राजनीतिक दल : बनने की प्रक्रिया, कार्य, महत्व

लोकतंत्र में राजनीतिक दल एक स्थापित और सर्वमान्य व्यवस्था है, भारत में ये काफी फला-फुला और कुल मिलाकर बात ये है कि यही सरकार चलाती है।

दल के आधार पर जनता के लिए भी ये चुनाव करना आसान हो जाता है कि वे किस तरह के लोगों को सरकार बनाना चाहती है। इसके अलावा भी इसके कई फायदे हैं।

इस लेख में हम भारत में राजनीतिक दल (Political Party) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे और इसके विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं को समझेंगे, तो आइये बिल्कुल शुरू से शुरू करते हैं;

राजनीतिक दल

राजनीति क्या है?

विविधता या भिन्नताएँ प्रकृति की एक आम लक्षण है। इंसान भी इससे अछूता नहीं है हम देश स्तर पर तो एक दूसरे से भिन्न होते ही है यहाँ तक कि हम जिस परिवार में पैदा हुए है वहाँ भी हम बाकियों से अलग होते हैं। हम सिर्फ देखने में अलग नहीं होते हैं बल्कि सोचने-विचारने में भी भिन्न होते हैं।

जहां भिन्नताएं है वहाँ संघर्ष स्वाभाविक है। हम चूंकि इंसान है इसीलिए हमें इसका समाधान चाहिए होता है। इसीलिए हमने एक राज्य (State) नामक संस्था बनाया। राज्य जिस तरह से इन संघर्षों से निपटने के लिए नीतियाँ बनाती है। उसी पूरी घटना या गतिविधियों को राजनीति (Politics) कहते हैं।

कुल मिलाकर राजनीति समस्या निवारण का एक तरीका है और इस समस्त तरीके को राज्य के परिपेक्ष्य में एक व्यवस्थित और क्रमबद्ध अध्ययन, राजनीति विज्ञान (political Science) कहलाता है।

राजनीतिक दल क्या है?

वैसे तो समाज में सभी के विचार अलग-अलग होते है या हो सकते हैं फिर भी विचारों का कुछ भाग ऐसा होता है जो दूसरे के विचार से मेल खाते हैं। इस तरह समान विचार वाले लोग जब एक जगह इकट्ठा होकर एक ग्रुप का निर्माण करते हैं और जब यह ग्रुप चुनाव आयोग से पंजीकृत हो जाते हैं तो उसे राजनीतिक दल (Political party) कहते हैं।

कुल मिलाकर राजनीतिक दल वे स्वैच्छिक संगठन अथवा लोगों के वे संगठित समूह होते हैं जो समान दृष्टिकोण रखते हैं तथा जो संविधान के प्रावधानों के अनुरूप राष्ट्र को आगे बढ़ाने के लिए राजनीतिक शक्ति प्राप्त करने की कोशिश करते हैं।

कोई भी देश किस प्रकार के राजनैतिक सिद्धांत या फिर विचारधारा द्वारा संचालित होगा ये इस पर निर्भर करता है कि उस देश में व्यक्ति को कितनी स्वतंत्रता मिली हुई है और राज्य को कितनी शक्ति मिली है। अर्थात अगर राज्य को असीमित शक्ति दे दिया जाये और व्यक्ति की स्वतंत्रता को न्यूनतम कर दिया जाये तो फिर वो राज्य अधिनायकवादी या फासीवादी कहलाएगा। इसी तरह अगर व्यक्ति को असीमित स्वतंत्रता दे दिया जाये और राज्य की शक्ति को न्यूनतम कर दिया जाये तो फिर वो राज्य अराजकतावादी या व्यक्तिवादी कहलाएगा।

अब अगर उदारवाद की बात करें तो इसमें व्यक्ति की स्वतंत्रता की तरफ ज्यादा झुकाव होता है वहीं समाजवाद की बात करें तो इसमें राज्य की शक्ति की तरफ ज्यादा झुकाव होता है। इसका एक मध्यबिंदु भी होता है जिसे आदर्शवाद कहते है जिसमें दोनों का संतुलन होता है पर ऐसी विचारधारा व्यावहारिक जीवन में सफल नहीं हो पाता है।

राजनीतिक दल के कार्य

राजनीतिक दल मूल रूप से राजनीतिक पद प्राप्त करने की कोशिश करती है ताकि राजनीतिक शक्ति प्राप्त हो सके। इसी शक्ति को प्राप्त करने के लिए राजनीतिक दल कई तरह के काम करते हैं, जैसे कि –

◾ चुनाव लड़ते हैं। इसके लिए वे अपने उम्मीदवारों को टिकट देते हैं और वो जीत सकें इसके लिए स्टार प्रचारकों से मदद दिलवाई जाती है।

◾ सभी दल अलग-अलग अपनी भावी नीतियों और कार्यक्रमों को घोषणापत्र के माध्यम से जनता के सामने रखती है। सभी दल ये कोशिश करती है कि वे ऐसी घोषणा करें जिससे उसके जीतने की संभावना बढ़ जाये।

◾ जो भी दल जीतकर आती है वो सरकार बनाती है और उसे चलाती है। एक सरकार के रूप में राजनीतिक दल इस प्रकार का काम करना चाहती है जिससे वे फिर से अगले चुनाव जीत सकें।

◾ जो दल हारकर आती है वो विपक्ष की भूमिका निभाती है। और वो सरकार की गलतियों को जनता के सामने रखने की कोशिश करती है ताकि वो अगला चुनाव जीत सके।

अगर हम ये प्रश्न करें कि राजनीतिक दलों की जरूरत ही क्या है? तो यहाँ समझने वाली बात है कि राजनीतिक दलों की जरूरत ही इसीलिए है ताकि वे उपरोक्त काम सके। दूसरे शब्दों में कहें तो राजनीतिक दल कोई भी काम सिर्फ इसलिए नहीं करता है कि उससे देश का भला हो बल्कि इसलिए करता है ताकि देश का भला होने के साथ-साथ उसके दल का भी भला हो और वो फिर से जीतकर आ सके। दलों के इसी जीत हार के खेल में देश का विकास होता जाता है और एक लोकतंत्र का यही तो तक़ाज़ा है।

राजनीतिक दल के प्रकार

इस तरह से अगर विचारधारा के आधार पर राजनैतिक दल को पृथक करने की कोशिश करें तो राजनैतिक दलों की भरमार हो जाएगी। वैसे राजनीतिविज्ञानी आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य में चार प्रकार के राजनैतिक दल को मानते हैं–

(1) प्रतिक्रियावादी राजनीतिक दल (Reactionary political parties) – ये पुरानी सामाजिक-आर्थिक तथा राजनीतिक व्यवस्थाओं से चिपके रहना चाहते हैं। ये “मैं सही हूँ “के स्थान पर “मै ही सही हूँ” को मानते हैं और कुछ भी अपने अनुसार न होता देख उसकी जबर्दस्त आलोचना करते हैं।

(2) रूढ़िवादी दल (Conservative Party) – ये यथा स्थिति में विश्वास रखते हैं। ये प्रतिक्रियावादी की तरह उतने विरोधी किस्म के तो नहीं होते हैं लेकिन ये भी अपनी परंपरा, रीति-रिवाज या कुछ प्रकार के अंधविश्वासों से जकड़े रहते हैं, ये हर चीज़ को आस्था, विश्वास या पूर्व के अनुभवों के आधार पर तौलने की कोशिश करते हैं। हालांकि ये बदलाव तो चाहते है लेकिन उतनी ही जितने से इसके विचारधारा को ठेस न पहुंचे।

(3) उदारवादी दल (Moderate party) – इनका लक्ष्य विद्यमान संस्थाओं में सुधार करना होता है तथा ये लोग fair competition को सपोर्ट करते हैं।

(4) सुधारवादी दल (Reformist party) – इनका उद्देश्य विद्यमान व्यवस्था को हटाकर नई व्यवस्था स्थापित करना होता है। और इसके लिए कुछ स्थितियों में हिंसा का भी सहारा लेनी पड़े तो लेना जायज है।

राजनीतिक दलों का उनकी विचारधारा के आधार पर वर्गीकरण करते हुए राजनीतिक वैज्ञानिकों ने सुधारवादी दलों को बाईं ओर, उदारवादी दलों को मध्य में तथा प्रतिक्रियावादी दलों एवं रूढ़िवादी दलों को दाईं ओर रखा है।

▪️ दूसरे शब्दों में जो बाई ओर है उसे वाम दल (Left parties) कहते है क्योंकि ये वर्तमान व्यवस्था से खुश नहीं होते हैं और ये व्यवस्था को तब तक बदलना चाहते हैं जब तक कि समाज में सभी वर्गों के बीच एक साम्य (Equilibrium) स्थापित न हो जाये। CPI तथा CPM वाम दलों के उदाहरण हैं।

▪️ सबसे दाई ओर स्थित दल को दक्षिण पंथी या रूढ़िवादी दल कहा जाता है। क्योंकि ये अपनी परंपरा से बहुत प्यार करते हैं और बदलाव उसी स्तर तक चाहते हैं जिससे कि उसके परंपरा, रीति-रिवाज या संस्कृति को कोई ठेस न पहुंचे। भाजपा दक्षिणपंथी दल के उदाहरण हैं।

▪️ मध्य में स्थित दल को केंद्रीय दल या मध्यमार्गी कहते हैं क्योंकि ये न ही पूरी तरह से वाम मत को फॉलो करते है और न ही दक्षिणपंथी मत को बल्कि ये उदार होते हैं। same level playing provide कराने या fair competition में ये विश्वास करते हैं। कांग्रेस मध्यमार्गी दल कहलाते है।

दलीय व्यवस्था (Party system)

जहां पर अभी भी मोनार्की व्यवस्था (राजतंत्र) है अगर उसे छोड़ दे तो विश्व में तीन तरह की दलीय व्यवस्था है।

(1) एक दलीय व्यवस्था (One party system) – इसमें केवल एक ही दल होता है जो कि सत्तारूढ़ दल होता है और विरोधी दल की कोई व्यवस्था नहीं होती है, जैसे-चीन

(2) दो दल व्यवस्था (Two Party System) – इसमें दो बड़े दल विद्यमान होते हैं। (कई छोटे-छोटे दल भी होते हैं लेकिन वे इतने महत्वपूर्ण नहीं होते) जैसे अमेरिका तथा ब्रिटेन

(3) बहुदलीय व्यवस्था (Multi party system) – इसमें कई दल होते है जो आमतौर पर मिलजुल कर सरकार बनाते हैं। जैसे- फ्रांस, इटली, भारत आदि।

भारत में बहुदलीय व्यवस्था है हालांकि कई बार ये एकदलीय व्यवस्था को भी प्रदर्शित करता है। जिसे कि आगे हम समझने वाले है।

भारत में दलीय व्यवस्था की विशेषताएँ

बहुदलीय व्यवस्था (Multi party system) देश का विशाल आकार, भारतीय समाज की विभिन्‍नता, विलक्षण राजनैतिक प्रक्रियाओं तथा कई अन्य कारणों से भारत में कई प्रकार के राजनैतिक दलों का उदय हुआ है। वास्तव में विश्व में सबसे ज्यादा राजनैतिक दल भारत में ही हैं। ये कितने है इसका अंदाजा आप इससे लगा सकते हैं कि सत्रहवीं लोकसभा के आम चुनाव 2019 के डाटा के अनुसार में देश में देशभर में 2598 दल है जिसमें से 8 राष्ट्रीय दल, 52 राज्य स्तरीय दल तथा 2538 पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दल हैं। (हालांकि विकिपीडिया पर अभी ये अपडेट नहीं किया गया है)

भारत में लगभग सभी प्रकार के राजनैतिक दल मिल जाते हैं, जैसे कि – वामपंथी दल, समाजवादी दल, मध्यमार्गी दल, दक्षिण पंथी दल, सांप्रदायिक दल, तथा गैर-सांप्रदायिक दल आदि। परिणामस्वरूप त्रिशंकु संसद (hung parliament), त्रिशंकु विधानसभा तथा साझा सरकार का गठन एक सामान्य बात है।

एकदलीय व्यवस्था (One Party system) वैसे भारत प्रकृति में तो बहुदलीय है लेकिन अनेक दल व्यवस्था के बावजूद भी भारत में एक लंबे समय तक कांग्रेस का शासन रहा। इसीलिए कुछ राजनैतिक विश्लेषक उस पीरियड को एकदलीय व्यवस्था वाले काल के रूप में मानते हैं। हालांकि कांग्रेस के प्रभावपूर्ण शासन में 1967 से क्षेत्रीय दलों के तथा अन्य राष्ट्रीय दलों, जैसे – जनता पार्टी (1977), जनता दल (1989) तथा भाजपा (1991) जैसी प्रतिद्वंद्विता पूर्ण पार्टियों के उदय और विकास के कारण कमी आनी शुरु हो गई थी।

स्पष्ट विचारधारा का अभाव – भाजपा तथा दो साम्यवादी दलों (सीपीआई और सीपीएम) को छोड़ दें तो अन्य सभी दलों की विचारधारा अस्पष्ट है। सभी दल एक दूसरे से मिलती-जुलती विचारधारा रखते हैं। उनकी नीतियों और कार्यक्रमों में काफी हद तक समानता है। लगभग सभी दल लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद और गांधीवाद की वकालत करते हैं।

व्यक्तित्व का महिमामंडन – ज़्यादातर दलों का संगठन एक श्रेष्ठ व्यक्ति के चारों ओर होता है ऐसी स्थिति में दल तथा उसकी विचारधारा से ज्यादा महत्वपूर्ण वो व्यक्ति हो जाता है। दल अपने घोषणा पत्रों की बजाय अपने नेताओं से पहचाने जाने लग जाते हैं।

उदाहरण के लिए देखें तो कांग्रेस की प्रसिद्धि अपने नेताओं जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी तथा राजीव गांधी की वजह से है। इसी प्रकार आजकल बीजेपी का मतलब मोदी हो गया है। यह जानना भी रोचक है कि कई दल अपने नाम में अपने नेताओं का नाम इस्तेमाल करते हैं, जैसे – बीजू जनता दल, लोकदल (ए), कांग्रेस (आई) आदि। अतः ऐसा कहा जाता है कि भारत में राजनीतिक दलों के स्थान पर राजनैतिक व्यक्तित्व हैं ।

पारंपरिक कारकों पर आधारितपश्चिमी देशों में राजनीतिक दल सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक कार्यक्रमों के आधार पर बनते हैं दूसरी ओर, भारत में अधिसंख्यक दलों का गठन धर्म, जाति, भाषा, संस्कृति तथा नस्ल आदि के नाम पर होता है । उदाहरण के लिए– शिव सेना, हिंदू महासभा, अकाली दल, मुस्लिम मजलिस, बहुजन समाज पार्टी, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया, आदि।

ये दल सांप्रदायिक तथा क्षेत्रीय हितों को बढ़ावा देने के लिए कार्य करते हैं और इस कारण सार्वजनिक हितों की अनदेखी करते हैं ।

क्षेत्रीय दलों का उद्भव भारत की दलीय व्यवस्था का एक दूसरा प्रमुख लक्षण राज्य स्तरीय दलों का उदय और उनकी बढ़ती भूमिका है। कई प्रदेशों में वे सत्तारूढ़ दल हैं, जेसे– ओडीशा में बीजेडी, आंध्र प्रदेश में तेलुगू देशम्‌ पार्टी, तमिलनाडु में DMK या AIADMK, पंजाब में अकाली दल, असम में असम गण परिषद, बिहार में जनता दल (यूनाइेड) आदि।

प्रारंभ में वे क्षेत्रीय राजनीति तक ही सीमित थे किंतु कुछ समय से केंद्र में साझा सरकारों के कारण राष्ट्रीय स्तर पर इनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। 1984 में तेलुगू देशम्‌ पार्टी लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल के रूप में उभरा था।

दल बनाना तथा दल-परिवर्तनभारत में दल बनाना, दल-परिवर्तन, टूट, विलय, बिखराव, ध्रुवीकरण आदि राजनैतिक दलों की कार्यशैली के महत्वपूर्ण रूप हैं । सत्ता की लालसा तथा भौतिक वस्तुओं की लालसा के कारण राजनीतिज्ञ अपना दल छोड़कर दूसरे दल में शामिल हो जाते हैं या नया दल बना लेते हैं। हालांकि इसके लिए बकायदे दल बदल कानून (anti defection law) है पर वो नाकाफी सिद्ध हुई है।

प्रभावशाली विपक्ष का अभाव – संसदीय लोकतंत्र की सफलता के लिए प्रभावशाली विपक्ष अत्यंत आवश्यक है। यह सत्तारूढ़ दल की निरंकुश शासन की प्रवत्ति पर रोक लगाता है और वैकल्पिक सरकार देता है किंतु पिछले 50 वर्षों में कुछ अवसरों को छोड़कर देखा जाये तो ज्ञात होता है कि देश में सशक्त, प्रभावशाली एवं जागरूक विपक्ष का अभाव ही रहा है। विपक्षी दलों में एकता का अभाव है और आमतौर पर वे आपसी विवादों में ही उलझे रहते हैं।

राजनीतिक दल की मान्यता के मापदण्ड क्या है? 

चुनाव आयोग, निर्वाचन के प्रयोजनों हेतु राजनीतिक दलों को पंजीकृत करता है और उनकी चुनाव निष्पादनता (Election performance) के आधार पर उन्हें राष्ट्रीय या राज्यस्तरीय दलों के रूप में मान्यता प्रदान करता है। अन्य दलों को केवल पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दल घोषित किया जाता है।

किसी दल को राष्ट्रीय राजनीतिक दल के रूप में मान्यता कब मिलती है?

एक दल को राष्ट्रीय दल (National party) के रूप में तब मान्यता दी जाती है, जब वह निम्नलिखित में से कोई अर्हतायें पूर्ण करता होः

1. यदि वह लोकसभा में पड़े कुल वोटों का अथवा विधानसभा के आम चुनावों में चार अथवा अधिक राज्यों में वैध मतों का छह प्रतिशत मत प्राप्त करता है तथा इसके साथ वह किसी राज्य या राज्यों से लोकसभा के चुनाव में 4 सीटें प्राप्त करता है।

2. यदि वह लोकसभा में दो प्रतिशत स्थान जीतता है तथा ये सदस्य तीन विभिन्न राज्यों से चुने जाते हैं ।

3. यदि कोई दल कम से कम चार राज्यों में राज्यस्तरीय दल के रूप में मान्यता प्राप्त हो।

फिलहाल राष्ट्रीय राजनीतिक दल के रूप मान्यता प्राप्त 7 दल है जिसे कि आप यहाँ क्लिक करके देख सकते हैं।

किसी दल को राज्यस्तरीय राजनीतिक दल के रूप में मान्यता कब मिलती है?

एक दल को राज्यस्तरीय राजनीतिक दल (State level political party) के रूप में तब मान्यता दी जाती है, जब वह निम्नलिखित अर्हतायें (Qualifications) पूर्ण करता हो:

1. यदि उस दल ने राज्य की विधानसभा के आम चुनाव में उस राज्य से हुए कुल वैध मतों का छह प्रतिशत प्राप्त किया हो, तथा इसके अतिरिक्त उसने संबंधित राज्य में 2 स्थान प्राप्त किए हों।

2. यदि वह राज्य की लोकसभा के लिये हुये आम चुनाव में इस राज्य से हुए कुल वैध मतों का छह प्रतिशत प्राप्त करता है, तथा इसके अतिरिक्त उसने संबंधित राज्य में लोकसभा की कम से कम 1 सीट जीती हो।

3.यदि उस दल ने राज्य की विधानसभा के कुल स्थानों का तीन प्रतिशत या तीन सीटें, जो भी ज्यादा हों, प्राप्त किए हों।

4. यदि प्रत्येक 25 सीटों में से उस दल ने लोकसभा की कम से कम 1 सीट जीती हो या लोकसभा के चुनाव में इस संबंधित राज्य में उसने विभाजन से कम-से-कम इतनी सीटें प्राप्त की हों।

5. यदि यह राज्य में लोकसभा के लिये हुए आम चुनाव में अथवा विधानसभा चुनाव में कुल वैद्य मतों का 8 प्रतिशत प्राप्त कर लेता है। यह शर्त वर्ष 2011 में जोड़ी गई थी।

फिलहाल 53 मान्यता प्राप्त राज्यस्तरीय राजनीतिक दल भारत में है। जिसे कि आप यहाँ क्लिक करके देख सकते हैं।

क्या किसी संघ (association) के लिए यह आवश्यक है कि वह निर्वाचन आयोग द्वारा पंजीकृत हो?

नहीं, केवल वे संघ (association) या भारत के व्यक्तिगत नागरिकों का निकाय जो कि स्वयं को राजनैतिक दल कहता है और लोक प्रतिनधित्वय अधिनियम 1951 के भाग 4क के उपबंधों का लाभ उठाना चाहता है तो उसे सिर्फ उसे स्वयं को भारत निर्वाचन आयोग के साथ पंजीकृत कराना होगा। 

चुनाव आयोग के साथ दल के पंजीकरण कराने का क्या लाभ है?

पंजीकृत राजनैतिक दलों द्वारा खडे़ किए गए उम्मीदवारों को निर्दलीय उम्मीदवारों की तुलना में मुक्त प्रतीकों के आबंटन के मामले में प्राथमिकता मिलेगी। इसके अतिरिक्त, समय बीतने के साथ राजनैतिक दल ‘राज्यीय दल’ या ‘राष्ट्रीय दल’ के रूप में मान्यता प्राप्त कर सकते हैं।

यदि पार्टी को ‘राज्यीय पार्टी‘ की मान्यता मिली हुई है तो यह उन राज्यों में, जिसमें उसे इस प्रकार की मान्यता मिली हुई है, इसके द्वारा खडे़ किए गए उम्मीदवार पार्टी द्वारा आरक्षित प्रतीक के आबंटन की पात्र होगा। और यदि पार्टी को ‘राष्ट्रीय पार्टी‘ के रूप में मान्यता प्राप्त है तो पूरे देश में इसके द्वारा खड़े किए गए उम्मीदवार पार्टी द्वारा आरक्षित प्रतीक के विशिष्ट आंबटन का पात्र होगा।

यानी कि प्रत्येक राष्ट्रीय दल को एक चुनाव चिन्ह प्रदान किया जाता है जो संपूर्ण देश में विशिष्टत: उसी के लिए आरक्षित होता है। इसी प्रकार प्रत्येक राज्यस्तरीय दल को एक चुनाव चिन्ह प्रदान किया जाता है जो उस राज्य या जिन राज्यों में इसे मान्यता प्राप्त है, विशिष्टत: उसी के लिए आरक्षित होता है ।

दूसरी ओर, कोई पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दल शेष चुनाव चिन्हों की सूची में से चिन्ह का चुनाव कर सकता है।

मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय और राज्यीय दलों को नामांकन पत्रों (Nomination papers) को भरने हेतु केवल एक ही प्रस्तावक की आवश्य्कता है और वे साधारण निर्वाचनों के दौरान आकाशवाणी/दूरदर्शन पर रेडियो/टेली प्रसारण तथा निर्वाचक नामावलियों के नि:शुल्क दो सेटों को लेने के लिए अधिकृत होंगी। 

इसके अलावा, इन दलों को चुनाव के समय में 40 ”स्टार प्रचारक” रखने की अनुमति है। जबकि पंजीकृत परंतु मान्यता रहित दलों को 20 स्टार प्रचारक रखने की अनुमति है। अपने दलों के इन उम्मीदवारों के लिए प्रचार करने वाले में स्टार प्रचारकों के यात्रा खर्च को उम्मीदवारों के चुनाव खर्च में नहीं शामिल किया जाएगा।

राजनीतिक दल के रूप में पंजीकरण की प्रक्रिया क्या है?

पंजीकरण के लिए आवेदन को आयोग द्वारा निर्धारित प्रपत्र में सचिव, भारत निर्वाचन आयोग, निर्वान सदन, अशोक रोड, नई दिल्ली -110001 को जमा कराया जाएगा। यह प्रपत्र अनुरोध करके डाक द्वारा मंगाया जा सकता है या आयोग के कार्यालय के काउंटर से लिया जा सकता है।

आवेदन को सुस्पष्ट रूप से पार्टी के पत्र शीर्ष (Letter head), यदि कोई है, पर टंकित किया जाना चाहिए और इसे पंजीकृत डाक से भेजा जाना चाहिए अथवा पार्टी के संगठन की तारीख से 30 दिनों के अंदर सचिव, निर्वाचन आयोग को व्यक्तिगत रूप से देना चाहिए।

2. आवेदन के साथ निम्नतलिखित दस्तावेज/सूचना संलग्न की जानी चाहिए:-

(i) प्रोसेसिंग शुल्क 10,000/- रू. (दस हजार रूपये केवल) का डिमांड ड्राफ्ट अवर सचिव, भारत निर्वाचन आयोग, नई दिल्ली के पक्ष में तैयार करना। प्रो‍सेसिंग शुल्क अप्रतिदेय (Non refundable) है। 

(ii) पार्टी के संविधान की प्रति पर पार्टी के महासचिव या अध्यक्ष या सभापति द्वारा प्रत्येक पृष्ठ पर विधिवत रूप से प्रमाणीकरण किया जाना चाहिए और उस पर हस्ताक्षरकर्ता की मुहर होनी चाहिए। 

(iii) पार्टी के संविधान या नियमों तथा विनियमों या ज्ञापन में विभिन्न स्तरों पर संगठनात्माक निर्वाचनों और ऐसे निर्वाचनों की आवधिकता और पार्टी के कार्यालय धारकों की पदावधि का विशेष उपबंध होना चाहिए। 

(iv) संविधान/नियमों तथा विनियमों/ज्ञापन में विलयन/विघटन के मामले में अंगीकार (Adoption) की जाने वाली प्रक्रिया का विशेष रूप से उपबंध होना चाहिए। 

(v) पार्टी के कम से कम 100 सदस्यों (सभी कार्यालय धारकों/मुख्य निर्णय लेने वाले घटकों यथा कार्यकारिणी समिति/कार्यकारिणी परिषद सहित) के संबंध में नवीनतम निर्वाचक नामावलियों से प्रमाणित उद्धरण (quotation) होने चाहिएं ताकि यह दिखाया जा सके कि वे पंजीकृत निर्वाचक (Registered Elector) हैं। 

(vi) पार्टी के अध्यक्ष/महासचिव द्वारा विधिवत रूप से हस्ताक्षरित शपथपत्र और प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट या शपथ आयुक्त या नोटेरी पब्लिक के समक्ष इस संबंध में शपथ ली जाए कि पार्टी का कोई भी सदस्‍य आयोग के साथ पंजीकृत किसी अन्य राजनैतिक दल का सदस्य नहीं है। 

(vii) पार्टी के नाम पर यदि कोई बैंक एकाउंट है या उसकी स्थायी एकांउट संख्या है तो उसके ब्योरे। 

3. ऊपर लिखित अपेक्षित सभी दस्तांवेजों सहित आवेदन पार्टी के गठन के पश्चांत 30 दिनों के अंदर आयोग के सचिव के पास पहुंच जाने चाहिए। 

4. उक्त अवधि के पश्चात दिया गया कोई भी आवेदन समयवर्जित (Time barred) हो जाएगा। इस संबंध में विशेष जानकारी↗️ प्राप्त करें

कुल मिलाकर हमने यहाँ भारत में राजनीतिक दल (political party) से संबंधित लगभग सभी महत्वपूर्ण विषयों को समझा है। बेहतर समझ के लिए चुनाव संबन्धित अन्य लेख जरूर पढ़ें। लिंक दिया हुआ है।

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91वां संविधान संशोधन अधिनियम क्यों महत्वपूर्ण है?
https://ncert.nic.in/textbook/pdf/jhss406.pdf

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