राष्ट्रपति के बारे में सब कुछ जानिए (Basics of President in hindi)

इस लेख में हम राष्ट्रपति (President) के बारे में संबन्धित अनुच्छेदों की मदद से सरल और सहज चर्चा करेंगे।

राष्ट्रपति

राष्ट्रपति: पृष्ठभूमि
(President: Background)

जैसा कि हमने पिछले लेख में चर्चा किया है संविधान के भाग 5 में अनुच्छेद 52 से लेकर 78 तक राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्रिमंडल और महान्यायवादी (Attorney General) की चर्चा की गयी है।

संघ के स्तर पर ये पाँच मुख्य कार्यपालिका है। जो कि प्रत्यक्षतः देश के कार्यपालक गतिविधियों को हैंडल करते हैं।

🔳 इस लेख में हम राष्ट्रपति (President) के बारे में चर्चा करेंगे। क्योंकि संविधान में ज़्यादातर चीज़ें राष्ट्रपति के बारे में ही है।

राष्ट्रपति_(President) के पास भले ही उतनी कार्यपालक शक्तियाँ नहीं होती है। लेकिन संविधान में सबसे ज्यादा अनुच्छेदों में चर्चा उसी के बारे में की गयी है।

🔳 आप खुद ही सोचिए कि प्रधानमंत्री जो कि वास्तविक कार्यपालक (Real executive) है, उसे संविधान में 3 से 4 अनुच्छेदों में ही निपटा दिया गया है। अन्य कार्यपालक की भी कमोबेश यही स्थिति है।

लेकिन राष्ट्रपति_(President) को बहुत ज्यादा विस्तार में वर्णित किया गया है। आप पाएंगे कि जैसे मुख्य फोकस राष्ट्रपति पर ही किया गया है। ऐसा क्यों है?

🔹 इसका एक कारण ये है कि भारत का संवैधानिक प्रमुख (Constitutional head) राष्ट्रपति ही होता है। और प्रधानमंत्री राष्ट्रपति के नाम पर ही सभी कार्यपालक काम करते हैं।

🔹 दूसरा कारण ये है कि हमने संसदीय व्यवस्था (Parliamentary system) संघीय चरित्र (Federal character) के साथ अपनायी है। ऐसे में राष्ट्रपति का पद का प्रतिकात्मक (Symbolic) होना ज्यादा अचरज में नहीं डालता है।

बहरहाल आइये राष्ट्रपति_(President) के बारे में चर्चा करते हैं, लेख थोड़ा लंबा हो सकता है इसीलिए धैर्य के साथ पढ़ें।

राष्ट्रपति (President)

🔷 संविधान के अनुच्छेद 52 के तहत देश में राष्ट्रपति_(President) की व्यवस्था की गयी है। यानी कि ये एक संवैधानिक पद है। जैसाकि हमने ऊपर भी चर्चा किया है कि राष्ट्रपति, भारत के इस संसदीय व्यवस्था में प्रतीक मात्र है।

करने का सारा काम तो प्रधानमंत्री ही करते हैं। यें बातें अनुच्छेद 53, अनुच्छेद 74 और अनुच्छेद 75 से स्पष्ट हो जाती है। वो कैसे?

🔷 अनुच्छेद 53 कहता है कि संघ की कार्यपालक शक्तियाँ राष्ट्रपति_(President) में निहित होगी और वह इस शक्ति का प्रयोग या तो स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के द्वारा करेगा।

बेशक उनके पास कुछ कार्यपालक शक्तियाँ होती भी है जिसका इस्तेमाल वे स्वयं करते हैं और अपने अधीनस्थ के माध्यम से करते हैं। इसके बारे में आगे जानेंगे।

🔷 पर असली बात अनुच्छेद 74 और 75 से पता चलता है। अनुच्छेद 74 के अनुसार राष्ट्रपति को सहायता और सलाह के लिए मंत्रिपरिषद (Council of Ministers) होगा, जिसका अध्यक्ष प्रधानमंत्री (Prime minister) होगा।

🔹 अनुच्छेद 74 के लाइन को पढ़ें तो उसमें सलाह और सहायता लिखा गया है, लेकिन होता ये है कि प्रधानमंत्री जो कहते हैं आमतौर पर राष्ट्रपति उसे मना भी नहीं कर पाते हैं।

ऐसा लगता है मानो राष्ट्रपति ही, प्रधानमंत्री के लिए काम करता है। और ऐसा होने के पीछे का कारण आप अनुच्छेद 75 में देख सकते हैं।

🔹 अनुच्छेद 75 कहता है कि मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी (Responsible) होगी। यानी कि मंत्रिपरिषद सीधे जनता के प्रति उत्तरदायी होगा। क्योंकि लोकसभा में सभी जनता के प्रतिनिधि ही तो बैठे हैं।

मंत्रिपरिषद का अध्यक्ष चूंकि प्रधानमंत्री होता है इसिलिए कह सकते हैं कि प्रधानमंत्री जनता के प्रति उत्तरदायी होता है।

🔹 अब अगर प्रधानमंत्री को जनता के प्रति उत्तरदायी बनाया गया है तो राष्ट्रपति प्रतीक मात्र ही होगा न।

इसीलिए तो राष्ट्रपति_(President) को सीधे जनता द्वारा नहीं चुना जाता है। बल्कि अप्रत्यक्ष विधि द्वारा चुना जाता है। ताकि राष्ट्रपति को वास्तविक कार्यपालिका बनने से रोका जाये।

🔹 अगर राष्ट्रपति_(President) को भी जनता द्वारा सीधे चुना जाता तो सत्ता संघर्ष में ही आधा कार्यकाल बीत जाता।

पर जो भी हो, हमारे संविधान निर्माताओं ने इसे समझा और राष्ट्रपति_(President) को एक मूर्ति बनाकर बैठा दिया। एक ऐसा मूर्ति जो कि कभी-कभी हिलता-डुलता भी है।

राष्ट्रपति चुनाव
(presidential election)

✅ राष्ट्रपति_(President) का चुनाव बड़ा ही दिलचस्प होता है, अच्छे-अच्छों को जल्दी समझ में नहीं आता है, इसीलिए ये दिलचस्प है, कुछ भी कहिए।

मुख्य रूप से देखें तो अनुच्छेद 54, अनुच्छेद 55, अनुच्छेद 57, अनुच्छेद 58, अनुच्छेद 62 और अनुच्छेद 71 राष्ट्रपति चुनाव को अच्छे से व्याख्यायित (Explained) कर देता है।

फिर भी हम सभी अनुच्छेदों को जानेंगे, क्योंकि वे भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।

अनुच्छेद 54 में ये बताया गया है कि राष्ट्रपति का चुनाव होगा और राष्ट्रपति चुनने का काम निर्वाचक मंडल (Electoral College) करेंगे।

अब ये निर्वाचक मंडल (Electoral College) क्या है? इसके बारे में भी उसी में बता दिया गया है कि निर्वाचक मंडल तीन प्रकार के लोगों का एक समूह होगा। ये तीन प्रकार के लोग निम्न है।

🔷 1. संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य
🔷 2. राज्य विधानसभा के निर्वाचित सदस्य

🔷 3. केंद्रशासित प्रदेशों दिल्ली व पुडुचेरी विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य। अब जम्मू-कश्मीर भी इसमें जुड़ जाएगा।

यहाँ दो बातें ध्यान रखिए कि सिर्फ निर्वाचित सदस्य (Elected members) ही इसमें भाग ले सकते हैं। मनोनीत सदस्य (Nominated member) नहीं।

यानी कि जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से चुन के आया है वही इसमें भाग ले सकता है, वो नहीं जिसको की राष्ट्रपति ने मनोनीत किया है।

दूसरी बात ये कि अब चूंकि जम्मू-कश्मीर भी एक विधानमंडल के साथ केन्द्रशासित प्रदेश बन चुका है इसीलिए उसके निर्वाचित सदस्य अब भी राष्ट्रपति चुनाव में भाग ले सकेंगे।

✅ अनुच्छेद 55, राष्ट्रपति का चुनाव कैसे होगा? उसके बारे में है। राष्ट्रपति का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportional representation) पर आधारित एकल हस्तांतरणीय मत पद्धत्ति (Single transferable vote method) के द्वारा होता है।

चूंकि राष्ट्रपति चुनाव थोड़ा काम्प्लिकेटेड और दिलचस्प है इसीलिए उसे एक अलग लेख में कवर करते हैं। ताकि चीज़ें बिलकुल स्पष्ट रहे।

⏫उस दिलचस्प लेख को ↗️यहाँ से पढ़ें

राष्ट्रपति की पदावधि
(Presidential term of office)

अनुच्छेद 56 राष्ट्रपति_(President) की पदावधि (Presidential term of office) के बारे में है।

🔷 राष्ट्रपति_(President) की पदावधि उसके पद धारण करने की तिथि से पाँच वर्ष तक होती है। हालांकि वह अपनी पदावधि में किसी भी समय अपना त्यागपत्र उप-राष्ट्रपति को दे सकता है।

इसके अतिरिक्त, कार्यकाल पूरा होने के पूर्व उस पर महाभियोग चलाकर भी उसके पद से हटाया जा सकता है।

अनुच्छेद 57पुनर्निर्वाचन के लिए राष्ट्रपति की पात्रता (President’s eligibility for re-election) के बारे में है।

इसके बारे में प्रावधान ये है कि जब तक उत्तराधिकारी पद ग्रहण न कर ले राष्ट्रपति_(President) अपने पाँच वर्ष के कार्यकाल के उपरांत भी पद पर बना रह सकता है।

और दूसरी बात कि वह इस पद पर पुनः निर्वाचित हो सकता है। वह कितनी ही बार पुनः निर्वाचित हो सकता है।

💢💢 हालांकि आमतौर पर ऐसा होता नहीं है, ऐसा इसीलिए क्योंकि जब डॉ. राजेंद्र प्रसाद दो बार राष्ट्रपति चुने गए थे, तो बहुत से लोगों के आँखों में वे खटकने लगे थे।

जिनमें से एक थे पंडित नेहरू। पंडित नेहरू का डॉ. प्रसाद के साथ बनता नहीं था। इसीलिए वे नहीं चाहते थे कि वे फिर से तीसरी बार भी राष्ट्रपति बन जाये।

इसलिए उन्होने संविधान संशोधन करके राष्ट्रपति पद के टर्म को निश्चित कर देने की कोशिश की। (जैसे कि अमेरिका में होता है वहाँ एक व्यक्ति दो बार से अधिक राष्ट्रपति नहीं बन सकता।)

ये बात जब डॉ. राजेंद्र प्रसाद को पता चली तो उन्होने खुद ही तीसरी बार राष्ट्रपति_(President) पद के लिए चुनाव लड़ने से मना कर दिया।

और ये कहा कि इसके लिए कोई संविधान संशोधन करने की आवश्यकता नहीं है, बस एक परंपरा बननी चाहिए कि कोई भी व्यक्ति एक बार या दो बार राष्ट्रपति_(President) बनने के बाद खुद ही अगली बार चुनाव में खड़ा नहीं होगा।

तब से लेकर आज तक एक परंपरा बन गयी है। डॉ. प्रसाद के बाद कोई भी व्यक्ति दो टर्म के लिए राष्ट्रपति_(President) नहीं बना है।

निर्वाचित होने के लिए अर्हताएं
(Qualifications to be elected)

अनुच्छेद 58 राष्ट्रपति निर्वाचित होने के लिए अर्हताओं (Qualifications) के बारे में है।

राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए व्यक्ति की निम्नलिखित अर्हताओं को पूर्ण करना आवश्यक है।

🔷 1. वह भारत का नागरिक हो। 🔷 2. वह 35 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका हो। 🔷 3. वह लोकसभा का सदस्य निर्वाचित होने के लिए अर्हित हो। 🔷 4. वह संघ सरकार में अथवा किसी राज्य सरकार में अथवा किसी स्थानीय प्राधिकरण मे अथवा किसी सार्वजनिक प्राधिकरण में लाभ के पद पर न हो।

🔹 यहाँ ये बात याद रखिए कि एक वर्तमान राष्ट्रपति अथवा उप-राष्ट्रपति, किसी राज्य का राज्यपाल और संघ अथवा राज्य का मंत्री किसी लाभ के पद पर नहीं माना जाता। इस प्रकार वह राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार होता है।

इसके अतिरिक्त राष्ट्रपति_(President) के चुनाव के नामांकन के लिए उम्मीदवार के कम से कम 50 प्रस्तावक (Proposer) व 50 अनुमोदक (Seconder) होने चाहिए।

प्रत्येक उम्मीदवार भारतीय रिजर्व बैंक में 15000 रुपया जमानत राशि के रूप में जमा करता है। यदि उम्मीदवार कुल डाले गए मतो का 1/6 भाग प्राप्त करने में असमर्थ रहता है तो यह राशि जब्त हो जाती है।

🔹 हालांकि 1997 से पूर्व प्रस्तावकों व अनुमोदकों की संख्या दस-दस थी तथा जमानत राशि 2500 थी। 1997 में इसे बढ़ा दिया गया ताकि उन उम्मीदवारों को हतोत्साहित किया जा सकें, जो गंभीरता से चुनाव नही लड़ते है।

राष्ट्रपति पद की शर्ते
(President post’s Conditions)

अनुच्छेद 59 राष्ट्रपति पद की शर्तों (President post’s Conditions) के बारे में है

संविधान द्वारा राष्ट्रपति के पद के लिए निम्नलिखित शर्ते निर्धारित की गयी हैं।

🔷 1. वह संसद के किसी भी सदन अथवा राज्य विधायिका का सदस्य नहीं होना चाहिए। यदि कोई ऐसा व्यक्ति राष्ट्रपति निर्वाचित होता है, तो उसे पद ग्रहण करने से पूर्व उस सदन से त्यागपत्र देना होगा।

🔷 2. वह कोई अन्य लाभ का पद धारण नहीं करेगा। 🔷 3. उसे बिना कोई किराया चुकाए आधिकारिक निवास राष्ट्रपति भवन आवंटित होगा। 🔷 4. उसे संसद द्वारा निर्धारित उपलब्धियों, भत्ते व विशेषाधिकार प्राप्त होंगे। 🔷 5. उसकी उपलब्धियां और भत्ते उसकी पदावधि के दौरान कम नहीं किए जाएँगे।

💢 राष्ट्रपति को अनेक विशेषाधिकार भी प्राप्त हैं। उसे अपने आधिकारिक कार्यों में किसी भी विधिक जिम्मेदारियों से उन्मुक्ति (Immunity) होती है।

अपने कार्यकाल के दौरान उसे किसी भी आपराधिक कार्यवाही से उन्मुक्ति होती है, यहाँ तक कि व्यक्तिगत कृत्य से भी। वह गिरफ्तार नहीं किया जा सकता, न ही जेल भेजा जा सकता हैं,

हालांकि दो महीने के नोटिस देने के बाद उसके कार्यकाल में उस पर उसके निजी कृत्यों के लिए अभियोग (Prosecution) चलाया जा सकता है।

शपथ (Oath)

अनुच्छेद 60 – राष्ट्रपति द्वारा ली जाने वाली शपथ (Oath-taking by the President) के बारे में है।

राष्ट्रपति पद ग्रहण करने से पूर्व शपथ या प्रतिज्ञान लेता है। अपनी शपथ में राष्ट्रपति कहता है, मैं –

🔷 श्रद्धापूर्वक राष्ट्रपति पद का कार्यपालन करूंगा;
संविधान और विधि का परिरक्षन (Preservation), संरक्षण (Protection)और प्रतिरक्षण (Immunization) करूंगा;
भारत की जनता की सेवा और कल्याण में निरत रहूँगा।

उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, राष्ट्रपति को शपथ दिलाते हैं। अगर वे न हो तो उसकी अनुपस्थिति में वरिष्ठतम न्यायाधीश द्वारा राष्ट्रपति को पद की शपथ दिलाई जाती है।

अन्य किसी भी व्यक्ति को जो राष्ट्रपति_(President) के रूप में कार्य करता है अथवा राष्ट्रपति के कर्तव्यों का निर्वाह करता है, इसी प्रकार शपथ लेनी होती है।

महाभियोग (Impeachment)

अनुच्छेद 61 – राष्ट्रपति पर महाभियोग (Impeachment of the President) के बारे में है।

राष्ट्रपति_(President) के द्वारा संविधान का उल्लंघन करने पर महाभियोग चलाकर उसे पद से हटाया जा सकता है।

💠महाभियोग के आरोप संसद के किसी भी सदन में प्रारम्भ किए जा सकते है। इन आरोपों पर सदन के एक चौथाई सदस्यों (जिस सदन में आरोप लगाए गए है) के हस्ताक्षर होने चाहिए और राष्ट्रपति को 14 दिन का नोटिस देना चाहिए।

महाभियोग का प्रस्ताव दो-तिहाई बहुमत से पारित होने के पश्चात यह दूसरे सदन में भेजा जाता है, जिसे इन आरोपों की जांच करनी होती है।

राष्ट्रपति_(President) को इसमें उपस्थित होने तथा अपना प्रतिनिधित्व कराने का अधिकार होगा ।

यदि दूसरा सदन इन आरोपण को सही पाता है और महाभियोग प्रस्ताव को दो तिहाई बहुमत से पारित करता है तो राष्ट्रपति_(President) को प्रस्ताव पारित होने की तिथि से उसके पद से हटना होगा।

💢💢 इस प्रकार महाभियोग संसद की अर्ध-न्यायिक (Quasi-judicial) प्रक्रिया है। इस संदर्भ में दो बातें ध्यान देने योग्य है।

🔷 1. संसद के दोनों सदनों के नामांकित सदस्य जिन्होने राष्ट्रपति के चुनाव में भाग नहीं लिया था, इस महाभियोग में भाग ले सकते हैं। 🔷 2. राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य तथा दिल्ली व पुडुचेरी केंद्रशासित राज्य विधानसभाओं के सदस्य इस महाभियोग प्रस्ताव में भाग नहीं लेते हैं, जबकि वे राष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेते हैं।

🔹🔹दिलचस्प बात ये है कि अभी तक किसी भी राष्ट्रपति_(President) को महाभियोग के द्वारा हटाया नहीं गया है।

🔰अनुच्छेद 62

अनुच्छेद 62राष्ट्रपति के पद की रिक्ति को भरने के लिए चुनाव कराने का समय के बारे में है।

राष्ट्रपति का पद निम्न प्रकार से रिक्त हो सकता है 🔷 1. पाँच वर्षीय कार्यकाल समाप्त होने पर, 🔷 2. उसके त्यागपत्र देने पर, 🔷 3. महाभियोग प्रक्रिया द्वारा उसे पद से हटाने पर, 🔷 4. उसकी मृत्यु पर, 🔷 5. किसी अन्य कारणों से, जैसे वह पद ग्रहण करने के लिए अर्हक न हो अथवा निर्वाचन अवैध घोषित हो।

▶ यदि पद रिक्त होने के कारण उसके कार्यकाल का समाप्त होना हो तो उस पद को भरने हेतु उसके कार्यकाल पूर्ण होने से पूर्व नया चुनाव करना चाहिए।

▶ यदि नए राष्ट्रपति के चुनाव में किसी कारण कोई देरी हो तो वर्तमान राष्ट्रपति पाँच वर्ष के उपरांत भी अपने पद पर बना रहेगा जब तक कि उसका उत्तराधिकारी कार्यभार ग्रहण न कर ले।

▶ संविधान ने यह उपबंध राष्ट्रपति के न होने पर पद रिक्त होने से शासनांतरण (Demigration) से बचने के लिए किया है।

इस स्थिति में उप-राष्ट्रपति को यह अवसर नहीं मिलता है कि व कार्यवाहक राष्ट्रपति की तरह कार्य करे और उसके कर्तव्यों का निर्वहन करें।

💢 यदि उसका पद, उसकी मृत्यु, त्यागपत्र, निष्कासन अथवा अन्यथा किसी कारण से रिक्त होता है तो नए राष्ट्रपति का चुनाव पद रिक्त होने की तिथि से छह महीने के भीतर कराना चाहिए।

जब तक चुनाव नहीं हो जाता उप-राष्ट्रपति, कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करेगा। नया राष्ट्रपति निर्वाचित होने के बाद पद ग्रहण करने से पाँच वर्ष तक अपने पद पर बना रहेगा।

💢 इसके अतिरिक्त यदि वर्तमान राष्ट्रपति, अनुपस्थिति, बीमारी या अन्य कारणों से अपने पद पर कार्य करने में असमर्थ हो तो उप-राष्ट्रपति उसके पुनः पद ग्रहण करने तक कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करेगा।

यदि उपराष्ट्रपति का पद रिक्त हो, तो भारत का मुख्य न्यायाधीश अथवा उसका भी पद रिक्त होने पर उच्चतम न्यायालय का वरिष्ठतम न्यायाधीश कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करेगा तथा उसके कर्तव्यों का निर्वाह करेगा।

🔷 जब कोई व्यक्ति, जैसे उप-राष्ट्रपति, भारत का मुख्य न्यायाधीश अथवा उच्चतम न्यायालय का वरिष्ठतम न्यायाधीश, कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप मे कार्य करता है अथवा उसके कर्तव्यों का निर्वहन करता है तो उसे राष्ट्रपति की समस्त शक्तियाँ व उन्मुक्तियाँ प्राप्त होती है तथा वह संसद द्वारा निर्धारित सभी उपलब्धियाँ, भते व विशेषाधिकार भी प्राप्त करता है।

🔰अनुच्छेद 71

अनुच्छेद 71 – इसका संबंध राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति से संबंधित विवाद से है। कि अगर किसी तरह का कोई विवाद होता है तो क्या किया जाएगा?

जैसे कि एक विवाद है – मार्च 1974 का जब गुजरात की सरकार गिर गयी थी। लेकिन इसके बावजूद भी राष्ट्रपति_(President) का चुनाव कराया गया था।

तो सवाल यही उठा कि जब एक राज्य के विधानमंडल का सदस्य है ही नहीं तो फिर राष्ट्रपति का चुनाव कैसे हो सकता है।

हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भले ही किसी राज्य का विधानमंडल भंग हो या फिर किसी सांसद की मृत्यु हो जाये चुनाव हो के रहेगा।

क्योंकि अनुच्छेद 62 में भी ये लिखा है कि पुराने राष्ट्रपति_(President) का पद छोड़ने से पहले नए राष्ट्रपति का चुनाव हो जाना चाहिए।

यही बात अनुच्छेद 71 में लिख दिया गया है कि कुछ भी हो जाये राष्ट्रपति का चुनाव हो के ही रहेगा। तो इस तरह से जितने भी विवाद है, उसका हल इसी में मिल जाएगा।

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