Chairman of Rajya Sabha (राज्यसभा का सभापति: गठन, कार्य, शक्तियाँ)

इस लेख में हम राज्यसभा के सभापति (Chairman of Rajya Sabha) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे, संसद को अच्छी तरह से समझने के लिए इस लेख को अंत तक पढ़ें।
Chairman of Rajya Sabha

राज्यसभा के बारे में हम पहले ही पढ़ चुके है कि राज्यसभा क्या है?, वो काम कैसे करता है? उसकी शक्तियाँ क्या है? इत्यादि। पहले आप ↗️राज्यसभा को जरूर पढ़ें ताकि आप राज्यसभा के सभापति को अच्छे से समझ सकें।

राज्यसभा का सभापति
(Chairman of Rajya Sabha)

राज्यसभा के पीठासीन अधिकारी या फिर अध्यक्ष को ही सभापति कहा जाता है। जो भी देश का उपराष्ट्रपति बनता है वह स्वतः ही राज्यसभा का सभापति भी बन जाता है। हालांकि उप-राष्ट्रपति जब राष्ट्रपति बन जाता है तब वह वह राज्यसभा के सभापति के रूप में काम नहीं करता है।

राज्यसभा के सभापति की अर्हताएं
(Qualifications of the Chairman)

1. भारत का नागरिक हो 2. कम से कम 30 साल की आयु हो 3. घोषित अपराधी या दिवालिया न हो। अर्थात उसे कर्ज में नहीं होना चाहिए और उसे अपने वित्तीय खर्चों को पूरा करने की क्षमता होनी चाहिए। 4. भारत सरकार के अधीन किसी लाभ के पद पर न हो।

राज्यसभा के सभापति को पद से हटाना
(Removal of the Chairman of Rajya Sabha)

जैसा कि ऊपर ही बताया गया है सभापति वही बनता है जो उपराष्ट्रपति हो, तो जाहिर है अगर उसे उप-राष्ट्रपति पद से हटा दिया जाये तो सभापति के पद से भी हट जाएगा। यानी कि राज्यसभा के सभापति को तब ही पद से हटाया जा सकता है जब उसे उपराष्ट्रपति पद से हटा दिया जाये। दूसरी बात कि अगर वे खुद ही उप-राष्ट्रपति पद से त्यागपत्र दे दे तो वे सभापति भी नहीं रहेंगे।

जब उपराष्ट्रपति को सभापति पद से हटाने का संकल्प राज्यसभा में विचारधीन हो या उस पर वोटिंग चल रहा हो तो वे राज्यसभा का पीठासीन अधिकारी नहीं होगा हालांकि वह सदन में उपस्थित रह सकता है, बोल सकता है और सदन की कार्यवाही में हिस्सा भी ले सकता है, लेकिन मत नहीं दे सकता।

◾ वहीं जब लोकसभा के अध्यक्ष को हटाने का संकल्प विचारधीन हो तो लोकसभा अध्यक्ष पहली बार मत दे सकता है।

राज्यसभा के सभापति से संबन्धित अन्य बातें
(Other matters related to the Chairman of Rajya Sabha)

◼ एक पीठासीन अधिकारी होने के रूप में राज्यसभा के सभापति की शक्तियां व कार्य लोकसभा के अध्यक्ष के समान ही होती हैं बस लोकसभा अध्यक्ष के पास निम्नलिखित विशेष शक्तियाँ होती है, जो सभापति के पास नहीं होती है।

(1) लोकसभा अध्यक्ष के पास यह तय करने की शक्ति होती है कि कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं और इस संबंध में उसका निर्णय अंतिम होता है। सभापति के पास ऐसी कोई शक्तियाँ नहीं होती। (2) दोनों सदनों के संयुक्त बैठक के दौरान लोकसभा अध्यक्ष ही पीठासीन अधिकारी हो सकता है, सभापति नहीं।

◼ लोकसभा अध्यक्ष सदन का सदस्य होता है जबकि सभापति सदन का सदस्य नहीं होता है। लेकिन वोटिंग के दौरान अगर दोनों पक्षों का मत बराबर हो जाये तो लोकसभा अध्यक्ष की तरह राज्यसभा सभापति भी अपना मत दे सकता है।

◼ लोकसभा अध्यक्ष की तरह सभापति का वेतन और भत्ते भी संसद निर्धारित करती है, जो भारत की संचित निधि पर भारित होते हैं।

◼ जब उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है तो उसे राज्यसभा से कोई वेतन या भत्ता नहीं मिलता है। यानी कि जब वे राष्ट्रपति होते हैं तो राष्ट्रपति के वेतन और भत्ते प्राप्त करते हैं।

राज्यसभा का उप-सभापति
(Deputy Chairman of Rajya Sabha)

राज्यसभा अपने सदस्यों के बीच से ही अपना उपसभापति चुनती है। जब किसी कारण से उपसभापति का स्थान रिक्त हो जाता है तो राज्यसभा के सदस्य अपने बीच से नया उप सभापति चुन लेते हैं।

उपसभापति आमतौर पर अपना पद निम्नलिखित तीन में से किसी एक कारण से छोड़ता है:- 1. यदि राज्यसभा से उसकी सदस्यता समाप्त हो जाये 2. यदि वह सभापति को अपना लिखित इस्तीफा सौप दे 3. यदि राज्यसभा में बहुमत द्वारा उसको हटाने का प्रस्ताव पास हो जाये लेकिन इस तरह का कोई भी प्रस्ताव 14 दिन के पूर्व नोटिस के बाद ही दिया जा सकता है।

सदन में सभापति का पद खाली होने पर या सभापति की अनुपस्थिति में उप-सभापति ही सभापति के रूप में कार्य करता है। जब ऐसा होता है तो दो उसके पास सभापति की सारी शक्तियाँ आ जाती हैं।

◾ एक बात का ध्यान रखिए कि उपसभापति सभापति के अधीनस्थ नहीं होता बल्कि वह राज्यसभा के प्रति सीधे उत्तरदायी होता है।

◼ सभापति की तरह ही उपसभापति भी सदन की कार्यवाही के दौरान पहले मत नहीं दे सकता लेकिन दोनों ओर से बराबर वोट पड़ने की स्थिति में वह अपना मत दे सकता है।

◼ सभापति की ही तरह जब उसे हटाने का प्रस्ताव विचारधीन हो या वोटिंग चल रहा हो तो वह सदन की कार्यवाही में पीठासीन नहीं होता, हालांकि वह सदन में उपस्थित हो सकता है, बोल भी सकता है।

◼ जब सभापति राज्यसभा की अध्यक्षता कर रहा होता है तब उपसभापति एक साधारण सदस्य की तरह होता है। वह बोल सकता है, कार्यवाही में भाग ले सकता है तथा मतदान कि स्थिति में मत भी दे सकता है।

◼ सभापति की तरह ही उपसभापति को भी संसद द्वारा तय किया गया वेतन और भत्ता मिलता है, जिसका भुगतान भारत की संचित निधि पर भारित होता है।

राज्यसभा के उप-सभापतियों की तालिका

राज्यसभा के नियमों के तहत, सभापति इसके सदस्यों के बीच से 10 उपसभापतियों को मनोनीत करता है और एक पैनल बनाता है। जब असली सभापति एवं उपसभापति सदन में अनुपस्थिति हों तब इनमें से कोई भी सदन की अध्यक्षता कर सकता है। जब ऐसा होता है तो उसे सभापति के समान ही अधिकार एवं शक्तियाँ प्राप्त होती है।

लेकिन जब इस पैनल में से भी कोई उपसभापति सदन में उपस्थित न हो तो दूसरा व्यक्ति जिसे सदन निर्धारित किया हो, बतौर सभापति कार्य करता है।

यहाँ पर एक बात याद रखिए कि यदि सभापति और उप-सभापति का पद रिक्त हो तो तब इस पैनल के सदस्य उस कार्यवाही का संचालन नहीं कर सकता। इस रिक्त स्थान को भरने के लिए जितना जल्द हो सकें, चुनाव कराया जाता है।

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