आपातकाल एक ऐसी अप्रत्याशित घटना थी जिसके बारे में उस समय के लोग सपने में भी नहीं सोच सकते थे कि अपनी ही सरकार कुछ ऐसा करेगी, लेकिन ऐसा हुआ,

इस लेख में हम 1975 में, हमारे तब के प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल (Emergency) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे एवं इसके विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं को समझने का प्रयास करेंगे।

आपातकाल 1975

विषय सूची

आपातकाल की पृष्ठभूमि

हमारे पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जी का अपने कार्यकाल के दौरान ही (27 मई 1964) देहांत हो जाता है। उसके बाद 9 जून 1964 से भारत के दूसरे प्रधानमंत्री के रूप में लाल बहादुर शास्त्री जी आते हैं, पर एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना में उनकी भी मृत्यु (11 जनवरी 1966) हो जाती है। चूंकि लोकसभा चुनाव 1967 में होना होता है और काँग्रेस बहुमत में होता है इसीलिए बचे हुए कार्यकाल के लिए इन्दिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनाया जाता है।

चुनाव के पश्चात 4 मार्च 1967 को फिर से इन्दिरा गांधी प्रधानमंत्री बनती है और अपने इस कार्यकाल में वे अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश करती हैं, एक अच्छी लीडर के रूप में अपनी पहचान स्थापित करने की कोशिश करती हैं। श्रीमती गांधी अपने कुछ निर्णयों की वजह से उसमें बहुत हद तक सफल भी होती है, जैसे कि जुलाई 1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण करना और सितंबर 1970 में प्रिवी पर्स को समाप्त करना आदि, वंचित वर्गों- गरीबों, दलितों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों में उनका मजबूत समर्थन सुनिश्चित किया। हालांकि श्रीमती गांधी के इन निर्णयों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई जिसमें से कई को सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज कर दिया गया। श्रीमती गांधी को इस सब से काफी झटका लगा।

अगला लोकसभा चुनाव 1972 में होने वाला था मगर इन्दिरा गांधी ने लोकसभा विघटित करके 1971 में ही चुनाव करवा दिया। इससे इनको बहुत फायदा हुआ 518 में अकेले ये 352 सीटें जीत गईं और अखंड बहुमत से सरकार में आयी।

इस बार उन्होने अपने ताकत की आजमाइश की और लगभग हर वो काम की जो वो करना चाहती थी। 1975 में आपातकाल लगाने से पहले 1971-75 के दौरान उन्होने एक पर एक लगातार संविधान संशोधन करके उन सारे परिवर्तनों को अंजाम दिया जो उनके रास्ते में कांटे का काम कर रहा था। इस दौरान उन्होने 14 बार संविधान संशोधन किया। ये संविधान संशोधन कुछ इस प्रकार है;

24वां संविधान संशोधन

ये संशोधन प्रसिद्ध गोलकनाथ मामले को पलटने के लिए था। दरअसल गोलकनाथ मामला जमीन से जुड़ा हुआ था जिसे कि सरकार द्वारा अधिगृहीत कर लिया गया था ताकि जमींदारी प्रथा को खत्म किया जा सके लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 1967 में इस पर फैसला सुनाते हुए कहा था कि सरकार ऐसा कुछ भी नहीं कर सकती है। और ये फैसला इन्दिरा गांधी को पसंद नहीं आया था इसीलिए 1971 में सरकार बनते ही सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट के इसी फैसले को खारिज कर दिया। [विस्तार से जानने के लिए संविधान की मूल संरचना↗️ पढ़ें]

25वां संविधान संशोधन

दरअसल 1969 में जब इन्दिरा गांधी ने 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया (यानी कि अधिग्रहण करके सरकार के कंट्रोल में ला दिया) तो आर सी कूपर नामक एक व्यक्ति इसे सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आर सी कूपर के पक्ष में गया और एक बार फिर इन्दिरा गांधी को झटका लगा। इसीलिए जुलाई 1971 में संविधान में 25वां संविधान संशोधन करके सुप्रीम कोर्ट के उस मामले को पलट दिया और ऐसा करके बैंकों के राष्ट्रीयकरण को वैध बना दिया। [विस्तार से समझने के लिए बैंक राष्ट्रीयकरण मामला↗️ जरूर पढ़ें]

26वां संविधान संशोधन

आजादी के समय लगभग साढ़े पाँच सौ से अधिक राज-रजवाड़ों को भारत में मिलाया गया था। तभी जाकर आज जैसा भारत दिख रहा है वैसा हो पाया। इन राज-रजवाड़ों को अनुच्छेद 291 और अनुच्छेद 362 के तहत क्रमशः प्रिवी पर्स (एक प्रकार का शाही भत्ता) और कुछ विशेषाधिकार दिया गया था। प्रिवी पर्स के नाम पर आजादी के समय जो 5000 रुपया सालाना मिलता था वो 70 के दशक में लाखों में चला गया था। ऊपर से अनुच्छेद 362 के तहत उसे राजा का टाइटल भी मिलता था। एक तरफ गरीबी चरम पर था और दूसरी तरफ फ्री में इन सैंकड़ों राज-रजवाड़ों को सरकारी पैसा देना पड़ता था।

इन्दिरा गांधी को ये बात कुछ हजम नहीं हुई और सितंबर 1970 में राष्ट्रपति द्वारा एक आदेश निकलवाकर प्रिवी पर्स और सारे विशेषाधिकारों को खत्म करवा दिया। इन राज-रजवाड़ों में से कुछ ने सुप्रीम कोर्ट में इसे चैलेंज कर दिया और सुप्रीम कोर्ट ने फैसला इन राज-रजवाड़ों के पक्ष में दे दिया। यानी कि इन्दिरा गांधी एक तरह से फिर से हार गई थी।

इसीलिए सरकार बनते ही जुलाई 1971 में संविधान में 26वां संविधान संशोधन करके अनुच्छेद 291 और 362 को संविधान से हटा ही दिया। और अनुच्छेद 366(22) में लिखवा दिया कि अब राजा का बेटा राजा नहीं कहलाएगा बल्कि उत्तराधिकारी कहलाएगा। इस तरह से राज-रजवाड़ों के शाही ठाट-बाट, शान-ओ-शौकत एवं हाथी पर बैठकर घूमना सब खत्म हो गया।

27वां संविधान संशोधन

इस संविधान संशोधन के माध्यम से दिसम्बर 1971 में मिज़ोरम को केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दिया गया था जिसके पास विधानमंडल भी था। हालांकि आगे चलकर 1987 में इसे पूर्ण राज्य का दर्जा दे दिया गया। यहाँ याद रखने वाली बात ये है कि इसके ठीक बाद जनवरी 1972 में मेघालय, त्रिपुरा और मणिपुर को राज्य का दर्जा दे दिया गया। इसके पीछे का मुख्य वजह 1971 का भारत-पाक युद्ध और उससे उत्पन्न शरणार्थी समस्या को माना जाता है। [विशेष जानकारी के लिए भारतीय राज्यों के बनने की कहानी↗️ पढ़ें]

28वां संविधान संशोधन

स्वतंत्रता से पहले नियुक्त किए गए सिविल सेवकों को कुछ विशेषाधिकार मिलता था उसे खत्म करने या उसमें परिवर्तन करने की शक्ति इस संविधान संशोधन के माध्यम से संसद को दे दी गई।

29वां संविधान संशोधन

ये वहीं संविधान संशोधन है जिसके चलते केशवानन्द भारती मामले का जन्म हुआ। दरअसल केरल के मठ के संचालक केशवानन्द भारती के मठ की भूमि का केरल भूमि सुधार (संशोधित) अधिनियम 1969 के तहत अधिग्रहण (Acquisition) कर लिया गया। और इस कानून को 29वें संविधान संशोधन 1972 द्वारा 9वीं अनुसूची में डाल दिया गया। (नौंवी अनुसूची में इसीलिए डाला जाता था ताकि न्यायालय उस कानून की समीक्षा न कर सके)

केशवानन्द भारती इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया और 1973 में जो सुप्रीम का फैसला आया वो इतिहास बन गया। संविधान की मूल संरचना का सिद्धांत यही से आया था। [विस्तार से समझने के लिए संविधान की मूल संरचना↗️ पढ़ें]

30वां संविधान संशोधन

ये संविधान संशोधन इस मामले से संबंधित है कि उच्च न्यायालय से सिविल विषयों से जुड़ा कौन सा अपील उच्चतम न्यायालय भेजा जा सकता है। पहले जहां सभी मामलों को उच्च न्यायालय से उच्चतम न्यायालय में अपील की जा सकती थी वहीं अब इसमें कुछ शर्त जोड़ दिया गया। इसे विस्तार से समझने के लिए उच्चतम न्यायालय का क्षेत्राधिकार↗️ पढ़ें। कहा जाता है कि श्रीमती गांधी अपने बेटे संजय गांधी को किसी अपराध के सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट से बचाने के लिए ये संशोधन किया था।

31वां संविधान संशोधन

संसद में लोकसभा सीटों की संख्या 525 से बढ़ाकर 545 कर दिया गया। ऐसा उत्तर पूर्व भारत में गठित नए राज्यों और 1971 के परिसीमन के परिणामस्वरूप हुआ था। इसके तहत अनुच्छेद 81, 300 और 302 में संशोधन किया गया था।

32वां संविधान संशोधन

आंध्र प्रदेश में तेलंगाना क्षेत्र के लोगों की आकांक्षा के अनुसार उनकी संतुष्टि के लिए विशेष उपबंध किया गया था। हालांकि आगे चलकर 2014 में तेलंगाना एक नया राज्य ही बना दिया गया।

33वां संविधान संशोधन

इसके माध्यम से अनुच्छेद 101 और अनुच्छेद 190 में संशोधन करके ये व्यवस्था कर दिया गया कि संसद और राज्य विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा दिये गए इस्तीफे का सत्यापन पीठासीन अधिकारी का द्वारा किया जाएगा और यदि पीठासीन अधिकारी को ये लगता है कि इस्तीफा स्वैच्छिक या असली नहीं है तो वह ऐसे त्यागपत्र को स्वीकार नहीं करेगा।

34वां संविधान संशोधन

इस संविधान संशोधन के माध्यम से विभिन्न राज्यों के बीस भू-सुधार एवं भू-पट्टेदारी (Land Tenure) अधिनियम को नौवीं अनुसूची में डाला गया।

35वां संविधान संशोधन

पहले सिक्किम भारत के संरक्षण में रहने वाला एक अलग देश था। इस संविधान संशोधन के माध्यम से 1974 में सिक्किम की संरक्षण व्यवस्था को बर्खास्त करते हुए उसे भारतीय संघ का सहयोगी राज्य बनाया गया। इसकी सेवा शर्तों को 10वीं अनुसूची बनाकर उसमें डाल दिया गया।

36वां संविधान संशोधन

इस संशोधन अधिनियम के माध्यम से सिक्किम को मार्च 1975 में भारतीय संघ के भीतर एक पूर्ण राज्य का दर्जा दे दिया गया।

37वां संविधान संशोधन

इसके माध्यम से मई 1975 में केंद्र शासित अरुणाचल प्रदेश के लिए विधान सभा और मंत्रिपरिषद की व्यवस्था की गई।

कुल मिलाकर 1971 में इन्दिरा गांधी की सरकार बनने के बाद जितने भी संविधान संशोधन हुए है उसमें से कुछ को निकाल दें तो अधिकतर मामलों में ऐसा प्रतीत होता है जैसे वे अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए ऐसा किया हो। इससे इन्दिरा गांधी के नेचर को समझा जा सकता है कि वे किस तरह के इंसान थे। क्योंकि आमतौर पर संविधान में इतने संशोधन नहीं हुए है अगर डॉ. मनमोहन सिंह के दस साल के कार्यकाल को देखें तो मुश्किल से 7-8 संशोधन हुए है वहीं श्रीमती गांधी के कार्यकाल की बात करें तो जब तक आपातकाल खत्म हुआ तब तक (6 सालों के दरम्यान) 19 संविधान संशोधन हुए, उसमें भी 42वां संविधान संशोधन तो पूरा संविधान लिखने जैसा ही था।

अब आइये समझते हैं कि 1971 से 1975 के बीच देश की स्थिति क्या थी। क्योंकि इससे इन्दिरा गांधी के फैसले लेने के पीछे के मनोभाव को समझा जा सकता है।

आपातकाल से पहले 1971 से 1975 के बीच देश की स्थिति

उस समय देश की स्थिति कुछ खास अच्छी नहीं थी। 1962, 65 और 71 का युद्ध बजट को बिगाड़ चुका था। महंगाई अचानक से बढ़ती चली गई, कुछ राज्यों में सूखा और अकाल की स्थिति उत्पन्न हो जाने से सरकार पर और दबाव बन रहा था। धीरे-धीरे सरकार के खिलाफ लोगों में आक्रोश भी बढ़ता गया जो कि जो कि अलग-अलग विरोध प्रदर्शनों के जरिये दिखाई देने लगा। कुछ चीजों ने तो बहुत ही ज्यादा बुरा प्रभाव डाला, जैसे कि –

1. शरणार्थी संकट (refugee crisis)

एक अनुमान के मुताबिक लगभग 1 करोड़ अवैध पूर्वी पाकिस्तानी (अब बांग्लादेशी) लोग 1971 के जंग के दौरान भारत आ गए थे। UNHCR की द स्टेट ऑफ़ द वर्ल्ड रिफ्यूजीज़ -2000 ’की रिपोर्ट के अनुसार, मार्च-अप्रैल के दौरान, एक महीने के भीतर, पूर्वी पाकिस्तान में सैन्य दमन से भागकर, लगभग एक मिलियन (10 लाख) शरणार्थियों ने भारत में प्रवेश किया था। रिपोर्ट के अनुसार, “मई के अंत तक, भारत में औसत दैनिक प्रवाह 100,000 से अधिक था और लगभग चार मिलियन तक पहुंच गया था।”

उस समय भारत एक 24 वर्षीय युवा गणराज्य था और इसकी अर्थव्यवस्था कमजोर थी। (उस समय इसकी जीडीपी $ 65.9 बिलियन थी। ये कितना कम था इसका अंदाजा 2014 के जीडीपी से लगा सकते हैं। 2014 में जीडीपी 2,066.90 बिलियन डॉलर थी।) हालांकि हरित क्रांति के कारण भारत में खाद्यान उत्पादन अच्छी स्थिति में था लेकिन इतनी भी अच्छी नहीं थी कि 1 करोड़ लोगों को फ्री में खिला सकें, क्योंकि युद्ध लड़ने के कारण वैसे भी काफी धन और संसाधन गंवाना पड़ा था, इसलिए, 10 मिलियन अतिरिक्त आत्माओं की मेजबानी करना कोई छोटा काम नहीं था।

2. तेल संकट (oil crisis 1973)

1973 का तेल संकट अक्टूबर 1973 में शुरू हुआ जब अरब पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन के सदस्यों ने एक तेल embargo (एक प्रकार का प्रतिबंध) की घोषणा की। ये उन देशों पर लागू होता था जो कि योम किप्पुर युद्ध में इस्राइल का समर्थन कर रहे थे जैसे कि कनाडा, जापान, नीदरलैंड, यू के, अमेरिका आदि। इससे हुआ ये कि तेल की कीमत लगभग 300% बढ़ गया। और वैश्विक राजनीति एवं वैश्विक अर्थव्यवस्था पर कई छोटे और दीर्घकालिक प्रभाव पड़ा। इंडिया के सामने भी इसने एक बड़ी चुनौती पेश की।

3. गरीबी और महंगाई

हालांकि इन्दिरा गांधी सत्ता में आयी तो थी गरीबी हटाओ का नारा देकर लेकिन उस दौरान गरीबी घटने के दौरान बढ़ ही गया। योजना आयोग के रिपोर्ट के मुताबिक 1973-74 के दौरान उस समय देश के कुल आबादी का लगभग 55 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे अपना जीवन यापन कर रहा था। साथ ही 1973 में लगभग 17 प्रतिशत महंगाई बढ़ गई थी।

कुल मिलाकर भारत की स्थिति का अंदाजा ऊपर दिये गए तथ्यों से लगाया जा सकता है कि देश कितने बड़े संकट से गुजर रहा था। और इतना कम नहीं था कि राजनैतिक अस्थिरता ने देश को पूरी तरह से हिला के रख दिया। आपातकाल लगने के पीछे तत्कालीन कारण यही था।

आइये अब देखते हैं कि आपातकाल लगने से ठीक पहले देश में क्या सब हुआ।

आपातकाल लगने के पीछे का तात्कालिक कारण

नव निर्माण आंदोलन

दिसंबर 1973 में, अहमदाबाद में L. D. College of Engineering के छात्रों ने स्कूल की फीस में बढ़ोतरी के विरोध में हड़ताल की। एक महीने बाद, गुजरात विश्वविद्यालय के छात्रों ने राज्य सरकार को बर्खास्त करने की मांग करते हुए विरोध प्रदर्शन किया। इसने इस आंदोलन को ‘नवनिर्माण आंदोलन’ या उत्थान के लिए आंदोलन कहा।

इस समय गुजरात में मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल के नेतृत्व में कांग्रेस का शासन था। जो कि भ्रष्टाचार के कारण ”चिमन चोर” के रूप में जाना जाता था। छात्र ने सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया और जल्द ही कारखाने के श्रमिकों और समाज के अन्य क्षेत्रों के लोग इसमें शामिल हो गए। पुलिस के साथ झड़पें, बसों और सरकारी कार्यालयों को जलाना और राशन की दुकानों पर हमले रोजमर्रा की घटना बन गए। फरवरी 1974 तक, केंद्र सरकार को कारवाई करने को मजबूर होना पड़ा। इसने विधानसभा को निलंबित कर दिया और राज्य पर राष्ट्रपति शासन लगा दिया। हालांकि मोरारजी देसाई के निरंतर आंदोलन और आमरण अनशन के कारण, इंदिरा गांधी ने विधानसभा भंग कर दी और जून में नए चुनाव की घोषणा की।

जेपी आंदोलन

गुजरात के नक्शेकदम पर चलते हुए या इसकी सफलता से प्रेरित होकर, बिहार में एक समान आंदोलन शुरू किया गया था। बिहार में मार्च 1974 में एक छात्र विरोध प्रदर्शन हुआ, जिस पर विपक्षी दलों ने अपनी ताकत झोंक दी। जल्द ही यह आंदोलन 71 वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में आ गया, जिसे लोकप्रिय रूप से जेपी कहा जाता था।

बिहार के मामले में, इंदिरा गांधी ने विधानसभा के निलंबन को स्वीकार नहीं किया। स्वतंत्रता संग्राम के एक नायक, जेपी राष्ट्रवादी आंदोलन के दिनों से अपनी निस्वार्थ सक्रियता के लिए जाने जाते थे। “उनकी प्रविष्टि ने संघर्ष को काफी बढ़ावा दिया, और इसका नाम भी बदल दिया; बिहार आंदोलन ’अब’ जेपी आंदोलन ’बन गया था। जेपी ने छात्रों को कक्षाओं का बहिष्कार करने और समाज की सामूहिक चेतना को बढ़ाने के लिए काम करने के लिए प्रेरित किया। पुलिस, अदालतों, और कार्यालयों के साथ बड़ी संख्या में झड़पें हुईं, स्कूल और कॉलेज बंद हो रहे थे।

जून 1974 में, जेपी ने पटना की सड़कों से एक बड़े जुलूस का नेतृत्व किया, जिसे ‘संपूर्ण क्रांति’ कहा गया। उन्होंने असंतुष्टों से मौजूदा विधायकों पर इस्तीफा देने का दबाव बनाने का आग्रह किया, ताकि कांग्रेस सरकार को गिराया जा सके। जल्द ही जेपी एक ऐसे लोकप्रिय नेता के रूप में देखा जाने लगा, जो इन्दिरा गांधी के खिलाफ खड़े होने के लिए सबसे उपयुक्त थे। इन्दिरा गांधी ने जेपी को मार्च 1976 के आम चुनावों में उनका सामना करने के लिए चुनौती दी। जेपी ने चुनौती स्वीकार की पर जल्द ही इन्दिरा गांधी ने आपातकाल लागू कर दिया।

रेलवे हड़ताल

जब बिहार आंदोलनों में जल रहा था, तब समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडीस की अगुवाई में रेलवे हड़ताल पर था। मई 1974 में तीन सप्ताह तक हड़ताल चली, इसके परिणामस्वरूप माल और लोगों की आवाजाही रुक गई। इन्दिरा गांधी के आदेश से हजारों कर्मचारियों को गिरफ्तार किया गया और उनके परिवारों को उनके क्वार्टर से बाहर निकाल दिया गया।

राजनारायन मामला

इन्दिरा गांधी के सामने एक नया खतरा इलाहाबाद हाई कोर्ट में समाजवादी नेता राज नारायण द्वारा दायर याचिका के रूप में सामने आया जो इन्दिरा गांधी से चुनाव हार गए थे। याचिका में प्रधानमंत्री पर भ्रष्ट आचरण के माध्यम से चुनाव जीतने का आरोप लगाया गया था। यह आरोप लगाया गया कि उसने अनुमति से अधिक पैसा खर्च किया और उसका अभियान सरकारी अधिकारियों द्वारा चलाया गया। 12 जून, 1975 को, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इन्दिरा गांधी के चुनाव को शून्य घोषित कर दिया। लेकिन उन्हें सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने के लिए 20 दिनों का समय दिया गया।

24 जून को, सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय के आदेश पर सशर्त रोक लगा दी: इससे हुआ ये कि इन्दिरा गांधी संसद में उपस्थित हो सकते थे, लेकिन जब तक अदालत ने उनकी अपील पर फैसला नहीं सुनाया, तब तक उन्हें मतदान करने की अनुमति नहीं थी। इस फैसले ने जेपी आंदोलन को और गति दी, और अब प्रधानमंत्री के इस्तीफे की उनकी मांग की जाने लगी।

25 जून को जयप्रकाश नारायण ने रैली की और 29 जून तक सत्ता छोड़ने की डेडलाइन दे दी। अब इन्दिरा गांधी को कोई और रास्ता नजर नहीं आया और आधी रात को आपातकाल लगा दिया गया। और 3 बजे सुबह ही सारे मुख्य नेताओं को जेल में डाल दिया गया।

गौरतलब है कि 1971 में जो आपातकाल लगा था वो अभी भी चल रहा था लेकिन वो बाह्य आक्रमण (External attack) के आधार पर लगाया गया था जबकि ये वाला आंतरिक गड़बड़ी (Internal disturbances) के आधार पर लगाया गया था।

आंतरिक गड़बड़ी किसे माना जाये; संविधान में ये स्पष्ट नहीं किया गया था और इसी का फायदा इन्दिरा गांधी को मिला। इसी का परिणाम था कि 44वें संविधान संशोधन 1978 के द्वारा इस आंतरिक गड़बड़ी को हटाकर सशस्त्र विद्रोह कर दिया गया।

आपातकाल का प्रभाव

लोकतंत्र का एक श्याह पहलू लोगों ने उन 21 महीनों के दौरान महसूस किया, जब संवैधानिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया, अभिव्यक्ति की आजादी छीन ली गई, प्रेस की स्वतंत्रता को कुचल दिया गया, सैकड़ों राजनेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं ट्रेड यूनियन के नेताओं आदि को सिर्फ इसीलिए जेल में डाल दिया गया क्योंकि वे इन्दिरा गांधी के नीतियों और निर्णयों के खिलाफ थे। मानवाधिकारों को ठेंगा दिखाते हुए 1976-77 के दौरान लगभग 83 लाख लोगों को उसकी इच्छा के विरुद्ध नसबंदी करवा दी गई।

लोकतंत्र में विश्वास रखने वाला शायद ही कोई व्यक्ति इस दिन की कल्पना की हो। श्रीमती गांधी ने लोगों को ये एहसास करवा दिया कि लोकतंत्र भी तानाशाही रुख अख़्तियार कर सकता है। उन्होने, जो मन में आया; किया, जिसमें अपना हित नजर आया; किया। संविधान में कई गैर-जरूरी परिवर्तन किए, न्यायालय की शक्ति को कम या कंट्रोल करने की कोशिश की। यही सब वो कारण है जिसके चलते 25 जून 1975 को लोकतंत्र का काला दिन कहा जाता है।

आपातकाल के दौरान संवैधानिक संशोधन

सबसे पहले उन्होने 38वां संविधान संशोधन करके राज्यपाल एवं राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति को बढ़ा दिया। साथ ही अनुच्छेद 352, 356 और 360 के तहत लगने वाले आपातकाल को न्यायिक समीक्षा से बाहर कर दिया। हालांकि 44वां संविधान संशोधन 1978 द्वारा इसे खारिज कर दिया गया।

39वां संविधान संशोधन द्वारा इलाहाबाद हाइ कोर्ट के फैसले से निपटा गया। इसके तहत जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में संशोधन करके धारा 8क जोड़ा गया जिसके तहत सजा माफ करवाने के लिए राष्ट्रपति के पास जाने की व्यवस्था कर दी गई। साथ ही धारा 123(7) भी जोड़ा गया जिसमें लिखवा दिया गया कि सरकारी अधिकारी का चुनाव में मदद गलत नहीं माना जाएगा।

अनुच्छेद 71 में संशोधन करके लिखवा दिया गया कि राष्ट्रपति का चुनाव किसी भी हालत में नहीं रुकेगा। भले ही राष्ट्रपति को चुनने वाले निर्वाचक मण्डल में से कुछ सदस्य कम हो।

सबसे बड़ा संशोधन था 42वां संविधान संशोधन। इसके तहत इतनी बड़ी मात्रा में संविधान संशोधन किया गया कि इसे लघु संविधान भी कहा गया। इसके तहत अनुच्छेद 31, 31C, 39, 55, 74, 77, 81, 82, 83, 100, 102, 103, 105, 118, 145, 150, 166, 170, 172, 189, 191, 192, 194, 208, 217, 225, 226, 227, 228, 311, 312, 330, 352, 353, 356, 357, 358, 359, 366, 368 and 371F को संशोधित किया गया।
साथ ही अनुच्छेद 31D, 32A, 39A, 43A, 48A, 131A, 139A, 144A, 226A, 228A and 257A को संविधान में जोड़ा गया।
संविधान में दो नए भाग 4A and 14A जोड़ा गया। और अनुसूची 7 को संशोधित किया गया।

कुल मिलाकर यही है 1975 का आपातकाल, उम्मीद है समझ में आया होगा। अन्य लेखों को भी अवश्य पढ़ें।

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Article Based On,
एम लक्ष्मीकान्त – भारत की राजव्यवस्था↗️
List of amendments of the Constitution of India
THE CONSTITUTION (AMENDMENT) ACTS
मूल संविधान
How India responded to the influx of 10 million refugees
India Inflation Rate 1960-2021
Poverty index
https://indianexpress.com/article/research/four-reasons-why-indira-gandhi-declared-the-emergency-5232397/ आदि।

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