर्षों तक मनमाने तरीके से राष्ट्रपति शासन लगाने का काम चलता रहा। 1994 में जाकर बोम्मई मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इसपर सुनवाई की और राष्ट्रपति शासन को थोड़ा उत्तरदायी और तर्कपूर्ण बनाया।

राष्ट्रपति शासन के मामले में सुप्रीम कोर्ट का ये जजमेंट माइलस्टोन की तरह है। इसीलिए उसे समझना बहुत ही जरूरी है। तो आइये हम उसे समझते हैं।

बोम्मई बनाम भारत संघ 1994
(Bommai v. Union of India 1994)

हमने राष्ट्रीय आपातकाल (National emergency) के बारे में तो पढ़ा ही था, कि किस तरह राष्ट्रीय आपातकाल का नाम सुनते ही कई लोगों के मन में नकारात्मक भाव आ जाता है।

राष्ट्रपति शासन भी दागमुक्त नहीं है। इस पर भी कई सारे दाग लगे हैं, कुछ तो बड़े ही बेतुके थे।

वैसे तो ये तब से ही विवादास्पद रहा है जब पहली बार राष्ट्रपति शासन लगाया गया था। पर हद तो तब हो गयी जब 1978 में मोरारजी देशाई की सरकार ने नौ कॉंग्रेस शासित राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगा दी।

इसी के जवाबी कारवाई में 1980 में कॉंग्रेस सरकार ने 9 गैर-कॉंग्रेसी राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगा दी। इतना भी रहता तो ठीक था।

1988 में कर्नाटक के विधानसभा के चुनाव के बाद जनता पार्टी और लोक दल ने मिलकर जनता दल बनाया और उसके नेता चुने गये एस आर बोम्मई।

वे मुख्यमंत्री बन गये। सितंबर 1988 में 13 नये सदस्यों के साथ मंत्रिमंडल का विस्तार किया।

लेकिन कुछ दिन बाद ही एक विधायक ने राज्यपाल पी वैंकटसुबैया को 1 पत्र सौंपा साथ ही 19 अन्य विधायकों का भी उसके हस्ताक्षर वाला पत्र सौंपा, उस पत्र में समर्थन वापसी की घोषणा की गयी थी।

19 अप्रैल 1989 की बात है राज्यपाल ने राष्ट्रपति को पत्र लिखा कि हालिया घटी घटना के मद्देनजर चूंकि अब मुख्यमंत्री एस आर बोम्मई के पास बहुमत नहीं रह गया है इसीलिए वहाँ अब राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाना चाहिए।

हालांकि इसके तुरंत एक दिन बाद यानी कि 20 अप्रैल को ही उस 19 में से 7 विधायकों ने कहा कि मेरे नाम पर जो पत्र दिये गये है वो फर्जी है। हम सब अब भी सरकार के सपोर्ट में हैं।

ऐसा होते ही मुख्यमंत्री एस आर बोम्मई राज्यपाल के पहुंचे और उन्होने राज्यपाल से कहा कि मुझे बहुमत साबित करने का मौका दिया जाये।

और यही बात उन्होने राष्ट्रपति को भी कहा कि यहाँ पर अभी राष्ट्रपति शासन न लगाया जाये बल्कि पहले मुझे बहुमत सिद्ध करने का मौका दिया जाये।

उसी दिन राज्यपाल ने भी राष्ट्रपति को फिर एक पत्र के माध्यम से कहा कि मुख्यमंत्री सदन में अपना विश्वास खो चुका है। इसलिए यहाँ अनुच्छेद 356 (1) के तहत राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाये।

केंद्र में कॉंग्रेस की सरकार थी राजीव गांधी उस समय प्रधानमंत्री थे, और राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह थे।

उन्होने आव देखा न ताव बोम्मई की सरकार को बर्खास्त करके 21 अप्रैल 1989 को राष्ट्रपति शासन लगा दी। और कॉंग्रेस की सरकार थी इसलिए संसद के दोनों सदनों से अनुमोदित भी कर दिया गया।

चूंकि बहुमत साबित करने का मौका दिये बिना ही राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था। इसीलिए एस आर बोम्मई 26 अप्रैल 1989 को कर्नाटक हाइ कोर्ट गये।

पर कर्नाटक हाइ कोर्ट ने उनके रिट पिटिशन को ही खारिज कर दिया। ये तो हुआ एक मामला, इसके अलावे भी उन कुछ सालों में बहुत कुछ घटा।

7 अगस्त 1988 को नागालैंड के सरकार को भी बर्खास्त करके वहाँ राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था।

जब वहाँ के विपक्षी दल ने गुवाहाटी हाइ कोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी तो केंद्र सरकार के आदेश पर वहाँ के हाइ कोर्ट के कार्यवाही पर रोक लगा दी गयी।

11 अप्रैल 1991 को मेघालय में भी राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। तब भी कॉंग्रेस की ही सरकार केंद्र में थी, गठबंधन के साथ। उस समय प्रधानमंत्री थे चन्द्रशेखर।

पर इससे भी बड़ा बवाल तो तब हुआ जब 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद ढाह दी गयी थी।

चूंकि उस समय आरएसएस, विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल की संलिप्तता उसमें सामने आयी थी तो उस समय इन संगठनों को केंद्र सरकार द्वारा बैन कर दिया गया।

और इसके सारी गतिविधियों पर रोक लगा दी गयी। कॉंग्रेस शासित राज्यों में तो या आसानी से हो गया, लेकिन उस समय मध्य प्रदेश, राजस्थान हिमांचल प्रदेश में बीजेपी का शासन था।

और वहाँ इन तीनों संगठनों पर प्रतिबंध नहीं था। वहाँ वे अपना काम मजे से कर रहे थे। तो इसीलिए 15 दिसम्बर 1992 को केंद्र सरकार ने इन तीनों राज्यों के सरकारों को बर्खास्त कर दिया और,

राष्ट्रपति शासन लगा दिया, और कारण के रूप में कहा गया कि इन राज्यों ने केंद्र द्वारा इन संगठनों पर लगाए गये प्रतिबंधों की अवहेलना की है।

अब जब ये वाला कोर्ट सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो उसे एस आर बोम्मई बनाम भारत सरकार का मामला कहा गया। और उसमें सभी मामलों पर सुनवाई हुई जो ऊपर बताया गया है।

ढेरों सारे सवाल सुप्रीम कोर्ट के पटल पर रखे गए जैसे कि – राष्ट्रपति द्वारा लगाए गये राष्ट्रपति शासन कहा तक उचित है?

क्या राष्ट्रपति के पास अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगाने की असीम शक्ति है? क्या राष्ट्रपति शासन को संसद द्वारा अनुमोदित करने के बाद सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज नहीं किया जा सकता है? इत्यादि-इत्यादि।

11 मार्च 1994 को सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों के बेंच ने अपना फैसला सुनाया। और नागालैंड, मेघालय और कर्नाटक में लगाए गये राष्ट्रपति शासन को अवैध ठहराया,

लेकिन उन्होने धर्म निरपेक्षता को संविधान की मूल संरचना माना और इस आधार पर लगाये गये राष्ट्रपति शासन को सही ठहराया। यानी कि मध्यप्रदेश, हिमांचल प्रदेश और राजस्थान में लगाये गये राष्ट्रपति शासन को सही ठहराया।

साथ ही कुछ महत्वपूर्ण बाते कहीं जो कि जिसके कारण बोम्मई मामला इतना फ़ेमस हुआ। आइये देखते हैं, उन्होने क्या-क्या कहा।

1. ✅ राष्ट्रपति शासन लागू करने की राष्ट्रपति की घोषणा न्यायिक समीक्षा योग्य है। भले ही उसे संसद के दोनों सदनों द्वारा अनुमोदित क्यों न किया गया हो।

2. ✅ राष्ट्रपति के कार्य पर न्यायालय द्वारा रोक लगाई जा सकती है, यदि यह अतार्किक, दुर्भावना से युक्त या फिर तर्क विरुद्ध पाया जाये।

3. ✅ केंद्र की यह जिम्मेवारी होगी कि वह राष्ट्रपति शासन को न्यायोचित सिद्ध करने के लिए तर्कसम्मत कारणों को प्रस्तुत करे।

क्योंकि न्यायालय यह नहीं देख सकता कि संसाधन सही अथवा पर्याप्त हैं अपितु यह देखता है कि कार्य तर्क सम्मत है अथवा नहीं।

4. ✅ यदि न्यायालय राष्ट्रपति की घोषणा को असंवैधानिक और अवैध पाता है तो उसे विघटित राज्य सरकार को पुनः स्थापित करने और निलंबित अथवा विघटित विधानसभा को पुनः बहाल करने का अधिकार है।

5. ✅ राज्य विधानसभा को केवल तभी विघटित किया जा सकता है, जब राष्ट्रपति की घोषणा को संसद की अनुमति मिल जाती है।

जब तक ऐसी कोई घोषणा को मंजूरी नहीं प्राप्त होती है, राष्ट्रपति विधानसभा को केवल निलंबित कर सकता है। यदि संसद इसे मंजूरी देने में असमर्थ होती है तो विधानसभा पुनर्जीवित हो जाती है।

6. ✅ राज्य सरकार का विधानसभा में विश्वास मत खोने का प्रश्न संसद में निश्चित किया जाना चाहिए जब तक यह न हो तब तक मंत्रिपरिषद बनी रहेगी।

7. ✅ जब केंद्र में कोई नया राजनीतिक दल सत्ता में आता है तो उसे राज्यों में अन्य दलों की सरकार को बर्खास्त करने का अधिकार प्राप्त नहीं होगा। ये फैसला क्यों दिया होगा आप समझ ही गये होंगे।

8. ✅ अनुच्छेद 356 के अधीन शक्तियाँ विशिष्ट शक्तियाँ है। इनका प्रयोग विशेष परिस्थितियों में यदा-कदा ही कारण चाहिए।

राष्ट्रपति शासन और वर्तमान स्थिति
(President’s rule and current status)

1994 में बोम्मई मामले के बाद ये बाद अब ये स्थिति है कि निम्नलिखित परिस्थितियों में लगाये गये राष्ट्रपति शासन उचित होगा।

✔ जब आम चुनावों के बाद विधानसभा में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त न हो अर्थात त्रिशंकु विधानसभा हो।

✔ जब बहुमत प्राप्त दल सरकार बनाने से इंकार कर दे और राज्यपाल के समक्ष विधानसभा में स्पष्ट बहुमत वाला कोई गठबंधन न हो।

✔ जब मंत्रिपरिषद त्यागपत्र दे दे और अन्य कोई दल सरकार बनाने की इच्छुक न हो अथवा स्पष्ट बहुमत के अभाव में सरकार बनाने की अवस्था में न हो।

✔ यदि राज्य सरकार केंद्र सरकार के किसी संवैधानिक निर्देश को मानने से इंकार कर दे।

✔ सरकार जब सोच विचारपूर्वक संविधान व कानून के विरुद्ध कार्य करे और इसका परिणाम एक उग्र विद्रोह के रूप में फूट पड़े।

✔ भौतिक विखंड, जहां सरकार इच्छापूर्वक अपने संवैधानिक दायित्व निभाने से इंकार कर दे जो राज्य की सुरक्षा को खतरा उत्पन्न कर दें।

अब तक कहाँ कितनी बार लगाया गया है
↗️उसका लिस्ट यहाँ से देखें

निम्नलिखित परिस्थितियों में राष्ट्रपति शासन लगाना अनुचित होगा।

✖ जब मंत्रिपरिषद त्यागपत्र दे दे अथवा सदन के बहुमत के अभाव के कारण बर्खास्त कर दी जाये और राज्यपाल एक वैकल्पिक सरकार की संभावनाओं की जांच किए बिना राष्ट्रपति शासन आरोपित करने की सिफ़ारिश करें।

✖ जब राज्यपाल मंत्रिपरिषद के समर्थन के संबंध में स्वयं निर्णय ले एवं मंत्रिपरिषद को सदन में बहुमत सिद्ध करने की अनुमति दिए बिना राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफ़ारिश कर दें।

✖ जब विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल, लोकसभा के आम चुनावों में भारी हार का सामना करें जैसा कि 1977 तथा 1980 में हुआ था।

✖ आंतरिक गड़बड़ी जिससे कोई आंतरिक उच्छेदन अथवा भौतिक विघटन या गड़बड़ी न हो।

✖ राज्य में कुशासन अथवा मंत्रिपरिषद के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोप अथवा राज्य में वित्तीय संकट ।

✖ जहां राज्य सरकार को अपनी गलती सुधारने के लिए पूर्व चेतावनी नहीं दी गयी हो। केवल उन मामलों को छोड़कर जहां स्थितियां, विपत्तिकारक घटनाओं में परिवर्तित होने वाली हों।

✖ जहां सत्ताधारी दल के अंदर की परेशानियों के सुलझाने के लिए अथवा किसी के बाह्य अथवा असंगत उदेश्य के लिए शक्ति का प्रयोग संविधान के विरुद्ध किया जाये।

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अब इस सिरीज़ का बस एक लेख बच गया है, जिसमें हम वित्तीय आपातकाल और आपातकाल की आलोचना के बारे में चर्चा करेंगे। उसे भी जरूर पढ़ें।

President’s rule and Bommai Case
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