चुनाव प्रक्रिया, मशीनरी, कार्य इत्यादि

जिस देश में चुनाव एक पर्व की मनाया जाता हो वहाँ का चुनाव प्रक्रिया दिलचस्प तो होगा ही। भारत में सभी महत्वपूर्ण चुनाव निर्वाचन आयोग द्वारा करवाए जाते हैं,

पर ये कैसे होता है, पूरी चुनावी मशीनरी कैसे काम करती है या चुनाव के घोषणा के बाद से लेकर मतगणना तक क्या-क्या होता है; ये जाना काफी दिलचस्प है।

इस लेख में हम भारत में चुनाव प्रक्रिया, मशीनरी, कार्य आदि पर सरल और सहज चर्चा करेंगे, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढे।

चुनाव प्रक्रिया

विषय सूची

भारत में चुनाव प्रक्रिया

हमारे देश में लोकसभा, विधानसभा, पंचायत चुनाव आदि “फर्स्ट पास्ट दि पोस्ट‘ पद्धति के अनुसार कराए जाते हैं। यानी कि जो सबसे ज्यादा वोट लाएगा उसे विजेता घोषित कर दिया जाएगा, चाहे वो एक ही वोट ज्यादा क्यों न हो। चूंकि इस व्यवस्था में मतदान प्रत्यक्ष रूप से होता है इसीलिए चुनाव आयोग को अलग-अलग वांछित जगहों पर मतदान केंद्र स्थापित करना पड़ता है और वहाँ से वोटों का संग्रहण किया जाता है। एक निश्चित जगह पर उसकी गिनती की जाती है और फिर विजेता को प्रमाण पत्र देने के साथ इस पूरी प्रक्रिया का अंत होता है। चुनाव आयोग के लिए इस पूरी प्रक्रिया को मैनेज करना आसान नहीं होता है इसीलिए इसे छोटे-छोटे खंडों में कई स्तरों पर संचालित किया जाता है।

हालांकि राष्ट्रपति, राज्यसभा आदि का चुनाव समानुपातिक प्रतिनिधित्व के माध्यम से एकल हस्तांतरणीय मत पद्धति पर करवाए जाते हैं। ये व्यवस्था उपरोक्त व्यवस्था से बिलकुल भिन्न है। कैसे है? इसे दिये गए लिंक के माध्यम से समझ सकते हैं।

चुनाव प्रक्रिया सम्पन्न करवाने हेतु चुनावी मशीनरी

भारत का निर्वाचन आयोग (ECI)

भारतीय चुनावी तंत्र में सबसे ऊपर तीन सदस्यीय चुनाव आयोग होता है जिसमें एक मुख्य चुनाव आयुक्त तथा दो चुनाव आयुक्त होते हैं। अनुच्छेद 324 के तहत, ये संसद, राज्य विधायिका, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रित करता है।

मुख्य निर्वाचन अधिकारी (Chief Election Officer)

हरेक राज्य या केंद्रशासित प्रदेश में एक मुख्य चुनाव अधिकारी होता है जिसका कार्य होता है उस राज्य अथवा केंद्रशासित प्रदेश में चुनाव कार्यों का पर्यवेक्षण करना और चुनाव सफलता पूर्वक संपन्न करवाने में चुनाव आयोग की मदद करना।

इस अधिकारी की नियुक्ति किसी राज्य में वहाँ के सरकार और केंद्रशासित प्रदेश में वहाँ के प्रशासक के परामर्श से की जाती है। किसी भी राज्य या केंद्रशासित प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी↗️ तक पहुँचने के लिए आप दिये गए लिंक का इस्तेमाल कर सकते हैं।

जिला निर्वाचन अधिकारी (District Election Officer)

राज्य के नीचे जिला स्तर पर चुनावी तंत्र का सबसे बड़ा अधिकारी जिला निर्वाचन अधिकारी होता है। आमतौर पर ये पद जिलाधिकारी को ही दे दिया जाता है वैसे राज्य सरकार की सलाह पर ये पद किसी और को भी दिया जा सकता है। इस अधिकारी का मुख्य काम जिले में चुनावी कार्य का पर्यवेक्षण करना और सफलतापूर्वक चुनाव संपन्न कराने में चुनाव आयोग की मदद करना।

चुनाव अधिकारी (रिटर्निंग ऑफिसर) (RO)

जिला स्तर से नीचे आए तो प्रत्येक विधानसभा या लोकसभा क्षेत्र के लिए एक अधिकारी की नियुक्ति की जाती है जिसे कि चुनाव अधिकारी या रिटर्निंग ऑफिसर कहा जाता है। ये किसी संसदीय अथवा विधान सभा क्षेत्र के चुनाव कार्य के संचालन के लिए उत्तरदायी होता है। इसकी भी नियुक्ति ऊपर बताए गए तरीकों से ही होती है। इस अधिकारी के ऊपर से काम का बोझ कम करने के लिए या इसके सहयोग के लिए जरूरत के हिसाब से एक या अधिक सहायक चुनाव अधिकारी भी नियुक्त किया जाता है।

चुनाव निबंधन पदाधिकारी (इलेक्टॉरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर) (ERO)

प्रत्येक विधानसभा या लोकसभा क्षेत्र में मददाता सूची तैयार करने और इसी से संबन्धित अन्य कार्यो के लिए चुनाव आयोग राज्य सरकार के परामर्श से चुनाव निबंधन पधाधिकारी को नियुक्त करता है। चुनाव पंजीकरण अधिकारी के सहयोग के लिए भारत का निर्वाचन आयोग एक या अधिक सहायक चुनाव पंजीकरण अधिकारियों की नियुक्ति कर सकता है।

पीठासीन अधिकारी (Presiding Officer)

उससे नीचे आए तो मतदान केंद्र पर पीठासीन अधिकारी (प्रेजाइडिंग ऑफिसर) (PO) होता है जो अपने अन्य सहायक अधिकारियों के साथ मिलकर मतदान केंद्र पर चुनाव कार्य संपन्न करवाता है। इन सभी अधिकारियों की नियुक्ति जिला निर्वाचन अधिकारी करता है। संघीय क्षेत्रों के मामले में जहां जिला नहीं होता वहाँ से नियुक्ति मुख्य चुनाव अधिकारी करता है। अपना मतदान केंद्र जानने के लिए आप इस पोर्टल का इस्तेमाल कर सकते है – Polling Stations↗️

ये तो हो गया मुख्य चुनावी तंत्र लेकिन इसके अलावे भी कई अन्य अधिकारी या सैन्य बल होते है जो चुनाव संपन्न कराने में मदद करता है। इसे पर्यवेक्षक (Supervisor) कहा जाता है, इसका मनोनयन चुनाव आयोग द्वारा किया जाता है। ये कई प्रकार के होते हैं।

पर्यवेक्षक (Supervisor)

सामान्य पर्यवेक्षक (General Supervisor): स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराने के लिए चुनाव प्रक्रिया के हर चरण पर नजर रखने की जरुरत पड़ती है इसके लिए चुनाव आयोग सामान्य पर्यवेक्षक को नियुक्त करता है।

व्यय पर्यवेक्षक (Expenditure supervisor): व्यव पर्यवेक्षक का काम काफी महत्वपूर्ण होता है। ये उम्मीदवारों के चुनाव खर्च पर कड़ी निगरानी रखता है और साथ ही इस पर भी नजर रखता है कि कहीं वोटरों को पूरी चुनाव प्रक्रिया के दौरान कोई लालच तो नहीं दिया जा रहा है।

व्यय पर्यवेक्षकों के अलावा सहायक व्यय पर्यवेक्षक भी हरेक विधानसभा क्षेत्र में नियुक्त किये जाते हैं। जो इस बात को सुनिश्चित करता है कि सभी प्रमुख चुनाव प्रचार की घटना की वीडियोग्राफी हो और चुनावी अनियमितता की शिकायतों का तुरत ही निवारण हो।

पुलिस पर्यवेक्षक (Police supervisor): चुनाव आयोग भारतीय पुलिस सेवा के अफसरों को पुलिस पर्यवेक्षकों के रूप में राज्य तथा जिला स्तर पर तैनात करता है। इसका मुख्य काम चुनाव काल के दौरान नागरिक तथा पुलिस प्रशासन में समन्वय स्थापित करना और कानून-व्यवस्था पर नजर रखना होता है।

जागरूकता पर्यवेक्षक (Awareness supervisor): ये हमेशा से नहीं था इसे पहली बार 16वें लोकसभा चुनाव (2014) में चुनाव आयोग द्वारा बहाल किया गया। इसका मुख्य कार्य वोटरों में जागरूकता फैलाना एवं फील्ड स्तर पर चुनाव प्रक्रिया के कुशल तथा प्रभावकारी प्रबंधन को देखना था। इसके अलावा ये जिला स्तर पर पेड न्यूज की समस्या से निबटने के लिए आयोग द्वारा तैयार किये गए उपायों का भी पर्यवेक्षण करता है।

लघुस्तरीय पर्यवेक्षक (Minor level supervisor): सामान्य पर्यवेक्षक के अलावा आयोग लघुस्तरीय पर्यवेक्षक भी बहाल करता है। इनका काम है चुने हुए पोलिंग स्टेशनों पर चुनाव के दिन वोटिंग प्रक्रिया का पर्यवेक्षण करना और मतदान केन्द्रों पर आधारभूत न्यूनतम सुविधाओं की जांच करना। इस तरह के पर्यवेक्षकों को केंद्र सरकार या केंद्रीय सावजनिक क्षेत्र इकाइयों के अधिकारियों में से चुने जाते हैं। मतदान समाप्त होने के बाद वे EVM को एवं दूसरे अन्य दस्तावेजों को सील करते है। इसके अलावा अपने पोलिंग स्टेशनों के अंदर पोल प्रक्रिया में गड़बड़ी का सीधे सामान्य पर्यवेक्षकों को सूचित करते हैं।

चुनाव प्रक्रिया की शुरुआत

चुनाव कार्यक्रम तय होना

इतना तो हम समझते ही है कि हर पाँच वर्ष में चुनाव होता है। वैसे उससे पहले भी हो सकता है यदि सरकार बहुमत खो दे आदि। लेकिन सामान्य स्थिति में सरकार का कार्यकाल जैसे ही पाँच वर्ष को पूरा कर लेता है विधायिका को भंग कर दिया जाता है। चूंकि संवैधानिक प्रावधान ये है विधायिका भंग होने के बाद 6 महीने के अंदर चुनाव होना जरूरी होता है इसीलिए चुनाव आयोग नए चुनाव की घोषणा करती है और अपने पूरे चुनावी तंत्र को सक्रिय करती है।

चुनाव की घोषणा होते ही उम्मीदवारों एवं राजनीतिक दलों पर आचार संहिता लागू हो जाती है। चुनाव प्रचार के दौरान चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों तथा राजनीतिक दलों से यह अपेक्षा की जाती है कि आदर्श आचार संहिता का वे पालन करेंगे। ऐसा इसीलिए किया जाता है ताकि चुनाव प्रचार स्वस्थ तरीके से हो सके और राजनीतिक दलों एवं उम्मीदवारों अथवा उनके समर्थकों के बीच संघर्षों एवं झगड़ों को रोका जा सके कम से कम तब तक जब तक कि चुनाव सम्पन्न न हो जाए।

चुनाव अधिसूचना (Election notification) जारी होने के साथ ही औपचारिक चुनाव प्रक्रिया आरंभ हो जाती है। चुनाव आयोग इस अधिसूचना के माध्यम से पूरे कार्यक्रम को बताते है कब तक उम्मीदवार नामांकन पत्र दाखिल कर सकते और कब उसे वापस ले सकते हैं और कितने दिनों तक वे चुनाव प्रचार कर सकते हैं।

उस नियत तारीख के बीच इच्छुक उम्मीदवार नामांकन पत्र दाखिल करते हैं। आमतौर पर नामांकन की अंतिम तारीख से एक सप्ताह पश्चात्‌ तक नामांकनों की जाँच संबंधित चुनाव क्षेत्र के चुनाव अधिकारी करते हैं। नामांकन पत्र सही नहीं पाये जाने पर एक सुनवाई के पश्चात्‌ उन्हें अस्वीकृत कर दिया जाता है।

जाँच के बाद दो दिनों के अंदर वैध उम्मीदवार अगर चाहे तो अपना नाम वापस लेकर चुनाव से हट सकते है। इसके बाद चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को आमतौर पर चुनाव अभियान के लिए मतदान की तिथि के पहले दो हफ्ते का समय मिलता है।

मतपत्र एवं चुनाव चिह्न

जब उम्मीदवारों के नामांकन की प्रक्रिया पूरी हो जाती है, चुनाव अधिकारी द्वारा चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों की एक सूची बनाई जाती है तथा मतदान पत्र छपवाए जाते हैं। राष्ट्रीय और राज्यस्तरीय दलों की तो चुनाव चिन्ह फिक्स ही होता है लेकिन जो निर्दलीय चुनाव लड़ते है उसे चुनाव चिन्ह आवंटित किए जाते हैं। EVM पर उसे अंकित करवाया जाता है।

शपथ ग्रहण (swearing)

उम्मीदवार से यह अपेक्षा की जाती है कि वह नामांकन पत्र दाखिल करने के फौरन बाद शपथ-पत्र प्रस्तुत करेगा या कम से कम नामांकन-पत्र जाँच की तारीख से एक दिन पहले तक अवश्य जमा कर देगा। किसी भी उम्मीदवार के लिए निर्वाचन आयोग द्वारा अधिकृत अधिकारी के समक्ष शपथ लेनी पड़ती है।

◾ऐसे उम्मीदवारों के लिए जो बंदी हों अथवा जिन्हें निरुद्ध किया गया हो संबंधित कारा अधीक्षक अथवा अवरोधन शिविर (Detention Camp) के समादेष्टा (Commandant) को शपथ ग्रहण के अधिकृत किया जाता है।

◾ऐसे उम्मीदवारों के लिए जो कि अस्पताल में हों और बीमार हों तब अस्पताल के प्रभारी चिकित्सा अधीक्षक अथवा चिकित्सा अधिकारी को इसके लिए अधिकृत किया जाता है।

◾यदि कोई उम्मीदवार भारत के बाहर हो तब भारत के राजदूत अथवा उच्चायुक्त अथवा उनके द्वारा अधिकृत राजनयिक कॉन्सलर के समक्ष शपथ ली जाती है।

चुनाव प्रचार (Election Campaign)

ये मतदान से पूर्व की वह अवधि है जब सभी राजनीतिक दल अपने-अपने उम्मीदवारों को सामने लाते हैं तथा अपने दल तथा उम्मीदवारों के पक्ष में मत डालने के लिए लोगों को प्रेरित करते हैं। औपचारिक चुनाव प्रचार उम्मीदवारों की सूची के प्रकाशन से मतदान समाप्त होने के 48 घंटे पूर्व तक चलता है। हालांकि बहुत सारे उम्मीदवार नामांकन दाखिल होने से पहले भी चुनाव प्रचार में लगे रहते हैं।

चुनावी घोषणापत्र एवं रैलियाँ

विभिन्‍न दल अपने चुनाव घोषणापत्र जारी करना शुरू कर देते हैं। इस घोषणापत्र में इस बात की जानकारी होती है कि वे चुनाव जीतकर सरकार बनाने के पश्चात क्या करना चाहते हैं। जरूरी मुद्दों को लोगों की जुबान पर लाया जा सके इसके लिए नारों का इस्तेमाल किया जाता है, मतदाताओं के बीच इश्तहार एवं पोस्टर आदि वितरित किए जाते हैं। पूरे निर्वाचन क्षेत्र में रैलियाँ की जाती हैं, जिनमें उम्मीदवार अपने समर्थकों को उत्साहित करते हैं और विरोधियों की आलोचना करते हैं।

व्यक्तिगत अपील और वादे भी उम्मीदवार मतदाताओं से करते हैं जिससे कि उन्हें अधिक से अधिक संख्या में अपने समर्थन में लाया जा सके।

मतदान दिवस (Polling day)

मतदाताओं की भारी संख्या एवं बहुत बड़े पैमाने पर की जाने वाली चुनावी कार्यवाही को ध्यान में रखकर राष्ट्रीय चुनाव को कई चरणों में सम्पन्न करवाया जाता है। ऐसा सुरक्षा प्रबंधों को प्रभावी बनाने तथा मतदान की व्यवस्था में लगे लोगों को मौनिटीरिंग का पूरा अवसर देने के लिए किया जाता है। मतगणना के लिए एक अलग तिथि निर्धारित की जाती है लेकिन मतगणना एक ही दिन सम्पन्न किए जाते हैं।

मतदान शुरू होना (Voting starts)

सार्वजनिक स्थलों पर मतदान केन्द्र (polling stations) स्थापित किए जाते हैं, जैसे-विद्यालय या सामुदायिक भवन आदि लेकिन मतदान गुप्त होता है। अधिक से अधिक मतदाता मताधिकार का प्रयोग करें, इसके लिए निर्वाचन आयोग यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक मतदाता से मतदान केन्द्र की दूरी 2 कि. मी. से अधिक नहीं हो साथ ही किसी भी मतदान केन्द्र में 500 से अधिक मतदाता नहीं आएँ।

मतदान केन्द्र में प्रवेश करते ही मतदाता का नाम मतदाता सूची में देख-मिलाकर, उसे एक मतदान पत्र प्रदान किया जाता है। इसके बाद मतदान केंद्र में ही बने एक छोटे से कक्ष में मतदान की प्रक्रिया पूरी की जाती है।

ईवीएम का पहली बार 1982 में केरल के 70-पारुर विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र में इस्तेमाल किया गया था। 2003 में सभी राज्य चुनावों और उप-चुनावों में ई.वी. एम का उपयोग किया गया। ये प्रयोग पूरी तरह से सफल रहा था इसके बाद चुनाव आयोग ने 2004 में लोकसभा चुनावों में केवल EVM का उपयोग किया और अब तो ये एक आम बात है। EVM और VVPAT↗️ के बारे में और जानें।

मतगणना (Counting of votes)

जब मतदान सम्पन्न हो जाता है चुनाव अधिकारी तथा पर्यवेक्षक की देखरेख में नियत समय में मतगणना की प्रक्रिया आरंभ होती है। मतगणना समाप्त होने के पश्चात्‌ चुनाव अधिकारी सबसे अधिक मत पाने वाले उम्मीदवार का नाम विजयी उम्मीदवार के रूप में घोषित करते हैं।

चुनाव प्रक्रिया की समाप्ति

आयोग निर्वाचित सदस्यों की सूची बनाता है तथा सदन के गठन के लिए उपयुक्त अधिसूचना जारी करता है। इसी के साथ चुनाव की प्रक्रिया सम्पन्न हो जाती है तथा लोकसभा के मामले में राष्ट्रपति तथा विधानसभाओं के लिए संबंधित राज्यों के राज्यपाल सदन/सदनों का सत्र आहूत करते हैं।

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चुनाव प्रक्रिया based on,

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मूल संविधान
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