Forward Derivatives in hindi (फॉरवर्ड डेरिवेटिव्स की समझ)

इस लेख में हम फॉरवर्ड डेरिवेटिव्स (Forward Derivatives) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें। अगर आपको ↗️डेरिवेटिव्स की समझ नहीं है तो पहले उसे समझ लें। और अगर आपको बेसिक शेयर मार्केट की नॉलेज नहीं है तो उस पर पूरी एक सिरीज़ है जिसमें बहुत ही आसान भाषा में ↗️शेयर मार्केट के बेसिक्स को समझाया गया है। आप उसे जरूर पढ़ें और अगर पढ़ चुकें है तो इसे नजरअंदाज करें।
Forward derivatives

हमने पिछले लेख में ↗️डेरिवेटिव्स को अच्छे से समझा था। उसी में हमने जाना था कि डेरिवेटिव्स चार प्रकार के होते हैं। जिसमें से पहला है फॉरवर्ड डेरिवेटिव्स। आइये जानते हैं ये क्या होता है।

Forward Derivatives Example

इसे एक उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिये कि अभी मार्केट में गेहूं 20 रुपए प्रति किलो बिक रहा है। एक किसान है जो अपना गेहूं इसी रेट पर बेचना चाहता है लेकिन उसके पास समस्या ये है कि अभी उसका गेहूं तैयार नहीं हुआ है वो 2 महीने बाद तैयार होगा। किसान इस बात को लेकर चिंतित है कि अगर 2 महीने बाद मार्केट में गेहूं का रेट 20 रुपए से कम हो गया तो फिर ऐसे में वो क्या करें।

इसी तरह से एक ब्रेड बनाने वाली फैक्ट्री है जिसने देखा था कि पिछली बार गेहूं का दाम मार्केट में बहुत बढ़ जाने से उसकी ब्रेड महंगी हो गयी थी। इस बार भी उसे लग रहा है कि शायद गेहूं का दाम 2 महीने बाद 30 रुपए प्रति किलो हो जाएगा। जबकि आज के डेट में उसकी बाज़ार कीमत सिर्फ 20 रुपए प्रति किलो है। अगर दो महीने बाद भी 20 रुपए प्रति किलो गेहूं मिल जाये तो फिर क्या ही कहने।

ये जो समस्या दोनों के पास आ रही है। इसी को समाधान करने का तरीका है फॉरवर्ड डेरिवेटिव्स (Forward derivatives )। वो कैसे?

अब वो किसान और वो फैक्ट्री ये कर सकता है कि गेहूं के आज के रेट के हिसाब से 2 महीने बाद के लिए कांट्रैक्ट कर सकता है। यानी कि मार्केट में गेहूं का दाम चाहे घटे या बढ़े लेकिन 2 महीने बाद आज के ही रेट पर दोनों सौदा करेंगे। इसमें दोनों का ही फायदा है क्योंकि इससे दोनों का रिस्क कम हो जाएगा, इसे हेजिंग (Hedging) कहा जाता है।

किसान को ये डर है कि कहीं दाम इससे भी ज्यादा कम न हो जाये क्योंकि मार्केट में जब बहुत गेहूं आ जाएँगे तो स्वाभिविक है कि दाम कम हो जाये वहीं दूसरी तरफ फैक्ट्री को लगता है कि क्या पता अगर गन्ने की उपज कम हो तो गन्ने का दाम बढ़ जाएगा। ये दोनों की बस अपनी-अपनी सोच है। 2 महीने बाद क्या होगा ये कौन जानता है।

खैर दोनों ने यही सोचकर आज की कीमत पर 2 महीने बाद के लिए एक समझौता कर लिया। चूंकि डील तो आज हुई है लेकिन सामान की डेलीवरी दो महीने बाद होगी इसीलिए इसे फॉरवर्ड कहा जाता है।

ये किसी भी दो व्यक्ति के बीच में हो सकता है लेकिन यहाँ पर समस्या ये होती है कि मान लीजिये कि अगर कांट्रैक्ट साइन हो लेकिन जब समय आए और गेहूं का रेट 20 रुपए से भी कम हो जाये और वो फैक्ट्री वाला उसे लेने से माना कर दें तो क्या होगा। इसी तरह अगर गेहूं का रेट दो महीने बाद बढ़ कर 30 रुपए हो गया और किसान ने उसे बेचने से मना कर दिया तो। ऐसी स्थिति में बड़ी समस्या आ जाएगी क्योंकि यहाँ बीच में कोई मध्यस्थता नहीं कर रहा है।

यानी कि स्टॉक एक्स्चेंज (Stock exchange) की इसमें कोई भूमिका नहीं होती है। ये बस दो पार्टियों के बीच किया गया एक कांट्रैक्ट है। इसीलिए कांट्रैक्ट होते हुए भी वो पूरा हो ही जाये इसकी कोई गारंटी नहीं होती है।

इसी समस्या को खत्म करने के लिए फ्युचर (Future) और ऑप्शन (Option) लाया गया। यहाँ पर इस तरह की कोई समस्या नहीं होती है क्योंकि ये स्टॉक एक्स्चेंज के देख-रेख में होती है और सब कुछ पारदर्शी तरीके से होता है।

तो कुल मिलाकर यही है फॉरवर्ड डेरिवेटिव्स (Forward derivatives)। हम फ्युचर और ऑप्शन को अगले लेख में कवर करेंगे। इसे आप ⏬नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।

Future Derivatives
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